Tuesday, 13 January 2015

(९) -१- गौ - चिकित्सा- पेटरोग ।

(९) -१- गौ - चिकित्सा- पेटरोग ।

१ - पेट दर्द
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कारण व लक्ष्ण - अधिक अनियमित व अधिक भोजन के कारण पशुओं को यह रोग होता हैं , भोजन करते ही पशु के पेट में वायुज शूल उत्पन्न हो जाते हैं , जिसके कारण वह अंगों को इधर उधर फेंकता है तथा बूरी तरह छटपटाता हैं । खाना पीना व जूगाली करना बन्द कर देता है । उसके गोबर में अत्यन्त दुर्गन्ध आती है ।

१ - औषधि - गाय का घी मिलाकर गरम दूध में गरम- गरम पिलाने से तुरन्त लाभ मिलता है ।

२ - औषधि - पत्ता तम्बाकू तथा कंजे की मींगी पीसकर आटे में गूथकर लगभग १५ -१५ ग्राम की गोलियाँ खिलाने से अवश्य लाभ होता है ।

३ -औषधि - सोंठ पीसी हूई २० ग्राम , ५ ग्राम हींग , पुराना गुड ५० ग्राम , लेकर इन सबकी गोलियाँ बना कर पशु को खिलाने से आराम आता है ।

४ - औषधि - १०-१० ग्राम की मात्रा में ज़ीरा व हींग और भांग को बारीक पीसकर १ किलो पानी में मिलाकर ३-३ घन्टे के अन्तर से पिलाने पर परम लाभकारी होता हैं ।

५- यदि उदरशूल पुराना हो तो तथा साथ ही शोथ ( सूजन ) की स्थिति हो तो आँबाहल्दी २५ ग्राम , छोटी हरड़ ३५ ग्राम , लहसुन ३० ग्राम , मकोय पञ्चांग इन सबको कूटपीसकर छानकर चूर्ण बना लें , तथा १०० ग्राम पुराना गुड़ लेकर उसमें यह चूर्ण मिलाकर गोलियाँ बना लें ५-७ गोलियाँ गरम पानी के साथ या रोटी में रखकर सुबह दोपहर सायं खिलाने से सुजन ठीक हो जाती है ।

२ - पेट दर्द ( Colin pain )
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कारण व लक्ष्ण - जब पशु कठोर रूखी घास अथवा पेड़ों की टहनियाँ आदि खा लेता हैं और उसे पीने के लिए पानी कम मिलता है तो वह भोजन सूखकर पेट में जम जाता है अथवा आँतों में अटक जाता है । इस कारण से पशु के पेट में दर्द उत्पन्न हो जाता है । गर्मी के दिनों में पशु को ठंडा पानी पिलाकर खडाकर देने से भी कभी -कभी यह रोग हो जाता है । इससे रोगग्रस्त पशु जूगाली करना तथा खाना- पीना छोड़ देता है और बहुत बेचैन हो जाता है पेट में भयंकर दर्द होने के कारण पशु तड़पता रहता है , अपने दाँत पीसता रहता है अपने पैरों को पटकता रहता है । गोबर या तो पशु बिलकुल ही नहीं करता है और यदि करता है तो वह तेज़ दुर्गन्ध युक्त होता है ।

१ - औषधि - यदि उदरशूल के साथ ही पशु को अफारा भी हो अर्थात पेट में गैस रूककर पेट फूल गया हो तो - पहले अफारा दूर करने का तत्काल प्रयत्न करें तदुपरान्त उदरशूल की चिकित्सा करें क्योंकि अफारा अधिक ख़तरनाक हैं ।
एक तोला हींग , तारपीन तैल एक छटांक और ढाई पाँव अलसी तैल , इन सभी दवाईयों को आपस में मिलाकर पशु को पिलायें , पेट दर्द शीघ्र दूर हो जायेगा ।

२- दो तौला सोंठ , ६ माशा हींग , दोनों को पीसकर आधा पाँव गुड में रखकर खिलाने से पेट दर्द में लाभ होता है ।

३- अजवायन २ तौला , कालानमक १ तौला , सोंठ १ तौला , मदार के पत्तों का ताज़ा रस तौला और गुड ४ छटांक पीसकर खिलायें । यदि दवा खिलाने के १ घन्टे बाद तक पशु को आराम न हो तो उपरोक्त दवा की आधी मात्रा ( आधी खुराक ) पुनः दें दें । पेट दर्द की रामबाण दवा है ।

४- तम्बाकू पीने वाला २ तौला , पुराना गुड ६ छटांक - इन दोनों को २५० ग्राम जल में खुब पकाकर नाल द्वारा पशु को पिलाना भी परम लाभकारी है ।

५- हींग १ तौला और नौसादर, व खाने वाला सोड़ा , काला नमक , लहसुन प्रत्येक २-२ तौला - इन सभी को लेकर बारीक पीसकर गुनगुने पानी अथवा अजवायन के काढ़े में घोलकर रोगी पशु को नाल द्वारा पिलाने से पेट दर्द दूर हो जाता है ।

६- अजवायन २ तौला , कालीमिर्च और सोंठ १-१ तौला तथा गुड २५० ग्राम , लेकर आधा लीटर पानी में औटाकर गुनगुना - गुनगुना पिलाना चाहिए ।


३ - पेट में अफारा आना ( पेट फूलना )
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कारण व लक्षण - इस रोग को पशुपालक अत्यन्त साधारण बिमारी समझते है , जबकि यह अत्यन्त ही भयंकर प्राणनाशक बिमारी है । कभी - कभी तो इस रोग में कई - कई पशु एक साथ कुछ घन्टो में ही मर जाते है और पशुपालक को अपने पड़ोसियों पर ही शक हो जाता है कि किसी ने इन्हें ज़हर दें दिया है ।

