(३८)- गौ - चिकित्सा .आग से जलना ।
१ - आग से जल जाना
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कारण व लक्षण -कभ- कभी भूल से आग लग जाने अथवा छप्पर , मकान आदि पशु के बाधने के स्थान पर अचानक आग लग जाने पर पशु आग से झुलस जाते हैं । मामूली जलने पर तो जलीं हुई जगह लाल - सी पड़ जाती हैं ,किन्तु अधिक जल जाने पर फफोलें पड़ जाते हैं । पशु जल जाने पर जिस स्थान कम जला होता है वहाँ की जगह सुर्ख़ हो जाती हैं। जले हुए स्थान मे फफोलों के फुटने से घाव हो जाते हैं ऐसी अवस्था मे चूने का पानी और अलसी का तेल २५०-२५० ग्राम लेकर एक साथ ख़ूब मिलाकर उसमे कपड़ा भिगोकर जले हुए स्थान पर लगाना हितकर रहेगा ।
१ - औषधि - अलसी का तेल १२० ग्राम , चूने का पानी ६० ग्राम , राल ( बारूद ) १२ ग्राम , राल को पीसकर तीनों आपस में मिलाएँ फिर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक लगायें।
२ - औषधि - असली शहद २४० ग्राम , बढ़िया सिन्दुर ( कामियाँ सिन्दुर ) १२० ग्राम , दोनों को आपस में ख़ूब फैंट कर रोगी पशु को दिन में तीन बार लगाये , ठीक होने तक लगाते रहे। या पहले शहद लगाकर ऊपर से सिन्दुर भी लगा सकते है ।
३ - औषधि - उँधा फूली के पत्तों का रस ( पाना चोली ) १२ ग्राम , अलसी का तेल ६० ग्राम , दोनों को आपस में फैटकर रोगी पशु को अच्छा होने तक दिन में दो तीन बार लगाते रहे ।
४ - औषधि - कई बार मक्खियाँ बहुत अधिक सताती है तो ऐसी स्थिति में हमें डीकामाली ( मालती बेल ) ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , डीकामाली को महीन पीसकर तथा तैल में भिगोकर रोगी पशु को ठीक होने तक दिन में तीन बार लगायें। कई बार अलसी के तैल के स्थान पर नारियल का तैल भी उक्त स्थान पर लगा सकते है। इससे ज़्यादा फ़ायदा होगा। एक बात और ध्यान रखना चाहिए कि डीकामाली को पीसकर रख लें । लगाने से पहले ही तैल में मिलाएँ क्योंकि मिलाकर अधिक समय रखने पर डीकामाली की गन्ध उड़ जाती है।
५ - औषधि - मोरपंख को जलाकर उसकी राख को चलनी में छानकरनारियल के तैल में मिलाकर पशु को अच्छा होने तक दिन में दो बार लगाते रहें।
मोरपंख व नारियल तैल को आप किसी भी घाव पर लगा सकते है जहाँ मक्खियाँ ज़्यादा सताती हो वहाँ प्रयोग करें ।
६ - औषधि - बेर की पत्ती ( बोर की पत्ती ) २४ ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , पत्तियों को ख़ूब महीन पीसकर तथा तैल में मिला कर रोगी पशु को दिन में दो बार लगाते रहे ठीक होने तक।
७ - औषधि - घृतकुमारी ( एलोविरा ) गूद्दा ४८० ग्राम गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी २४० ग्राम , घृतकुमारी के गूद्दे को दही में मिलाकर ख़ूब मथकर इसमें पानी मिला कर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक रोज़ पिलाते रहें।
८ - औषधि - बेल ( बिल्व फल ) का गूद्दा ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , पहले बेल फल के गूद्दे को पानी में मथकर छान लें, फिर उसे दही में मथकर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक पिलाते रहें ।
९ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी १८२० ग्राम , पहले मेंथी के दानों को महीन पीसकर पानी मे गलाये फिर दही में मिलाकर रोगी पशु को दिन में दो बार पिलाते रहे अच्छा होने तक। पशु अवश्य ठीक होगा ।
१० - औषधि - मेहन्दी के पत्ते जलाकर उसकी राख घावों पर छिड़कना भी लाभकारी होता हैं ।
