Wednesday, 30 November 2016

पशु पालन

i”kq ikyu

i”kq ikyu NksVs lhekar d`’kdksa d`f’k etnwjksa o csjkstxkj ;qodksa ds fy, jkstxkj ,oa vfrfjDr vk; dk ,d loksZRre yksdfiz; lk/ku gSA i”kq ikyu ls izR;{k o ijks{k  #i ls yxHkx 2 djksM+ ls Hkh vf/kd yksxksa dks jkstxkj feyrk gS] ftlesa fL=;ksa dh Hkkxhnkjh yxHkx 70 izfr”kr ls Hkh vf/kd gSA xzkeh.kPkyksa esa jkstxkjksUeq[kh O;olk; esa d`f’k vk/kkfjr jkstxkjksa dh vis{kk i”kq ikyu vk/kkfjr O;olk; dks vf/kd yksxksa us jkstxkj lk/ku ds :i esa viuk;k gqvk gSA nw/k ds vfrfjDr i”kqvksa ls izkIr jDr]PkchZ]gfM~M;ka vkSj [kky dbZ izdkj ds /kaU/kksa dh eq[; lkefxz;ka gSaA buesa Hkkjokgh i”kq”kfDr dk ;ksxnku lfEefyr ugha gSA i”kqvksa ls vf/kd mRiknu izkfIr ds mn~ns”; gsrq fons”kh uLy ds mUur uj i”kq ds oh;Z ls eknk i”kq dks xfHkZr djkdj ladj uLy rS;kj dh tk jgh gSA ladj xksi”kqvksa ls vkSlru 2900 fdxzk nw/k C;kar miyC/k gks tkrk gSA nw/k dk vkSj vf/kd mRiknu c<+kus dh iwjh lEHkkouk,a gSA i”kqvksa ls ;FkklEHko mRikn o`f++) ds fy, Hkkjr dh dsUnz ljdkj rFkk jkT; ljdkjksa }kjk vusdksa ;kstukvksa dk lQy fdz;kUo;u fd;k tk jgk gSA
       ikyrw i”kqvksa dks mudh vkfFkZd o lkekftd egRo]mi;ksfxrk ds vuqlkj lewgc+) fd;k x;k gSA pkj isV okys i”kq tSls&xk;]HkSal]ÅaV]HksM+]cdjh]fgj.k vkfn jkseUFkh lewg esa vkrs gSa]tcfd ,d isV okys i”kq tSls&?kksM+k]”kwdj vkfn vjkseUFkh dgykrs gSaA
                 ikyrw i”kqvksa dh eq[; uLys
a                      jkseUFkh oxZ
xksi”kq
   ,Q vks eSuqvy esa 1953 esa & Hkkjr esa tkus okys xksi”kqvksa dks muds lhax]eLrd]Ropk ds jax]”kkjhfjd xBu]M~;wySi rFkk f”k”ukoj.k] dh jpuk ;k cukoV ds vk/kkj ij uhps fy[ks 6 lewgksa esa j[kk x;k gSA
1Û  izFke lewg&yEch vkSj fljs ij eqM+h gqbZ lhax okys /kwlj xksi”kq bl lewg ds vUrxZr vkrs gaSA buds eLrd ij lQsn mHkkj]vka[ks mHkjh gqbZ rFkk psgjk likV gksrk gSA budks ^yk;js gkuZ xzs dSVy^ dgk tkrk gSA dkadjst]efyuh][ksjhx<+ rFkk Fkkjikjdj bl lewg dh eq[; uLysa gSaA
2Û  f}rh; lewg& bl lewg ds vUrxZr NksVh lhax]”osr vFkok /kwlj jax ,oa rkcwr ln`”k flj okys xksi”kq vkrs gSaA bu xksi”kqvksa dh vka[ksa vkSj psgjk FkksM+k mHkjk gksrk gSA bl Js.kh esa&gfj;kuk]esokrh]vkaxksy]jkBh]ukxiqjh vkSj d`’.kkoSyh uLy ds i”kq vkrs gSaA
3Û  r`rh; lewg& bl lewg ds xksi”kq Hkkjh dk;k okys gksrs gSa rFkk budk M~;wySi o f”k”ukoj.k >kyjnkj gksrk gSA bu Js.kh esa&fxj]lkghoky]jsM flU/kh]nsouh]Mkaxh vkSj fuekM+h uLysa vkrh gSaA
4Û pkSFkk lewg& bl lewg ds vUrxZr vkus okys xksi”kqvksa dks ^eSlwj xksi”kq^ ds uke ls Hkh tkuk tkrk gSA ;g xksi”kq e/;e dB&dkBh]lqxfBr nsg;qDr rFkk “kfDr”kkyh ta?kk okys gksrs gSaA budk f”k”ukoj.k pqLr ,oa mnj ls lVk gqvk jgrk gSA lhax o eLrd dh jpuk bl lewg ds xksi”kqvksa dh ,d fo”ks’k izdkj dh gksrh gSA budk eLrd mHkjk gqvk vkSj lhax flj ds Åijh Hkkx ls fudydj Åij tkrs gq, ihNs dh vksj eqM+ tkrs gSaA nksuksa lhaxksa ds chp dk vUrj vU; xksi”kqvksa dh rqyuk esa de gksrk gSA bl Js.kh esa ve`r egy]dkaxk;e]gsYyhdj]cNkSj ,oa f[kYykj uLy ds xksi”kq vkrs gSaA
5Û  ikapoka lewg& bl lewg ds vUrxZr lhjh o iuokj uLy ds xksi”kq vkrs gSaA fofHkUu uLyksa ds fefJr y{k.k;qDr ;g xksi”kq eq[;r;k fgeky; o Åaps&uhps igkM+h {ks=ksa esa ik;s tkrs gSaA ;g i”kq vis{kkd`r NksVs]jax esa dkys ]yky ;k budh Ropk ij fofHkUu vkdkj o jax ds /kCcs feyrs gSaA dke esa pqLr bu i”kqvksa dk f”k”ukoj.k mnj ls lVk gksrk gS rFkk lhax NksVs vFkok cM+s ik;s tkrs gSaA

