(१६)- गौ- चिकित्सा - बवासीर( Piles )
१ - पशुओं को बवासीर ( Piles )
============================
कारण- लक्षण :- अधिक दिनों तक क़ब्ज़ व दस्त आदि की शिकायत रहने तथा जिगर की बिमारी के कारण पशु को बवासीर होजाता है इस बिमारी से पशु के मलद्वार में मस्सें हो जाते है और उनसे के क़तरे निकलते रहते हैं । जो गोबर में अलग ही दिखाई देते हैं यदि अन्दर से ख़ून आता हैं तो समझ लेना चाहिए कि किसी घाव आदि के कारण आया हैं क्योंकि बवासीर की मुख्यत: एक ही पहचान है कि उसके मलद्वार में मस्सें होते हैं ।
१ - औषधि - ककरोंदा पावडर २ तौला , कबीला पावडर ढाई तौला , गाय के दूध से बनी छाछ ५०० ग्राम , में मिलाकर पशु को नित्य पिलाते रहने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - रसोंत ६ माशा , गेन्दें की पत्ती ढाई तौला , नीम की निबोली ढाई तौला लेकर दोनों को भली-भाँति घोंटकर पशु को प्रतिदिन पिलाना चाहिए, यह गुणकारी हैं ।
३ - औषधि - मलद्वार में बवासीर के मस्सों पर भाँग की ताजी पत्ती कूटकर गरम करके बाँधें अथवा गेंदें की पत्तियों की टिकीया बनाकर बाँधें। तदुपरान्त १ तोला माजूफल पीसकर उसमें तीन माशा अफ़ीम मिलाकर गाय के घी के साथ घोटकर लेंप तैयार करें और मस्सों पर लगायें । इस प्रयोग से शीघ्र लाभ होगा ।
४ - औषधि - रसकपूर १ रत्ती , कपूर २ रत्ती , काशकारी सफेदा ४ रत्ती , मुर्दासंग ८ रत्ती , और गाय का घी १ तौला , लें सभी को घोंटकर मरहम बना लें मरहम गाढ़ा - गाढ़ा होना चाहिए इस मरहम को पशु की गदा में मस्सों पर लगाने से मस्सें शीघ्र ठीक होने लगतें हैं ।
इस रोग में मस्सें अधिक कष्ट कारी होते हैं अत: इन मस्सों को मिटना अतिआवश्यक होता हैं ।
५ - औषधि - बवासीर के मस्सों पर सुअर की चर्बी की मालिश करते रहने से मस्सें नष्ट हो जाते हैं और पशु ठीक हो जाता हैं । यह अतिगुणकारी औषधि हैं । बवासीर की दवाये लम्बे समय करनी पड़ती हैं । तब यह रोग समूल नष्ट होता है इसका इलाज जल्दी बन्द नहीं करना चाहिए ।
# - बदहजमी व क़ब्ज़ पशु को न हो ये ध्यान रहे पशु को क़ब्ज़ कारक व भारी आहार न दें । हल्का सुपाच्य आहार देना चाहिए ।
Sent from my iPad
Tuesday, 13 January 2015
गौ- चिकित्सा -नकसीर फूटना ( Epistoxis )
नकसीर फूटना (Epistoxis)
कारण-लक्षण :- हृष्ट- पुष्ट पशुओं की नाक पर चोट लग जाने, अधिक छींके आने , धूप की गर्मी से अथवा गरम औषधियों के प्रभाव आदि कारणों से नाक की सुक्ष्म शिराएँ फट जाता हैं और ख़ून बहने लगता हैं इसी को नकसीर कहते हैं ।
१ - औषधि - सिर पर ठन्डे पानी की लगातार धार डालते रहने से रक्त जमकर नाक से ख़ून बहना बन्द हो जाता हैं ।
२ - औषधि - थोड़े से पानी में फिटकरी पीसकर ,घोलकर उसमें माजूफल घिसकर डाल लें इस पानी की बूँदें पशु के नाक में टपकाने रूई का फोहा तर करके नाक में रखने से रक्त गाढ़ा होकर नकसीर बन्द हो जाती है
३ - औषधि - चिरायता एक छटांक कुटकी और गिलोय ढाई-ढाई तौला और शक्कर २५० ग्राम , लेकर सभी को पानी में घोलकर शर्बत बनाकर नाल द्वारा पशु को पिलायें । नकसीर फूटने में इस योग का सफल प्रयोग है ।
कारण-लक्षण :- हृष्ट- पुष्ट पशुओं की नाक पर चोट लग जाने, अधिक छींके आने , धूप की गर्मी से अथवा गरम औषधियों के प्रभाव आदि कारणों से नाक की सुक्ष्म शिराएँ फट जाता हैं और ख़ून बहने लगता हैं इसी को नकसीर कहते हैं ।
१ - औषधि - सिर पर ठन्डे पानी की लगातार धार डालते रहने से रक्त जमकर नाक से ख़ून बहना बन्द हो जाता हैं ।
२ - औषधि - थोड़े से पानी में फिटकरी पीसकर ,घोलकर उसमें माजूफल घिसकर डाल लें इस पानी की बूँदें पशु के नाक में टपकाने रूई का फोहा तर करके नाक में रखने से रक्त गाढ़ा होकर नकसीर बन्द हो जाती है
३ - औषधि - चिरायता एक छटांक कुटकी और गिलोय ढाई-ढाई तौला और शक्कर २५० ग्राम , लेकर सभी को पानी में घोलकर शर्बत बनाकर नाल द्वारा पशु को पिलायें । नकसीर फूटने में इस योग का सफल प्रयोग है ।
(१८)-गौ - चिकित्सा - न्यूमोनिया ( Pneumonia )
(१८)-गौ - चिकित्सा - न्यूमोनिया ( Pneumonia )
१ - न्यूमोनिया ( Pneumonia ) ( फेफड़ों की सूजन )
कारण व लक्षण :- न्यूमोनिया अर्थात फेफड़ों की सूजन का रोग है , यह एक भंयकर रोग हैं जिसके कारण मृत्यु भी हो जाती है अत: इसके इलाज में देरी व लापरवाही नहीं करनी चाहिए अक्सर खाँसी , ज़ुकाम ,के बाद न्यूमोनिया हो जाने का डर रहता हैं और इसी प्रकार बुखार के बाद भी न्यूमोनिया हो जाता हैं । इस रोग के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में हज़ारों पशु अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं ।
भयानक गर्मी से या सर्दी मे आ जाने से दौड़कर या अधिक परिश्रम करने पर पसीनें में होने पर पानी में भीग जाते हैं या ठन्डा पानी पी लेते हैं तो पशु के फेफड़ों पर सूजन आ जाती हैं और रोग तेज़ी से बढ़कर फेफड़ों को प्राकृतिक कार्य करने से रोक देता हैं जिसके कारण श्वास रूक जाने के कारण पशु की मृत्यु हो जाती हैं । गीलें गन्दे व शीलनयुक्त स्थानों पर पशुओं को नहीं रखना चाहिए या अधिक कमज़ोर पशु पर यह रोग आक्रमण करता हैं , पशु को हर समय तेज़ बुखार रहता हैं पिडित पशु काँपता रहता हैं , फेफड़ों तथा पसलियों में तेज़ दर्द के कारण कराहता तथा छटपटाता रहता हैं , और उसे साँस लेने में कठिनाई होती हैं । पशु के नथुनों बार- बार फूलते हैं पशु दाँत पीसता रहता हैं , अन्त में नाक से ख़ून मिला हुआ बलगम आने लगता हैं , पशु अपने अगले पैरों को चौड़ा करके खड़ा हो जाता हैं तथा उसे बैठने में कष्ट होता हैं , आँखें लाल हो जाती हैं पेशाब का रंग गहरा लाल हो जाता हैं इसके बाद पशु को दस्त भी होने लगते हैं । पशु की साँसें तेज़ और अधुरी चलने लगती हैं और यह लक्षण सात दिन तक बढ़ते है उसके बाद घटने लगते हैं ।
# - ध्यान रहे ---- इस रोग में यदि बुखार बिना इलाज के ही कम हो जाये और बिमार पशु आराम से साँस लेने लगे तो यह अशुभ लक्षण हैं ऐसा होने समझ लेना चाहिए कि पशु की मृत्यु के नज़दीक़ हैं
# - जो ज़ुकाम व सर्दी मे भपारा देने की विधी बतायी गयी हैं वह इस रोग में लाभकारी होता हैं ।
१ - औषधि :- पशु की छाती पर अलसी का लेप लगाकर रूई रखकर कपड़ा बाँध देना चाहिए तथा अलसी के तेल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करना व रूई के फाेहो से गरम- गरम सिकाई करनी चाहिए , यह लाभकारी सिद्ध होता है ।
२ - औषधि :- कपूर ३ तौला , जावित्री ३ माशा , मदार की छाल १ तौला , केसर ६ रत्ती , मुलहटी २ तौला , कलमीशोरा १ तौला , नौसादर १ तौला , अलसी २ तौला , गन्ने का शीरा १ छटांक , सबको आपस में मिलाकर दिनभर में २-३ खुराक देवें तथा पशु को पीने के लिए गुनगुना पानी देना चाहिए ।
३ - औषधि :- सोंठ , काकडासिंगी , छोटी पीपल , चाय पत्ती , प्रत्येक १-१ तौला , अजवायन २ तौला , लेकर मोटा- मोटा कूटकर आधालीटर पानी में डालकर पकायें जब पानी जल कर डेढ़ पाँव रह जायें तब उतारकर उसमें गुड १ तौला , कपूर २ माशा , धतुरा बीज पावडर १ माशा , ढाई तौला देशी शराब मिलाकर यह दवा पशु को नाल द्वारा पशु को पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - फेफड़ों की सूजन ( निमोनियाँ )
=====================================
कारण व लक्षण - यह रोग शीत ऋतु में या वर्षाऋतु में अक्सर होता है । बुखार की हालत में पसीना होने पर बहुत ठन्डा पानी पिलाने से और ठन्डी हवा लग जाने से तथा वर्षा में अधिक समय तक भीग जाने से यह रोग हो जाता है । कभी-कभी पशु को समय पर पानी न मिलने से ,और अधिक प्यास में अधिक पानी पी लेने से यह रोग हो जाता है ।
इस रोग में रोगी पशु बहुत सुस्त रहता है । खाना- पीना और जूगाली करना बन्द कर देता है । उसके रोये खड़े हो जाते है । उसे ज़ख़्म और खाँसी हो जाती है । और पशु का शरीर काँपता है और साधारण ज्वर हर समय बना रहता है । आँखें लाल तथा गहरी हो जाती है,उसकी नाक से बलगम निकलता रहता है तथा नाड़ी तेज़ चलती रहती हैं ,पशु उस बाज़ू दबाव देकर बैठता हैं,जिस बाज़ू के फेफड़े में दर्द होता हैं और पशु बार- बार दाँत पीसता रहता है । रोग शुरू होने के बाद ६-७ दिन में यह बिमारी बढ़ जाती है । रोगी पशु के कान की जड़ ठन्डी हो जाती है , पशु के उपर के होंठ पर पसीने की बूँदें नहीं रहती है यानि होंठ ख़ुश्क बनारहता हैदर उसकी ठन्डी साँसें चलती रहती हैं तथा पशु कराहता रहता और आँखें अन्दर की और धँस जाती है ।
१ - औषधि -भैंसों के लिए- सादा नमक पिसा हुआ ३० ग्राम , नारियल तेल ४०० ग्राम , नमक को तेल में मिलाकर गुनगुना गरम करके रोगी पशु के पूरे शरीर में आधे घन्टा तक मालिश करनी चाहिए , फिर उसके शरीर पर सूखी घास रखकर ऊपर से चार कम्बल ओढाये और उन्हें रस्सी से बाँध देने चाहिए , जिससे घास और कम्बल अपनी जगह से सरकें। पानी गरम करके ठन्डा होने तक पिलाया जाय । रोगी पशु को बन्द कमरे में बाँधा जाय और रोगी पशु को हरी घास व ठन्डी चींजे न खिलायी जाय । केवल सूखी नरम घास व गेंहू का भूसा खिलाया जाय वही उसके नीचे बिछाया जाय इससे पशु को गर्मी पहुँचेगी
# - गाय के लिए- गाय व बैल की केवल हाथ से ही आधा घन्टे मालिश की जाये,और मालिश करने के बाद उपरोक्त विधी द्वारा ही घास व कम्बल बाँध दिये जाये ।
२- औषधि - देशी मुर्ग़ी के २अण्डे , १० ग्राम हल्दी पावडर ,गाय का दूध २ लीटर गरम करके उसमें हल्दी तथा अण्डे को तोड़कर दूध में डाले और अण्डे केछिलके को फेंक दें। तथा दो दिन तक दिन में एक बार , तीनों को आपस में मिलाकर गुनगुना पशु को पिला देना चाहिए ।
# - तीसरे दिन १ लीटर दूध तथा एक अण्डा व ५ ग्राम हल्दी मिलाकर गुनगुना करके पशु को पिला देना चाहिए, अगर आवश्यक हो तो चौंथे दिन भी दें ।
३ - औषधि - इन्द्रायण फल ६० ग्राम , घुड़बच ६० ग्राम , काला ज़ीरा ६० ग्राम , सेंधानमक ६० ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , अदरक २५ ग्राम , गुड़ १२० ग्राम , अजवायन ६० ग्राम , पानी १४४० ग्राम , सभी को बारीक कूटपीसकर छलनी में छानकर ,पानी में उबालें ,जब पानी १००० ग्राम रह जाये तब गुनगुनापानी बिना छाने ही पशु को सुबह - सायं आराम होने तक इस मात्रा को पिलाते रहे ।
४- औषधि - अजवायन ६० ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , लहसुन ३६ ग्राम , काला ज़ीरा ६० ग्राम , चन्द्रशूर ६० ग्राम , गुड़ ४८० ग्राम , पानी ५०० ग्राम , सभी को बारीक पीसकर पानी में उबालकर काढ़ा बनायें डेढ़ लीटर काढ़ा रहने पर रोगी पशु को दोनों समय बनाकर पिलाना चाहिए और आराम होने तक दवा को पिलाते रहना चाहिए।
५ - औषधि - कालीमिर्च १२ ग्राम , घुड़बच ६० ग्राम , लौंग १२ ग्राम , नमक ३० ग्राम , सभी को बारीक पीसकर ,पानी ५०० ग्राम व देशी शराब ५०० ग्राम को आपस में मिलाकर बिना छाने ही पशु को पिलानी चाहिए और आराम होने तक दोनों समय इसी मात्रा को पिलाते रहना चाहिए ।
३ - दमारोग ( Asthma )
======================
कारण- लक्षण :- बूढ़े एंव कमज़ोर शरीर के पशु को अधिक दौड़ाने या उससे भारी काम लेने , बदहजमी अथवा खाँसी की शिकायत बहुत दिनों तक बनी रहने और ठीक प्रकार से चिकित्सा न होने पर रोग के बिगड़ जाने के कारण खाँसी या दमा रोग हो जाता हैं । दमा से बिमार पशु को खाँसी जल्दी- जल्दी आती हैं तथा घोर कष्ट के साथ श्वास खींचकर अन्दर लें जाना पड़ती हैं । श्वास खींचने के कारण ही उसकी कोख और पेट में दर्द होने लगता हैं । खाँसी के साथ ही बलगम भी निकलता हैं ।
१ - औषधि :- श्वेत संखिया ५ रत्ती , आटे में मिलाकर खिला देने से पशु का दमा ठीक हो जाता हैं ।
२ - औषधि :- धतुरा बीज १ रत्ती , अफ़ीम १ माशा , दोनों को पीस- घोलकर २५० ग्राम पानी के साथ सेवन कराने से भी दमारोग में आराम आता हैं ।
ये दोनों दवाये पशु को बारी- बारी से १५ दिन तक देते रहने से पशु बिलकुल ठीक हो जायेगा ।
३ - औषधि :- धतुरा बीज १ माशा , कपूर १ माशा , अनार का छिल्का १ तौला , देशी शराब १छंटाक , गन्ने का शीरा १ छटांक , लें । कपूर व धतुरा के बीजों को पीसकर बाँस के पत्तों के रस में मिलाकर शराब के साथँ घोल लें । इसके बाद अनार के छिलके को ५०० ग्राम पानी में पकायें जब पानी जलकर आधा है जाये तब पानी को कपड़े में छानकर पानी को रख लें तथा गुनगुना होने पर उसमें बाक़ी सभी दवाये मिलाकर दिन में दो बार पिलाने से लाभँ होता हैं ।
४ - औषधि :- नौसादर १ तौला , अदरक १ छटांक ,पीसकर गुड १ छटांक , लेकर उसमें मिलाकर पशु को खिलायें यह दवाई ऐसी स्थिति में लाभकारी होता है जब रोगी पशु का बलगम निकलने मे कष्ट होता हैं ।
# - ध्यान रहे पशु को भारी व बादी चीज़ों से बचाना आपकी ज़िम्मेदारी हैं ।
Sent from my iPad
१ - न्यूमोनिया ( Pneumonia ) ( फेफड़ों की सूजन )
कारण व लक्षण :- न्यूमोनिया अर्थात फेफड़ों की सूजन का रोग है , यह एक भंयकर रोग हैं जिसके कारण मृत्यु भी हो जाती है अत: इसके इलाज में देरी व लापरवाही नहीं करनी चाहिए अक्सर खाँसी , ज़ुकाम ,के बाद न्यूमोनिया हो जाने का डर रहता हैं और इसी प्रकार बुखार के बाद भी न्यूमोनिया हो जाता हैं । इस रोग के कारण प्रतिवर्ष हमारे देश में हज़ारों पशु अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं ।
भयानक गर्मी से या सर्दी मे आ जाने से दौड़कर या अधिक परिश्रम करने पर पसीनें में होने पर पानी में भीग जाते हैं या ठन्डा पानी पी लेते हैं तो पशु के फेफड़ों पर सूजन आ जाती हैं और रोग तेज़ी से बढ़कर फेफड़ों को प्राकृतिक कार्य करने से रोक देता हैं जिसके कारण श्वास रूक जाने के कारण पशु की मृत्यु हो जाती हैं । गीलें गन्दे व शीलनयुक्त स्थानों पर पशुओं को नहीं रखना चाहिए या अधिक कमज़ोर पशु पर यह रोग आक्रमण करता हैं , पशु को हर समय तेज़ बुखार रहता हैं पिडित पशु काँपता रहता हैं , फेफड़ों तथा पसलियों में तेज़ दर्द के कारण कराहता तथा छटपटाता रहता हैं , और उसे साँस लेने में कठिनाई होती हैं । पशु के नथुनों बार- बार फूलते हैं पशु दाँत पीसता रहता हैं , अन्त में नाक से ख़ून मिला हुआ बलगम आने लगता हैं , पशु अपने अगले पैरों को चौड़ा करके खड़ा हो जाता हैं तथा उसे बैठने में कष्ट होता हैं , आँखें लाल हो जाती हैं पेशाब का रंग गहरा लाल हो जाता हैं इसके बाद पशु को दस्त भी होने लगते हैं । पशु की साँसें तेज़ और अधुरी चलने लगती हैं और यह लक्षण सात दिन तक बढ़ते है उसके बाद घटने लगते हैं ।
# - ध्यान रहे ---- इस रोग में यदि बुखार बिना इलाज के ही कम हो जाये और बिमार पशु आराम से साँस लेने लगे तो यह अशुभ लक्षण हैं ऐसा होने समझ लेना चाहिए कि पशु की मृत्यु के नज़दीक़ हैं
# - जो ज़ुकाम व सर्दी मे भपारा देने की विधी बतायी गयी हैं वह इस रोग में लाभकारी होता हैं ।
१ - औषधि :- पशु की छाती पर अलसी का लेप लगाकर रूई रखकर कपड़ा बाँध देना चाहिए तथा अलसी के तेल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करना व रूई के फाेहो से गरम- गरम सिकाई करनी चाहिए , यह लाभकारी सिद्ध होता है ।
२ - औषधि :- कपूर ३ तौला , जावित्री ३ माशा , मदार की छाल १ तौला , केसर ६ रत्ती , मुलहटी २ तौला , कलमीशोरा १ तौला , नौसादर १ तौला , अलसी २ तौला , गन्ने का शीरा १ छटांक , सबको आपस में मिलाकर दिनभर में २-३ खुराक देवें तथा पशु को पीने के लिए गुनगुना पानी देना चाहिए ।
३ - औषधि :- सोंठ , काकडासिंगी , छोटी पीपल , चाय पत्ती , प्रत्येक १-१ तौला , अजवायन २ तौला , लेकर मोटा- मोटा कूटकर आधालीटर पानी में डालकर पकायें जब पानी जल कर डेढ़ पाँव रह जायें तब उतारकर उसमें गुड १ तौला , कपूर २ माशा , धतुरा बीज पावडर १ माशा , ढाई तौला देशी शराब मिलाकर यह दवा पशु को नाल द्वारा पशु को पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - फेफड़ों की सूजन ( निमोनियाँ )