११ - औषधि - चूने के निखरे हुए पानी को अलसी या नारियल के तैल मे और कपूर मिलाकर किसी साफ़ बोतल मे भरकर सुरक्षित रखे , दवा को लगाने से पहले ख़ूब हिलाये उसके बाद जले हुए स्थान पर दिन मे २-३ बार लगाने से लाभ होता हैं ।
१२ - औषधि - गाय के मक्खन को फूल ( काँसे ) की परात या थाली मे डालकर साफ़ पानी मे मिलाकर ख़ूब फैटते रहे फिर पानी को निकालकर दूसरा पानी डालकर फैटते रहे , इस क्रिया को २० से १०० बार करने से यह घी सतधौत घी बन जायेगा अब इस घी को किसी मिट्टी के बर्तन मे रखे और रोगी पशु के जले हुए स्थान पर दिन मे २-३ बार लगायेंगे तो अवश्य ठीक होगा ।
यदि पशु अधिक जल गया हो तो सावधानीपुर्वक पशु को दिन मे दो- तीन करवट अवश्य दिला देनी चाहिए तथा पीड़ित पशु को मक्खी व मच्छर से बचाने का कोई उत्तम उपाय अवश्य करना चाहिए । या कोई कपड़ा डालकर ढक दें ।
१३ - चूने के निथरे हुए पानी को अलसी या गोले के तैल मे अथवा तिल के तैल मे थोड़ा - सा कपूर मिलाकर समपरिमाण मे मिलाकर किसी साफ़ - स्वच्छ बोतल में भरकर ख़ूब हिलायें । जब सब दवा हि- मिलकर एक हो तो इस दवा को दिन मे २ बार जले हुए स्थानों पर लगायें ।
जले स्थान को मक्खियों से बचाने के लिए हल्के कपड़े से ढकें तथा यह भी ध्यान रहे कि उपरोक्त दवा पशु चाटने न पायें ।
१४ - औषधि - गाय के शुद्ध घी को फूल ( काँसे ) की थाली या परात मे पानी डालकर बार- बार घी धोयें और फैटे और पानी बदले इस प्रकिया को सौ बार करके साफ़ करके निथार लें और फिर जले हुए स्थान पर लगाने बहुत आराम होता हैं ।
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२ - गरम पानी से जल जाना
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कारण व लक्षण - कभी- कभी अज्ञानतावश पशु को अधिक गरम पानी से सेंक देतें हैं या गरम - गरम पानी फैंक देत है उसके ऊपर , जिससे पशु जल जाता है । उसकी चमड़ी सुन्न पड़ जाती है और तिडक जाती है ।
१ - औषधि - गेरू ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , गेरू को महीन पीसकर कपडछान करके तैल में मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर दोनों वक़्त , सुबह- सायं ठीक होने तक लगाते रहे ।
२ - औषधि - चूने का पानी ६० ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर ख़ूब हिलायें और उसके बाद में रोगी पशु को लगायें ।
३ - औषधि - सिन्दुर ६० ग्राम , शहद ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर जले हुए स्थान पर लेप कर दें । और ठीक होने तक करते रहें ।
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Saturday, 7 November 2015
(६)-१- गौ - चिकित्सा ,पैर रोग ।
(६)-१- गौ - चिकित्सा ,पैर रोग ।
१ - रोग - पशुओं में लँगड़ी बाँय अथवा परपरहवा रोग ।
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कारण व लक्षण - इस रोग में पशु के कुल्ही का हिस्सा जाम हो जाता है । वह लगंडाकर चलने लगता है । कई बार पशु को बुखार भी हो जाता है और उसको गोबर व मूत्र का बन्द भी लग जाता है । पशु ६-७ घन्टे में परेशान होकर मर जाता है , यह दवा इस बिमारी में बड़ी कारगर है ।
१ - औषधि - अजवायन की धूनी ।
गाय के गोबर के ऊपले को किसी बर्तन में रखकर जला लें जब धूआँ निकलना बन्द हो जाये । तब उसके ऊपर थोड़ी - थोड़ी अजवायन डालते रहे ओर धूएँ को पशु के मुँह के पास रखें जिससे उसके मुँह में धूआँ चला जाये । ५० ग्राम ताज़ा भृंगराज को लेकर बारीक साग की तरह काट लें , ४० कालीमिर्च मोटी - मोटी कूटकर १०० ग्राम गेहूँ का आटा लेकर उसमें मिलाकर कर गुथकर कच्ची- पक्की रोटी बना लें जो भी एक या दो बने रोटी ठन्डी करके उनमे ६० ग्राम गाय का घी रखकर पशु को खिला देने से ठीक हो जायेगा । यह औषधि केवल एक बार ही देनी है । आटे में मिलाकर न देवें क्योंकि गाय को चार पेट होते है उसे आटा पचता नहीं है ।( अगर रोटी नहीं बना पाते तो आटे को कड़ाई में हल्का सा भूनकर सी दवाईयाँ मिलाकर भी दें सकते है ) लेकिन पानी मत देना ।