NBk lewg& mijksDr of.kZr lewgksa esa u vkus okys xksi”kqvksa dks bl Js.kh esa j[kk x;k gSA mijksDr of.kZr 5 lewghsdj.k esa xksi”kqvksa dh 27 uLyksa dks lfEefyr fd;k x;k gS] fdUrq uohure vuqlU/kku ifj.kkeksa ds vk/kkj ij xksi”kqvksa dh uLyksa dks u;s fljs ls Js.khc) fd;k x;k gSA

Wednesday, 23 November 2016

घुमना रोग

कारण व लक्षण –
इस रोग में पशु एक स्थान पर घुमता रहता हैं । उसे बेहोशी हो जाती हैं । बाँधने पर पशु बंधी रस्सी के सहारे खड़ा होता हैं । ऐसा मालूम होता हैं कि उसे आँखों से दिखाई नहीं पड़ रहा हो तो इस रोग में पशु ऐसे घुमता है जैसे कुम्हार अपना चाक घुमाता हैं । इसे ही घुमना रोग कहते हैं ।

१ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर में हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर दिन में कम से कम ३ बार पिलाना चाहिए । अधि से अधिक ५-६ बार पिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - बकरी का दूध १ लीटर , हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर दिन में ५-६ बार पिलाने से पशु को आराम आता हैं ।

३ - औषधि - असली मलयगिरी चन्दन को पत्थर पर घिसकर १-१ छटांक दिन में ५-६ बार पिलाने से भी लाभ होता हैं ।

४ - औषंधि - अलसी १२५ ग्राम की मात्रा को भिगोकर दिन में ३ बार पिलाने से भी लाभ होता हैं ।

मूर्छा रोग


कारण व लक्षण - 

इस रोग में पशु धीरे- धीरे अलसाने लगता हैं । घुमरी ( घमेर ) आया करती हैं । पशु की बेचैनी बढ़ती जाती हैं । फिर एकाएक पशु ज़मीन पर गिर जाता हैं और मूर्च्छित ( बेहोश ) हो जाता हैं ।

१ - औषधि - नमक १२५ ग्राम , सोंठपावडर १५ ग्राम , गुड़ डेढ़ छटांक , गन्धक चूर्ण डेढ़ छटांक , सभी को दो लीटर गरमपानी में मिलाकर रखें और ठण्डा होने पर नाल में भरकर पशु को पिलाने से आराम आता हैं ।