=====================================
कारण व लक्षण - यह रोग शीत ऋतु में या वर्षाऋतु में अक्सर होता है । बुखार की हालत में पसीना होने पर बहुत ठन्डा पानी पिलाने से और ठन्डी हवा लग जाने से तथा वर्षा में अधिक समय तक भीग जाने से यह रोग हो जाता है । कभी-कभी पशु को समय पर पानी न मिलने से ,और अधिक प्यास में अधिक पानी पी लेने से यह रोग हो जाता है ।
इस रोग में रोगी पशु बहुत सुस्त रहता है । खाना- पीना और जूगाली करना बन्द कर देता है । उसके रोये खड़े हो जाते है । उसे ज़ख़्म और खाँसी हो जाती है । और पशु का शरीर काँपता है और साधारण ज्वर हर समय बना रहता है । आँखें लाल तथा गहरी हो जाती है,उसकी नाक से बलगम निकलता रहता है तथा नाड़ी तेज़ चलती रहती हैं ,पशु उस बाज़ू दबाव देकर बैठता हैं,जिस बाज़ू के फेफड़े में दर्द होता हैं और पशु बार- बार दाँत पीसता रहता है । रोग शुरू होने के बाद ६-७ दिन में यह बिमारी बढ़ जाती है । रोगी पशु के कान की जड़ ठन्डी हो जाती है , पशु के उपर के होंठ पर पसीने की बूँदें नहीं रहती है यानि होंठ ख़ुश्क बनारहता हैदर उसकी ठन्डी साँसें चलती रहती हैं तथा पशु कराहता रहता और आँखें अन्दर की और धँस जाती है ।
१ - औषधि -भैंसों के लिए- सादा नमक पिसा हुआ ३० ग्राम , नारियल तेल ४०० ग्राम , नमक को तेल में मिलाकर गुनगुना गरम करके रोगी पशु के पूरे शरीर में आधे घन्टा तक मालिश करनी चाहिए , फिर उसके शरीर पर सूखी घास रखकर ऊपर से चार कम्बल ओढाये और उन्हें रस्सी से बाँध देने चाहिए , जिससे घास और कम्बल अपनी जगह से सरकें। पानी गरम करके ठन्डा होने तक पिलाया जाय । रोगी पशु को बन्द कमरे में बाँधा जाय और रोगी पशु को हरी घास व ठन्डी चींजे न खिलायी जाय । केवल सूखी नरम घास व गेंहू का भूसा खिलाया जाय वही उसके नीचे बिछाया जाय इससे पशु को गर्मी पहुँचेगी
# - गाय के लिए- गाय व बैल की केवल हाथ से ही आधा घन्टे मालिश की जाये,और मालिश करने के बाद उपरोक्त विधी द्वारा ही घास व कम्बल बाँध दिये जाये ।
२- औषधि - देशी मुर्ग़ी के २अण्डे , १० ग्राम हल्दी पावडर ,गाय का दूध २ लीटर गरम करके उसमें हल्दी तथा अण्डे को तोड़कर दूध में डाले और अण्डे केछिलके को फेंक दें। तथा दो दिन तक दिन में एक बार , तीनों को आपस में मिलाकर गुनगुना पशु को पिला देना चाहिए ।
# - तीसरे दिन १ लीटर दूध तथा एक अण्डा व ५ ग्राम हल्दी मिलाकर गुनगुना करके पशु को पिला देना चाहिए, अगर आवश्यक हो तो चौंथे दिन भी दें ।
३ - औषधि - इन्द्रायण फल ६० ग्राम , घुड़बच ६० ग्राम , काला ज़ीरा ६० ग्राम , सेंधानमक ६० ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , अदरक २५ ग्राम , गुड़ १२० ग्राम , अजवायन ६० ग्राम , पानी १४४० ग्राम , सभी को बारीक कूटपीसकर छलनी में छानकर ,पानी में उबालें ,जब पानी १००० ग्राम रह जाये तब गुनगुनापानी बिना छाने ही पशु को सुबह - सायं आराम होने तक इस मात्रा को पिलाते रहे ।
४- औषधि - अजवायन ६० ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , लहसुन ३६ ग्राम , काला ज़ीरा ६० ग्राम , चन्द्रशूर ६० ग्राम , गुड़ ४८० ग्राम , पानी ५०० ग्राम , सभी को बारीक पीसकर पानी में उबालकर काढ़ा बनायें डेढ़ लीटर काढ़ा रहने पर रोगी पशु को दोनों समय बनाकर पिलाना चाहिए और आराम होने तक दवा को पिलाते रहना चाहिए।
५ - औषधि - कालीमिर्च १२ ग्राम , घुड़बच ६० ग्राम , लौंग १२ ग्राम , नमक ३० ग्राम , सभी को बारीक पीसकर ,पानी ५०० ग्राम व देशी शराब ५०० ग्राम को आपस में मिलाकर बिना छाने ही पशु को पिलानी चाहिए और आराम होने तक दोनों समय इसी मात्रा को पिलाते रहना चाहिए ।
३ - दमारोग ( Asthma )
======================
कारण- लक्षण :- बूढ़े एंव कमज़ोर शरीर के पशु को अधिक दौड़ाने या उससे भारी काम लेने , बदहजमी अथवा खाँसी की शिकायत बहुत दिनों तक बनी रहने और ठीक प्रकार से चिकित्सा न होने पर रोग के बिगड़ जाने के कारण खाँसी या दमा रोग हो जाता हैं । दमा से बिमार पशु को खाँसी जल्दी- जल्दी आती हैं तथा घोर कष्ट के साथ श्वास खींचकर अन्दर लें जाना पड़ती हैं । श्वास खींचने के कारण ही उसकी कोख और पेट में दर्द होने लगता हैं । खाँसी के साथ ही बलगम भी निकलता हैं ।
१ - औषधि :- श्वेत संखिया ५ रत्ती , आटे में मिलाकर खिला देने से पशु का दमा ठीक हो जाता हैं ।
२ - औषधि :- धतुरा बीज १ रत्ती , अफ़ीम १ माशा , दोनों को पीस- घोलकर २५० ग्राम पानी के साथ सेवन कराने से भी दमारोग में आराम आता हैं ।
ये दोनों दवाये पशु को बारी- बारी से १५ दिन तक देते रहने से पशु बिलकुल ठीक हो जायेगा ।
३ - औषधि :- धतुरा बीज १ माशा , कपूर १ माशा , अनार का छिल्का १ तौला , देशी शराब १छंटाक , गन्ने का शीरा १ छटांक , लें । कपूर व धतुरा के बीजों को पीसकर बाँस के पत्तों के रस में मिलाकर शराब के साथँ घोल लें । इसके बाद अनार के छिलके को ५०० ग्राम पानी में पकायें जब पानी जलकर आधा है जाये तब पानी को कपड़े में छानकर पानी को रख लें तथा गुनगुना होने पर उसमें बाक़ी सभी दवाये मिलाकर दिन में दो बार पिलाने से लाभँ होता हैं ।
४ - औषधि :- नौसादर १ तौला , अदरक १ छटांक ,पीसकर गुड १ छटांक , लेकर उसमें मिलाकर पशु को खिलायें यह दवाई ऐसी स्थिति में लाभकारी होता है जब रोगी पशु का बलगम निकलने मे कष्ट होता हैं ।
# - ध्यान रहे पशु को भारी व बादी चीज़ों से बचाना आपकी ज़िम्मेदारी हैं ।
Sent from my iPad
(२०)-३- गौ- चिकित्सा - मुखरोग ।
(२०)-३- गौ- चिकित्सा - मुखरोग ।
१ - गलफर में काँटे हो जाना ( अबाल रोग )
=====================================
कारण व लक्षण :- पशु के गलफर में काटें हो जाते हैं इस रोग को अबाल रोग कहते हैं अनछरा रोग में जीभ पर काँटे होते हैं इस रोग में गालों में होते हैं तथा इस रोग में गलफर में चिप- चिप होती रहती हैं पशु चारा नहीं खा पाता हैं
# - जो दवा अनछरा रोग में लाभ करती हैं वह गलफर में भी काम करती हैं ।
१ - औषधि - हल्दी व नमक पीसकर गालों में चुपड़ते रहना लाभकारी हैं दवा करने से पहले बाँस की खपच्ची से गलफर में उत्पन्न काँटों को धीरे-धीरे छीलकर बाद में दवा को रगड़ कर लगायें ।
२ - जिह्वा कण्टक ( अनछरा रोग या जीभ का काँटा )
========================================
कारण व लक्षण :- पशु की जीभ के ऊपर छोटें- छोटें नोंकदार दानें - इस रोग में निकल आते हैं , जिन्हें आम बोलचाल में काटें कहते हैं । इस रोग से ग्रसित पशु खाने की तो इच्छा करता हैं किन्तु काटें चुभने के कारण खा नहीं पाता हैं ।
१ - औषधि - हल्दी व नमक पीसकर तैयार रखें , इसके बाद बाँस की खपच्ची लेकर जीभ पर रगड़कर काँटों को छील दें फिर दवा को सरसों के तेल में मिलाकर रगड़कर लगायें । इससे आराम आयेगा ।
२ - औषधि - काला ज़ीरा , काली मिर्च और अम्बा हल्दी - इन तीनों को सममात्रा में लेकर महीन कर लें और रोगी पशु की जीभ पर बार- बार लगायें ।
३ - औषधि - धाय के फूल २ तौला , रात्रि में में पानी में भिगोकर रख दें प्रात होने पर सेंधानमक कलमीशोरा , और समुद्रीफेन , प्रत्येक १-१ तौला , और रसवत ६ माशा , लेकर सबको बारीक पीसकर जीभ पर मलते रहना लाभकारी हैं ।
प्रात: काल रोगी पशु को कुछ भी खिलाने से पूर्व अदरक , पान तथा कालीमिर्च खिला देने से मुख के अन्दर उत्पन्न होने वाले तथा सभी जगहों के काँटों में लाभ होता हैं ।
३ - सूतबाम ( सुकभामी ) रोग
===========================
कारण व लक्षण :- इस रोग में तालु अथवा तारू में छेद हो जाता हैं । इस रोग को सूतबाम या सुकभामी के नामों से जानते हैं । इसरोग में पशु की आँखों से पानी बहता हैं , उसे भूख नहीं लगती हैं जिसके कारण दिन- प्रतिदिन पशु दूबला होता जाता हैं पशु पानी पीने से डरता हैं । जब छेद में पानी पड़ता हैं तो दर्द अधिक बढ़ जाता हैं । इस पीड़ा से पशु की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं । इसी पीड़ा के भय के कारण पशु पानी नहीं पीता हैं । रोगी का मुख खोलकर देखने पर तालू का छेद साफ़ दिखाई देता हैं ।
१ - औषधि - लोहे खुब गरम करके छिद्र को दाग देना लाभकारी उपाय हैं । दागने के बाद घाव में देशी सिन्दुर व पीसी हूई हल्दी और गाय का घी मिलाकर मरहम तैयार करके पहले ही रखें दागने के तुरन्त बाद घाव में भर देंना चाहिए यह गुणकारी उपाय हैं ।
४ - मेझुकी ( कठभेलुकी या भेलुकी रोग
=================================
कारण व लक्षण :- इस रोग में पशु की जीभ के ऊपर सूजन हो जाती हैं । इस रोग को मेझुकी, कठभेलुकी , भेलुकी , आदि नामों से लोग जानते हैं । इस रोग में पशु चारा न खा पाने के कारण पशु दुर्बल हो जाता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु चारा कम खाता हैं और पानी पीने में भी कम रूची रखता हैं ।
१ - औषधि -पशु की जीभ पर हल्के गरम लोहे से दाग लगाकर ऊपर की जली हुई खाल को खींचकर उतार दें इसके बाद गाय का घी , हल्दीपावडर , देशी सिन्दुर मिलाकर मरहम की तरह बनाकर जीभ पर लगायें इस योग को ठीक होने तक लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - एक पक्षी होता है मैली बुगली उसको मारकर, पकाकर शोरबा बनाकर खिलाने से भी लाभ होता हैं । साथ-साथ उसके शरीर से निकली हूई हड्डियों को पीसकर पशु की जीप पर लगायें तो जल्दी आराम आता हैं ।
५ - बहता रोग
=============
कारण व लक्षण :- इस रोग में पशु की जीभ बहुत अधिक फूल जाती हैं , जिसके कारण उसके मुख से हर समय लार टपकती रहती हैं । रोगी पशु के नेत्रों से पानी बहने लगता हैं जिसके कारण रोगी पशु बहुत विकल्प रहता हैं , आँख से हर समय पानी बहता रहता हैं इसिलिए किसान इस रोग को बहता रोग कहते हैं ।
१ - औषधि - पशु की जीभ के नीचे वाले हिस्से के चारों रंगों में चार फस्दया फश्त खोल देना ही इस रोग का मुख्य इलाज हैं । नश्तर के घाव में - हल्दी पावडर , देशी सिन्दुर , गाय का घी मलना लाभकारी रहता है ।
६ - जिह्वा व्रण ( जीभ के घाव )
==========================
कारण व लक्षण - पशु की जीभ पर घाव हो जाते हैं । जिसके कारण पशु ठीक प्रकार से खाना- पीना ठीक से नहीं कर पाता है और वह बहुत परेशान रहता हैं । यह रोग गायों को बहुत अधिक होता हैं ।
१ - औषधि - पशु की जीभ पर घाव होतों - पीपल की छाल जलाकर उसकी महीन राख जीप्रणाम रगड़कर कुछ देर के के लिए रोगी पशु के मुँह को बाँध देना चाहिए । दबाकर न बाँधे इतना बाँधे की पशु जबड़ा न चला पाये लेकिन नाक से साँस बन्द न हो । कभी इतना टाईट बाँध दें कि वह साँस भी न लें सकें ध्यान रहें ।
७ - गरदब्बा
===============
कारण व लक्षण :- इस रोग में जीभ की जड़ में अधिक सूजन आ जाती हैं जिसके कारण रोगी पशु का मुख काफ़ी गरम प्रतित होता हैं । यह भयंकर रोग हैं इसे भी जहरबाद की तरह असाध्य समझा जाता हैं । अत: इस रोग के लक्षण प्रकट होते ही तुरन्त इलाज करना चाहिए । पशु के मुँह में हाथ डालकर देखने पर मुँह अन्दर से काफ़ी ठण्डा रहता हैं ,जबकि गलाघोटू रोग में पशु का मुख अन्दर से काफ़ी गरम रहता हैं ।
१ - औषधि - मेंथी आधा पाँव प्याज़ ३ छटांक , पानी १ किलो में पकाकर पशु को नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - सरसों का तेल १० ग्राम , अफ़ीम ५ ग्राम , मिलाकर पशु के नाक में डालने से आराम आता हैं ।
३ - औषधि - बंडार, कालीजीरी और मकोय तीनों को थोड़ा पानी डालकर पीस लें फिर गरम करके , महुए पुत्री बनाकर पुन: पतरी को रूई में रखकर हलक के ऊपर बाँधना भी लाभदायक हैं ।
४ - औषधि - धतुरे का पत्ता , मेउड़ का पत्ता , बकायन के पत्ते , आकाश बंवर का पत्ता और अरूस का पत्ता - इन सबको उबालकर सूजन के ऊपर बफारा ( भाँप देना ) देने से लाभ होता हैं ।
५ - औषधि - इस रोग में उपयुक्त दवाओं के प्रयोग से लाभ होता हैं । यदि इनके प्रयोग से कोई लाभ न हो तो रोगग्रस्त स्थान को लोहा छड़ को गरम करके दाग लगाना चाहिए ।
८ - दाँत हिलना
================
१ - औषधि - पशुओं के हिलते हुए दाँत की जड़ में पीसी हुई हल्दी रखकर उपर से शुद्ध सरसों का तेल डाल देने से पशु का हिलता हुआ दाँत जम जाता है ।
२ - फिटकरी पावडर में पानी की बूँदें डालकर दाँत की जड़ पर लगाने से दाँत हिलने बन्द हो जाते हैं ।
९ - परिहुल ( मसूड़े फूलना )
=====================
कारण व लक्षण :- इस बिमारी में पशुओं के दाँतों की जड़े ( मसूड़े ) फूलकर मोटे हो जाते हैं । जिसके फलस्वरूप पशु का मुख बड़ा गरम हो जाता हैं । शुरूआत में फूले हुए मसूड़े काफ़ी कठोर रहते हैं किन्तु कुछ दिनों के बाद वे पक जाते हैं और उनसे मवाद निकलने लगता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु न तो चारा ही चर सकता है और न ही दाना खा पाता हैं ।
१ - औषधि - शुरूआत में तो ३-४ बार साँभरनमक तथा हल्दी बारीक पीसकर व कपडछान करके मलते रहना चाहिए । यदि कुछ दिन तक मलने से सूजन नरम पड़ जाये तो नश्तर से चीरा देकर मवाद निकाल देनी चाहिए । उसके बाद पान के पत्ते पर बुरककर कालीमिर्च व सोंठ पावडर सूजन पर लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - मेंथी , सांभर नमक और अलसी - प्रत्येक को समान मात्रा में लेकर पुलटीश बनाकर लेंप करना चाहिए यह उपयोगी होता है ।
३ - औषधि - यदि रोग की तीव्रता के कारण पशु को बुखार हो जाये और वह बुखार से परेशान होकर चक्कर काट रहा हो तो - गुड़ और चिरायता ५००-५०० ग्राम , लेकर लगभग १ लीटर पानी में औटायें । जब आधा पानी रह जाये तब छानकर रोगी पशु को गुनगुना ही पिला देना लाभप्रद होता हैं ।
# - मुलायम घास व अलसी या चावल का माण्ड में नमक मिलाकर पशु को पिलाना चाहिए ।
१० - दाँतों मे पायरिया
=================
कारण व लक्षण :- इस रोग को पिंग रोग के नाम से भी जानते हैं । तथा कहीं- कहीं इस रोग को "गहन " रोग से भी पुकारते हैं । यह दाँतों का भयंकर रोग है । इसमें दाँतों की जड़ों का माँस गल- गलकर क्षीण होने लगता हैं । दाँतों की जड़े खोखली हो जाती हैं और वे हिलने लगते हैं । पायरिया रोग में रोगी पशु को चारा दाना खाने का कष्ट रहता हैं ।
१ - औषधि - सरसों के तेल में रूई को भिगोकर दाँत की जड़ में रखे । साधारण गर्म लोहे को रूई के ऊपर रखें , ताकि तेल गर्म होकर दाँतों की जड़ों में चला जायें । इसके बाद बरगद का दूध रूई में भिगोकर दाँतों की जड़ों में रखने से दाँतों की जड़े मज़बूत हो जाती हैं ।
११ - दाँतों का अनियमित बढ़ना
==========================
कारण व लक्षण :- आमतौर पर यह रोग बूढ़े पशुओं को होता हैं । उनके दाँत ऊँचे - नीचें हो जाते हैं । तथा दाढें बढ़ जाती हैं , जिसके कारण उन्हें चारा - दाना खाने में कष्ट होता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु चारे को दाँतों से भलीप्रकार चबा नहीं पाता हैं और उसे चबाने में कष्ट होता हैं ।
१ - औषधि - इस रोग के इलाज हेतु पशु को किसी सुयोग्य डाक्टर के पास जाकर दाँतों को रितवा देना चाहिए अथवा अनियमित रूप से बढ़े दाँतों को निकलवा देना चाहिए ।
१२ - मुँह पका रोग
=================
१ - मूहँ पकारोग - जूवाॅसा - १५० ग्राम , अजमोदा - १५० ग्राम , चीता ( चित्रक सफ़ेद ) -१०० ग्राम , बड़ी इलायची - ५० ग्राम , इलायची को कूटकर बाक़ी सभी दवाओं को साढ़े तीन किलो पानी में उबालकर ,छानकर पानी की एक-एक नाल सुबह-सायं देने सेल लाभ होता है ।
१३ - जीभ पर छालें पड़ जाना
=======================
कारण व लक्षण - कभी - कभी गरम चीज़ें खा लेने के कारण शरीर का ताप बढ़ जाता है , या बदहजमी के कारण यह रोग हो जाता है , यह रोग फेफड़ों में भी हो सकता है । पशु की जीभ में छालें पड़ जाते है । मुँह से दुर्गन्ध आती है । लार टपकती है ।खाना - पीना तथा जूगाली करना कम हो जाता है । पश सुस्त रहता है और दिनोंदिन कमज़ोर होता जाता है ।