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२ - आगे के पैर की मोच ( घटने का खिसक जाना )
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कारण व लक्षण - परस्पर लड़ने से , घातक चोट लगने से, दौड़ने और फिसल जाने पर कभी - कभी पशु की गोड़ खिसक जाती है । इसके लिए नीचे लिखें उपचार का प्रयोग करना चाहिए ।
१ - औषधि - कन्थार की हरी पत्तियाँ २४० ग्राम , या पत्तियों का रस ४० ग्राम ,मीठा तैल ६० ग्राम , कन्थार की पत्तियों को पहले पानी में डालना चाहिए एक घंटे बाद पत्तियों को निकालकर उन्हें महीन पीसकर उनका रस कपड़े में छानकर निकाल लेना चाहिए । फिर जितना रस हो , उतना खाने के मीठे तैल में मिलाकर गरम करना चाहिए । गरम करते समय चम्मच द्वारा उसको हिलाना चाहिए । फिर घोल से गुनगुना रहने पर पशु के घुटने पर मालिश करनी चाहिए । एेसी मालिश चार दिन तक करनी चाहिए । पाँव तुरन्त ठीक हो जायेगा । रोगी पशु के बाल निकल जायेंगे , किन्तु चमड़ी नहीं निकलेगी । बाल बाद में आ जायेंगे । जब पशु अच्छा हो जाये, तब मालिश किये गये स्थान पर नारियल का तैल रूई से लगाना चाहिए । इससे आराम आ जायेगा ।
२ - औषधि - रोगी पशु के चटखुरी या मोच के स्थान पर पहले रूई द्वारा मिट्टी का तैल ( घासलेट ) लगाया जाय । १२ घंटे बाद उसी स्थान पर नारियल का तैल लगाया जाये।यह दवा एक ही बार लगाने पर पशु को आराम हो जायेगा । कन्थार की दवा भी बनाकर मोच में काम आ सकती है ।
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३ - खुर तिड़कना
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कारण व लक्षण - पशुओं के खुसरो मे तिडकन आ जाती है ।
१ - औषधि - कभी-कभी पशु का खुर कोई मार लगने से तिडक जाता है,सीताफल ( शरीफ़ा ) की पत्ती १२ ग्राम , चूना ९ ग्राम , शरीफ़ा की पत्तियाँ बारीक पीसकर चूने में मिलाकर ज़ख़्म में भरकर ऊपर से रूई रखकर पट्टी बाँधनी चाहिए ।
२ - औषधि - भिलावें का तैल साढ़े चार ग्राम में भरकर ऊपर से गरम लाल लोहे का दाग लगाया जाय । इस प्रयोग से पशु को आराम मिलेगा ।
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४ - खुरमोच
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कारण व लक्षण - कभी - कभी अचानक गड्डे में पैर गिर जाने से या आपस में लड़ने से पशुओं के खुर में मोच ( चोट ) आ सकती है और उस स्थान पर सूजन आ जाती है ,और पशु चलने - फिरने में लँगड़ाता है ।
१ - औषधि - पहले नीम की पत्ती पानी में उबालकर पानी से सेंकें, फिर निम्नलिखित दवा का उपयोग करना चाहिए । कन्थार ( कठार, गोविन्द फल, लै०- कैपीरस केलेनिका ) २४० ग्राम , मीठा तैल ६० ग्राम , कन्थार की पत्ती को पानी में आधा घन्टा तक डालकर फिर पत्तियों को निकालकर महीन पीसें । फिर कपड़े द्वारा रस निकालकर जितना रस हो उतना ही तैल मिलाकर गरम करें । उसे गुनगुना रहने पर रोग के स्थान पर रोज़ सुबह ८ दिन तक मालिश करें । इससे पशु के रोग के स्थान पर के बाल तो निकलेंगे , किन्तु चमड़ी नहीं निकलेगी । कुछ दिन में बाल जम जायेंगे और पशु ठीक हो जायेगा । जब पशु का लंग करना कम हो जाये तो उस स्थान पर खोपरे का तेल रोज़ लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - घासलेट ( मिट्टी का तैल ) ६० ग्राम , से रोगी पशु के रोगस्थान पर लगाकर मालिश कि जाय । फिर १२ घंटे बाद उस स्थान पर नारियल तैल को लगाया जाय। इस दवा के लगाने से एक बार में ही आराम आने लगता है ।