२ - औषधि - हींग आधा तौला , कालीमिर्च पावडर ५ ग्राम , ज़ीरा पावडर १० ग्राम , अदरक पीसकर १ छटांक , सभी को मिलाकर गरम पानी में मिलाकर नाल द्वारा पिलाना चाहिए , दोनों दवाई के बीच तीन घन्टे होना चाहिए । ये दोनों खुराक एक दिन ही दें सकते हैं ।

३ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर में हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर पिलाने से बिमार पशु को बहुत ही लाभ होता हैं । यह दवा दिन में तीन बार देना चाहिए ।

हिरण वाह ( हिरणाबाँय ) पागलपन

कारण व लक्षण –

इस रोग में पशु पागल होकर जानवरों और आदमियों को मारने के लिए दौड़ता हैं । खुर से मिट्टी कुरेदता हैं , मौक़ा पाकर बहुत दूर भागने की कोशिश करता हैं । उसको अपने देह की सुध नहीं रहती हैं और उसकी आँख लाल हो जाती हैं

१ - औषधि - असली मलयगिरी चन्दन को पत्थर पर कूछ बुंदे पानी की डालकर घिसकर पेस्ट बनाकर रोगी पशु को पिलाने से अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता हैं ।

२ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर , हल्दीपावडर १ छटांक , दूध में मिलाकर दिन मे ४-५ बार पिलाने से पशु को लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - हिरण की नाभि १ छटांक , लालमिर्च १ छटांक , पीसकर गरम पानी में मिलाकर दिन में तीन बार पिलाने से लाभँ होता हैं और पशु जल्दी ही ठीक हो जाता हैं ।

५ - औषधि - बारहसिंगा के के सींग को पत्थर पर कुछ बुंदे पानी डालकर सींग को घीसकर पेस्ट बना लें और पशु को खिलाने से आराम आता हैं ।

६ - औषधि - बाघ का माँस को पानी में पीसकर पशु को पिलाने से आराम आता हैं ।

जकड़ा रोग: कारण और बचाव


कारण व लक्षण - 

यह एक वायु रोग है । इस रोग में पशु का शरीर जकड़ सा जाता है इस लिए इस रोग को जकड़ा रोग कहते हैं । गाय -भैंस के पैरों में वायु विकार के कारण पशु खड़ा नहीं हो पाता हैं ।

१ - औषधि - बकरबेल, हाड़ा बेल , ( । ) यह बेल काष्ठिय पौधों पर चढ़ती है और तने से लिपटी रहती है । और पत्तियों को तोड़ने से इसके डंठल से दूध निकलता है ।

बकरबेल २ किलो की कूट्टी काटकर २० भाग करलें । एक भाग सवा किलो पानी में उबालें और एक किलो शेष रहने तक उबाले यह एक खुराक के लिए प्रयाप्त है । अब मेंथी का चूर्ण १ किलो , कूटकी २०० ग्राम , मालकंगनी २०० ग्राम , कालीजीरी १०० ग्राम , इन दवाइयों को कूटकर चालीस खुराक बना लेंएक खुराक लेकर ।बकरबेल की पानी में बनी खुराक दोनों को मिलाकर सुबह -सायं देने से लाभ होगा यह दवाई दस दिन तक दवाई खिलाऐ । 

मालिश के लिए मरहम-- तारपीन का तेल १५० ग्राम , सरसों का तैल २५० ग्राम , मोम देशी १०० ग्राम , सज्जी १०० ग्राम , मर्दा सिंह २५ ग्राम , को लेकर सज्जी व मूर्दा सिंह को कूटछानकर बाक़ी दवाइयों को मिलाकर किसी बर्तन में रखकर धीमी आँच पर गर्म कर ले , यह मरहम बन जायेगा । एकबार पशु को स्नान के बाद लगाये । लाभ अवश्य होगा ।

पशुओं में गठिया या जोड़ों का दर्द

कारण व लक्षण –

पशु के शरीर में यह एक प्रकार का रक्तविकार है । अशुद्ध घास, दाना और पानी पीने से यह रोग उत्पन्न हो जाता है । रोगी पशु उदास रहता है । उसके खाने - पीने तथा जूगाली करने में कुछ कमी आ जाती है । पहले उसके अगले घुटनों पर सूजन आती है , फिर पिछले घुटनों पर । इसके बाद शरीर में गाँठ के रूप में सूजन इसी तरह आती और उतरती है । यह क्रम कई दिनों तक चला करता है । सूजन एक जोड़ से दूसरे जोड़ पर चली जाती है । कुछ दिन तक पुनः इसी जोड़ पर सूजन आ जाती है । तब पशु काम के लायक नहीं रहता ।