प्राय: ग्रीष्म - ऋतु में या अकाल पीड़ित क्षेत्रों में पशुओं को भर पेट चारा न मिलने के बाद , बरसात ऋतु में जब नई घास चरने को मिलती है तो वे स्वाद - स्वाद में अधिक खा जाते है , सडीगली व ज़हरीली घास भी होती है तथा कभी- कभी पशु खुटे से खुलकर अनाज के डेर पर जाकर अधिक अनाज खा जाता है ।तदुपरान्त पानी पीने पर वह पेट में पड़ी चींजे फूलने लगती हैं तब पशु का अमाशय उन्हें पचाने में असमर्थ हो जाता हैं , जिसके स्वरूप वें पेट में पड़ी चींजे सड़ने लगती हैं । जिससे पेट में विषैली गैस बनती है और वह गैस उपर उठकर हृदय तथा फेफड़ों के काम में रूकावट पैदा कर देती है जिससे पशु का पेट फ़ुल जाता है और अफारा आ जाता है । यदि दूषित गैस को शीघ्र नहीं निकाला जाये तो और रोगी पशु कुछ घन्टो में ही मर जाता है और हाँ कंभी-कभी पशु को चारा खिलाकर तुरन्त ही जोत देने से सर्दियों में अधिक जोतने व गर्मी में बहुत दौड़ाने से अपानवायु बन्द हो जाने पर या जूगाली बन्द होने पर तथा बदहजमी हो जाने पर यह रोग हो जाता है । उपरोक्त सभी कारणों से पेट फूलने पर , फूले हुए पेट पर अंगुली मारने पर ढब- ढब की आवाज़ आती है पशु को श्वास लेने में कठिनाई होती है तथा जूगाली बन्द हो जाती है , कभी-कभी पेट में तनाव हो जाता है तथा पेट में दर्द हो जाता है, या मलावरोध हो जाता है, पशु को श्वास लेने में बैचनी हो जाती है समय पर चिन्ता न होने पर पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।

# - इस रोग में पशु के पेट में भरी गैस निकालना अतिआवश्यक है जिसके लिए नीचे लिखी औषधियों में से किसी एक का प्रयोग किया जा सकता है ।

१- औषधि - खाने वाला सोडा ५ तौला, नौसादर पावडर ४ तौला , लेकर आधा लीटर गरम पानी में घोलकर पिलायें ।

२- औषधि - सरसों , अलसी , या तिल का तेल ३ पाँव , तारपीन का तेल २ तौला , - इन दोनों को मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ मिलता है ।

३- औषधि - सोंठ पावडर आधा छटांक , कालीमिर्च पावडर डेढ़ तौला , देशी शराब आधा पाँव सभी को मिलाकर पशु को पिला दें । दस्त आकर पेट का मल तथा गैस बाहर निकल जायेगी पशु को आराम आयेगा ।

४- औषधि - कालानमक पावडर १२५ ग्राम , सरसों या अलसी का तेल ५०० ग्राम , मिलाकर नाल द्वारा पशु को पिलाने से लाभ मिलता है ।

५- औषधि - कालानमक पावडर व २ तौला , अजवायन पावडर २ तौला , कच्चा आम चटनी २ छटांक लेकर आपस में मिलाकर गरम पानी में घोलकर पशु को नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है ।

६- औषधि - आम का अमचूर आधा पाँव गरम पानी में ख़ूब घोटकर गरमागरम नाल से पिलाने से तुरन्त आराम मिलता है तथा प्रभावकारी रहताहैं ।

७- औषधि - राई बारीक पीसकर १० तौला, आधा लीटर गरम पानी में मिलाकर - घोलकर नाल द्वारा पिलाना लाभकारी रहता हैं ।

८- औषधि - सोंठपावडर २ तौला , हींग ६ माशा , सादा नमक १० तौला , कालीमिर्च पावडर २ छटांक ,तारपीन तेल २ छटांक , सबको गरम पानी में घोलकर कर नाल द्वारा पिलाना गुणकारी होता है ।


# - बदहजमी के कारण अफारा होने पर इस प्रकार से इलाज करना चाहिए -
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१ - औषधि - गाय का घी २०० ग्राम , १ लीटर गाय , गाय के घी को गरम करके दूध में मिलाकर गुनगुना- गुनगुना नाल से पिलाने पर आराम आता है ।

२ - औषधि - आम की मुलायम पत्तियाँ २० ग्राम , अथवा आम का फूल बारीक पीसकर पानी में मिलाकर नाल द्वारा पिलाना गुणकारी होता हैं ।

३ - औषधि - मेंहन्दी के पेड़ के ताज़ा पत्ते १०० ग्राम , अमरूद की जड़ की छाल १०० ग्राम , कालीमिर्च पावडर १० ग्राम ,मेहन्दी पत्ते व अमरूद जडछाल को बारीक पीसकर चटनी जैसी पीसकर उसमें कालीमिर्च पावडर डालकर सिरके में मिलाकर लेप बनाकर पेट पर लगा देना लाभकारी रहता हैं ।

४ - औषधि - पशु के नासिका मार्ग से २५० ग्राम सरसों तेल , कालानमक ५० ग्राम मिलाकर पिलाने से इस रोग में तुरन्त लाभ होता हैं ।

५ -औषधि - देशीशराब १२० ग्राम , सौँफ १२ ग्राम , ८-९ कालीमिर्च , कालीमिर्च व सौँफ को गरम पानी ६० ग्राम गरम पानी में पकाकर गुनगुना करके शराब मिलाकर नाल द्वारा पिलानें से आराम आता है ।

६ - औषधि - सादानमक पावडर ५० ग्राम , सोंठ पावडर ५० ग्राम , मुसब्बर ५० ग्राम , देशीशराब २५० ग्राम , अलसी का तेल २५० ग्राम , १ किलो तेज गरम पानी में मिलाकर, गुनगुनाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभकारी होता हैै ।

# - सर्दियों में पशुओं से अधिक मेहनत कराने पर पैदा हुए रोग का उपचार -
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१ - औषधि - यदि सर्दी लगने से पेट में सूजन हो तो - सरसों का तेल बड़े पशुओं को आधा लीटर व छोटे पशुओं को २५० मिली लीटर की मात्रा में मदार का फूल या सोंठ २ तौला , आवश्यकतानुसार गरम पानी मे मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभकारी रहता है ।

२ - औषधि - कुटकीपावडर १ तौला , पीसा हुआ लहसुन २ तौला , कालाजीरा पावडर १ तौला , आवश्यकतानुसार गरम पानी में डालकर ,घोटकर नालद्वारा पिलाने से लाभ मिलता है ।


# - वायु बन्द होने पर पैदा रोग का इस विधी से उपचार करे -
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कारण व लक्षण - वायु बन्द अर्थात कभी-कभी हवा खुलती है या दर्द जैसा होता है ,इसी को पशुओं की वायु बन्द होना कहते है । ऐसी िस्थति में नीचे लिखी दवाओं के द्वारा उपचार कर सकते हैं -