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५ - खोराला ( अगले पैर के खुर के पास पक जाना )
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कारण व लक्षण - अगले पाँव के खुर के पास पक जाता है । इलाज न होने से वह पककर पककर फूट जाता है और पशु लँगड़ाता है ।
१ - औषधि - आक ( मदार ) की हरी गीली लकड़ी में तेल लगाकर फिर उसके ऊपर सिन्दुर लगा लें । उसे पशु की नाक के अन्दर घुसा दें । इस प्रकार नाक के दोनो छिद्रों में आक की लकड़ी चलानी चाहिए । इसे लगाते समय पशु की नाक से आवाज़ आती है, और वह छींकता हैं ।
आलोक-:- आक की लकड़ी को पहले ही पशु की नाक के बाहर से नाप लेंना चाहिए । ध्यान रहे कि लकड़ी इतनी बड़ी न हो कि वह आँख तक पहुँच जाय । आँख तक पहुँच से हानि हो सकती है । यह रोग पशु के अगले पैर में ही होता है ।
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६ - पाँव करवा जाने पर ( पैरों का तलस जाना )
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कारण व लक्षण - रेत ,काली मिट्टी और नरम मिट्टी में पैदा हुए बछड़ों को पथरीली ज़मीन पर काम करने से पाँव करवा जाते है । रोगी पशु लंग करता है । वह कभी - कभी एक, दो या तीन पाँवों से लंग करता है ।
१ - औषधि - रोगी पशु के पैरों में नाल हमेशा बैठवानी चाहिए । इससे उसके पाँव करवाते नही । फिर वह डामर की सड़क , पथरीली ज़मीन और अन्य कड़ी जगहों पर आसानी से चल सकता है ।
२ - औषधि - रोगी पशु को नीम के उबले पानी से, गुनगुना होने पर ,२० ग्राम , नमक डालकर , दोनों समय , आराम होने तक ,सेंकना चाहिए । बाद में रोग के स्थान पर नारियल तैल की मालिश करनी चाहिए ।
घोड़े के लिए इलाज -:- ईंट को लाल गरम करके पानी में बुझा लें । फिर तत्काल उस ईंट पर घोड़े का लँगड़ा पैर रख दें। इससे उसके पैर में सेंक लगेगा और उसे आराम हो जायेगा ।
#- थोड़े से गाय के गोबर से बने कण्डो फ़र्श पर रख कर जलायें ,उपले जल जाने पर उन्हें तुरन्त वहाँ से हटा दें और उस स्थान पर घोड़े के पैर को गरम गरम फ़र्श पर रखकर सेंकना चाहिए और ऊपर से थोड़ा थोड़ा पानी डालनी चाहिए, इससे सेंक लगने से आराम आने लगेगा ।
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७ - खुर ( तलवे या तालू फूटने ) की बीमारी ।
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कारण व लक्षण - यह रोग भैंस को होता है । गर्मी की अधिकता के कारण यह रोग पैदा होता है ।
१ -औषधि - पशु के मुँह के भीतर ऊपरी जबड़े में दो पतले सुराख़ होते है , जिनका सम्बंध मस्तिष्क से रहता है । वह जो पानी पीता है वह इन सूराखों से उसके मस्तिष्क में चढ़ जाता है । ये दोनों सुराख़ अन्दर से चौड़े हो जाते है । पशु जब पानी पीता है तो पानी उसकी नाक से गिरता है ।
२ - औषधि - सिन्दुर ३६ ग्राम , मक्खन ९ ग्राम , दोनों को मिलाकर , थोड़ी रूई में लपेटकर , गोमती घास की काड़ी ( सोटिया घास ) लेकर उपर्युक्त मिश्रण उसके एक सिरे पर लगायें । फिर पशु को धीरे से पृथ्वी पर सुलाकर सावधानी से दोनों स्वरों में दो काँडियांँ बनाकर , दोनों सूराखों में आधा - आधा इंच लें जायँ ।बाहर निकली काड़ी को तोड़ देना चाहिए । रोगी पशु को एक ही बार में अवश्य आराम होगा ।