१ - बछाँग की जड़ ( जलजमनी ) ६० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , जड़ को महीन कूटकर उसे घी में गुनगुना गरम करके , बिना छाने , रोगी पशु को एक समय , चार - पाँच दिन तक , दी जाय । उससे अवश्य आराम होगा ।
२ - औषधि - मुर्ग़ी का अण्डा १ नग , गाय का दूध ९६० ग्राम , अण्डे को फोड़कर और गूद्दे को दूध में मिलाकर ख़ूब फेंट लिया जाय । फिर रोगी पशु को दोनो समय ,तीन दिन तक , पिलाया जाय ।
आलोक -:- रोगी पशु को पहले जूलाब दिया जाय । उसके बाद जलजमनी की पत्तियाँ खिलाने से वह अच्छा हो जाता है । यदि वह न खाये , तो उसे बारीक पीसकर पानी के साथ मिलाकर पिलाये ।
३ -औषधि - फिटकरी ६० ग्राम , पानी २४० ग्राम , फिटकरी को पानी में मिलाकर रोगी पशु का सिर धोना चाहिए तथा उसे पिलाना भी चाहिए ।
४ - औषधि - इलायची १२ ग्राम , शीतल चीनी २४ ग्राम , पानी २४० ग्राम , इलायची और शीतल चीनी को पीसकर , पानी में मिलाकर गुनगुना करके , रोगी पशु को आठ दिन तक , देना चाहिए ।
------------------- @ --------------------
१४ - पान कोशी
=======================
कारण व लक्षण - मुहँपका रोग में या माता की बिमारी में पशु के भूखे रहने से यह बिमारी हो जाती है । इस रोग में पशु अधिक गर्मी नहीं सहन कर सकता । रोगी पशु अधिक हाँफता हैं । उसे दम चलती है । वह हमेशा छाया में या पानी में रहने की कोशिश करता है । उसके रोयें बढ़ जाते है और काले पड़ जाते हैं । अगर रोगी मादा पशु हो तो गाभिन नहीं होता और हुआ भी तो दूध नहीं देता है ,उसका दूध प्रतिदिन सूखता जाता है।
१ - औषधि - बत्तख का अण्डा १ नग ,गाय का दूध ९६० ग्राम , प्रतिदिन अण्डे को फोड़कर और दूध के साथ ख़ूब फेंटकर रोगी पशु को ८ दिन तक पिलाया जाय। अगर इसके बीच रोगी पशु अच्छा हो जाय तो फिर एक समय यह दवा पिलानी चाहिए ।
२ - औषधि - मुर्ग़ी का अण्डा २ नग , गाय का दूध १ लीटर , अण्डों को तोड़कर , दूध में मिलाकर , रोगी पशु को दोनों समय ८ दिन तक देना चाहिए ।
टोटका -:-
३ - औषधि - गाय के दूध की छाछ १४४० ग्राम , कालीमिर्च ३० ग्राम , कालीमिर्च को महीन पीसकर उसे छाछ में मिला लिया जाय । फिर लोहे के टुकड़े को या पत्थर को लाल गरम करके उसे छाछ में एक दम डालकर तुरन्त ढँक दिया जाय । १५ मिनट बाद उस लोहे के टुकड़े को निकालकर , गुनगुनी छाछ रोगी पशु को दोनों समय , एक माह तक ,इसी मात्रा में पिलायी जाय ।
४ - औषधि - नीम की पत्ती १०० ग्राम , २५० ग्राम पानी में पीसकर पिलानी चाहिए । बाद मे २५० ग्राम , गाय का घी भी दोनों समय देना चाहिए ।
---------------------- @ ---------------------
१५ - फाँसी या छड़ रोग, जीभ के नीचे नसों में काला ख़ून इक्कठा होना ।
========================================================
कारण व लक्षण - यह रोग गाय व भैंस और मादा पशुओं की जीभ के नीचे यह प्राय: होता है । यह रोग अन्य पशुओं को नहीं होते देखा गया है । यह रोग गर्मियों में अधिक होता है । पशुओं को सूखी घास खाने तथा ठीक समय पर पानी न मिलने के कारण यह रोग होता है । जीभ के नीचे के भाग की नसों में काला ख़ून भर जाता है । पशु का शरीर अकड़ जाता है। उसकी कमर को ऊपर से दबाने से वह एकदम नीचे झुक जाता है । यह रोग अधिकतर दूधारू भैंसों को होता है । दूधारू पशु दूध देने तथा खाने में कमी करते हैं।
१ - औषधि - पहले रोगी पशु को धीरे से ज़मीन पर लिटा देना चाहिए । फिर उसकी जीभ बाहर निकालकर उसकी बड़ी - बड़ी दो नसों को ( जिनमें काला ख़ून भरा हो ) , जोकि कई छोटी -छोटी नसों को मिलाती है । उसे सुई से तोड़कर काला ख़ून बाहर निकाल देना चाहिए ।और बाद में २४ ग्राम हल्दी, गाय का घी २४ ग्राम , दोनों को मिलाकर जीभ पर नसों के पास लगा दें । इससे ज़ख़्म नर्म और ठीक हो जायगा ।
# - रोगी पशु की पूँछ के नीचे के भाग में थोड़ा - सा चीरा ( नश्तर) लगाकर ख़ून निकाल दिया जाना चाहिए । उसे ऊपर से नीचें की ओर लौटाना चाहिए , जिससे काला रक्त निकल जायेगा । अच्छी तरह दबाकर काला ख़ून निकाल देना चाहिए । काला ख़ून निकल जाने के बाद ज़ख़्म में अफ़ीम चार रत्ती पानी में मिलाकर नरम करकें , भर देनी चाहिए । इससे रोगी को यह रोग दूसरी बार नहीं होगा ।
---------------------- @ -------------------------
१६ - मुँह मे आँवल या मुँह में काँटों का बढ़ना
======================================
कारण व लक्षण - यह रोग गौ वर्ग को होता है कभी - कभी गाय को नमक क्षारयुक्त पदार्थ न मिलने पर भी यह रोग हो जाता है । जिस गाय बैल को सदैव कब्जियत रहती है । उसे यह रोग अधिक होता है । इस रोग में रोगी के मुँह के आँवल बढ़ जाते है । ये आँवल गाय व बैल के जबड़े के अन्दर अग़ल - बग़ल दोनों ओर रहते है । ये काँटे लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई में बढ़ जाते है । जिससे पशु घास ठीक प्रकार नहीं खा सकता है । वह दिनोंदिन कमज़ोर होने लगता है । दाना भी कम खाता है ।दूधारू गाय दूध देना कम कर देती है ।
१ - औषधि - रोगी पशु को सबसे पहले जूलाब देकर उसका पेट साफ़ कर देना चाहिए ।
२ - औषधि - रोगी पशु को प्रतिदिन २४ ग्राम , पिसानमक उन काँटों पर हाथ से मलना चाहिए ।
३ - औषधि - नारियल के रेशे , कत्थे की रस्सी को या भाभड़ के बाण को इन काँटों पर रगड़ें तथा ख़ूब मलना चाहिए ।
४ - औषधि - रोगी पशु के ज़मीन पर लेटाकर फिर उसके बढ़े हुए काँटे तेज़ कैची द्वारा काट दिये जायँ फिर बाद में हल्दी २४ ग्राम , गाय का घी या मक्खन २४ ग्राम , दोनों को मिलाकर काटो के स्थान पर हाथ से मला जायें । यह क्रिया केवल एक ही दिन करनी होती है । इससे पशु को आराम होगा । तथा ध्यान रहे की रोगी पशु को मुलायम घास , हल्की पतली ,पोषक घास देनी चाहिए । और पशु को हर चौथे नमक देना पड़ता है ।
------------------------ @ --------------------
Sent from my iPad
१ - गलफर में काँटे हो जाना ( अबाल रोग )
=====================================
कारण व लक्षण :- पशु के गलफर में काटें हो जाते हैं इस रोग को अबाल रोग कहते हैं अनछरा रोग में जीभ पर काँटे होते हैं इस रोग में गालों में होते हैं तथा इस रोग में गलफर में चिप- चिप होती रहती हैं पशु चारा नहीं खा पाता हैं
# - जो दवा अनछरा रोग में लाभ करती हैं वह गलफर में भी काम करती हैं ।
१ - औषधि - हल्दी व नमक पीसकर गालों में चुपड़ते रहना लाभकारी हैं दवा करने से पहले बाँस की खपच्ची से गलफर में उत्पन्न काँटों को धीरे-धीरे छीलकर बाद में दवा को रगड़ कर लगायें ।
२ - जिह्वा कण्टक ( अनछरा रोग या जीभ का काँटा )
========================================
कारण व लक्षण :- पशु की जीभ के ऊपर छोटें- छोटें नोंकदार दानें - इस रोग में निकल आते हैं , जिन्हें आम बोलचाल में काटें कहते हैं । इस रोग से ग्रसित पशु खाने की तो इच्छा करता हैं किन्तु काटें चुभने के कारण खा नहीं पाता हैं ।
१ - औषधि - हल्दी व नमक पीसकर तैयार रखें , इसके बाद बाँस की खपच्ची लेकर जीभ पर रगड़कर काँटों को छील दें फिर दवा को सरसों के तेल में मिलाकर रगड़कर लगायें । इससे आराम आयेगा ।
२ - औषधि - काला ज़ीरा , काली मिर्च और अम्बा हल्दी - इन तीनों को सममात्रा में लेकर महीन कर लें और रोगी पशु की जीभ पर बार- बार लगायें ।
३ - औषधि - धाय के फूल २ तौला , रात्रि में में पानी में भिगोकर रख दें प्रात होने पर सेंधानमक कलमीशोरा , और समुद्रीफेन , प्रत्येक १-१ तौला , और रसवत ६ माशा , लेकर सबको बारीक पीसकर जीभ पर मलते रहना लाभकारी हैं ।
प्रात: काल रोगी पशु को कुछ भी खिलाने से पूर्व अदरक , पान तथा कालीमिर्च खिला देने से मुख के अन्दर उत्पन्न होने वाले तथा सभी जगहों के काँटों में लाभ होता हैं ।
३ - सूतबाम ( सुकभामी ) रोग
===========================
कारण व लक्षण :- इस रोग में तालु अथवा तारू में छेद हो जाता हैं । इस रोग को सूतबाम या सुकभामी के नामों से जानते हैं । इसरोग में पशु की आँखों से पानी बहता हैं , उसे भूख नहीं लगती हैं जिसके कारण दिन- प्रतिदिन पशु दूबला होता जाता हैं पशु पानी पीने से डरता हैं । जब छेद में पानी पड़ता हैं तो दर्द अधिक बढ़ जाता हैं । इस पीड़ा से पशु की आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं । इसी पीड़ा के भय के कारण पशु पानी नहीं पीता हैं । रोगी का मुख खोलकर देखने पर तालू का छेद साफ़ दिखाई देता हैं ।
१ - औषधि - लोहे खुब गरम करके छिद्र को दाग देना लाभकारी उपाय हैं । दागने के बाद घाव में देशी सिन्दुर व पीसी हूई हल्दी और गाय का घी मिलाकर मरहम तैयार करके पहले ही रखें दागने के तुरन्त बाद घाव में भर देंना चाहिए यह गुणकारी उपाय हैं ।
४ - मेझुकी ( कठभेलुकी या भेलुकी रोग
=================================
कारण व लक्षण :- इस रोग में पशु की जीभ के ऊपर सूजन हो जाती हैं । इस रोग को मेझुकी, कठभेलुकी , भेलुकी , आदि नामों से लोग जानते हैं । इस रोग में पशु चारा न खा पाने के कारण पशु दुर्बल हो जाता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु चारा कम खाता हैं और पानी पीने में भी कम रूची रखता हैं ।
१ - औषधि -पशु की जीभ पर हल्के गरम लोहे से दाग लगाकर ऊपर की जली हुई खाल को खींचकर उतार दें इसके बाद गाय का घी , हल्दीपावडर , देशी सिन्दुर मिलाकर मरहम की तरह बनाकर जीभ पर लगायें इस योग को ठीक होने तक लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - एक पक्षी होता है मैली बुगली उसको मारकर, पकाकर शोरबा बनाकर खिलाने से भी लाभ होता हैं । साथ-साथ उसके शरीर से निकली हूई हड्डियों को पीसकर पशु की जीप पर लगायें तो जल्दी आराम आता हैं ।
५ - बहता रोग
=============
कारण व लक्षण :- इस रोग में पशु की जीभ बहुत अधिक फूल जाती हैं , जिसके कारण उसके मुख से हर समय लार टपकती रहती हैं । रोगी पशु के नेत्रों से पानी बहने लगता हैं जिसके कारण रोगी पशु बहुत विकल्प रहता हैं , आँख से हर समय पानी बहता रहता हैं इसिलिए किसान इस रोग को बहता रोग कहते हैं ।
१ - औषधि - पशु की जीभ के नीचे वाले हिस्से के चारों रंगों में चार फस्दया फश्त खोल देना ही इस रोग का मुख्य इलाज हैं । नश्तर के घाव में - हल्दी पावडर , देशी सिन्दुर , गाय का घी मलना लाभकारी रहता है ।
६ - जिह्वा व्रण ( जीभ के घाव )
==========================
कारण व लक्षण - पशु की जीभ पर घाव हो जाते हैं । जिसके कारण पशु ठीक प्रकार से खाना- पीना ठीक से नहीं कर पाता है और वह बहुत परेशान रहता हैं । यह रोग गायों को बहुत अधिक होता हैं ।
१ - औषधि - पशु की जीभ पर घाव होतों - पीपल की छाल जलाकर उसकी महीन राख जीप्रणाम रगड़कर कुछ देर के के लिए रोगी पशु के मुँह को बाँध देना चाहिए । दबाकर न बाँधे इतना बाँधे की पशु जबड़ा न चला पाये लेकिन नाक से साँस बन्द न हो । कभी इतना टाईट बाँध दें कि वह साँस भी न लें सकें ध्यान रहें ।
७ - गरदब्बा
===============
कारण व लक्षण :- इस रोग में जीभ की जड़ में अधिक सूजन आ जाती हैं जिसके कारण रोगी पशु का मुख काफ़ी गरम प्रतित होता हैं । यह भयंकर रोग हैं इसे भी जहरबाद की तरह असाध्य समझा जाता हैं । अत: इस रोग के लक्षण प्रकट होते ही तुरन्त इलाज करना चाहिए । पशु के मुँह में हाथ डालकर देखने पर मुँह अन्दर से काफ़ी ठण्डा रहता हैं ,जबकि गलाघोटू रोग में पशु का मुख अन्दर से काफ़ी गरम रहता हैं ।
१ - औषधि - मेंथी आधा पाँव प्याज़ ३ छटांक , पानी १ किलो में पकाकर पशु को नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - सरसों का तेल १० ग्राम , अफ़ीम ५ ग्राम , मिलाकर पशु के नाक में डालने से आराम आता हैं ।
३ - औषधि - बंडार, कालीजीरी और मकोय तीनों को थोड़ा पानी डालकर पीस लें फिर गरम करके , महुए पुत्री बनाकर पुन: पतरी को रूई में रखकर हलक के ऊपर बाँधना भी लाभदायक हैं ।
४ - औषधि - धतुरे का पत्ता , मेउड़ का पत्ता , बकायन के पत्ते , आकाश बंवर का पत्ता और अरूस का पत्ता - इन सबको उबालकर सूजन के ऊपर बफारा ( भाँप देना ) देने से लाभ होता हैं ।
५ - औषधि - इस रोग में उपयुक्त दवाओं के प्रयोग से लाभ होता हैं । यदि इनके प्रयोग से कोई लाभ न हो तो रोगग्रस्त स्थान को लोहा छड़ को गरम करके दाग लगाना चाहिए ।
८ - दाँत हिलना
================
१ - औषधि - पशुओं के हिलते हुए दाँत की जड़ में पीसी हुई हल्दी रखकर उपर से शुद्ध सरसों का तेल डाल देने से पशु का हिलता हुआ दाँत जम जाता है ।
२ - फिटकरी पावडर में पानी की बूँदें डालकर दाँत की जड़ पर लगाने से दाँत हिलने बन्द हो जाते हैं ।
९ - परिहुल ( मसूड़े फूलना )
=====================
कारण व लक्षण :- इस बिमारी में पशुओं के दाँतों की जड़े ( मसूड़े ) फूलकर मोटे हो जाते हैं । जिसके फलस्वरूप पशु का मुख बड़ा गरम हो जाता हैं । शुरूआत में फूले हुए मसूड़े काफ़ी कठोर रहते हैं किन्तु कुछ दिनों के बाद वे पक जाते हैं और उनसे मवाद निकलने लगता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु न तो चारा ही चर सकता है और न ही दाना खा पाता हैं ।
१ - औषधि - शुरूआत में तो ३-४ बार साँभरनमक तथा हल्दी बारीक पीसकर व कपडछान करके मलते रहना चाहिए । यदि कुछ दिन तक मलने से सूजन नरम पड़ जाये तो नश्तर से चीरा देकर मवाद निकाल देनी चाहिए । उसके बाद पान के पत्ते पर बुरककर कालीमिर्च व सोंठ पावडर सूजन पर लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - मेंथी , सांभर नमक और अलसी - प्रत्येक को समान मात्रा में लेकर पुलटीश बनाकर लेंप करना चाहिए यह उपयोगी होता है ।
३ - औषधि - यदि रोग की तीव्रता के कारण पशु को बुखार हो जाये और वह बुखार से परेशान होकर चक्कर काट रहा हो तो - गुड़ और चिरायता ५००-५०० ग्राम , लेकर लगभग १ लीटर पानी में औटायें । जब आधा पानी रह जाये तब छानकर रोगी पशु को गुनगुना ही पिला देना लाभप्रद होता हैं ।
# - मुलायम घास व अलसी या चावल का माण्ड में नमक मिलाकर पशु को पिलाना चाहिए ।
१० - दाँतों मे पायरिया
=================
कारण व लक्षण :- इस रोग को पिंग रोग के नाम से भी जानते हैं । तथा कहीं- कहीं इस रोग को "गहन " रोग से भी पुकारते हैं । यह दाँतों का भयंकर रोग है । इसमें दाँतों की जड़ों का माँस गल- गलकर क्षीण होने लगता हैं । दाँतों की जड़े खोखली हो जाती हैं और वे हिलने लगते हैं । पायरिया रोग में रोगी पशु को चारा दाना खाने का कष्ट रहता हैं ।
१ - औषधि - सरसों के तेल में रूई को भिगोकर दाँत की जड़ में रखे । साधारण गर्म लोहे को रूई के ऊपर रखें , ताकि तेल गर्म होकर दाँतों की जड़ों में चला जायें । इसके बाद बरगद का दूध रूई में भिगोकर दाँतों की जड़ों में रखने से दाँतों की जड़े मज़बूत हो जाती हैं ।
११ - दाँतों का अनियमित बढ़ना
==========================
कारण व लक्षण :- आमतौर पर यह रोग बूढ़े पशुओं को होता हैं । उनके दाँत ऊँचे - नीचें हो जाते हैं । तथा दाढें बढ़ जाती हैं , जिसके कारण उन्हें चारा - दाना खाने में कष्ट होता हैं । इस रोग से ग्रस्त पशु चारे को दाँतों से भलीप्रकार चबा नहीं पाता हैं और उसे चबाने में कष्ट होता हैं ।
१ - औषधि - इस रोग के इलाज हेतु पशु को किसी सुयोग्य डाक्टर के पास जाकर दाँतों को रितवा देना चाहिए अथवा अनियमित रूप से बढ़े दाँतों को निकलवा देना चाहिए ।
१२ - मुँह पका रोग
=================
१ - मूहँ पकारोग - जूवाॅसा - १५० ग्राम , अजमोदा - १५० ग्राम , चीता ( चित्रक सफ़ेद ) -१०० ग्राम , बड़ी इलायची - ५० ग्राम , इलायची को कूटकर बाक़ी सभी दवाओं को साढ़े तीन किलो पानी में उबालकर ,छानकर पानी की एक-एक नाल सुबह-सायं देने सेल लाभ होता है ।
१३ - जीभ पर छालें पड़ जाना
=======================