१ - औषधि - हुक्के का पानी २ लोटा , २ तौला पीने का तम्बाकू पावडर घोलकर नाल द्वारा पिलायें।
२ -औषधि - अरण्डी का तेल २५० ग्राम , २५० मिली लीटर गरम पानी में मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ मिलता हैं ।
३ - औषधि - गाय का दूध गरम १ लीटर , गाय का घी २५० ग्राम , में मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है ।
४ - औषधि - हुक्के का जल १ लीटर , कलमीशोरा १० ग्राम , पीने का तम्बाकू पावडर १० ग्राम , मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभँ होता है । ये दवाये प्रत्येक प्रकार की बदहजमी में हितकर है इन्हें नि :सकोंच दें सकते है ।
# - गर्मीयो में पशु के अधिक दौड़ने के कारण से पशु का पेट फूल जाता है -
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कारण व लक्षण - इस रोग में बिमार पशु बार- बार गुदामार्ग को खोलता है और बन्द करता है जिससे थोड़ी- थोड़ी वायु निकलती रहती है और बाक़ी रूकी रहती है । इस रोग में वायु बन्द वाली दवाये भी दें सकते है यदि किसी दवा से लाभ नहीं हो रहा है तो पशु को एनिमा देकर भी पेट साफ़ कर सकते है ।

१ - औषधि - मेहन्दी के पत्तों को उबालकर छानकर पानी को पिलाने से लाभ होता है ।


८ -- औषधि - सफ़ेद ज़ीरापावडर २ तौला , धनियाँ पावडर २ तौला , जौ का आटा २५० ग्राम , पानी में मिलाकर पिलाने से लाभँ होता है ।
इस रोग में खाना पीना उस समय तक नहीं देना चाहिए जब तक अफारा ठीक न हो जाये । बल्कि ठीक होने पर भी २४ घन्टे तक पशु को भूखा रखे , फिर हल्का सुपाच्य भोजन देना चाहिए । पशु धीरे- धीरे टहलाकर शेष पूरे समय आराम करने देना चाहिए ।

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४ -औषधि - गाय - भैंस व अन्य पशुओ को क़ब्ज़ व अफारा -- ऐसे में पशु का पेट फूल जाता है और पेट पर हाथ मारने से पेट से ढप -ढप की आवाज़ आती है ,पशु घास खाना छोड़ देता है । जूगाली भी बन्द कर देता है ।एसे में हरा कसीस ५० ग्राम , साल्ट ( नमक ) ५० ग्राम , हीरा हींग १० ग्राम , बड़ी पीपल १५ ग्राम , सभी दवाईयों को कूटकर पाँच खुराक बना लें । २५० ग्राम गाय का दूध लेकर उसमें १०० ग्राम पानी को मिलाकर उबाल लें , फिर ठंडा करके तेज मीठा कर लें , तब एक खुराक उपरोक्त दवाईयाँ मिला कर दें ।
अगर ज़रूरत पड़े तो ७-८ घन्टे बाद दूसरी खुराक दें, आवश्यक होतों पाँच खुराक या ९ खुराक पाँच-पाँच घन्टे बाद देवें , ९ से ज़्यादा खुराक न दें दवा नुक़सान करेगी । तथा क़ब्ज़ या अफारा टूटने पर दवाई न दें ।

५ -औषधि - दर्द व अफारा -- इस बिमारी में गाय -भैंस व अन्य पशु जब बिमार होता है तो वह पिछले पैर को ज़मीन में बार - बार मारती रहती है । ऐसे मे कालानमक १० ग्राम , अजवायन ५ ग्राम , दूधिया हींग ५ ग्राम , खाने का सोडा १० ग्राम,सभी दवाओं को कूटपीसकर पशु के मूंह को खोलकर उसकी जीभ पर रगड़ने से ठीक होता है।

#~ आधा लीटर सरसों का तैल पिलाने से भी अफारा टूट जाता है ।



६ - गर्मी की दवा
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कारण व लक्षण - गर्मी अधिक होने से यह बीमारी होती है । बाहर की गर्मी द्वारा यह बीमारी अधिक होती है । जेठ मास की गर्मी से भी यह बीमारी फैलती है , किन्तु क्वार की गर्मी का प्रभाव रहता है ।
पशु का दम घुटने लगता है । वह अस्वस्थ हो जाताहै । भैंस को क्वार में पानी में लौटने की ज़रूरत पड़ती हैं ,क्योंकि , अधिक गर्मी के कारण वह दूध देना कम कर देती है । गर्मी के कारण यह बीमारी पशु को होती है और पशु का दम घुटने लग जाता है । इस गर्मी से बचाने के लिए पशु को छाया में रखना चाहिए ।

१ - औषधि - गाय के दूध से बनी दही १६८० ग्राम , गुड़ या शक्कर ४८० ग्राम , गँवारपाठा का गूद्दा २४० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , गँवार पाठे का गूद्दा निकालकर दही में मथकर शक्कर और पानी मिलाकर रोगी पशु को रोज सुबह , अच्छा होने तक , पिलायें ।

२ - औषधि -गाय का दूध ९६० ग्राम , गँवारपाठा का गूद्दा २४० ग्राम , गाय का घी १२० ग्राम , गँवारपाठा का २०० ग्राम गूद्दा निकालकर , एक लीटर दूध में मिलाकर गुनगुना करके गरम होने पर रोगी पशु को रोज़ाना आराम होने तक दिया जाय ।

आलोक-:- रोगी पशु को शीशम की पत्तियों और जलजमनी और हरी घास खिलानी चाहिए और गर्मी से बचाना चाहिए ।

३ - औषधि - अलसी का आटा ९६० ग्राम , पानी १५०० ग्राम , अलसी के आटे को उपर्युक्त मात्रा में पानी मिलाकर रोगी पशु को सुबह- सायं ,अच्छा होने तक देना चाहिए । उपर्युक्त मात्रा केवल एक खुराक की है ।

आलोक -:- कभी- कभी मादा पशु चार महीने ब्यायी हुई होने पर भी गर्मी के कारण दूध देना बन्द कर देती है तो ऐसा होने पर उसे ३४० ग्राम गाय का घी देने से वह दूध देने लगती है। यह मात्रा एक खुराक की है । इसे ४-५ दिन तक देना चाहिए ।