खान-पान -:- रोगी पशु को कमजोर न होने देना चाहिए । मुलायम घास और पतली खुराक दी जायेँ ।
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८ - फ़ील पाँव ( हाथा पाँव )
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कारण व लक्षण - इस रोग से ग्रसित पशु के पैर सूजकर हाथी के पैर के सामान हो जाते है इसलिए इस रोग को हाथी पाँव कहा जाता हैं । यह रोग कभी- कभी एक तथा कभी चारों पैरो मे भी हो जाता हैं जिसके कारण रोगी पशु को बडी कठिनाई से चलना पड़ता हैं इस रोग को गजचरण के नाम से भी पुकारा जाता हैं ।
१ - औषधि - परवल की जड़ , नीम के पत्ते , छोटी हरड़ इन तीनों २५०-२५० ग्राम लेकर सभी को पीसकर गाय का घी २५० ग्राम लेकर उसमे सानकर पशु को खिला देना चाहिए लाभकारी सिद्ध होगा ।
२ - औषंधि - अजवायन , सैंधानमक , बायबिडंग , सोंठ ,पीपल , प्रत्येक १०-१० ग्राम लेकर कुटपीसकर , आवश्यकतानुसार गुड़ मे सान कर कराते रहने से २ माह मे लाभ दिखाई देने लगेगा । और पशु धीरे- धीरे ठीक हो जायेगा ।
९ - पशुओं के खुरों मे घाव
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कभी - कभी खुर घिस जाने पर , गरम रेत आदि में चलने अथवा कील- काँटा आदि खुर में चुभ जाने आदि कारणों से खुर मे घाव होकर पक जाता हैं , जिसके कारण पशु को चलने- फिरने मे बड़ा कष्ट होता हैं ।
# - औषधि - इस दशा में फ़ौरन ही पशु की जीभ देखनी चाहिए । यदि जीभ पर छालें हो जाते हैं तो वह खूरपका नामक छूत का रोग होता हैं । यदि जीभ पर छालें न हो तो सामान्य कारणों से खुर मे घाव होना समझें । उसके लिए पशु के खुर को ध्यानपूर्वक देखकर यदि कील- काँटा चूभ गया हो तो उसे खींचकर निकाले और बोरिकएसिड पावडर मिले गरमपानी से खुर को धोयें साफ़ करके नीचे लिखे मरहम लगायें ।
१ - औषधि - तिल के तैल मे तारपीन का तैल मिलाकर उसमे रूई का फाहा तर करके खुर के बीच मे दबा दें । लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - यदि गरम रेत आदि के कारण फफोला पड़ गया हो तो पिसा हुआ नमक, मक्खन मे मिलाकर लगाना लाभदायक होता हैं।
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१ - रोग - पशुओं में लँगड़ी बाँय अथवा परपरहवा रोग ।
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कारण व लक्षण - इस रोग में पशु के कुल्ही का हिस्सा जाम हो जाता है । वह लगंडाकर चलने लगता है । कई बार पशु को बुखार भी हो जाता है और उसको गोबर व मूत्र का बन्द भी लग जाता है । पशु ६-७ घन्टे में परेशान होकर मर जाता है , यह दवा इस बिमारी में बड़ी कारगर है ।
१ - औषधि - अजवायन की धूनी ।
गाय के गोबर के ऊपले को किसी बर्तन में रखकर जला लें जब धूआँ निकलना बन्द हो जाये । तब उसके ऊपर थोड़ी - थोड़ी अजवायन डालते रहे ओर धूएँ को पशु के मुँह के पास रखें जिससे उसके मुँह में धूआँ चला जाये । ५० ग्राम ताज़ा भृंगराज को लेकर बारीक साग की तरह काट लें , ४० कालीमिर्च मोटी - मोटी कूटकर १०० ग्राम गेहूँ का आटा लेकर उसमें मिलाकर कर गुथकर कच्ची- पक्की रोटी बना लें जो भी एक या दो बने रोटी ठन्डी करके उनमे ६० ग्राम गाय का घी रखकर पशु को खिला देने से ठीक हो जायेगा । यह औषधि केवल एक बार ही देनी है । आटे में मिलाकर न देवें क्योंकि गाय को चार पेट होते है उसे आटा पचता नहीं है ।( अगर रोटी नहीं बना पाते तो आटे को कड़ाई में हल्का सा भूनकर सी दवाईयाँ मिलाकर भी दें सकते है ) लेकिन पानी मत देना ।
Dank
Mag,mms,?ch,.DV
MV.AD,.
ask.s.