१ - औषधि - हरी मेंथी रोगी पशु को ९६०० ग्राम , प्रतिदिन एक माह तक खिलायी जाय । इससे उसे अवश्य आराम होगा । पशु भी तैयार हो जायगा ।

२ - औषधि - मेंथी का दाना ७२० ग्राम , पवाडिया ( चक्रमर्द ) के बीज ७२० ग्राम , काला नमक ६० ग्राम , पानी ४००० ग्राम , सबको बारीक पीसकर चलनी द्वारा छानकर पानी के साथ ८ घन्टे भिगोकर रोगी पशु को , आराम होने तक दिया जाय । पशु को खली आदि । देना बन्द कर देना चाहिए । उसे केवल हरा चारा देना चाहिए । उक्त दवा पशु को सुबह - सायं देनी चाहिए ।

३ - औषधि - साम्राज्य बेला १२० ग्राम , गिरदान १२० ग्राम , नागोरी अश्वगन्धा ४८० ग्राम , काला कुडा़ ६०० ग्राम , सबको बारीक पीस,छानकर चूर्ण बना लेना चाहिए । रोगी पशु को रोज १०० ग्राम चूर्ण , पानी ४०० ग्राम, में उबालकर , बोतल द्वारा, बिना छाने पिलाये । यह दवा रोगी पशु को २२ दिन तक पिलायी जाय ।

Tuesday, 18 October 2016

गाय में गठिया रोग

गठियाँ रोग ( Gout )
कारण व लक्षण -
इस रोग में पशु के ख़ून में विकार उत्पन्न होकर पुट्ठों तथा जोड़ो में सूजन हो जाती हैं तथा उनमें बड़ा दर्द होता हैं । खराब चारा- दाना खाने अधिक समय तक खडे रहने , एकदम तेज गर्मी से ठण्डक में जाने , सीलन युक्त स्थानों पर बँधे रहने पर , आदि कारणों से यह रोग होता हैं । इस रोग से ग्रसित पशुओं के जोड़ो और पुट्ठों में दर्द होता हैं । जोड़ो पर अचानक सूजन हो जाती हैं । पशु चलने - फिरने मे असमर्थ हो जाता हैं तथा बेचैनी से करवटें बदलता रहता हैं । कभी - कभी उसे बुखार भी हो जाता हैं ।

औषधि -
१-सबसे पहले पशु को जूलाब देना होगा । इसलिए अरण्डी तैल आठ छटांक अथवा सरसों के तैल में आधा छटांक सोंठ पावडर मिलाकर पशु को पिलाना चाहिए ।
२-काला नमक आठ छटांक और आधा छटांक सोंठ कुटपीसकर दोनो के आधा लीटर पानी में मिलाकर पिलाना चाहिए ।
नोट - जूलाब देने के बाद अगली दवाओं का उपयोग करना चाहिए -

३ - गुड १ पाव , सोंठ १ तौला , अजवायन १ छटांक , मेंथी आधा पाव और भाँग १ तौला - इन सब द्रव्यों को घोटकर - पीसकर २५० ग्राम , दूध में गुड़ सहित घोलकर आग पर पकाकर पशु को पिलायें । यह योग गठिया रोग में लाभकारी हैं ।
४ -  दूसरे दिन पशु को निम्नांकित योग को तैयार कर १-१ मात्रा दिन में बार दें । पलाश पापड़ा ( ढाक के बीज ) , अनार की छाल , सौँफ और अमलतास - प्रत्येक १-१ तौला लें । इन द्रव्यों को आधा लीटर पानी में पकायें और जब २५० मिली पानी शेष रह जायें तो गुनगुना - गुनगुना ही पशु को ख़ाली पेट पिलायें ।
५ - उपर्युक्त औषधि मुख द्वारा सेवनीय औषधियों के अतिरिक्त गठिया रोग में , बाहृाउपचार आवश्यक हैं । निम्नलिखित तैलो से जोड़ो पर मालिश करके रूई के फाहों से सेंक करना चाहिए और फिर वही फांहें उन्हीं जोड़ो पर बाँध देना चाहिए , लेकिन उनके हवा न लगे । इससे पशु को दर्द मे आराम आता हैं तथा सूजन भी कम होती हैं
# - इस रोग मे ठण्डी हवा बहुत हानिकारक होती हैं । अत: उससे विशेष रूप से बचाव रखें ।