४ - जब गाय का घी न हो तो ३५० ग्राम , अलसी का तैल पिलाना चाहिए । इससे भी मादा पशु दूध देने लग जाती है । यह मात्रा एक खुराक की है ।

७ - क़ब्ज़ रोग , मलावरोध ( Constipation )
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कारण व लक्षण - यदि किसी अन्य रोग के उपलक्ष्ण स्वरूप यह रोग हूआ हो तो मूल बिमारी की चिकित्सा करनी चाहिए , कभी - कभी मूलरोग करने के साथ किये गये उपचार के साथ ही मलावरोध को दूर करने के लिए भी अलग से औषधि देनी होती है ।
# - देशी आयुर्वेदिक इलाज के अन्तर्गत - क़ब्ज़ या दूर करने के लिए पशु को रेचक ( दस्तावर ) दवा देकर पेट साफ़ करा देना चाहिए , यह लाभकारी सिद्ध होता है । आगे कुछ औषधियों का वर्णन कर रहे है जो रेचक व कब्जनाशक होती है -

१ -औषधि - अलसी का तेल या अरण्डी का तेल १० छटांक , में सोंठ पावडर २ तौला , मिलाकर पशु को पिलाने से खुलकर दस्त हो जायेगा वह पशु ठीक हो जायेगा ।

२ - औषधि - अमल्तास का गूद्दा ढाई तौला , सौँफ २ छटांक लेंकर कूटपीसकर २५० ग्राम गुड के शीरे में मिलाकर पशु को गुनगुने पानी में मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है । इस दवाई को पशुओ के बच्चों को भी दें सकते है ।

३ - औषधि - शुद्ध ऐलवा १ तौला , सोंठ १ तौला , कूटपीसकर २५० ग्राम तेल या गुड़ के शीरे में मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभकारी होता हैं ।

४ -औषधि - तिल या सरसों का तेल ५०० ग्राम , तारपीन तेल डेढ़ छटांक , दोनों को मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लांभकारी होता है ।

५ -औषधि - कालानमक पावडर ५०० ग्राम , सोंठपावडर २ तौला , आधा लीटर गुनगुने पानी में मिलाकर पिलाने से लाभकारी होता हैं ।

# - यदि इन सब उपायों से लाभ न हो तो पशु को एनिमा देकर पेट साफँ कर देना चाहिए ।


८ - आवँ , पेचिश , मरोड़ , ख़ूनी दस्त ( Dysentery )
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कारण व लक्षण - यह एक अत्यन्त कष्टप्रद रोग है , इससे पशु के पेट में मरोड़ें उठती है तथा दर्द के साथ ख़ून व आवं मिला हुआ गोबर करता है ।
इस रोग की उत्पत्ति का कारण पेट में एक विशेष कीड़े का उत्पन्न होना है , जोकि पशुओं द्वारा सड़ी - गली चीज़ें खा लेने अथवा अधिक दिनों तक दस्त होते रहने पर हो जाता है । कभी - कभी यह रोग सर्दी - गर्मी के तीव्र प्रभाव के कारण भी हो जाता है । भोजन की ख़राबी के कारण तथा अमाशय एवं पाचन सम्बन्धी विकार के कारण यह रोग उत्पन्न होता है । किन्तु ध्यान रखें कि - अखाद्य पदार्थ सेवन करने से या अधिक खा लेने आदि किसी भी कारण से रूधिरातिसार हो रहे हो , किन्तु जलवायु का प्रभाव अवश्य पड़ता है । इस रोग के कई नाम हैं - आवँ पड़ना , रक्तमाशय, पेचिश , मल पड़ना , दस्त में ख़ून पड़ना , मरोड़ आदि ।
लक्षण :- बार - बार आवँ पड़ना अथवा ख़ून मिला गोबर करना , इस रोग का मुख्य लक्षण है , पशु के पेट में तेज़ मरोड़ उठती है , वह बेचैन होकर इधर - उधर चक्कर काटता रहता है तथा कभी - कभी शरीर का तापमान भी बढ़ जाता है गोबर के साथ गोबर की कड़ी - कड़ी गाँठे भी आती है , गोबर करते समय रोगी पशु इतना ज़ोर लगाता है , कि उसकी काँच बाहर निकल आती है , कलेजे में भी विकार पैदा हो जाने के कारण प्राय: पशु के मूंह की खाल या आँखों के पपोटे तथा शरीर की खाल पीली पड़ जाती है , पशु का गोबर दुर्गन्ध भी रहती है , उसके शरीर के रोये खड़े रहते है , पशु चारा ठीक से नहीं खा पाता है , दरअसल में रोगी पशु हर समय गोबर करने की इच्छा करता है किन्तु थोड़ी - थोड़ी मात्रा में ही मल त्याग हो पाता है ।

चिकित्सा :- प्रारम्भ में पशु के दस्त एकदम रोकने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए , बल्की पेट का विषैला अंश निकाल देना चाहिए , १-२ दिन के बाद जब पेट की गर्मी कम हो जायें तब इन दवाओं का उपयोग कर रोगी पशु का उपचार करके अधिक से अधिक आवँ निकालना चाहिए ।

१ - औषधि - अरण्डी या अलसी का तेल ५०० ग्राम , सौँफ पावडर १ छटांक , बेलगिरी पावडर २ तौला , इनको मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से आवँ बाहर आकर पेचिश ठीक हो जाती है ।

# - जब दस्त ख़ूब हो ओर आवँ भी काफ़ी निकल जाये तब ये दवाये कामयाब सिद्ध होगी -

२ -औषधि - चूने का पानी आधा लीटर , बबूल का गोंद २ छटांक , अफ़ीम २ माशा , गोंद व अफ़ीम को किसी कटोरी में भलीभाँति घोल लेना चाहिए फिर चूने वाले पानी में डालकर पिला देना चाहिएँ ।

३ - औषधि - सफेदा काशकारी २ माशा , अफ़ीम ३ माशा , शैलखडी २ तौला , बेलगिरी २ तौला , लेकर सभी को बारीक पीसकर चावलों के माण्ड में घोलकर पशु को पिला दें ।यह दवा पेट की मरोड़ तथा दस्तों को रोकती हैं तथा पेट से निकलने वाले ख़ून को भी बन्द कर देती है ।