कारण व लक्षण - कभी - कभी गरम चीज़ें खा लेने के कारण शरीर का ताप बढ़ जाता है , या बदहजमी के कारण यह रोग हो जाता है , यह रोग फेफड़ों में भी हो सकता है । पशु की जीभ में छालें पड़ जाते है । मुँह से दुर्गन्ध आती है । लार टपकती है ।खाना - पीना तथा जूगाली करना कम हो जाता है । पश सुस्त रहता है और दिनोंदिन कमज़ोर होता जाता है ।
१ - बछाँग की जड़ ( जलजमनी ) ६० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , जड़ को महीन कूटकर उसे घी में गुनगुना गरम करके , बिना छाने , रोगी पशु को एक समय , चार - पाँच दिन तक , दी जाय । उससे अवश्य आराम होगा ।
२ - औषधि - मुर्ग़ी का अण्डा १ नग , गाय का दूध ९६० ग्राम , अण्डे को फोड़कर और गूद्दे को दूध में मिलाकर ख़ूब फेंट लिया जाय । फिर रोगी पशु को दोनो समय ,तीन दिन तक , पिलाया जाय ।
आलोक -:- रोगी पशु को पहले जूलाब दिया जाय । उसके बाद जलजमनी की पत्तियाँ खिलाने से वह अच्छा हो जाता है । यदि वह न खाये , तो उसे बारीक पीसकर पानी के साथ मिलाकर पिलाये ।
३ -औषधि - फिटकरी ६० ग्राम , पानी २४० ग्राम , फिटकरी को पानी में मिलाकर रोगी पशु का सिर धोना चाहिए तथा उसे पिलाना भी चाहिए ।
४ - औषधि - इलायची १२ ग्राम , शीतल चीनी २४ ग्राम , पानी २४० ग्राम , इलायची और शीतल चीनी को पीसकर , पानी में मिलाकर गुनगुना करके , रोगी पशु को आठ दिन तक , देना चाहिए ।
------------------- @ --------------------
१४ - पान कोशी
=======================
कारण व लक्षण - मुहँपका रोग में या माता की बिमारी में पशु के भूखे रहने से यह बिमारी हो जाती है । इस रोग में पशु अधिक गर्मी नहीं सहन कर सकता । रोगी पशु अधिक हाँफता हैं । उसे दम चलती है । वह हमेशा छाया में या पानी में रहने की कोशिश करता है । उसके रोयें बढ़ जाते है और काले पड़ जाते हैं । अगर रोगी मादा पशु हो तो गाभिन नहीं होता और हुआ भी तो दूध नहीं देता है ,उसका दूध प्रतिदिन सूखता जाता है।
१ - औषधि - बत्तख का अण्डा १ नग ,गाय का दूध ९६० ग्राम , प्रतिदिन अण्डे को फोड़कर और दूध के साथ ख़ूब फेंटकर रोगी पशु को ८ दिन तक पिलाया जाय। अगर इसके बीच रोगी पशु अच्छा हो जाय तो फिर एक समय यह दवा पिलानी चाहिए ।
२ - औषधि - मुर्ग़ी का अण्डा २ नग , गाय का दूध १ लीटर , अण्डों को तोड़कर , दूध में मिलाकर , रोगी पशु को दोनों समय ८ दिन तक देना चाहिए ।
टोटका -:-
३ - औषधि - गाय के दूध की छाछ १४४० ग्राम , कालीमिर्च ३० ग्राम , कालीमिर्च को महीन पीसकर उसे छाछ में मिला लिया जाय । फिर लोहे के टुकड़े को या पत्थर को लाल गरम करके उसे छाछ में एक दम डालकर तुरन्त ढँक दिया जाय । १५ मिनट बाद उस लोहे के टुकड़े को निकालकर , गुनगुनी छाछ रोगी पशु को दोनों समय , एक माह तक ,इसी मात्रा में पिलायी जाय ।
४ - औषधि - नीम की पत्ती १०० ग्राम , २५० ग्राम पानी में पीसकर पिलानी चाहिए । बाद मे २५० ग्राम , गाय का घी भी दोनों समय देना चाहिए ।
---------------------- @ ---------------------
१५ - फाँसी या छड़ रोग, जीभ के नीचे नसों में काला ख़ून इक्कठा होना ।
========================================================
कारण व लक्षण - यह रोग गाय व भैंस और मादा पशुओं की जीभ के नीचे यह प्राय: होता है । यह रोग अन्य पशुओं को नहीं होते देखा गया है । यह रोग गर्मियों में अधिक होता है । पशुओं को सूखी घास खाने तथा ठीक समय पर पानी न मिलने के कारण यह रोग होता है । जीभ के नीचे के भाग की नसों में काला ख़ून भर जाता है । पशु का शरीर अकड़ जाता है। उसकी कमर को ऊपर से दबाने से वह एकदम नीचे झुक जाता है । यह रोग अधिकतर दूधारू भैंसों को होता है । दूधारू पशु दूध देने तथा खाने में कमी करते हैं।
१ - औषधि - पहले रोगी पशु को धीरे से ज़मीन पर लिटा देना चाहिए । फिर उसकी जीभ बाहर निकालकर उसकी बड़ी - बड़ी दो नसों को ( जिनमें काला ख़ून भरा हो ) , जोकि कई छोटी -छोटी नसों को मिलाती है । उसे सुई से तोड़कर काला ख़ून बाहर निकाल देना चाहिए ।और बाद में २४ ग्राम हल्दी, गाय का घी २४ ग्राम , दोनों को मिलाकर जीभ पर नसों के पास लगा दें । इससे ज़ख़्म नर्म और ठीक हो जायगा ।
# - रोगी पशु की पूँछ के नीचे के भाग में थोड़ा - सा चीरा ( नश्तर) लगाकर ख़ून निकाल दिया जाना चाहिए । उसे ऊपर से नीचें की ओर लौटाना चाहिए , जिससे काला रक्त निकल जायेगा । अच्छी तरह दबाकर काला ख़ून निकाल देना चाहिए । काला ख़ून निकल जाने के बाद ज़ख़्म में अफ़ीम चार रत्ती पानी में मिलाकर नरम करकें , भर देनी चाहिए । इससे रोगी को यह रोग दूसरी बार नहीं होगा ।
---------------------- @ -------------------------
१६ - मुँह मे आँवल या मुँह में काँटों का बढ़ना
======================================
कारण व लक्षण - यह रोग गौ वर्ग को होता है कभी - कभी गाय को नमक क्षारयुक्त पदार्थ न मिलने पर भी यह रोग हो जाता है । जिस गाय बैल को सदैव कब्जियत रहती है । उसे यह रोग अधिक होता है । इस रोग में रोगी के मुँह के आँवल बढ़ जाते है । ये आँवल गाय व बैल के जबड़े के अन्दर अग़ल - बग़ल दोनों ओर रहते है । ये काँटे लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई में बढ़ जाते है । जिससे पशु घास ठीक प्रकार नहीं खा सकता है । वह दिनोंदिन कमज़ोर होने लगता है । दाना भी कम खाता है ।दूधारू गाय दूध देना कम कर देती है ।
१ - औषधि - रोगी पशु को सबसे पहले जूलाब देकर उसका पेट साफ़ कर देना चाहिए ।
२ - औषधि - रोगी पशु को प्रतिदिन २४ ग्राम , पिसानमक उन काँटों पर हाथ से मलना चाहिए ।
३ - औषधि - नारियल के रेशे , कत्थे की रस्सी को या भाभड़ के बाण को इन काँटों पर रगड़ें तथा ख़ूब मलना चाहिए ।
४ - औषधि - रोगी पशु के ज़मीन पर लेटाकर फिर उसके बढ़े हुए काँटे तेज़ कैची द्वारा काट दिये जायँ फिर बाद में हल्दी २४ ग्राम , गाय का घी या मक्खन २४ ग्राम , दोनों को मिलाकर काटो के स्थान पर हाथ से मला जायें । यह क्रिया केवल एक ही दिन करनी होती है । इससे पशु को आराम होगा । तथा ध्यान रहे की रोगी पशु को मुलायम घास , हल्की पतली ,पोषक घास देनी चाहिए । और पशु को हर चौथे नमक देना पड़ता है ।
------------------------ @ --------------------
Sent from my iPad
(२३)-१-गौ- चिकित्सा - गर्दन रोग ।
(२३)-१-गौ- चिकित्सा - गर्दन रोग ।
गर्दन रोग -
===============
१ - नमका या चिकवा रोग
===========================
कारण व लक्षण - इस रोग में गर्दन सूजकर अकड़ जाती हैं । और ऐसी कठोर पड़ जाती हैं कि वह दायें- बाँये अथवा ऊपर नीचे किसी भी तरफ़ झुकायें नहीं झुकती हैं ।
१ - औषधि - पूँछ के नीचे गुदामार्ग के ऊपर नस मे फस्त लगा देनी ( खोल देनी ) चाहिए और रोगी पशु को नाक से १०-१५ ग्राम सरसों का तेल पिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - रोगी पशु को सात- आठ दिन तक प्रतिदिन आधा किलो पुराना गुड़ खिलाना चाहिए ।
३ - औषधि - रोगी पशु को आठ दिन तक दवा करने पर भी आराम नहीं होता हैं तो " गर्दन की नस चढ़ाना " रोग में जिन दवाओं का विवरण किया गया हैं गेरू - साबुन वाले योग का उपयोग करना चाहिए ।
४ - दागना - यदि किसी दवा से आराम नही आ रहा है तो गर्दन में गोलाकार दाग चारों ओर से दाग देना चाहिए । मेरूदण्ड के दोनों तरफ़ पूँछ से गर्दन तक दाग दें और इसके बाद ४-४ अँगुल पर बीच- बीच में दाग कर देना चाहिए तथा पूँछ उठा कर नीचे के भाग में दाग दें । दागने बाद भी दवा वही चलाते रहें ।
२- गर्दन की नस चढ़ना
======================
कारण व लक्षण - यह रोग अक्सर गाड़ी में चलने वाले पशुओं को होता हैं । प्राय: यह रोग झटका लगने से हो जाता हैं । इसमें गर्दन की नस चढ़ जाती हैं तथा पशु अकड़ा सा खड़ा रहता हैं । वह इधर- उधर नहीं देख पाता हैं और चरने के लिए मुँह नहीं खोल पाता हैं ।
१ - औषधि - बाँबी ( दीमक ) की मिट्टी और भेड़ के गोबर को गाय की बछिया के मूत्र में पीसकर गरम करके मालिश करना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - गेरू और साबुन को समान भाग लेकर सरसों के तेल में पकाकर ४-५ दिन तक मालिश करने से नस ठिकाने बैठकर गर्दन सीधी हो जाती हैं ।
३ - पनियारी
==============
कारण व लक्षण - पशुओं के मुख व चौहर के बीच में जो ख़ाली स्थान होता हैं - इस रोग में उस पर सूजन हो जाती हैं । यह सूजन बढ़कर दाढ़ी से गर्दन तक फैल जाता हैं । इस रोग से पीड़ित पशु का मुख नहीं खुलता हैं । पशु खाना- पीना छोड़ देता हैं तथा वह अत्यन्त बैचनी की िस्थति में रहता हैं ।
१ - औषधि - इस रोग को ठीक करने का सर्वोत्तम उपाय हैं - लोहे की छड़ को लाल करके सूजन को दाग देना चाहिए ।
२ - टोटका - बकरे के सिर पर जहाँ गूद्दी होती हैं वहां के बाल लेकर व पत्थर का चूना लेकर आपस में मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर लेप करने से आराम आता हैं ।
४ - कण्ठमाला
===============
कारण व लक्षण - इस रोग को गण्डमाल के नाम से भी जानते हैं । यह रोग पशुओं की गर्दन की नस के उपर फुन्सियो के रूप में होता हैं । कुछ समय पश्चात् ये फुन्सियाँ फूटने लगती हैं ।
१ - दागना - सर्वप्रथम समस्त फुन्सियाँ को लोहा गरम करके दाग देना चाहिए ।
२ - औषधि - इसको दागने की एक यह भी विधी हैं - सेहुड़ की दूध वाली डाल लेकर उससे कण्ठ को गोद दें ।
३ - औषधि - सरसों का तेल ३ पाँव , पुरूष के सिर के बाल १ छटांक , तेल को आग पर चढ़ाकर उसमें बाल डालकर औटायें जब बाल जलकर राख हो जायें तो उसमें आधा पाँव देशी साबुन डाल दें । इस मरहम को तैयार करके दागे हूए स्थान पर जहाँ कण्ठमाला है उस पर लगायें ।
५ - गर्दन तोड़
============
कारण व लक्षण - इस रोग में पशु की गर्दन नहीं घूमती । वह अकड़ जाती है । उसे बुखार रहता है । वह खाना- पीना छोड़ देता है । समय पर ठीक इलाज न होने पर पशु मर जाता है ।
१- औषधि - घुड़बचर १२० ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , गुड २४० ग्राम , अजवाइन ६० ग्राम , इन्द्रायण का फल ३० ग्राम , पानी १२०० सबको बारीक कूट - पीसकर और पानी में उबालकर कुनकुना रहने पर , रोगी पशु को बिना छाने , पिला दिया जाय । दवा दोनों समय, अच्छा होने तक देनी चाहिए ।
---------------------- @ -----------------------
५ - गर्दन व रीढ़ का अकड़ जाना ।
=======================
कारण व लक्षण - पशु को समय पर पानी न मिलने से यह रोग हो जाता है । पहले तो रोगी पशु को किसी नदी या तालाब में पाँच दिनों तक ख़ूब तैराना चाहिए । फिर उसके सिर को एक अच्छी रस्सी में बाँधकर वृक्ष आदि के ऊपर रस्सी डालकर उसके अगले दोनों पाँव ज़मीन से छुड़ा देने चाहिए । यानि पशु अगले पाँव से टंग जायें । यह कार्य बहुत जल्दी और केवल तीन मिनट तक ही किया जायें। फिर रोगी पशु की बेची पर लगभग एक रूपये के सिक्के के बराबर उस जगह के बाल खुरचकर निकाल दिया जाये ओर इस खुरचे हुए स्थान पर आक ( मदार ) के दूध में ,५ ग्राम रूई को भिगोकर चिपका दिया जाय । ऐसा बिना खुरचे भी ६ दिन तक लगाया जाय ।
१ - औषधि - - आबाँहल्दी २५० ग्राम , फिटकरी २५० ग्राम , सज्जी २५० सबको बारीक पीसकर छान लेना चाहिए और गोमूत्र या भैंस का मूत्र ४८० ग्राम , दवा १२० ग्राम इस हिसाब से मिलाकर , बिना छाने,एक समय रोगी पशु को आठ दिन तक पिलायी जाये ।
२ - औषधि - मेंथी का बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ३ लीटर , मेंथी के बीज को बारीक पीसकर , छाछ में मिलाकर , ८ घन्टे पहले गलना चाहिए । रोगी को दोनों समय ८ दिन तक पिलाना चाहिए । बाद दिन में एक समय आराम होने तक देना चाहिए । और उसकी खुराक बंद करके हरी घास खिलायी जायें ।।
३ - औषधि - फिटकरी ४८० ग्राम , काला नमक १२० ग्राम , आबाँहल्दी ४८० ग्राम , सज्जी ४८० ग्राम , ढाढ़न के बीज ५५० ग्राम सबको बारीक पीसकर और छानकर उनमें गोमूत्र ४८० ग्राम, और दवा १८० ग्राम , दोनों को मिलाकर रोगी पशु को सुबह बिना छाने , ११ दिन तक , बोतल या नाल से पिलाया जाय ।
४ - औषधि - रोगी पशु की रीढ़ पर तिल का तैल ४० ग्राम , पिचकारी में चमड़ी के भीतर उतारा जाय और उस स्थान को ख़ूब मसल दिया जाय, ताकि तेल सब जगह मिल जाय । जिस दिन दवा उतारें , उस दिन नीचें उतारें । दूसरे दिन नीचे से उपर मालिश करें और नीम के पानी से सेंकें ।
५ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , पवाडिया ( चक्रमर्द ) के बीज ४८० ग्राम , नमक ३६ ग्राम , पानी ४ लीटर , बीजों और नमक को महीन पीसकर , पानी में मिलाकर , ख़ूब उबालें ,ठन्डा होने पर दोनों समय ,१५ दिन तक रोगी पशु को खिलायें ।
# - १० ग्राम भुई कोला ( पाताल तुमड़़ी ) बिदारीकन्द उबाल और छानकर काम में लिया जायें ।
५ - औषधि - रोगी नर पशु की कमर व गर्दन में पिचकारी से दवा उतारी जाय,भुई कोला का तेल बना करकें - भुई कोला ( पाताल तुमड़़ी ) ४०० ग्राम , अलसी का तैल १००० ग्राम ,पाताल तुमड़़ी को तैल में पकाकर तैयार कर लें ।
--------------------------- @ ----------------------------
६ - कन्धो में सूजन और पेशाब चढ़ जाना
===========================
कारण व लक्षण - जब बैल पेशाब करता है तो उसे रोक देना चाहिए । उस समय उसे चलाया नहीं जाना चाहिए । गोबर निकालते ( टट्टी करते ) समय भी उसे आराम देना चाहिए । ऐसा न करने पर कंधा की बिमारी हो जाती है । उसके शरीर के अन्दर पेशाब ( मूत्र ) भर जाता है । कन्धे पर काफ़ी सूजन आ जाती है । यह रोग केवल बैल को ही हो जाती है ।
१ - औषधि - सुई लगाकर पिचकारी से उसका मूत्र कन्धा में से निकालकर बाहर फेंक दें । बाद में नीम के उबले हुए पानी से घाव को धोयें तथा कपड़े से उसकाे पोंछ दें । अामचूर का तेल १२० ग्राम ,सिंगदराद पत्थर९० ग्राम , लेकर सिंगदराद को महीन पीसकर दोनों को मिलाकर गरम करके मालिश करें । दोनों समय, सुबह- सांय नीम के पानी से घाव धोते रहना चाहिए ।
--------------------------- @ ----------------------------
७ - कन्धा तिड़कना
===================
कारण व लक्षण - यह रोग बैल व भैंसे मे होता है जोत को ढिला रखने पर गाड़ी मे काफ़ी दिनों तक न जोतने पर और फिर अचानक जोतने पर बैल का कन्धा तिडक जाता है । उससे ख़ून निकलने लगता है । उस पर मक्खियाँ गिरने लगती है । लापरवाही के कारण घाव हो जाता है और उसमें कीड़े भी पड़ जाते हैं ।
१ - औषधि - पहले रोगी पशु के कंधे को नीम के उबले हुए गुनगुने पानी से सेंकना चाहिए , फिर रूई से उसे साफ़ कर देना चाहिए ।
२ - औषधि - पहले रोगी पशु के कन्धे को नीम के उबले हुए गुनगुने पानी से सेंकना चाहिए , फिर रूई से उसे साफ़ कर देना चाहिए ।
३ - औषधि - अमचूर का तैल २४ ग्राम , सिंगदराद १२ ग्राम , सिंगदराद को पीसकर छान लें और अमचूर के तैल में मिलाकर गरम कर लें । गरम करते समय दवा को हिलाते रहना चाहिए , जिससे दवा अच्छी तरह मिल जाय । फिर गुनगुना दवा से पशु के कन्धे पर दोनों समय , अच्छा होने तक , मालिश करते रहें ।
४ - औषधि - रतनजोत का दूध २४ ग्राम , को रोगी पशु के कन्धे पर दिन में तीन बार , अच्छा होने तक ,लगाते रहे ।
५ - औषधि - गधापलास की गीली लकड़ी के काँटे साफ़ कर उसे आँच पर जला लें और ठंडा होने पर रोगी पशु के कन्धे पर २४ ग्राम , नारियल तैल लगाकर लकड़ी से घाव पर दोनों समय ,अच्छा होने तक रगड़े । इससे पशु जल्दी अच्छा होगा ।
६ - औषधि - नीम का तैल १२ ग्राम , मिस्सी ९ ग्राम , नीम के तैल को रोगी पशु के घाव पर लगाकर मिस्सी को बारीक पीसकर लगायें ।
--------------------------@---------------------------
८ - कन्धे में गाँठ पड़ना
====================
कारण व लक्षण - अक्सर बैलों को जोतने पर , जोत ढीली रहने पर , नया बैल होने पर , छोटे-बड़े बैलों को एक साथ जोतने पर , बैलों को लगातार १५ दिनों तक न जोतने के बाद यकायक जोतने पर बैल के कन्धो पर सूजन आ जाती है । यह सूजन धीरे - धीरे गाँठ का रूप धारण कर लेती है । इससे पशु को बहुत कष्ट होता है ।