गठिया नाशक बाहृा उपचारार्थ तेलीय योग

औषधि - 
१-आक ( मदार ) के पत्तों को कुटकर रस निचोड़ लें ओर २५० ग्राम तिल के तेल मे एक लीटर रस मिलाकर आग पर रखकर पकायें । जब रस जलकर तेल मात्र शेष रह जायें तो उसे कपड़े से छान लें । इस तेल की जोड़ो पर मालिश करना लाभकारी हैं ।
२ - कपूर १ तौला पीसकर , तारपीन तेल १ छटांक , दोनो को आपस मे मिलाकर मालिश करना गुणकारी होता हैं ।
३ -  धतुरे के पत्तों का रस १ पाव निकालकर उसे आधा सेर कड़वा ( सरसों ) तेल मे मिलाकर पकायें । जब रस जलकर तेल मात्र शेष रह जायें तो छानकर मालिश के कार्य में लेना लाभकारी होता हैं ।
४ - धतुरा बीज २ तौला पीसकर , तिल का तेल १ पाव , दोनो को मिलाकर १५-२० दिन तक धूप में रखे , बीस दिन के बाद छानकर शीशी भरकर रख लें । इस तेल की मालिश करना भी गठिया मे लाभकारी होता हैं ।
५ - एक पाव लहसुन की पोथियाँ अच्छी तरह कुचलकर उन्हे आधा लीटर तिल के तेल मे डालकर आग पर पकायें जब तेल भलीभाँति पक जायें तो तेल छानकर स्वच्छ शीशी मे भर कर रख लेवें । इस तेल की मालिश भी गुणकारी होती हैं ।
६ - हरी- हरी दूबघास ( दूर्वा ) को १० सेर पानी में उबालकर गरमपानी का जोड़ो वाले स्थान पर भपारा दें और दर्द वाली जगह पर गरम- गरम पानी डालें । इस प्रयोग से पशु का दर्द कम होता हैं ।
७ - पलाश के फूल ( ढाक,टेशू के फूल ) २ किलो , १० सेर पानी में उबालकर गरम - गरम पानी का भपारा दें व पानी डालकर सिकाई करने से भी दर्द कम होता हैं ।
# - औषधि - जब पशु को गठिया रोग मे कुछ आराम हो जायें तथा दर्द कम हो जायें और सूजन भी जाती रहे , पशु आराम से चलने फिरने लगे तो कुछ दिनों तक हवा व सर्दी से बचाते हुए ताक़त प्राप्ति हेतू नीचे लिखे योगों का उपयोग करना चाहिए - -
८ - औषधि - हराकसीस,सोंठ,चिरायता , तथा भाँग अथवा खाने वाला सोडा ( प्रत्येक १-१ तौला ) लेकर आधा लीटर पानी मे घोलकर अथवा गुड की डली में मिलाकर कम से कम सात दिनों तक सुबह के समय पशु को लगातार खिलाना चाहिए । इस प्रयोग से पशु को खोई हुऐ शक्ति पुन: प्राप्त हो जाती हैं ।

पथ्य - इस रोग में पशुओं को बादीकारक या कब्जकारक चींजे कदापि नही खिलानी चाहिए । ब्लकि शीघ्रपाची तथा गरम चींजे जैसे - चाय , दूध , दलिया आदि ही खिलानी चाहिए । चना , मटर , लोबिया आदि द्विदलीय जाति के दाने या ठण्डी वस्तुओं का सेवन वर्जित हैं । पानी भी ठण्डा न देकर थोड़ा गुनगुना पिलाना चाहिए और हवा , सर्दी एवं बरसात से पशु को बचाकर रखना चाहिए । यदि ठण्ड अधिक हो तो पशु को गरम झूल ओढायें तथा उसके बाँधने के स्थान पर उपलो की आग सुलगा देनी चाहिए ।