४ - औषधि - पीपल के पेड़ की छल पावडर या बेरी के पेड़ की छाल का पावडर २ तौला , मेहन्दी पावडर २ तौला , सफ़ेद ज़ीरा पावडर २ तौला , देशी कपूर ३ माशा , धतुराबीज पावडर २ माशा , आवश्यकतानुसार चावल के माण्ड को लेकर सभी को आपस में मिलाकर ( गायक दूध से बनी छाछ ) भी लें सकते है , इससे पशु की ख़ूनी पैचीश व दस्त बन्द हो जायेंगे ।

५ -औषधि - भाँग , कपूर , मेहन्दी , सफ़ेद ज़ीरा , और बेलगिरी , प्रत्येक १-१ तौला लेकर सभी को कुटपीसकर आधा किलो चावल का माण्ड में मिलाकर पिलायें ।
६ - सुखा आवंला पावडर २ तौला , सोंठ पावडर १ तौला , खाण्ड या बताशे २ तौला , आधा लीटर पानी में घोलकर नाल द्वारा पिलायें ।

७ - औषधि - किसी बड़े बर्तन में चार लीटर पानी को ख़ूब खोलाये , जब पानी उबल जाये , तब उसे नीचे उतारकर उसमें थोड़ा तारपीन का तेल डाल दें इसके बाद कम्बल का एक टुकड़ा उसमें तर करके तथा निचोड़कर उससे पशु के पेट पर सेंक करें । जब तक पानी गरम रहे , इसी प्रकार सेंक करते रहना चाहिए ।

# - इस रोग के इलाज में सर्वप्रथम जुलाब ( सरसों का तेल और सोंठ ) देना चाहिए , तदुपरान्त दवाई करनी चाहिए । यह भी स्मरणीय है कि ग्रीष्म - ऋतु में आंव पेचिश की दवायें कुछ और ही होती है और शरद ऋतु में कुछ और । अत: आवँ की दवा करते समय ऋतुकाल का विचार करना आवश्यक है ।

८ - औषधि - पैचिस -यदि पैचिस हल्की होतों दो टी स्पुन फिटकरी पीसकर रोटी में रखकर दें दें।यह खुराक सुबह-सायं देने से २-३ दिन में ठीक होता है

९ - औषधि - पैचिस यदि तेज़ हो और बदबूदार हो-- ऐसी स्थिति में किसान को हींगडा १ तौला लेकर चार खुराक बना ले , एक खुराक रोटी में रखकर या गुड़ में मिलाकर दें । बाक़ी खुराक सुबह- सायं देवें ।

#~ ध्यान रहे बिमारी की अवस्था में पशु को खल का सेवन न कराये ।


१ - ग्रीष्मकालीन उपचार :-
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१ -औषधि - गाय के दूध की छाछ आवश्यकतानुसार , बेलगिरी पावडर २ तौला , मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है ।

२ - औषधि - ख़ूनी आंव मे चौलाई की जड़ १२५ ग्राम , पीसकर गाय के दूध की छाछ में मिलाकर पिलायें ।

३ -औषधि - बेल का शर्बत ( कच्चा बेल होतों उसे भूनकर और पका बेल हो तो उसका २५० ग्राम गूद्दा , पशु को देने से लाभ होता है ।

४ - औषधि - भांग पावडर १० ग्राम , कतीरा २० ग्राम , और गुड ५० ग्राम , लें । पहले कतीरा को पानी में भिगोकर फुला लें , फिर भांग को बारीक पीसकर गुड़ मिलाकर तथा उसी में कतीरा डालकर रोगी पशु को पिलावें ।

५ -औषधि - रात को पानी में भिगोई गयी इश्बगोल में प्रात: काल दागनी मात्रा में मिश्री घोलकर पिलायें ।

६ - औषधि - रात को सोते समय मिट्टी के पात्र में २५० ग्राम , के लगभग आँवले भिगोकर प्रात: काल उसके जल में २० ग्राम , धनियाँ पावडर ५०० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही को मथकर रोगी पशु को पिलाने से लाभकारी होता है ।

७ -औषधि - बेल व शीशम तथा बबूल की पत्तियों को कूटपीसकर लूगदी को चावलों के माण्ड या गाय के दूंध से बनी छाछ में मिलाकर इसके उपर भूनें ज़ीरा पावडर को बुरक कर पशु को पिलाना चाहिए । यह गुणकारी योग है ।

२ - शीतकालीन उपचार :-
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१ - औषधि - धतुरा के बीज का पावडर ३ माशा , या अफ़ीम , और खडिया मिट्टी पावडर २० ग्राम , कत्था पावडर २० ग्राम , चावल का माण्ड ५०० ग्राम , में मिलाकर २-३ बार में रोगी को पिलायें ।

२ - औषधि - धतुरा बीज पावडर ५ ग्राम , कपूर पावडर ८ ग्राम , और देशी शराब १२० मिली लेकर इन सबको चावल के माण्ड में मिलाकर पशु को पिलायें ।

३ - औषधि - सोंठ पावडर २० ग्राम , आँवला पावडर २० ग्राम , खाण्ड २० ग्राम , में मिश्रित करके आधा लीटर जल में घोलकर छान लें और रोगी पशु को पिलाये ।