१ - औषधि - कन्धे की गाँठ को पहले नीम के उबले हुए पानी में दोनों समय , क़रीब आठ दिनों तक , सेकें । गरम ईंट से गाँठ सेंकने से पशु को आराम होता है ।
२ - औषधि - अमचूर का तैल ४८ ग्राम , सिंगदराद २४ ग्राम , सिंगदराद को महीन पीसकर कपड़े में छानकर तैल गरम करते समय मिला दें । उसे हिलाते रहे । फिर गुनगुना होने पर पंशु के कन्धे पर दोनों समय ,अच्छा होने तक लगायें ।
३ - आक ( मदार ) का दूध छ: माशा ( ९ ग्राम ) रोगी पशु को बेची पर चाक़ू से एक रूपये के बराबर जगह खुरचकर बाल उड़ा दें । फिर उसी स्थान पर रूई से आक का दूध लगा दें । प्रतिदिन सुबह ६ दिन तक दूध लगायें ऐसा करने पर पहले कन्धे पर सूजन आयेगी । नसें तंग होगी , लेकिन उसके बाद गाँठ गल जायेंगी । गँवारपाठा का गूद्दा निकालकर पशु के कन्धे पर लगाना चाहिए ।
४ - औषधि - मदार की जड़ ६ माशा रोटी में डालकर पशु को आठ दिन तक खिलानी चाहिए ।
९ - बैल व भैंसा की गर्दन में मूतार
=======================
कारण व लक्षण - मूतार ( बैल - भैंसा ) की गर्दन में सूजन आने के बाद पक जाना -- यह बिमारी वज़न ढोनेवाले पशुओं की गर्दन में हो जाता है ।गर्दन में सूजन आ जाती है। एसे में किसान को जुताई नहीं करनी चाहिए ।
१ - औषधि - असली रूमीमस्तगीं ५ ग्राम , राल २० ग्राम , गूगल १० ग्राम , मूर्दा सिंह १० ग्राम , सिन्दुर १० ग्राम , नील ३ ग्राम , मोमदेशी ३० ग्राम , इन सभी दवाओं को कूटकर १५० ग्राम ,सरसों के तैल मे मिलाकर एक उबाल देकर डिब्बे में रख लें और पशु को धूप में बाँध कर उसकी गर्दन पर लगाये ।
दवाई को हाथ से नही लगानी चाहिए , किसी लकड़ी की चम्मच से लगाना चाहीए , दवाई गर्दन पर पतली- पतली दवा लगाना चाहिए नहीं तो गर्दन को जला देगी , और ध्यान रहे जबतक ठीक न हो जबतक पशु को हल व बूग्गी में नहीं जोड़ना चाहिए ।
१० - जहरवात ( जहरबाद ) गर्दन में सूजन
==============================
कारण- लक्षण - इस रोग में पशु की गर्दन में बहुत अधिक सूजन आ जाती हैं । यह कष्टदायक व्याधि हैं पशु दाना-खाना लेने में असमर्थ रहता हैं ।
१ - औषधि - सोंठ, पीपल , कालीमिर्च , ज़ीरा सफ़ेद , ज़ीरा काला , कुटकी , चिरायता , चीता ( चित्रक) बायबिड्ंग , काकडासिंगी , सभी को ५०-५० ग्राम , लेकर कूटपीसकर - कपडछान करके रख लें । बण्डार २०० ग्राम , लहसुन २०० ग्राम , पीसकर मिला लें , इस दवा को ८-९ दिन तक रोज़ाना जौं के आटे में मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - काली जीरी ५ ग्राम ,कुटकी १० ग्राम , बण्डार १० ग्राम को बराबर में मिलाकर पीसछानकर दिन मे ४-५ बार जौं के आटे में मिलाकर खिलाने से आराम आता हैं ।
३ - औषधि - चीता , चिरायता , काकडासिंगी , जवाॅखार , कुटकी , भाँग , बड़ी पीपल, पीपरामूल , ढाक के बीज , गुगल , संभालू के सूखे पत्तें । मरोड़ फली , सभी को २५०-२५० ग्राम , लें । सज्जीखार , सेंधानमक , कालाजीरा , सफेदजीरा घुड़बच , हींग , अजवायन देशी , अजवायन खुरासानी , राई , अदरक , इन्द्रायण के फल , नीम के पत्ते , बेलगिरी , कालीमिर्च , इन्द्रजौं , गिलोय , छोटी हरड़ , सभी को ५००-५०० ग्राम , लें। बड़ी हरड़ , बण्डार , कचरी , सोंठ , बहेड़ा , सहजन ( सोहजना ) की छाल , पुदिना , प्याज़ , प्रत्येक १-१ किलो लें । कुचला छिला हूआ ३ छटांक , सुहागा फूला ७५ ग्राम , फिटकरी फूला ७५ ग्राम , सबको लेकर कुटपीसकर ७५-७५ ग्राम के गोले बना लें और दिन में तीन बार पशु को खिलाने से जहरवात बिमारी ठीक हो जायेगी ।
४ - औषधि - कालीजीरी , मकोय , बण्डार , सममात्रा में लेकर पीसकुटकर लेपबनाकर लेप को गुनगुना कर रोगग्रस्त स्थान पर लगाकर महुआ का पत्ता बाँधने से लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
--------- ० --------
११ - जहरवात
=============
कारण व लक्षण - यह रोग अधिकतर मादा ( दूध देने वाले ) पशुओं के थन और साधारण पशुओं के गले ( कण्ठ) में होता है । पहले गले या कण्ठ और थन में एक गाँठ पैदा होती है । कुछ ही घण्टों बाद वह बड़ा रूप धारण कर लेती है । यह रोग हर जगह हो सकता है ।
गाय को छूने पर वह गरम मालूम होती है । गाँठ का आकार ३-४ इंच तक होता है । पशु खाना पीना और जूगाली करना बन्द कर देता है । उसे बुखार चढ़ आता है । गले पर सूजन आ जाती है , जिससे साँस लेने में उसे कठिनाई होती है । कभी - कभी इसका आक्रमण थनों पर भी होता है । थन ख़राब हो जाते है । थनों और दूग्धकोष पर सूजन आ जाती है , कभी - कभी छिछडेदार और रक्तमिश्रित दूध निकलता है । समय पर इलाज न होने से थन बेकार हो जाते है । यह बीमारी कभी एक , दो , तीन , चारों थनों में हो जाती है । उपचार उचित समय पर न होने के कारण गर्दन के रोग वाला पशु जल्दी मर जाता है ।
१ - औषधि - रोग - स्थान को नीम के उबले पानी को गुनगुना होने पर दिन में ३ बार सेंका जाय । फिर नारियल का तैल या नीम के तैल की मालिश की जाय । इससे गाँठ को गरम होने में सहायता मिलेगी ।
२ - औषधि - सत्यनाशी की जड़ १२० ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , पानी ७२० ग्राम , जड़ को बारीक पीसकर , गुड़ मिलाकर , पानी में घोलकर , रोगी पशु को ( बिना छाने ही ) , दो बार पिलाना चाहिए ।
३ - औषधि - हुलहुल का पुरा पौधा ( मच्छुन्दी ) १२० ग्राम , इसको बारीक पीसकर , रोटी के साथ रोगी पशु को दोनों समय , खिलाया जाय । अथवा इसको बारीक पीसकर ७२० ग्राम , पानी के साथ बिना छाने पिलाया जाय । दवा जादू का - सा असर दिखायेगी ।
टोटका -:-
४ - औषधि - जिस व्यक्ति की सबसे छोटी और अँगूठे के पासवाली अंगुली लम्बी करने से मिल जाती है , उसके द्वारा कुँआरी बछडी का गोबर लेकर सूजन के ऊपर गोल चक्कर बनाकर मध्य में चित्र नं० १ की तरह चीर देना चाहिए ।
आलोक -:- दोनों उँगलियों को मिलाते वक़्त उसको दूसरी दोनों अंगुलियों को हथेली की और दबाकर अंगुलियाँ मिलाना चाहिए ।
१२ - खाँसना ( ढाँसना )
===================
कारण व लक्षण - प्राय : बदहजमी और सरदी - गर्मी के कारण पशु को खाँसी चला करती है । यह ऐसा रोग है, जिसमें छाती के भीतर फोड़े हो जाते है । और पशु सुस्त रहता है । उसके खानपान में कमी हो जाती है । वह कमज़ोर हो जाता है । अक्सर उसके रोयें खड़े हो जाते हैं । कभी - कभी उसे ज्वर भी आ जाता है । उसका रंग काला पड़ जाता है । अक्सर उसे क़ब्ज़ रहा करती है , नाक वआँख से पानी बहता रहता हैं। और आँख से पानी बहता रहता है । उसकी श्वास की गति बढ़ जाती है । कभी-कभी खाँसते-खाँसते पशु का गोबर निकल जाता है ।
१ - औषधि - धान का छिल्का ४८ ग्राम ,( बिनौला कपास का बीज ) ४८० ग्राम , दोनों को ख़ूब मिलाकर , सूखा ही , आठ दिन तक दोनों समय रोगी पशु को खिलायें ।
२ - औषधि - खड़ी मूँग २४ ग्राम , मीठा तैल १२० ग्राम , खड़ी मूँग को तैल के साथ रोगी पशु को पिलाने से फ़ायदा होता है ।उपर्युक्त मात्रा में प्रतिदिन सुबह- सायं ४-५ दिन तक देने से आराम मिलता है और खाँसी दूर हो जाती हैै । कलई के चूने का पानी १२० ग्राम , चूने को ८ घन्टे पहले गरम पानी में गलाया जाय । फिर ऊपर का स्वच्छ पानी निथारकर रोगी पशु को ६० ग्राम , बोतल द्वारा पिलाया जाय । यह दवा चार दिन तक , दोनों समय ,पिलाये ।
------------ @ ------------
Sent from my iPad
गर्दन रोग -
===============
१ - नमका या चिकवा रोग
===========================
कारण व लक्षण - इस रोग में गर्दन सूजकर अकड़ जाती हैं । और ऐसी कठोर पड़ जाती हैं कि वह दायें- बाँये अथवा ऊपर नीचे किसी भी तरफ़ झुकायें नहीं झुकती हैं ।
१ - औषधि - पूँछ के नीचे गुदामार्ग के ऊपर नस मे फस्त लगा देनी ( खोल देनी ) चाहिए और रोगी पशु को नाक से १०-१५ ग्राम सरसों का तेल पिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - रोगी पशु को सात- आठ दिन तक प्रतिदिन आधा किलो पुराना गुड़ खिलाना चाहिए ।
३ - औषधि - रोगी पशु को आठ दिन तक दवा करने पर भी आराम नहीं होता हैं तो " गर्दन की नस चढ़ाना " रोग में जिन दवाओं का विवरण किया गया हैं गेरू - साबुन वाले योग का उपयोग करना चाहिए ।
४ - दागना - यदि किसी दवा से आराम नही आ रहा है तो गर्दन में गोलाकार दाग चारों ओर से दाग देना चाहिए । मेरूदण्ड के दोनों तरफ़ पूँछ से गर्दन तक दाग दें और इसके बाद ४-४ अँगुल पर बीच- बीच में दाग कर देना चाहिए तथा पूँछ उठा कर नीचे के भाग में दाग दें । दागने बाद भी दवा वही चलाते रहें ।
२- गर्दन की नस चढ़ना
======================
कारण व लक्षण - यह रोग अक्सर गाड़ी में चलने वाले पशुओं को होता हैं । प्राय: यह रोग झटका लगने से हो जाता हैं । इसमें गर्दन की नस चढ़ जाती हैं तथा पशु अकड़ा सा खड़ा रहता हैं । वह इधर- उधर नहीं देख पाता हैं और चरने के लिए मुँह नहीं खोल पाता हैं ।
१ - औषधि - बाँबी ( दीमक ) की मिट्टी और भेड़ के गोबर को गाय की बछिया के मूत्र में पीसकर गरम करके मालिश करना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - गेरू और साबुन को समान भाग लेकर सरसों के तेल में पकाकर ४-५ दिन तक मालिश करने से नस ठिकाने बैठकर गर्दन सीधी हो जाती हैं ।
३ - पनियारी
==============
कारण व लक्षण - पशुओं के मुख व चौहर के बीच में जो ख़ाली स्थान होता हैं - इस रोग में उस पर सूजन हो जाती हैं । यह सूजन बढ़कर दाढ़ी से गर्दन तक फैल जाता हैं । इस रोग से पीड़ित पशु का मुख नहीं खुलता हैं । पशु खाना- पीना छोड़ देता हैं तथा वह अत्यन्त बैचनी की िस्थति में रहता हैं ।
१ - औषधि - इस रोग को ठीक करने का सर्वोत्तम उपाय हैं - लोहे की छड़ को लाल करके सूजन को दाग देना चाहिए ।
२ - टोटका - बकरे के सिर पर जहाँ गूद्दी होती हैं वहां के बाल लेकर व पत्थर का चूना लेकर आपस में मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर लेप करने से आराम आता हैं ।
४ - कण्ठमाला
===============
कारण व लक्षण - इस रोग को गण्डमाल के नाम से भी जानते हैं । यह रोग पशुओं की गर्दन की नस के उपर फुन्सियो के रूप में होता हैं । कुछ समय पश्चात् ये फुन्सियाँ फूटने लगती हैं ।
१ - दागना - सर्वप्रथम समस्त फुन्सियाँ को लोहा गरम करके दाग देना चाहिए ।
२ - औषधि - इसको दागने की एक यह भी विधी हैं - सेहुड़ की दूध वाली डाल लेकर उससे कण्ठ को गोद दें ।
३ - औषधि - सरसों का तेल ३ पाँव , पुरूष के सिर के बाल १ छटांक , तेल को आग पर चढ़ाकर उसमें बाल डालकर औटायें जब बाल जलकर राख हो जायें तो उसमें आधा पाँव देशी साबुन डाल दें । इस मरहम को तैयार करके दागे हूए स्थान पर जहाँ कण्ठमाला है उस पर लगायें ।
५ - गर्दन तोड़
============
कारण व लक्षण - इस रोग में पशु की गर्दन नहीं घूमती । वह अकड़ जाती है । उसे बुखार रहता है । वह खाना- पीना छोड़ देता है । समय पर ठीक इलाज न होने पर पशु मर जाता है ।
१- औषधि - घुड़बचर १२० ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , गुड २४० ग्राम , अजवाइन ६० ग्राम , इन्द्रायण का फल ३० ग्राम , पानी १२०० सबको बारीक कूट - पीसकर और पानी में उबालकर कुनकुना रहने पर , रोगी पशु को बिना छाने , पिला दिया जाय । दवा दोनों समय, अच्छा होने तक देनी चाहिए ।
---------------------- @ -----------------------
५ - गर्दन व रीढ़ का अकड़ जाना ।
=======================
कारण व लक्षण - पशु को समय पर पानी न मिलने से यह रोग हो जाता है । पहले तो रोगी पशु को किसी नदी या तालाब में पाँच दिनों तक ख़ूब तैराना चाहिए । फिर उसके सिर को एक अच्छी रस्सी में बाँधकर वृक्ष आदि के ऊपर रस्सी डालकर उसके अगले दोनों पाँव ज़मीन से छुड़ा देने चाहिए । यानि पशु अगले पाँव से टंग जायें । यह कार्य बहुत जल्दी और केवल तीन मिनट तक ही किया जायें। फिर रोगी पशु की बेची पर लगभग एक रूपये के सिक्के के बराबर उस जगह के बाल खुरचकर निकाल दिया जाये ओर इस खुरचे हुए स्थान पर आक ( मदार ) के दूध में ,५ ग्राम रूई को भिगोकर चिपका दिया जाय । ऐसा बिना खुरचे भी ६ दिन तक लगाया जाय ।
१ - औषधि - - आबाँहल्दी २५० ग्राम , फिटकरी २५० ग्राम , सज्जी २५० सबको बारीक पीसकर छान लेना चाहिए और गोमूत्र या भैंस का मूत्र ४८० ग्राम , दवा १२० ग्राम इस हिसाब से मिलाकर , बिना छाने,एक समय रोगी पशु को आठ दिन तक पिलायी जाये ।
२ - औषधि - मेंथी का बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ३ लीटर , मेंथी के बीज को बारीक पीसकर , छाछ में मिलाकर , ८ घन्टे पहले गलना चाहिए । रोगी को दोनों समय ८ दिन तक पिलाना चाहिए । बाद दिन में एक समय आराम होने तक देना चाहिए । और उसकी खुराक बंद करके हरी घास खिलायी जायें ।।
३ - औषधि - फिटकरी ४८० ग्राम , काला नमक १२० ग्राम , आबाँहल्दी ४८० ग्राम , सज्जी ४८० ग्राम , ढाढ़न के बीज ५५० ग्राम सबको बारीक पीसकर और छानकर उनमें गोमूत्र ४८० ग्राम, और दवा १८० ग्राम , दोनों को मिलाकर रोगी पशु को सुबह बिना छाने , ११ दिन तक , बोतल या नाल से पिलाया जाय ।
४ - औषधि - रोगी पशु की रीढ़ पर तिल का तैल ४० ग्राम , पिचकारी में चमड़ी के भीतर उतारा जाय और उस स्थान को ख़ूब मसल दिया जाय, ताकि तेल सब जगह मिल जाय । जिस दिन दवा उतारें , उस दिन नीचें उतारें । दूसरे दिन नीचे से उपर मालिश करें और नीम के पानी से सेंकें ।
५ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , पवाडिया ( चक्रमर्द ) के बीज ४८० ग्राम , नमक ३६ ग्राम , पानी ४ लीटर , बीजों और नमक को महीन पीसकर , पानी में मिलाकर , ख़ूब उबालें ,ठन्डा होने पर दोनों समय ,१५ दिन तक रोगी पशु को खिलायें ।
# - १० ग्राम भुई कोला ( पाताल तुमड़़ी ) बिदारीकन्द उबाल और छानकर काम में लिया जायें ।
५ - औषधि - रोगी नर पशु की कमर व गर्दन में पिचकारी से दवा उतारी जाय,भुई कोला का तेल बना करकें - भुई कोला ( पाताल तुमड़़ी ) ४०० ग्राम , अलसी का तैल १००० ग्राम ,पाताल तुमड़़ी को तैल में पकाकर तैयार कर लें ।
--------------------------- @ ----------------------------
६ - कन्धो में सूजन और पेशाब चढ़ जाना
===========================
कारण व लक्षण - जब बैल पेशाब करता है तो उसे रोक देना चाहिए । उस समय उसे चलाया नहीं जाना चाहिए । गोबर निकालते ( टट्टी करते ) समय भी उसे आराम देना चाहिए । ऐसा न करने पर कंधा की बिमारी हो जाती है । उसके शरीर के अन्दर पेशाब ( मूत्र ) भर जाता है । कन्धे पर काफ़ी सूजन आ जाती है । यह रोग केवल बैल को ही हो जाती है ।
१ - औषधि - सुई लगाकर पिचकारी से उसका मूत्र कन्धा में से निकालकर बाहर फेंक दें । बाद में नीम के उबले हुए पानी से घाव को धोयें तथा कपड़े से उसकाे पोंछ दें । अामचूर का तेल १२० ग्राम ,सिंगदराद पत्थर९० ग्राम , लेकर सिंगदराद को महीन पीसकर दोनों को मिलाकर गरम करके मालिश करें । दोनों समय, सुबह- सांय नीम के पानी से घाव धोते रहना चाहिए ।
--------------------------- @ ----------------------------
७ - कन्धा तिड़कना
===================
कारण व लक्षण - यह रोग बैल व भैंसे मे होता है जोत को ढिला रखने पर गाड़ी मे काफ़ी दिनों तक न जोतने पर और फिर अचानक जोतने पर बैल का कन्धा तिडक जाता है । उससे ख़ून निकलने लगता है । उस पर मक्खियाँ गिरने लगती है । लापरवाही के कारण घाव हो जाता है और उसमें कीड़े भी पड़ जाते हैं ।
१ - औषधि - पहले रोगी पशु के कंधे को नीम के उबले हुए गुनगुने पानी से सेंकना चाहिए , फिर रूई से उसे साफ़ कर देना चाहिए ।
२ - औषधि - पहले रोगी पशु के कन्धे को नीम के उबले हुए गुनगुने पानी से सेंकना चाहिए , फिर रूई से उसे साफ़ कर देना चाहिए ।
३ - औषधि - अमचूर का तैल २४ ग्राम , सिंगदराद १२ ग्राम , सिंगदराद को पीसकर छान लें और अमचूर के तैल में मिलाकर गरम कर लें । गरम करते समय दवा को हिलाते रहना चाहिए , जिससे दवा अच्छी तरह मिल जाय । फिर गुनगुना दवा से पशु के कन्धे पर दोनों समय , अच्छा होने तक , मालिश करते रहें ।