९ - पतले दस्त , अतिसार ( Diarrhoea )
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कारण व लक्षण - यह रोग पेचिश से भिन्न होता है। पेचिश पशु को दस्त के साथ आंव अथवा ख़ून मिला होता है । किन्तु इस रोग में केवल पानी जैसे पतले दस्त ही आते है , आंव अथवा ख़ून नहीं और न ही इसमें पेचिश की भाँति पेट में मरोड़ उठती है ।
अधिक गर्मी - सर्दी लगने से तथा पेचिश से बदहजमी से व गन्दा पानी पीने से या खाने - पीने के पदार्थों से हो जाता है और अधिक परिश्रम करने के पश्चात् एक साथ ठण्डा पानी पीने से भी दस्तातिसार हो जाता है। प्राय: शीतकाल या गर्मी के बाद सहला ठण्डी वायु लगने से भी यह रोग हो जाता है । विषम जलवायु में प्रवेश करना भी एक कारण हो जाता है ।
प्राय: यह रोग अजीर्ण अथवा अपच के कारण ही होता है । सडा- गला खाना या गन्दा पानी पीने के कारण या अधिक भारी व रूखी वस्तुएँ खाने के कारण व जुगाली करने का समय न मिलने के कारण , तारा खिलाकर तत्काल जोत देने के कारण पशु को अजीर्ण होकर दस्त आने लगते है । और पेट में कीड़े होने के कारण भी यह रोग हो जाता है ।
लक्षण :-
इस रोग में पशु बार- बार गोबर करता है किन्तु इसमें रक्तातिसार की तरह ख़ून नहीं होता है । रोगी पशु थकावट सी मैहसुस करता है और वह जूगाली नहीं करता है और करता है बहुत थोड़ी करता है ।
जिसके कारण से यह रोग होता है उसी के अनुसार लक्षण प्रकट होते है जैसे कि- पेट के कर्मियों से उत्पन्न रोग में दस्तों के साथ कीड़े निकलते है । घास अधिक खा जाने पर पशु हरा - हरा पतला गोबर करता है । भारी व रूक्ष वस्तुऐ खा जाने पर दस्ते में उन चीज़ों के साबुत टुकड़े निकलते है , पशु की भूख नष्ट हो जाती है । वह खाना व जूगाली बन्द कर देता है । पानी की प्यास बढ़ जाती है व शरीर की खाल सुखने लगती है । अधिक दस्त होने से पशु अधिक कमज़ोर हो जाता है ।

सर्दी से उत्पन्न अतिसार के लक्षण :-
पेट बोलता है प्यास नहीं लगती है शरीर ठण्डा रहता है , गोबर से दुर्गन्ध आती है , पशु पानी नहीं पीता है ।
इसमें पशु को हल्का ओर हरा चारा देना चाहिए , ताज़ा पानी पिलाना चाहिए , २-१ दिन का उपवास कराना चाहिए । दस्त होने के बाद अलसी व चावल का माण्ड खिलाना चाहिए ।

१ - औषधि - अलसी , तिल , अरण्डी , या सरसों का तेल आधा शेर में सौँफ आधा छटांक मिलाकर पशु को पिला देने से आँतों की ख़राश दूर होकर दस्तों में लाभ होता है । पानी के स्थान पर चावल का माण्ड पिलाने से ज़्यादा लाभ होता है ।

२ - औषधि - सोंठ , ज़ीरा , ढाककणी - प्रत्येक सवा - सवा तौला , भांग आधा तौला , सभी दवाओं को पीसकर आधा किलो चावल के माण्ड में मिलाकर पिला देना चाहिए । दस्त रूक जायेंगे ।

३ - औषधि - अजवायन २ तौला , कत्था २ तौला , सौँफ ३ तौला , सभी को कुटपीसकर चावल का माण्ड आधा किलो लेकर आपस में मिलाकर पशु को पिला देना चाहिए ।

४ - औषधि - मोचरस २ तौला , अनार के पेड़ की छाल २ तौला , सफ़ेद ज़ीरा २ तौला , और अफ़ीम डेढ़ माशा , चावल का माण्ड आधा किलो , सभी को कुटपीसकर चावल के माण्ड में मिलाकर पिलाने से दस्त अवश्य रूक जायेंगे ।

५ -औषधि - सेलम खडिया सवा तौला , बेलगिरी ५ तौला , दोनों को कुटपीसकर आधा लीटर पानी में मिलाकर पिलाने से लाभँ होता है ।

६ - औषधि - खडिया मिट्टी १ छटांक , सोंठ २ तौला , कत्था आधा तौला , भांग १ तौला , धतुरा बीज ३ माशा , सभी को कुटपीसकर कर आधा किलो चावल के माण्ड में मिलाकर पशु को पिलाऐ , लांभ होगा ।

७ - औषधि - सफ़ेद ज़ीरा १ तौला , कत्था १ तौला , जायफल ६ माशा , कपूर १ माशा , अफ़ीम १ माशा , रसौत १ माशा , सभी को कुटपीसकर आधा किलो चावल के माण्ड में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

८ - औषधि - नीला थोथा फुला ३ माशा , फिटकरी फुला ३ माशा , पीसकर आधा किलो चावल के माण्ड में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

९ - औषधि - भूना कसीस ४ माशा , मोचरस १ तौला , पीसकर चावल के माण्ड के साथ देने से पुराना दस्त भी ठीक हो जाता है ।

१० - औषधि - सोंठ १५ ग्राम , चिरायता १५ ग्राम , कालीमिर्च १५ ग्राम , अजवायन १५ ग्राम , नमक १ छटांक , भूना कसीस पावडर डेढ़ माशा , कुटपीसकर चावल के माण्ड में मिलाकर नित्य पशु को कुछ दिनों तक पिलाने से पशु के दस्त रूक जाने के बाद पशु की कमज़ोरी दूर हो जाती है , इस दवाई को शकि्तवर्धक टेनिस के रूप में प्रयोग कर सकते है ।

११ - औषधि - काला नमक , सोंचर नमक , सैंधा नमक , सांभर नमक , जवाॅखार , सज्जी , हरड़ , बहेड़ा , आवंला , हल्दी , छोटी हरड़ , सफ़ेद ज़ीरा , काला ज़ीरा , भांग , देवदारू , कालीमिर्च , पीपल , पीपरामूल , मूली का बीज , सोया का बीज , बायबिड्ंग , शतावर । नागोरी , अश्वगन्धा , सोंठ , अजवायन , अजमोदा , सहजन की छाल , सभी को सममात्रा में लेकर कूटपीसकर तथा छानकर चूर्ण बनाकर रख लें सर्दी से उत्पन्न अतिसार से ग्रस्त पशु को २-२ तौला प्रतिदिन खिलाने से लांभ होता है ।

# - गर्मी से उत्पन्न अतिसार में निम्नांकित योगों का सेवन लाभकारी होता है :-

१ - औषधि - कतीरा १ छटांक , सायं के समय पानी में भिगोकर रख दें और फूल जाने पर २५० ग्राम जौ का आटे में मिलाकर रोगी पशु को खिलाने से लाभ होता है ।

२ -औषधि - सफ़ेद ज़ीरा १ तौला , धनिया १ तौला, और भांग आधा छटांक , सभी को पीसकर २५० ग्राम , जौ के आटे में मिलाकर रखें और पानी में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