४ - औषधि - रतनजोत का दूध २४ ग्राम , को रोगी पशु के कन्धे पर दिन में तीन बार , अच्छा होने तक ,लगाते रहे ।
५ - औषधि - गधापलास की गीली लकड़ी के काँटे साफ़ कर उसे आँच पर जला लें और ठंडा होने पर रोगी पशु के कन्धे पर २४ ग्राम , नारियल तैल लगाकर लकड़ी से घाव पर दोनों समय ,अच्छा होने तक रगड़े । इससे पशु जल्दी अच्छा होगा ।
६ - औषधि - नीम का तैल १२ ग्राम , मिस्सी ९ ग्राम , नीम के तैल को रोगी पशु के घाव पर लगाकर मिस्सी को बारीक पीसकर लगायें ।
--------------------------@---------------------------
८ - कन्धे में गाँठ पड़ना
====================
कारण व लक्षण - अक्सर बैलों को जोतने पर , जोत ढीली रहने पर , नया बैल होने पर , छोटे-बड़े बैलों को एक साथ जोतने पर , बैलों को लगातार १५ दिनों तक न जोतने के बाद यकायक जोतने पर बैल के कन्धो पर सूजन आ जाती है । यह सूजन धीरे - धीरे गाँठ का रूप धारण कर लेती है । इससे पशु को बहुत कष्ट होता है ।
१ - औषधि - कन्धे की गाँठ को पहले नीम के उबले हुए पानी में दोनों समय , क़रीब आठ दिनों तक , सेकें । गरम ईंट से गाँठ सेंकने से पशु को आराम होता है ।
२ - औषधि - अमचूर का तैल ४८ ग्राम , सिंगदराद २४ ग्राम , सिंगदराद को महीन पीसकर कपड़े में छानकर तैल गरम करते समय मिला दें । उसे हिलाते रहे । फिर गुनगुना होने पर पंशु के कन्धे पर दोनों समय ,अच्छा होने तक लगायें ।
३ - आक ( मदार ) का दूध छ: माशा ( ९ ग्राम ) रोगी पशु को बेची पर चाक़ू से एक रूपये के बराबर जगह खुरचकर बाल उड़ा दें । फिर उसी स्थान पर रूई से आक का दूध लगा दें । प्रतिदिन सुबह ६ दिन तक दूध लगायें ऐसा करने पर पहले कन्धे पर सूजन आयेगी । नसें तंग होगी , लेकिन उसके बाद गाँठ गल जायेंगी । गँवारपाठा का गूद्दा निकालकर पशु के कन्धे पर लगाना चाहिए ।
४ - औषधि - मदार की जड़ ६ माशा रोटी में डालकर पशु को आठ दिन तक खिलानी चाहिए ।
९ - बैल व भैंसा की गर्दन में मूतार
=======================
कारण व लक्षण - मूतार ( बैल - भैंसा ) की गर्दन में सूजन आने के बाद पक जाना -- यह बिमारी वज़न ढोनेवाले पशुओं की गर्दन में हो जाता है ।गर्दन में सूजन आ जाती है। एसे में किसान को जुताई नहीं करनी चाहिए ।
१ - औषधि - असली रूमीमस्तगीं ५ ग्राम , राल २० ग्राम , गूगल १० ग्राम , मूर्दा सिंह १० ग्राम , सिन्दुर १० ग्राम , नील ३ ग्राम , मोमदेशी ३० ग्राम , इन सभी दवाओं को कूटकर १५० ग्राम ,सरसों के तैल मे मिलाकर एक उबाल देकर डिब्बे में रख लें और पशु को धूप में बाँध कर उसकी गर्दन पर लगाये ।
दवाई को हाथ से नही लगानी चाहिए , किसी लकड़ी की चम्मच से लगाना चाहीए , दवाई गर्दन पर पतली- पतली दवा लगाना चाहिए नहीं तो गर्दन को जला देगी , और ध्यान रहे जबतक ठीक न हो जबतक पशु को हल व बूग्गी में नहीं जोड़ना चाहिए ।
१० - जहरवात ( जहरबाद ) गर्दन में सूजन
==============================
कारण- लक्षण - इस रोग में पशु की गर्दन में बहुत अधिक सूजन आ जाती हैं । यह कष्टदायक व्याधि हैं पशु दाना-खाना लेने में असमर्थ रहता हैं ।
१ - औषधि - सोंठ, पीपल , कालीमिर्च , ज़ीरा सफ़ेद , ज़ीरा काला , कुटकी , चिरायता , चीता ( चित्रक) बायबिड्ंग , काकडासिंगी , सभी को ५०-५० ग्राम , लेकर कूटपीसकर - कपडछान करके रख लें । बण्डार २०० ग्राम , लहसुन २०० ग्राम , पीसकर मिला लें , इस दवा को ८-९ दिन तक रोज़ाना जौं के आटे में मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - काली जीरी ५ ग्राम ,कुटकी १० ग्राम , बण्डार १० ग्राम को बराबर में मिलाकर पीसछानकर दिन मे ४-५ बार जौं के आटे में मिलाकर खिलाने से आराम आता हैं ।
३ - औषधि - चीता , चिरायता , काकडासिंगी , जवाॅखार , कुटकी , भाँग , बड़ी पीपल, पीपरामूल , ढाक के बीज , गुगल , संभालू के सूखे पत्तें । मरोड़ फली , सभी को २५०-२५० ग्राम , लें । सज्जीखार , सेंधानमक , कालाजीरा , सफेदजीरा घुड़बच , हींग , अजवायन देशी , अजवायन खुरासानी , राई , अदरक , इन्द्रायण के फल , नीम के पत्ते , बेलगिरी , कालीमिर्च , इन्द्रजौं , गिलोय , छोटी हरड़ , सभी को ५००-५०० ग्राम , लें। बड़ी हरड़ , बण्डार , कचरी , सोंठ , बहेड़ा , सहजन ( सोहजना ) की छाल , पुदिना , प्याज़ , प्रत्येक १-१ किलो लें । कुचला छिला हूआ ३ छटांक , सुहागा फूला ७५ ग्राम , फिटकरी फूला ७५ ग्राम , सबको लेकर कुटपीसकर ७५-७५ ग्राम के गोले बना लें और दिन में तीन बार पशु को खिलाने से जहरवात बिमारी ठीक हो जायेगी ।
४ - औषधि - कालीजीरी , मकोय , बण्डार , सममात्रा में लेकर पीसकुटकर लेपबनाकर लेप को गुनगुना कर रोगग्रस्त स्थान पर लगाकर महुआ का पत्ता बाँधने से लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
--------- ० --------
११ - जहरवात
=============
कारण व लक्षण - यह रोग अधिकतर मादा ( दूध देने वाले ) पशुओं के थन और साधारण पशुओं के गले ( कण्ठ) में होता है । पहले गले या कण्ठ और थन में एक गाँठ पैदा होती है । कुछ ही घण्टों बाद वह बड़ा रूप धारण कर लेती है । यह रोग हर जगह हो सकता है ।
गाय को छूने पर वह गरम मालूम होती है । गाँठ का आकार ३-४ इंच तक होता है । पशु खाना पीना और जूगाली करना बन्द कर देता है । उसे बुखार चढ़ आता है । गले पर सूजन आ जाती है , जिससे साँस लेने में उसे कठिनाई होती है । कभी - कभी इसका आक्रमण थनों पर भी होता है । थन ख़राब हो जाते है । थनों और दूग्धकोष पर सूजन आ जाती है , कभी - कभी छिछडेदार और रक्तमिश्रित दूध निकलता है । समय पर इलाज न होने से थन बेकार हो जाते है । यह बीमारी कभी एक , दो , तीन , चारों थनों में हो जाती है । उपचार उचित समय पर न होने के कारण गर्दन के रोग वाला पशु जल्दी मर जाता है ।
१ - औषधि - रोग - स्थान को नीम के उबले पानी को गुनगुना होने पर दिन में ३ बार सेंका जाय । फिर नारियल का तैल या नीम के तैल की मालिश की जाय । इससे गाँठ को गरम होने में सहायता मिलेगी ।
२ - औषधि - सत्यनाशी की जड़ १२० ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , पानी ७२० ग्राम , जड़ को बारीक पीसकर , गुड़ मिलाकर , पानी में घोलकर , रोगी पशु को ( बिना छाने ही ) , दो बार पिलाना चाहिए ।
३ - औषधि - हुलहुल का पुरा पौधा ( मच्छुन्दी ) १२० ग्राम , इसको बारीक पीसकर , रोटी के साथ रोगी पशु को दोनों समय , खिलाया जाय । अथवा इसको बारीक पीसकर ७२० ग्राम , पानी के साथ बिना छाने पिलाया जाय । दवा जादू का - सा असर दिखायेगी ।
टोटका -:-
४ - औषधि - जिस व्यक्ति की सबसे छोटी और अँगूठे के पासवाली अंगुली लम्बी करने से मिल जाती है , उसके द्वारा कुँआरी बछडी का गोबर लेकर सूजन के ऊपर गोल चक्कर बनाकर मध्य में चित्र नं० १ की तरह चीर देना चाहिए ।
आलोक -:- दोनों उँगलियों को मिलाते वक़्त उसको दूसरी दोनों अंगुलियों को हथेली की और दबाकर अंगुलियाँ मिलाना चाहिए ।
१२ - खाँसना ( ढाँसना )
===================
कारण व लक्षण - प्राय : बदहजमी और सरदी - गर्मी के कारण पशु को खाँसी चला करती है । यह ऐसा रोग है, जिसमें छाती के भीतर फोड़े हो जाते है । और पशु सुस्त रहता है । उसके खानपान में कमी हो जाती है । वह कमज़ोर हो जाता है । अक्सर उसके रोयें खड़े हो जाते हैं । कभी - कभी उसे ज्वर भी आ जाता है । उसका रंग काला पड़ जाता है । अक्सर उसे क़ब्ज़ रहा करती है , नाक वआँख से पानी बहता रहता हैं। और आँख से पानी बहता रहता है । उसकी श्वास की गति बढ़ जाती है । कभी-कभी खाँसते-खाँसते पशु का गोबर निकल जाता है ।
१ - औषधि - धान का छिल्का ४८ ग्राम ,( बिनौला कपास का बीज ) ४८० ग्राम , दोनों को ख़ूब मिलाकर , सूखा ही , आठ दिन तक दोनों समय रोगी पशु को खिलायें ।
२ - औषधि - खड़ी मूँग २४ ग्राम , मीठा तैल १२० ग्राम , खड़ी मूँग को तैल के साथ रोगी पशु को पिलाने से फ़ायदा होता है ।उपर्युक्त मात्रा में प्रतिदिन सुबह- सायं ४-५ दिन तक देने से आराम मिलता है और खाँसी दूर हो जाती हैै । कलई के चूने का पानी १२० ग्राम , चूने को ८ घन्टे पहले गरम पानी में गलाया जाय । फिर ऊपर का स्वच्छ पानी निथारकर रोगी पशु को ६० ग्राम , बोतल द्वारा पिलाया जाय । यह दवा चार दिन तक , दोनों समय ,पिलाये ।
------------ @ ------------
Sent from my iPad
(२४)-गौ-चिकित्सा - सींगरोग ।
(२४)-गौ-चिकित्सा - सींगरोग ।
सींग का टूट जाना
====================
यदि सींग टूटने पर रक्त बह रहा हो तो सींग के ऊपर पुरूष के बाल लपेटकर कपड़ा बाँध दें और उसके ऊपर गाय का या बकरी का दूध या अलसी का तेल व कपूर मिलाकर पट्टी को तेलकपूर से तर कर दें । इस प्रयोग से यथाशीघ्र लाभ होता हैं । यदि इस प्रयोग के क्रियान्वयन से ख़ून बहना नहीं रूकता है तो फिटकरी मिले हूए ठण्डे जल से तर करके पट्टी बाँधकर इसके बाद ऊपर वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए ।
Sent from my iPad
सींग का टूट जाना
====================
यदि सींग टूटने पर रक्त बह रहा हो तो सींग के ऊपर पुरूष के बाल लपेटकर कपड़ा बाँध दें और उसके ऊपर गाय का या बकरी का दूध या अलसी का तेल व कपूर मिलाकर पट्टी को तेलकपूर से तर कर दें । इस प्रयोग से यथाशीघ्र लाभ होता हैं । यदि इस प्रयोग के क्रियान्वयन से ख़ून बहना नहीं रूकता है तो फिटकरी मिले हूए ठण्डे जल से तर करके पट्टी बाँधकर इसके बाद ऊपर वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए ।
Sent from my iPad
(२२)- गौ- चिकित्सा - आँखों के रोग।
(२२)- गौ- चिकित्सा - आँखों के रोग।
पशुओं में आँखों के रोग होना
=======================
१ - आँखों में जाला पड़ना ( दृष्टिमांद्य )
कारण व लक्षण - पशुओं की आँख के अन्दर जो नीले रंग की पुतली दिखाई देती हैं और जब वह सफ़ेद रंग की या मैटमेले रंग से ढक जाती हैं तब अन्य प्राणियों के समान ही पशुओं को भी दृष्टिमांद्य हो जाता हैं इस रोग को ही गाँव के लोग आँख में जाला आना बोलते हैं । इस रोग में पशु को कम दिखाई देने लगता है बहुत पुरान होने पर दिखाई देना भी बन्द हो जाता है इसलिए इसका उपचार अनिवार्य रूप से करना चाहिए ।
१ - औषधि - हाथी के नाख़ून को तीन साफ़ पत्थर पर २-२ बून्द पानी की डालकर नाख़ून को चन्दन की तरह घिसकर तैयार कर लें और रोगी पशु की आँख में आँज दें ( आँख में लगाना ) यह दवा ३-४ हफ़्ते तक लगाने से पशु की आँख ठीक हो जाती हैं ।
२ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) के पत्तों का रस निकालकर कपड़े में छानकर रोगी पशु की आँख में पाँच- पाँच बून्द २-३ बार डालने से ही लाभ हो जाता हैं । और यह औषंधि आँखों के हरप्रकार की बिमारी में चमत्कारी सिद्ध होता हैं ।
३ - औषधि - शोरा मीठा १० ग्राम ,तथा गेरू १० ग्राम - दोनों को बारीक पीसकर रख लें और प्रतिदिन कोई काग़ज़ की ६ इंच लम्बी व आधा इंच मोटी नली बनाकर उसमे २ ग्राम पावडर भरकर पशु की आँख के पास लेजाकर नली में ज़ोर से फूँक मार दें जिससे दवाई पशु की आँख में चली जाये ,ठीक होने तक करना होगा ।
४ - औषधि - कटैरी ( कण्टकारी ) ज़मीन पर फैलती है छोटे- छोटे टमाटर जैसे सफ़ेद फल लगते है और पककर फल पीले हो जाते है तथा इसके पत्तों पर काँटे होते है इसको लेकर पलों का रस निचोड़ लें । इस रस को रोगी पशु की आँख में ५-५ बून्द प्रतिदिन टपकाने से उसकी आँख का जाला जड़ से जाता रहता हैं किन्तु यह दवा आँख में डालने के बाद पशु की आँख लाल होकर उसमें सूजन आ जाती हैं लेकिन धीरे-धीरे सूजन उतर जाती हैं और पशु की आँख ठीक अवश्य हो जाती हैं ।
५ - औषधि - शिंगरफ और मिश्री समान मात्रा में लेकर एक नींबू के रस में खरल करकें रख लें और प्रतिदिन मुर्ग़े के पंख से इस दवा को पशु की आँख में प्रतिदिन लगाने से आराम आता हैं और जाला नष्ट हो जाता हैं ।
६ - औषधि - ममीरा व नीला थोथा और सिन्दुर को सममात्रा में लेकर काग़ज़ी नींबू का रस में ख़ूब घोटकर नैत्रो में अंजन करते रहने से ही लाभ हो जाता हैं ।
२ - आँख में फूली अथवा फूल पड़ना ' ढेढर ( आँख में चोट लगने के कारण भी )
=============================================
५ - औषधि - अधिक दिनों तक आँखों के दुखते रहना तथा समुचित इलाज न किये जाने के कारण कभी- कभी पशुओं की आँख में घाव हो जाता हैं आँख की पुतली पर सफ़ेद - सफ़ेद जाला सा आ जाता हैं तथा उसे कम दिखाई देने लगता हैं और आँखों से हर समय पानी और कीचड़ बहता रहता हैं और अन्त में आँख मे फफोला सा पड़ जाता हैं । यदि शीघ्र इलाज नहीं किया तो ऐसा रोगी पशु अन्धा हो जाता हैं ।
# - कभी- कभी पशु की आँख पर चोट लगने से भी फूली पड़ जाती है और पानी बहता रहता है ।
१ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) की पत्तियों का रस आँख में डालना लाभकारी सिद्ध होता हैं । यह औषधि आँख की समस्त प्रकार के रोगों का निदान करती हैं यह रामबाण औषधि हैं ।
२ - औषधि - सरसों का शुद्ध तेल भी आँख में डालना हितकारी रहता हैं ।
३ - औषध - चीनीपत्थर के कटोरे में नींबू का रस निकालकर चुटकी भर सादा नमक डालकर लोहे की मूसली या किसी वस्तु से घोटकर आँख में डालना उपयोगी रहता हैं ।
४ - औषधि - गाय घी १ छटांक , आधा छटांक फिटकरी , अफ़ीम १ रत्ती लेंकर पहले घी को आग में गरम करे और गरम होने पर इसमें फिटकरी का चूर्ण डाल दें ( इसको डालते ही घी में झाग उठने लगेंगे और अफ़ीम डालते ही बन्द हो जायेंगे ) इसके बाद उसे ठन्डा करके दिन में ३-४ बार आँख में प्रतिदिन लगाने से आँख ठीक हो जाती हैं ।
५ - औषधि - मिट्टी के ढक्कन दार बर्तन में मदार ( आक ) का दूध डालकर उसमे साठी के चावल भिगोवें । उस बर्तन के मुख को कच्ची मिट्टी का गारा बनाकर उससे मुँह बन्द कर दें और आँच पर चढ़ा दें । जब चावल ख़ूब जल जायें तब ठन्डा करके पीसकर कपडछान करके रखें और प्रतिदिन पशु की आँख मे आँजना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
६ - औषधि - काला सूरमा १ तौला , चाकसू ६ माशा , ( ऐसा चाकसू जिसे इमली के पत्तों में पकाकर उसका छिल्का उतार कर रख लिया हो ) तथा कलमीशोरा - सभी को काग़ज़ी नींबू के रस में डालकर एक दिन लगातार खरल करके चने के बराबर गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रख लें । और एक गोली प्रतिदिन सफ़ेद पत्थर पर दो बून्द पानी डालकर ,घीसकर पेस्ट बनालें ओर इस पेस्ट को पशु की आँख में लगाने से कुछ दिनों में आँख का जाला , फोले , धुन्ध आदि कटकर दृष्टि साफ़ हो जाती हैं ।
७ - औषधि - शीतल चीनी १ रत्ती , लौंग २ रत्ती , बड़ी इलायची डेढ़ माशा , त्रिफला चूर्ण डेढ़ माशा , कालीमिर्च १ रत्ती , महीन पीसकर कपडछान करके नीम का रस ५ छटांक , डालकर अच्छी तरह से घोट लें । फिर इसमें कपूर पावडर ६ रत्ती , पिपरमेन्ट पावडर २ रत्ती मिलाकर एक शीशी में भरकर रखँ लें तथा प्रतिदिन सलाईँ द्वारा पशु की आँख में लगाने से जाला , फोला , धुन्ध , मोतियाँ बिन्द आदि समस्त नेत्र रोगों में लाभ होता हैं तथा दृष्टि तेज व साफ़ होती हैं ।
८ - औषधि - पशु की आँख में चोट लगने पर -- घरेलू पालतू कबुतर की बीट को पत्थर पर दो बून्द पानी डालकर घीसकर पेस्ट बनाकर पशु की आँख में लगाने से पशु की आँख की पीड़ा चली जाती हैं । कबूतर की बीट में चोट की पीड़ा हरने की बड़ी क्षमता होती हैं ।
९ - औषधि - मदार ( आक ) १० ग्राम , गन्ने के शीरे की सात बून्द डालकर मिला लें ।रविवार के दिन दूध में अंगुली भिगोकर भीगी हूई अंगुली से पशु की आँख के चारों ओर अंगुली से सात चक्कर बना दे । ध्यान रहे चक्कर बनाते समय अंगुली न उठे । इस प्रकार दवा लगाने से जहाँ चक्कर बनाये थे वहाँ से बाल व खाल उड़ जायेंगे और फूली में आराम आ जायेगा ।