३ - औषधि - जामुन की गुठली १ तौला , आम की गुठली १ तौला , इनको पीसकर २५० ग्राम जौ के आटे में मिलाकर खिलाना लाभप्रद होता है ।

४ - औषधि - अलसी के बीज पावडर २५० ग्राम , जौ का आटा २५० ग्राम , बेलगिरी पावडर १२५ ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १ लीटर , आपस में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

# - पेचिश से उत्पन्न अतिसार में निम्नांकित योग लाभप्रद हैं :-

१ - औषधि - कच्चे बेल को भूनकर गूद्दा निकालकर ५०० ग्राम , और गुड २५० ग्राम , लेकर तथा इन्हें मिलाकर सुबह सायं खिलाने से लाभ होता है ।

२ - औषधि - बेल की पत्तियाँ पीसकर गाय केदूध से बनी । छाछ मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

३ - औषधि - चौलाई की जड़ का पावडर २५० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ में मिलाकर देने से लाभ होता है ।

४ - औषधि - खडिया मिट्टी ५ तौला , सोंठ पावडर १ तौला , कत्था ६ माशा , भांग १ तौला , धतुरा बीज ३ माशा , सभी को कुटपीसकर आधा किलो माण्ड में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है ।

# - बदहजमी से उत्पन्न अतिसार में निम्नांकित योग विषेश गुण कारी रहते है :-
सर्व प्रथम जूलाब दें । इससे रोगी का पेट साफ़ हो जायेगा ।

१ - औषधि - जूलाब :- अरण्डी तेल आधा किलो ( बड़े पशु के लिए ) या ( एक पाँव छोटे पशु के लिए ) सोंठ आधा छटांक , तथा सरसों का तेल २५० ग्राम , मिलाकर पशु काे सेवन कराये । जूलाब के बाद ये दवाइयाँ देकर उपचार करें ।

२ - औषधि - बेल का गूद्दा आधा किलो , पुराना गुड २५० ग्राम , १ किलो पानी में डालकर शर्बत बनाकर पशु को पिलाना चाहिए ।
३ -औषधि - सोंठ १ तौला , दूधिया हींग ५ ग्राम , आधा किलो चावल के माण्ड में मिलाकर देवें ।

# - रक्तातिसार ( रूधीर पोंकें ) गर्मी से पोंकें में निम्नांकित याेग लाभकारी है :-

१ - औषधि - धनियाँ पावडर २ तौले , सेंधानमक पावडर २ तौला , जौ का आटा २५० ग्राम , सभी को आपस में मिलाकर पशु को खिलाने से लाभकारी सिद्ध होता है ।

२ -औषधि - बबूल का गोंद २ तौला , गोंदकतीरा २ तौला , इन्हें पानी में भिगो दें । फूल दाने पर जौ का आटा २५० ग्राम में मिलाकर पिण्ड बनाकर खिलायें । इस प्रयोग से रूधीर दस्त बन्द हो जाते है ।

# - दस्तों में पशु को हरा चारा, दाना , देना बिलकुल बन्द कर देना चाहिए , केवल अलसी की चाय अथवा चावल का माण्ड ही देवें । पानी में बेल का गूद्दा या बबूल के पत्ते औटाकर छानकर पिलायें । साथ ही पशु को सर्दी - गर्मी धूप , बरसात , ठण्डी , हवा से बचाकर रखें ।पशु के दस्तों को तत्काल साफ़ करते रहे । उसके बाँधने का स्थान स्वच्छ व किटाणुरहित होना चाहिए ।


१० - बदहजमी या अपच ( Indigetion )
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कारण व लक्षण :- गन्दा , सड़ा- गला अथवा सूखा चारा आदि खाने- पीने के के कारण प्राय: पशुओं को बदहजमी हो जाती है उनका मेदा ( अमाशय ) ठीक काम नहीं करता तथा उसमें खाना पचाने की शक्ति नहीं रह जाती है । कभी - कभी पेट में कीड़े हो जाना या पट्ठों की दुर्बलता भी इस रोग की उत्पत्ति का कारण होता है ।
पशुओं से अनियमित ढंग से काम लेना किसी दिन १०-१२ घन्टे काम लेना तो किसी दिन काम न लेना यह भी अपच के प्रधान कारणों में से एक कारण है ।
इस रोग में रोगी पशु की पाचनक्रिया दूषित हो जाने से भोजन का पौष्टिक अंश ठीक प्रकार से न मिलने के कारण पशु दिन- प्रतिदिन दूबला होता जाता है् , भूख बन्द हो जाती है और प्यास बढ़ जाती है , कभी - कभी पशु मिट्टी भी चाटने लगता है । जूगाली नहीं करता , क़ब्ज़ तथा अफारा भी कभी - कभी हो जाता है , मूहँ मे काँटे पड़ जाते है तथा गोबर रंगबिरगां पतला थोड़ा तथा कष्टपुर्वक निकलता है ,पशु उदास सा रहता है ।


चिकित्सा - पेट सम्बन्धी सभी रोगों में प्राय: हल्का जूलाब देना लाभप्रद होता है । अत: इस रोग में भी पशु के पेट से बिना पचा भोजन निकालने के लिए निम्नांकित में से एक विरेचन देकर रोगी पशु को थोडें से दस्त करा देना आवश्यक तथा लाभकारी है ।


१ - औषधि - अरण्डी का या सरसों का तेल १२५ ग्राम , सोंठ या छोटी पीपल पावडर २ तौला , दोनों को मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है ।

२ - औषधि - सरसों का तेल ८ छटांक , तारपीन तेल आधा छटांक , भूनी हूई हींग ६ माशा , सभी को आपस में मिलाकर पशु को नाल द्वारा पिलायें , यह जूलाब थोड़ा तेज़ है परन्तु पेट के कीड़ों को मारता है तथा जमा हूआ मल निकालकर बदहजमी को दूर करता है ।

# - उपरोक्त जूलाब देकर जब पेट साफ़ हो जायें तब बाद में निम्नांकित दवायें देना लाभकारी रहता है --

१ - औषधि - सोंठ पावडर १ तौला , राई पावडर १ तौला , अजवायन २ तौला ,काला नमक डेढ़ तौला , तथा हींग भूनी हूई पावडर ६ माशा , लें ।सभी को आपस में मिलाकर २५० ग्राम गरम पानी के साथ पिलादें ,और दवा देने के दो घन्टे तक पानी नहीं पिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - कालानमक पावडर २ तौला , नौसादर पावडर १ तौला , कसीस पावडर ६ माशा , कुचला पावडर ३ माशा , कुचला न हो तो भांग पावडर १ तौला , सभी को आपस में मिलाकर आधा लीटर गरम पानी में मिलाकर पशु को नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता है ।

# - हल्का तथा थोड़ा - थोड़ा खाना पशु को दिन में कई बार देना चाहिए । अलसी का दलिया , चोकर का दलिया , चावल का माण्ड आदि देना विशेषकर लाभकारी होते हैं , पशु को भूख लगने तक थोड़ा - थोड़ा हरा चारा भी दें ।

११ - दस्त ( छेरा )
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१ - औषधि - गाय - भैंसों या अन्य पशुओं मे छेरा ( दस्त ) -- दस्त होने पर मोचरस १५० ग्राम , इश्बगोल भूसी ५० ग्राम , कतरन कत्था ५० ग्राम , इन दवाईयों को कूटछानकर २५-२५ ग्राम की खुराक बना लें । एक खुराक को २५ ग्राम शराब व २५० ग्राम गाय के दूध की दही मिलाकर दोनों समय नाल से पिला दें ।

१२ - छेरा मरोड़ा दस्त
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कारण व लक्षण - छेरा मरोंडा ( दस्त ) पशु के पेट मे घरड- घरड की आवाज़ आती है --

१ - औषधि - इश्बगोल बीज २५० ग्राम , इश्बगोल भूसी ५० ग्राम , माई १०० ग्राम , कत्था पपड़ियाँ ५० ग्राम , हरड़ छोटी १०० ग्राम ,इन सब दवाओं को कूटछानकर ५०-५० ग्राम , की खुराक बना लें । एक खुराक ५०० ग्राम पानी में भिगोकर रख दें , प्रात: की भीगी दवाई सायं को देवें और सायं की भीगी दवा प्रात: को देवें , आराम आयेगा ।

१३ - छेरा ख़ूनी दस्त
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कारण व लक्षण - गाय - भैंस या अन्य पशुओं को छेरा , मरोड़ा , ख़ूनी छेरा --
१ - औषधि - १००ग्राम धनियाँ , १००ग्राम मिश्री ( चीनी ) पानी में घोलकर नाल से देवें तथा दो घन्टे बाद फिर एक खुराक देवें तथा आवश्यक होतों तीन घन्टे बाद एक खुराक और देदें ।

२ - औषधि - ख़ूनी छेरा ,दस्त , मरोड़ा -- ऐसी स्थिति में छोटी दूद्धी १०० ग्राम ,खिलायें और दो घन्टे बाद एक खुराक और दें पशु अवश्य ठीक होगा ।यदि पशु को खिला न पाये तो दूद्धी का रस निकालकर एक-एक घन्टे बाद एक नाल से दें ।


१४ - अलस
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-- ( अलसी , बर्रे या ज्वार - चारा - विष )

कारण व लक्षण - जब कोई पशु अलसी , बर्रे या ज्वार की विषैली चेरी ज़्यादा मात्रा में खा लेता हैं तो उसे एक प्रकार का नशा आ जाता है । वह खाना -पीना छोड़ देता है । वह जूगाली नहीं करता और पागल - सा होकर मर जाता हैं ।

१ - औषधि - - जलजमनी (बछाँग) ४८० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , बछाँग को महीन पीसकर पानी में मिलाकर लगभग दो- दो घन्टे में आराम होने तक देते रहना चाहिए , आराम होगा । रोगी पशु को खुब नहलाना चाहिऐ और पानी से भीगे थैले को उसकी पीठ पर रखना चाहिऐ ।

२ - औषधि -- गुड़ ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १९२० ग्राम , हमें छाछ को लेकर गुड़ में मिलाकर रोगी पशु को पिलाना चाहिऐ । यही खुराक रोगी पशु को आराम होने तक तीन-तीन घन्टे के बाद पिलानी चाहिऐ ।

आलोक -- गर्मी में जो चेरी बोयी जाती है , उसमें विष हो जाता है । उसको खाने से पशु मर जाता है । इसलिए ऐसी चेरी को तभी खिलाना चाहिए , जब उस पर अच्छी मात्रा में वर्षा का दो-तीन बार पानी गिर जायें, जिससें उसका विष धुल जाये । सबसे पहले चेरी को बूढ़े पशु को खिलाना चाहिए , क्योंकि अगर चेरी में विष भी हुआ तो बुढें को ही नुक़सान होगा और पता भी चल जायेगा चेरी में विष है या नहीं, जाँच पड़ताल करने के बाद ही चारे का प्रयोग करना चाहिऐ ।

#~ कभी -कभी वर्षा में बोयी हुई ज्वार लगभग १ फ़ुट उग आने के बाद खुरड़ होना ( पानी न गिरने ) से वह पौधा कुम्हला जाता है और सूखने पर उसमें विष पैदा हो जाता है । उसे खिलाने से पशु मर जाते है ।
#~ बर्रे में भी विष होता है। दो - तीन बार अच्छी मात्रा में पानी गिरने के बाद उसका विष धुल जाता है। फिर उसे पशु को खिलाना चाहिऐ।

#~खजेड़ा ( संफेद कीकर ) में जो काले - काले रंग की फलियाँ आती है , उसमें भी विष रहता है,उसे भी नही खिलाना चाहिए। खजेडे की हरे रंग की फलियाँ खिलानी चाहिए, पहले तो पशु को हरी फलियाँ एक पौण्ड खिलायें। फिर मात्रा बढ़ाये । तीसरे दिन २ पौण्ड खिलाये। इस हिसाब से मात्रा बढ़ानी चाहिए , क्योंकि धीरे- धीरे खिलाने से वह आहार में आ जाता है तथा उससे नुक़सान नहीं होता। इससे दूधारू पशु बहुत अधिक दूध देता है और बिना दूध के पशु बहुत तगड़े हो जाते है ।

#~ अफ़ीम के पौधे और डोंडियों को भी नही खिलाना चाहिए, क्योंकि उसमें भी विष रहता है । उसको गड्ढे में दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए ।

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