१० - औषधि - काँच की हरी चूड़ियों १० ग्राम ,को खरल में डालकर बहुत महीन पीसकर कपडछान कर लें । इसके बाद सिरस के पत्तों का रस १० ग्राम , लेकर खरल में डालकर बहुत खरल करें जिससे घुटकर काजल व सूरमे की भाँति चिकना हो जायें फिर किसी शीशी में भरकर रख लें और प्रतिदिन एक चुटकी दवा लेकर रोगी पशु की आँख में लगाने से पशु की आँख की फूली या ढेढर बिलकुल ठीक हो जायेगी
३ - आँख की फूली
============
कारण व लक्षण - गाय- भैंस व अन्य पशु की आँख आ जाने से ( किसी पशु की दोनों आँखें एक साथ आ जाती हैं और किसी पशु की एक आँख आती है ) और अचानक चोट लग जाने से फूली बन जाती है । पहले पशु आँख बन्द रखता है और उसकी आँख से पानी बहता है, फिर पशु की आँख में सफ़ेद झिल्ली की टीकिया बन जाती है। उसके बाद पशु को आँख से नहीं दिखता । उसकी आँख बिलकुल ख़राब हो जाती है। आँख में फूली पड़ते ही इसका इलाज जल्दी होना चाहिए , वरना बाद में इलाज होना कठिन है ।
१ - औषधि --फूली बनते ही पशु की आँख को कनपटी पर चाक़ू द्वारा लगभग अठन्नी की जगह भर, चौथाई हिस्से के बाल खुरचकर निकाल देने चाहिए। इससे वहाँ की जगह लाल हो जायेगी। इसके बाद थोड़ी - सी रूई लेकर उसमें २-३ भिलावें कूट लो । उसका तैल रूई द्वारा सोख लिया जायेगा। भिलावें का बचा हुआ कचरा गिरा देना चाहिए। फिर तैल युक्त रूई लेकर कनपटी पर खुरची हुई जगह पर दोनों तरफ़ की कनपटी पर बार लगा देनी चाहिए , ८ दिन में ज़ख़्म आराम हो जायेगा ।
आलोक-- जिस पशु को यह दवा लगायी जाय, उसे लगभग ८ दिन तक गर्मी में न जाने दिया जाय, क्योंकि सूर्य का प्रकाश वह सहन नहीं कर सकता है। पानी बरसे तो उसको घर बाँधकर रखना चाहिए। पशु यदि पानी में भीगेगा तो दवा रोग पर काम नहीं करेगी ।
२ - औषधि-- पहले बताये गये अनुसार पशु की दोनों कनपटी के बाल उखाड़कर चम्पाथुवर का दूध ( डंडाथुवर ) रूई द्वारा लगभग ८ दिन तक एक समय लगाया जाय।
३ -औषधि-- रोगी पशु की आँख में आगे लिखा हुआ घोल लगभग ८ दिन तक छिड़कना चाहिए-घोल बनाने के लिए , पानी ९६० ग्राम , तम्बाकू ९ ग्राम , चूना डेढ़ ग्राम ,नमक १२ ग्राम , सबको महीन पीसकर पानी में डालकर उबाल लेना चाहिए। फिर छानकर कुनकुना पानी आँखों में छिड़कना चाहिए ।
४ - औषधि -- पानी में घीसा हुआ साभँर ( बारहसिंगा ) का सिंग ३ ग्राम , नींबू का रस ३ ग्राम , ३ ग्राम , मक्खन ३ ग्राम , कामिया सिंदूर ( असली सिंदूर ) ३ ग्राम , सबको मिलाकर तथा मरहम बनाकर रोगी पशु की आँख में ८-१० दिन दोनों समय लगाना चाहिए।
५ - औषधि -- गुराड़ ( सफ़ेद शिरस ) के पौधे की जड़ लाकर तथा पानी द्वारा धोकर उसे गोमूत्र के साथ घिसना चाहिए। इस प्रकार बना हुआ मरहम रोगी की आँख में दोनों समय लगभग १० दिन तक लगाना चाहिए।
६ - औषधि -- गाय का घी और नमक का मरहम बनाकर ८ दिन लगायें पशु की आँख में लगाते रहे ।
७ - औषधि -- गुराड़ सफ़ेद सिरश के पौधे की जड़ को गोघृत के साथ घिसकर दोनों समय २० दिन तक लगाना चाहिए ।
८ - औषधि -- जिस पशु की आँख आ जायें ( किसी पशु की एक और किसी पशु की दोनों आँखे आ जाती हैं ) तो उसे मीठे प्याज़ का रस ९ ग्राम , फिटकरी साढ़े चार ग्राम , आबाँहल्दी भी साढ़े चार ग्राम , लेकर । फिटकरी व आबाँहल्दी को महीन पीसकर उसे प्याज़ के रस में मिलाकर अंजन बना लें। उसे रोगी पशु को रोज़ाना दोनों समय आराम होने तक लगाया जायें ।
९ - औषधि -- अच्छा होने तक रोगी पशु के दोनों सींगों की जड़ के चारों ओर लगभग २० ग्राम , ताज़े नींबू का रस दोनों समय मला जाय। यह आँख आने पर तथा आँख में फूली होने पर भी लाभ करता है।
४ - रोग - आँख में सफ़ेद कीचड़ सा ( क्लेद ) आना
१ - औषधि - गाय का ताज़ा मक्खन -- गाय या भैंस की आँखों में जब सफ़ेद कीचड़ सा आये तो गाय का ताज़ा मक्खन लेकर थोड़ा - थोड़ा हाथ में लेकर बिमार पशु के सींग की जड़ में मक्खन की मालिश करें । यह क्रिया दो - तीन दिन तक करनी चाहिए रोगी पशु स्वस्थ हो जायेंगे तथा आँख में कीचड़ आना बन्द हो जायेगा ।
२ - गाय की आँख मे ढीड़ आना -- ताज़े पानी में नमक मिलाकर , पानी की घूँट भर कर गाय की आँख के ऊपर कुल्ला करें । दिन में तीन चार बार करें,२-३ दिन में ठीक हो जायेगा ।
५ - आँख में भिलावा लगना
====================
कारण व लक्षण - कभी- कभी पशु की आँखों में भिलावा लग जाता हैं । भिलावा तेज़ विष औषधि हैं इसके लग जाने से आँखों में सूजन आ जाती हैं लाल हो जाती है है क्योंकि इसमें तेल होता हैं वह त्वचा पर जहाँ लग जाता है वहाँ जला देता है ।
१ - औषधि - कुटकी २ छटांक लेकर पीस कर कपडछान करके रोगी पशु की आँख में लगाने से लाभ होने लगता हैं ।
६ - आँख उठना , आँखें लाल होकर दूखना
= ================================
कारण व लक्षण - आँख में चोट लगने से अथवा धूल पड़ने से पशुओं की भी आँखें उठ जाती हैं । इस रोग में - आँखें लाल हो जाती हैं । हर समय आँखों से पानी बहता रहता है तथा पशु को कम दिखाई देने लगता हैं । इस रोग की यदि शीघ्र समुचित चिकित्सा नहीं की जाती हैं तो पशु की आँखो में फूली हो जाती हैं ।
# - औषधि - सबसे पहले फिटकरी के पानी से पशु की आँखों की धुलाई व सफ़ाई करनी चाहिए । इसके बाद इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए ।
१ - औषधि - छोटी हरड़ को गाय के घी में भूनकर इसके बाद उसे थोड़े से साजे नमक के साथ मिलाकर तीन- चार बून्द पानी डालकर घोटकर लेप बना लें फिर उसको पशु की आँख के चारों ओर लगा देना चाहिए । यह क्रिया दिनभर में ३-४ बार करनी चाहिए । लाभ अवश्य होगा ।
२ - औषधि - लाल चन्दन , हल्दी , अफ़ीम , १-१ छटांक , आम ३-४ पत्तियाँ , कुटपीसकर । सेहुड़ का दूध २ छटांक लेकर उसमें मिलाकर आँख के चारों तरफ़ सावधानी से लगाये । ध्यान रहे की दवाई पशु की आँख में अन्दर नहीं जानी चाहिए । क्योंकि सेहुड़ का दूध आँख में लगने से पशु अन्धा हो जाता हैं ।
७ - आँखें दूखना ( आँख मे तिनका पड़ने से या किसी कीट के काटने पर )
=============================================
कारण व लक्षण - पशु की आँख में चोट लगने व आँख में तिनका गिर जाने व ज़हरीले कीट के गिर जाने व उसके काट लेने के कारण आँखें लाल होकर सूज जाती है । आँख से दिन मे पानी बहता रहता हैं और रात में कीचड़ आ जाता हैं रोगी पशु हर समय आँखें बन्द किये रहता हैं ।
१ - औषधि - यदि किसी चीज़ के आँख में पड़ जाने के कारण आँख दुखने लगी हैं तो आँख के अन्दर से उस चीज़ को सावधानी पूर्वक निकलना चाहिए । और बाद मे २-२ बून्द अरण्डी के तेल की आँखों में डालनी चाहिए । इसके बाद गुलाबी फिटकरी १० रत्ती , को आधा छटांक गुलाब जल में घोलकर इस लोन की बून्दे आँखों में टपकाना चाहिए ।
२ - औषधि - यदि पशु की आँख में सूजन हो तो खशखश के छिलके पानी में पकाकर साफ़ रूई से सेंक करें । पहली अवस्था में रूई तर करके बाँध देने से भी आराम हो जाता हैं । किन्तु २-४ दिन के बाद सेंक ही करना पड़ेगा ।
३ - औषधि - यदि मक्खी - मच्छर या कीट आदि ने काटा हो तो पशु की आँख से पानी व कीचड़ आता हैं । मिश्री , सेंधानमक , फिटकरी , प्रत्येक १-१ तौला लेकर , नीला थोथा ४ रत्ती , रसौत ६ माशा , गुलाबजल या उबला हूआ पानी १ लीटर ठन्डा करके , सभी दवाओं को पीसछानकर गुलाबजल या पानी में घोल लें इससे रोगी पशु की आँखों में छबके मारने चाहिए और दो- चार बून्द आँखों में भी डालनी चाहिए । यह क्रिया दिन मे ३-४ बार करनी चाहिए ।
टोटका :-
१ - थोड़ी सी मात्रा में पशु को सुअर की विष्टा देने से भी आँखों का दूखना ठीक हो जाता हैं ।
२ - आटे की लोई में भुजायल पक्षी के पंख को रखकर रोगी पशु को खिलाने से भी रोग जाता रहता हैं । और आँखें ठीक हो जाती हैं ।
३ - मंगलवार या रविवार के दिन रजस्वला स्त्री ( ऐसी महिला जिसको M c - मासिक धर्म ) हो रहा हो । ऐसी महिला के ख़ून में भीगा हुआ कपड़े का थोड़ा सा टुकड़ा लेकर पशु को खिला देने से रोग समाप्त होसजाता हैं ।
४ - गुम्मा का रस आँख में डालने से भी यह रोग जाता रहता है ।
८ - रतौंधी ( Night blindness )
==========================
कारण व लक्षण - यह रोग पशुओं में प्राय : दिमाग़ की कमज़ोरी से होता हैं । इसमें पशु को दिन में तो साफ़ दिखाई देता हैं किन्तु सांय होते- होते ही ( सूरज ढलने के बाद ) उसे कुछ भी दिखाईं नहीं देता हैं । इस रोग का यदि प्रारम्भ में ही ठीक प्रकार से इलाज हो जाये तो ठीक हो जाता है वरना बाद में पशु अन्धा हो जाता हैं चूँकि इस रोग में दिन में दिखाई देता है और रात में नहीं दिखाई देता इसलिए इस रोग को ( रात + अन्ध =रातअन्ध , रात का अन्धा ) रतौंधी कहते हैं ।
१ - औषधि - हुक्के का मैल पानी में पीसकर आँखों में लगाने से रतौंधी में लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - अलसी या अरण्डी का तेल पशु के सिर के ऊपर मालिश करना भी गुणकारी सिद्ध होता हैं ।
३ - औषधि - चिरमिटी के पत्तों का रस पशु की आँखों में लगाने से भी लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - मछली के पित्ता ४ छटांक , व शुद्ध शहद ४ छटांक , दोनों को मिलाकर ५-६ दिन तक आँखो में डालने से पशु का रतौंधी रोग ठीक हो जाता हैं ।
५ - औषधि - गाय के गोबर में एक साफ़ रूमाल को उसके अन्दर दबाकर ५ -१० मिनट के लिए छोड़ दें उसके बाद कपड़ा निकालकर एक बर्तन में निचोड़ ले और इस गोबर के रस की ४-५ बून्दे आँख में डालने बिलकुल ठीक हो जाता हैं ।=
९ - आँख कोया निकलना
==================
कारण व लक्षण - आँख का कोया निकल जाने के तीन कारण है ।-१ - वज़न खींचते समय झटका लग जाना । २ - पशुओ का आपस में लड़ जाना । ३ -पशु का पैर अचानक गड्ढे में गिर जाना । इन कारणों से पशु की यह बिमारी होती है । आँख का कोया जब बाहर आता है तो आँख में लाल -लाल दिखाई देता है ।
१ -औषधि - बासी पानी ( रात का बचा हुआ पानी ) ९६०ग्राम , सादा नमक २४ ग्राम , नमक को लेकर पीसकर पानी में डालकर पानी को गर्म किया जाये । फिर उसे छानकर कुनकुना होनेपर रोगी पशु की खुलीआँखों में दोनों समय अच्छा होने तक पानी को मुँह में भरकर आँख पर कुल्ला करें या अंजुली भर कर आँख पर छींटें मारे ।
२ - औषधि - सादा नमक १२ ग्राम , गुनगुना पानी ९६० ग्राम , दोनों को लेकर छान लें । और रोगी पशु की आँख पर हाथ से छींटना चाहिए । आँख का कोया बैठ जायगा और पशु को आराम हो जायेगा । दोनों समय ७-८ दिन तक एेसा करना चाहिए । यह दवाई गाय के शरीर जैसा बड़ा या छोटा । हो वैसे ही खुराक बढ़ा व घटा सकते है ।
१० - आँख में चिर्मियाँ होना
====================
कारण व लक्षण - जाला , ये एक प्रकार के महीन कीड़े है , जो पशु की आँख को अन्दर ही अन्दर खाया करते है । ग़ौर से देखने पर हमें रोगी पशु की आँख में वे दिखाई देते है । ये कीड़े रंग में सफ़ेद , लम्बे , बारीक होते हैं और ये आँख में इधर से उधर घुमा करते है , भीगी रूई से निकालने से वे निकल भी जाते है । पशु की आँख से पानी बहता रहता है । उसमें कीचड़ आ जाता है , जिससे पशु आँख बन्द रखता है ।
१ - औषधि - सेंधानमक २ तोला या २४ ग्राम पानी ८० तोला या ९६० ग्राम नमक को पीसकर ४० तोला पानी में उबालना चाहिए । िफर उसे छानकर कुनकुना पानी रोगी पशु की आँख पर दोनों समय अच्छे होने तक छिड़कना चाहिए ।
२ - औषधि - नीम की पत्ती १२ ग्राम , पानी ९६० ग्राम , नमक २४ ग्राम , नीम की पत्ती व नमक को पीसकर पानी में उबालना चाहिए । फिर उसे छानकर गुनगुने पानी को हाथ की अंजुली में लेकर पशु की आँख पर सुबह-सायं छींटें मारने चाहिए यह उपाय आँख ठीक होने तक करना चाहिए ।
३ - औषधि - पानी ९६० ग्राम , तम्बाकू १२ ग्राम , नमक १२ ग्राम , नमक व तम्बाकू को महीन पीसकर पानी में डालकर गरम किया जाय । फिर छानकर गुनगुना पानी पशु की की आँख में ठीक होने तक दोनों समय हाथ से छींटें मारने चाहिए ।
४ - औषधि - गाय की दही २४ ग्राम , अफिम २ ग्राम , अफिम को पानी में घिस लें और दही में मिलाकर अंजन बना लें । रोगी पशु की की आँख में सुबह -सायं यही अंजन रोज़ाना बना कर लगाते रहे , अच्छा होने तक लगाया जायें।
५ - औषधि - वराहीकन्द को पानी में घीसकर क्रीम जैसा बनाकर रोगी पशु की आँख में दोनों समय अंजन बनाकर अच्छा होने तक लगाया जाय।
६ - औषधि - मीठे प्याज़ का रस १० ग्राम , लेकर रोगी पशु की आँख में दोनों समय डालते रहे, अच्छा होने तक इस क्रिया को करते रहें ।
११ - अन्धा हो जाना
==============
कारण व लक्षण - कभी - कभी पशुओं को चरते समय खरगोश और गोच आदि जानवर आँख में फूँक मार देते है , जिससे पशु अक्सर अन्धे हो जाते है ।
१ - रोगी पशु की आँख में रोज़ सुबह - सायं दोनों समय ५-५ बूँद नींबू का रस छानकर अच्छा होने तक डालना चाहिए ।
२ - कचनार के छोटे पौधे की जड़ लाकर उसे धोकर गोमूत्र के साथ पत्थर पर खड़ी घिसना चाहिए फिर उसे छान लीजिए । और सुबह- सायं ठीक होने तक आँख में आंजना चाहिए ।
पशुओं में आँखों के रोग होना
=======================
१ - आँखों में जाला पड़ना ( दृष्टिमांद्य )
कारण व लक्षण - पशुओं की आँख के अन्दर जो नीले रंग की पुतली दिखाई देती हैं और जब वह सफ़ेद रंग की या मैटमेले रंग से ढक जाती हैं तब अन्य प्राणियों के समान ही पशुओं को भी दृष्टिमांद्य हो जाता हैं इस रोग को ही गाँव के लोग आँख में जाला आना बोलते हैं । इस रोग में पशु को कम दिखाई देने लगता है बहुत पुरान होने पर दिखाई देना भी बन्द हो जाता है इसलिए इसका उपचार अनिवार्य रूप से करना चाहिए ।
१ - औषधि - हाथी के नाख़ून को तीन साफ़ पत्थर पर २-२ बून्द पानी की डालकर नाख़ून को चन्दन की तरह घिसकर तैयार कर लें और रोगी पशु की आँख में आँज दें ( आँख में लगाना ) यह दवा ३-४ हफ़्ते तक लगाने से पशु की आँख ठीक हो जाती हैं ।
२ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) के पत्तों का रस निकालकर कपड़े में छानकर रोगी पशु की आँख में पाँच- पाँच बून्द २-३ बार डालने से ही लाभ हो जाता हैं । और यह औषंधि आँखों के हरप्रकार की बिमारी में चमत्कारी सिद्ध होता हैं ।
३ - औषधि - शोरा मीठा १० ग्राम ,तथा गेरू १० ग्राम - दोनों को बारीक पीसकर रख लें और प्रतिदिन कोई काग़ज़ की ६ इंच लम्बी व आधा इंच मोटी नली बनाकर उसमे २ ग्राम पावडर भरकर पशु की आँख के पास लेजाकर नली में ज़ोर से फूँक मार दें जिससे दवाई पशु की आँख में चली जाये ,ठीक होने तक करना होगा ।
४ - औषधि - कटैरी ( कण्टकारी ) ज़मीन पर फैलती है छोटे- छोटे टमाटर जैसे सफ़ेद फल लगते है और पककर फल पीले हो जाते है तथा इसके पत्तों पर काँटे होते है इसको लेकर पलों का रस निचोड़ लें । इस रस को रोगी पशु की आँख में ५-५ बून्द प्रतिदिन टपकाने से उसकी आँख का जाला जड़ से जाता रहता हैं किन्तु यह दवा आँख में डालने के बाद पशु की आँख लाल होकर उसमें सूजन आ जाती हैं लेकिन धीरे-धीरे सूजन उतर जाती हैं और पशु की आँख ठीक अवश्य हो जाती हैं ।
५ - औषधि - शिंगरफ और मिश्री समान मात्रा में लेकर एक नींबू के रस में खरल करकें रख लें और प्रतिदिन मुर्ग़े के पंख से इस दवा को पशु की आँख में प्रतिदिन लगाने से आराम आता हैं और जाला नष्ट हो जाता हैं ।
६ - औषधि - ममीरा व नीला थोथा और सिन्दुर को सममात्रा में लेकर काग़ज़ी नींबू का रस में ख़ूब घोटकर नैत्रो में अंजन करते रहने से ही लाभ हो जाता हैं ।
२ - आँख में फूली अथवा फूल पड़ना ' ढेढर ( आँख में चोट लगने के कारण भी )
=============================================
५ - औषधि - अधिक दिनों तक आँखों के दुखते रहना तथा समुचित इलाज न किये जाने के कारण कभी- कभी पशुओं की आँख में घाव हो जाता हैं आँख की पुतली पर सफ़ेद - सफ़ेद जाला सा आ जाता हैं तथा उसे कम दिखाई देने लगता हैं और आँखों से हर समय पानी और कीचड़ बहता रहता हैं और अन्त में आँख मे फफोला सा पड़ जाता हैं । यदि शीघ्र इलाज नहीं किया तो ऐसा रोगी पशु अन्धा हो जाता हैं ।
# - कभी- कभी पशु की आँख पर चोट लगने से भी फूली पड़ जाती है और पानी बहता रहता है ।
१ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) की पत्तियों का रस आँख में डालना लाभकारी सिद्ध होता हैं । यह औषधि आँख की समस्त प्रकार के रोगों का निदान करती हैं यह रामबाण औषधि हैं ।
२ - औषधि - सरसों का शुद्ध तेल भी आँख में डालना हितकारी रहता हैं ।
३ - औषध - चीनीपत्थर के कटोरे में नींबू का रस निकालकर चुटकी भर सादा नमक डालकर लोहे की मूसली या किसी वस्तु से घोटकर आँख में डालना उपयोगी रहता हैं ।
४ - औषधि - गाय घी १ छटांक , आधा छटांक फिटकरी , अफ़ीम १ रत्ती लेंकर पहले घी को आग में गरम करे और गरम होने पर इसमें फिटकरी का चूर्ण डाल दें ( इसको डालते ही घी में झाग उठने लगेंगे और अफ़ीम डालते ही बन्द हो जायेंगे ) इसके बाद उसे ठन्डा करके दिन में ३-४ बार आँख में प्रतिदिन लगाने से आँख ठीक हो जाती हैं ।
५ - औषधि - मिट्टी के ढक्कन दार बर्तन में मदार ( आक ) का दूध डालकर उसमे साठी के चावल भिगोवें । उस बर्तन के मुख को कच्ची मिट्टी का गारा बनाकर उससे मुँह बन्द कर दें और आँच पर चढ़ा दें । जब चावल ख़ूब जल जायें तब ठन्डा करके पीसकर कपडछान करके रखें और प्रतिदिन पशु की आँख मे आँजना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
६ - औषधि - काला सूरमा १ तौला , चाकसू ६ माशा , ( ऐसा चाकसू जिसे इमली के पत्तों में पकाकर उसका छिल्का उतार कर रख लिया हो ) तथा कलमीशोरा - सभी को काग़ज़ी नींबू के रस में डालकर एक दिन लगातार खरल करके चने के बराबर गोलियाँ बनाकर सुरक्षित रख लें । और एक गोली प्रतिदिन सफ़ेद पत्थर पर दो बून्द पानी डालकर ,घीसकर पेस्ट बनालें ओर इस पेस्ट को पशु की आँख में लगाने से कुछ दिनों में आँख का जाला , फोले , धुन्ध आदि कटकर दृष्टि साफ़ हो जाती हैं ।
७ - औषधि - शीतल चीनी १ रत्ती , लौंग २ रत्ती , बड़ी इलायची डेढ़ माशा , त्रिफला चूर्ण डेढ़ माशा , कालीमिर्च १ रत्ती , महीन पीसकर कपडछान करके नीम का रस ५ छटांक , डालकर अच्छी तरह से घोट लें । फिर इसमें कपूर पावडर ६ रत्ती , पिपरमेन्ट पावडर २ रत्ती मिलाकर एक शीशी में भरकर रखँ लें तथा प्रतिदिन सलाईँ द्वारा पशु की आँख में लगाने से जाला , फोला , धुन्ध , मोतियाँ बिन्द आदि समस्त नेत्र रोगों में लाभ होता हैं तथा दृष्टि तेज व साफ़ होती हैं ।
८ - औषधि - पशु की आँख में चोट लगने पर -- घरेलू पालतू कबुतर की बीट को पत्थर पर दो बून्द पानी डालकर घीसकर पेस्ट बनाकर पशु की आँख में लगाने से पशु की आँख की पीड़ा चली जाती हैं । कबूतर की बीट में चोट की पीड़ा हरने की बड़ी क्षमता होती हैं ।
९ - औषधि - मदार ( आक ) १० ग्राम , गन्ने के शीरे की सात बून्द डालकर मिला लें ।रविवार के दिन दूध में अंगुली भिगोकर भीगी हूई अंगुली से पशु की आँख के चारों ओर अंगुली से सात चक्कर बना दे । ध्यान रहे चक्कर बनाते समय अंगुली न उठे । इस प्रकार दवा लगाने से जहाँ चक्कर बनाये थे वहाँ से बाल व खाल उड़ जायेंगे और फूली में आराम आ जायेगा ।
१० - औषधि - काँच की हरी चूड़ियों १० ग्राम ,को खरल में डालकर बहुत महीन पीसकर कपडछान कर लें । इसके बाद सिरस के पत्तों का रस १० ग्राम , लेकर खरल में डालकर बहुत खरल करें जिससे घुटकर काजल व सूरमे की भाँति चिकना हो जायें फिर किसी शीशी में भरकर रख लें और प्रतिदिन एक चुटकी दवा लेकर रोगी पशु की आँख में लगाने से पशु की आँख की फूली या ढेढर बिलकुल ठीक हो जायेगी
३ - आँख की फूली
============
कारण व लक्षण - गाय- भैंस व अन्य पशु की आँख आ जाने से ( किसी पशु की दोनों आँखें एक साथ आ जाती हैं और किसी पशु की एक आँख आती है ) और अचानक चोट लग जाने से फूली बन जाती है । पहले पशु आँख बन्द रखता है और उसकी आँख से पानी बहता है, फिर पशु की आँख में सफ़ेद झिल्ली की टीकिया बन जाती है। उसके बाद पशु को आँख से नहीं दिखता । उसकी आँख बिलकुल ख़राब हो जाती है। आँख में फूली पड़ते ही इसका इलाज जल्दी होना चाहिए , वरना बाद में इलाज होना कठिन है ।
१ - औषधि --फूली बनते ही पशु की आँख को कनपटी पर चाक़ू द्वारा लगभग अठन्नी की जगह भर, चौथाई हिस्से के बाल खुरचकर निकाल देने चाहिए। इससे वहाँ की जगह लाल हो जायेगी। इसके बाद थोड़ी - सी रूई लेकर उसमें २-३ भिलावें कूट लो । उसका तैल रूई द्वारा सोख लिया जायेगा। भिलावें का बचा हुआ कचरा गिरा देना चाहिए। फिर तैल युक्त रूई लेकर कनपटी पर खुरची हुई जगह पर दोनों तरफ़ की कनपटी पर बार लगा देनी चाहिए , ८ दिन में ज़ख़्म आराम हो जायेगा ।
आलोक-- जिस पशु को यह दवा लगायी जाय, उसे लगभग ८ दिन तक गर्मी में न जाने दिया जाय, क्योंकि सूर्य का प्रकाश वह सहन नहीं कर सकता है। पानी बरसे तो उसको घर बाँधकर रखना चाहिए। पशु यदि पानी में भीगेगा तो दवा रोग पर काम नहीं करेगी ।
२ - औषधि-- पहले बताये गये अनुसार पशु की दोनों कनपटी के बाल उखाड़कर चम्पाथुवर का दूध ( डंडाथुवर ) रूई द्वारा लगभग ८ दिन तक एक समय लगाया जाय।
३ -औषधि-- रोगी पशु की आँख में आगे लिखा हुआ घोल लगभग ८ दिन तक छिड़कना चाहिए-घोल बनाने के लिए , पानी ९६० ग्राम , तम्बाकू ९ ग्राम , चूना डेढ़ ग्राम ,नमक १२ ग्राम , सबको महीन पीसकर पानी में डालकर उबाल लेना चाहिए। फिर छानकर कुनकुना पानी आँखों में छिड़कना चाहिए ।
४ - औषधि -- पानी में घीसा हुआ साभँर ( बारहसिंगा ) का सिंग ३ ग्राम , नींबू का रस ३ ग्राम , ३ ग्राम , मक्खन ३ ग्राम , कामिया सिंदूर ( असली सिंदूर ) ३ ग्राम , सबको मिलाकर तथा मरहम बनाकर रोगी पशु की आँख में ८-१० दिन दोनों समय लगाना चाहिए।
५ - औषधि -- गुराड़ ( सफ़ेद शिरस ) के पौधे की जड़ लाकर तथा पानी द्वारा धोकर उसे गोमूत्र के साथ घिसना चाहिए। इस प्रकार बना हुआ मरहम रोगी की आँख में दोनों समय लगभग १० दिन तक लगाना चाहिए।
६ - औषधि -- गाय का घी और नमक का मरहम बनाकर ८ दिन लगायें पशु की आँख में लगाते रहे ।
७ - औषधि -- गुराड़ सफ़ेद सिरश के पौधे की जड़ को गोघृत के साथ घिसकर दोनों समय २० दिन तक लगाना चाहिए ।
८ - औषधि -- जिस पशु की आँख आ जायें ( किसी पशु की एक और किसी पशु की दोनों आँखे आ जाती हैं ) तो उसे मीठे प्याज़ का रस ९ ग्राम , फिटकरी साढ़े चार ग्राम , आबाँहल्दी भी साढ़े चार ग्राम , लेकर । फिटकरी व आबाँहल्दी को महीन पीसकर उसे प्याज़ के रस में मिलाकर अंजन बना लें। उसे रोगी पशु को रोज़ाना दोनों समय आराम होने तक लगाया जायें ।
९ - औषधि -- अच्छा होने तक रोगी पशु के दोनों सींगों की जड़ के चारों ओर लगभग २० ग्राम , ताज़े नींबू का रस दोनों समय मला जाय। यह आँख आने पर तथा आँख में फूली होने पर भी लाभ करता है।
४ - रोग - आँख में सफ़ेद कीचड़ सा ( क्लेद ) आना
१ - औषधि - गाय का ताज़ा मक्खन -- गाय या भैंस की आँखों में जब सफ़ेद कीचड़ सा आये तो गाय का ताज़ा मक्खन लेकर थोड़ा - थोड़ा हाथ में लेकर बिमार पशु के सींग की जड़ में मक्खन की मालिश करें । यह क्रिया दो - तीन दिन तक करनी चाहिए रोगी पशु स्वस्थ हो जायेंगे तथा आँख में कीचड़ आना बन्द हो जायेगा ।
२ - गाय की आँख मे ढीड़ आना -- ताज़े पानी में नमक मिलाकर , पानी की घूँट भर कर गाय की आँख के ऊपर कुल्ला करें । दिन में तीन चार बार करें,२-३ दिन में ठीक हो जायेगा ।
५ - आँख में भिलावा लगना
====================
कारण व लक्षण - कभी- कभी पशु की आँखों में भिलावा लग जाता हैं । भिलावा तेज़ विष औषधि हैं इसके लग जाने से आँखों में सूजन आ जाती हैं लाल हो जाती है है क्योंकि इसमें तेल होता हैं वह त्वचा पर जहाँ लग जाता है वहाँ जला देता है ।
१ - औषधि - कुटकी २ छटांक लेकर पीस कर कपडछान करके रोगी पशु की आँख में लगाने से लाभ होने लगता हैं ।
६ - आँख उठना , आँखें लाल होकर दूखना
= ================================
कारण व लक्षण - आँख में चोट लगने से अथवा धूल पड़ने से पशुओं की भी आँखें उठ जाती हैं । इस रोग में - आँखें लाल हो जाती हैं । हर समय आँखों से पानी बहता रहता है तथा पशु को कम दिखाई देने लगता हैं । इस रोग की यदि शीघ्र समुचित चिकित्सा नहीं की जाती हैं तो पशु की आँखो में फूली हो जाती हैं ।
# - औषधि - सबसे पहले फिटकरी के पानी से पशु की आँखों की धुलाई व सफ़ाई करनी चाहिए । इसके बाद इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए ।
१ - औषधि - छोटी हरड़ को गाय के घी में भूनकर इसके बाद उसे थोड़े से साजे नमक के साथ मिलाकर तीन- चार बून्द पानी डालकर घोटकर लेप बना लें फिर उसको पशु की आँख के चारों ओर लगा देना चाहिए । यह क्रिया दिनभर में ३-४ बार करनी चाहिए । लाभ अवश्य होगा ।
२ - औषधि - लाल चन्दन , हल्दी , अफ़ीम , १-१ छटांक , आम ३-४ पत्तियाँ , कुटपीसकर । सेहुड़ का दूध २ छटांक लेकर उसमें मिलाकर आँख के चारों तरफ़ सावधानी से लगाये । ध्यान रहे की दवाई पशु की आँख में अन्दर नहीं जानी चाहिए । क्योंकि सेहुड़ का दूध आँख में लगने से पशु अन्धा हो जाता हैं ।
७ - आँखें दूखना ( आँख मे तिनका पड़ने से या किसी कीट के काटने पर )
=============================================
कारण व लक्षण - पशु की आँख में चोट लगने व आँख में तिनका गिर जाने व ज़हरीले कीट के गिर जाने व उसके काट लेने के कारण आँखें लाल होकर सूज जाती है । आँख से दिन मे पानी बहता रहता हैं और रात में कीचड़ आ जाता हैं रोगी पशु हर समय आँखें बन्द किये रहता हैं ।
१ - औषधि - यदि किसी चीज़ के आँख में पड़ जाने के कारण आँख दुखने लगी हैं तो आँख के अन्दर से उस चीज़ को सावधानी पूर्वक निकलना चाहिए । और बाद मे २-२ बून्द अरण्डी के तेल की आँखों में डालनी चाहिए । इसके बाद गुलाबी फिटकरी १० रत्ती , को आधा छटांक गुलाब जल में घोलकर इस लोन की बून्दे आँखों में टपकाना चाहिए ।
२ - औषधि - यदि पशु की आँख में सूजन हो तो खशखश के छिलके पानी में पकाकर साफ़ रूई से सेंक करें । पहली अवस्था में रूई तर करके बाँध देने से भी आराम हो जाता हैं । किन्तु २-४ दिन के बाद सेंक ही करना पड़ेगा ।
३ - औषधि - यदि मक्खी - मच्छर या कीट आदि ने काटा हो तो पशु की आँख से पानी व कीचड़ आता हैं । मिश्री , सेंधानमक , फिटकरी , प्रत्येक १-१ तौला लेकर , नीला थोथा ४ रत्ती , रसौत ६ माशा , गुलाबजल या उबला हूआ पानी १ लीटर ठन्डा करके , सभी दवाओं को पीसछानकर गुलाबजल या पानी में घोल लें इससे रोगी पशु की आँखों में छबके मारने चाहिए और दो- चार बून्द आँखों में भी डालनी चाहिए । यह क्रिया दिन मे ३-४ बार करनी चाहिए ।
टोटका :-
१ - थोड़ी सी मात्रा में पशु को सुअर की विष्टा देने से भी आँखों का दूखना ठीक हो जाता हैं ।
२ - आटे की लोई में भुजायल पक्षी के पंख को रखकर रोगी पशु को खिलाने से भी रोग जाता रहता हैं । और आँखें ठीक हो जाती हैं ।
३ - मंगलवार या रविवार के दिन रजस्वला स्त्री ( ऐसी महिला जिसको M c - मासिक धर्म ) हो रहा हो । ऐसी महिला के ख़ून में भीगा हुआ कपड़े का थोड़ा सा टुकड़ा लेकर पशु को खिला देने से रोग समाप्त होसजाता हैं ।
४ - गुम्मा का रस आँख में डालने से भी यह रोग जाता रहता है ।
८ - रतौंधी ( Night blindness )
==========================
कारण व लक्षण - यह रोग पशुओं में प्राय : दिमाग़ की कमज़ोरी से होता हैं । इसमें पशु को दिन में तो साफ़ दिखाई देता हैं किन्तु सांय होते- होते ही ( सूरज ढलने के बाद ) उसे कुछ भी दिखाईं नहीं देता हैं । इस रोग का यदि प्रारम्भ में ही ठीक प्रकार से इलाज हो जाये तो ठीक हो जाता है वरना बाद में पशु अन्धा हो जाता हैं चूँकि इस रोग में दिन में दिखाई देता है और रात में नहीं दिखाई देता इसलिए इस रोग को ( रात + अन्ध =रातअन्ध , रात का अन्धा ) रतौंधी कहते हैं ।
१ - औषधि - हुक्के का मैल पानी में पीसकर आँखों में लगाने से रतौंधी में लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - अलसी या अरण्डी का तेल पशु के सिर के ऊपर मालिश करना भी गुणकारी सिद्ध होता हैं ।
३ - औषधि - चिरमिटी के पत्तों का रस पशु की आँखों में लगाने से भी लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - मछली के पित्ता ४ छटांक , व शुद्ध शहद ४ छटांक , दोनों को मिलाकर ५-६ दिन तक आँखो में डालने से पशु का रतौंधी रोग ठीक हो जाता हैं ।
५ - औषधि - गाय के गोबर में एक साफ़ रूमाल को उसके अन्दर दबाकर ५ -१० मिनट के लिए छोड़ दें उसके बाद कपड़ा निकालकर एक बर्तन में निचोड़ ले और इस गोबर के रस की ४-५ बून्दे आँख में डालने बिलकुल ठीक हो जाता हैं ।=
९ - आँख कोया निकलना
==================
कारण व लक्षण - आँख का कोया निकल जाने के तीन कारण है ।-१ - वज़न खींचते समय झटका लग जाना । २ - पशुओ का आपस में लड़ जाना । ३ -पशु का पैर अचानक गड्ढे में गिर जाना । इन कारणों से पशु की यह बिमारी होती है । आँख का कोया जब बाहर आता है तो आँख में लाल -लाल दिखाई देता है ।
१ -औषधि - बासी पानी ( रात का बचा हुआ पानी ) ९६०ग्राम , सादा नमक २४ ग्राम , नमक को लेकर पीसकर पानी में डालकर पानी को गर्म किया जाये । फिर उसे छानकर कुनकुना होनेपर रोगी पशु की खुलीआँखों में दोनों समय अच्छा होने तक पानी को मुँह में भरकर आँख पर कुल्ला करें या अंजुली भर कर आँख पर छींटें मारे ।
२ - औषधि - सादा नमक १२ ग्राम , गुनगुना पानी ९६० ग्राम , दोनों को लेकर छान लें । और रोगी पशु की आँख पर हाथ से छींटना चाहिए । आँख का कोया बैठ जायगा और पशु को आराम हो जायेगा । दोनों समय ७-८ दिन तक एेसा करना चाहिए । यह दवाई गाय के शरीर जैसा बड़ा या छोटा । हो वैसे ही खुराक बढ़ा व घटा सकते है ।
१० - आँख में चिर्मियाँ होना
====================
कारण व लक्षण - जाला , ये एक प्रकार के महीन कीड़े है , जो पशु की आँख को अन्दर ही अन्दर खाया करते है । ग़ौर से देखने पर हमें रोगी पशु की आँख में वे दिखाई देते है । ये कीड़े रंग में सफ़ेद , लम्बे , बारीक होते हैं और ये आँख में इधर से उधर घुमा करते है , भीगी रूई से निकालने से वे निकल भी जाते है । पशु की आँख से पानी बहता रहता है । उसमें कीचड़ आ जाता है , जिससे पशु आँख बन्द रखता है ।
१ - औषधि - सेंधानमक २ तोला या २४ ग्राम पानी ८० तोला या ९६० ग्राम नमक को पीसकर ४० तोला पानी में उबालना चाहिए । िफर उसे छानकर कुनकुना पानी रोगी पशु की आँख पर दोनों समय अच्छे होने तक छिड़कना चाहिए ।
२ - औषधि - नीम की पत्ती १२ ग्राम , पानी ९६० ग्राम , नमक २४ ग्राम , नीम की पत्ती व नमक को पीसकर पानी में उबालना चाहिए । फिर उसे छानकर गुनगुने पानी को हाथ की अंजुली में लेकर पशु की आँख पर सुबह-सायं छींटें मारने चाहिए यह उपाय आँख ठीक होने तक करना चाहिए ।
३ - औषधि - पानी ९६० ग्राम , तम्बाकू १२ ग्राम , नमक १२ ग्राम , नमक व तम्बाकू को महीन पीसकर पानी में डालकर गरम किया जाय । फिर छानकर गुनगुना पानी पशु की की आँख में ठीक होने तक दोनों समय हाथ से छींटें मारने चाहिए ।
४ - औषधि - गाय की दही २४ ग्राम , अफिम २ ग्राम , अफिम को पानी में घिस लें और दही में मिलाकर अंजन बना लें । रोगी पशु की की आँख में सुबह -सायं यही अंजन रोज़ाना बना कर लगाते रहे , अच्छा होने तक लगाया जायें।
५ - औषधि - वराहीकन्द को पानी में घीसकर क्रीम जैसा बनाकर रोगी पशु की आँख में दोनों समय अंजन बनाकर अच्छा होने तक लगाया जाय।
६ - औषधि - मीठे प्याज़ का रस १० ग्राम , लेकर रोगी पशु की आँख में दोनों समय डालते रहे, अच्छा होने तक इस क्रिया को करते रहें ।
११ - अन्धा हो जाना
==============
कारण व लक्षण - कभी - कभी पशुओं को चरते समय खरगोश और गोच आदि जानवर आँख में फूँक मार देते है , जिससे पशु अक्सर अन्धे हो जाते है ।
१ - रोगी पशु की आँख में रोज़ सुबह - सायं दोनों समय ५-५ बूँद नींबू का रस छानकर अच्छा होने तक डालना चाहिए ।
२ - कचनार के छोटे पौधे की जड़ लाकर उसे धोकर गोमूत्र के साथ पत्थर पर खड़ी घिसना चाहिए फिर उसे छान लीजिए । और सुबह- सायं ठीक होने तक आँख में आंजना चाहिए ।
Subscribe to:
Posts (Atom)