२ - आगे के पैर की मोच ( घटने का खिसक जाना )
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कारण व लक्षण - परस्पर लड़ने से , घातक चोट लगने से, दौड़ने और फिसल जाने पर कभी - कभी पशु की गोड़ खिसक जाती है । इसके लिए नीचे लिखें उपचार का प्रयोग करना चाहिए ।
१ - औषधि - कन्थार की हरी पत्तियाँ २४० ग्राम , या पत्तियों का रस ४० ग्राम ,मीठा तैल ६० ग्राम , कन्थार की पत्तियों को पहले पानी में डालना चाहिए एक घंटे बाद पत्तियों को निकालकर उन्हें महीन पीसकर उनका रस कपड़े में छानकर निकाल लेना चाहिए । फिर जितना रस हो , उतना खाने के मीठे तैल में मिलाकर गरम करना चाहिए । गरम करते समय चम्मच द्वारा उसको हिलाना चाहिए । फिर घोल से गुनगुना रहने पर पशु के घुटने पर मालिश करनी चाहिए । एेसी मालिश चार दिन तक करनी चाहिए । पाँव तुरन्त ठीक हो जायेगा । रोगी पशु के बाल निकल जायेंगे , किन्तु चमड़ी नहीं निकलेगी । बाल बाद में आ जायेंगे । जब पशु अच्छा हो जाये, तब मालिश किये गये स्थान पर नारियल का तैल रूई से लगाना चाहिए । इससे आराम आ जायेगा ।
२ - औषधि - रोगी पशु के चटखुरी या मोच के स्थान पर पहले रूई द्वारा मिट्टी का तैल ( घासलेट ) लगाया जाय । १२ घंटे बाद उसी स्थान पर नारियल का तैल लगाया जाये।यह दवा एक ही बार लगाने पर पशु को आराम हो जायेगा । कन्थार की दवा भी बनाकर मोच में काम आ सकती है ।
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३ - खुर तिड़कना
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कारण व लक्षण - पशुओं के खुसरो मे तिडकन आ जाती है ।
१ - औषधि - कभी-कभी पशु का खुर कोई मार लगने से तिडक जाता है,सीताफल ( शरीफ़ा ) की पत्ती १२ ग्राम , चूना ९ ग्राम , शरीफ़ा की पत्तियाँ बारीक पीसकर चूने में मिलाकर ज़ख़्म में भरकर ऊपर से रूई रखकर पट्टी बाँधनी चाहिए ।
२ - औषधि - भिलावें का तैल साढ़े चार ग्राम में भरकर ऊपर से गरम लाल लोहे का दाग लगाया जाय । इस प्रयोग से पशु को आराम मिलेगा ।
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४ - खुरमोच
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कारण व लक्षण - कभी - कभी अचानक गड्डे में पैर गिर जाने से या आपस में लड़ने से पशुओं के खुर में मोच ( चोट ) आ सकती है और उस स्थान पर सूजन आ जाती है ,और पशु चलने - फिरने में लँगड़ाता है ।
१ - औषधि - पहले नीम की पत्ती पानी में उबालकर पानी से सेंकें, फिर निम्नलिखित दवा का उपयोग करना चाहिए । कन्थार ( कठार, गोविन्द फल, लै०- कैपीरस केलेनिका ) २४० ग्राम , मीठा तैल ६० ग्राम , कन्थार की पत्ती को पानी में आधा घन्टा तक डालकर फिर पत्तियों को निकालकर महीन पीसें । फिर कपड़े द्वारा रस निकालकर जितना रस हो उतना ही तैल मिलाकर गरम करें । उसे गुनगुना रहने पर रोग के स्थान पर रोज़ सुबह ८ दिन तक मालिश करें । इससे पशु के रोग के स्थान पर के बाल तो निकलेंगे , किन्तु चमड़ी नहीं निकलेगी । कुछ दिन में बाल जम जायेंगे और पशु ठीक हो जायेगा । जब पशु का लंग करना कम हो जाये तो उस स्थान पर खोपरे का तेल रोज़ लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - घासलेट ( मिट्टी का तैल ) ६० ग्राम , से रोगी पशु के रोगस्थान पर लगाकर मालिश कि जाय । फिर १२ घंटे बाद उस स्थान पर नारियल तैल को लगाया जाय। इस दवा के लगाने से एक बार में ही आराम आने लगता है ।
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५ - खोराला ( अगले पैर के खुर के पास पक जाना )
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कारण व लक्षण - अगले पाँव के खुर के पास पक जाता है । इलाज न होने से वह पककर पककर फूट जाता है और पशु लँगड़ाता है ।
१ - औषधि - आक ( मदार ) की हरी गीली लकड़ी में तेल लगाकर फिर उसके ऊपर सिन्दुर लगा लें । उसे पशु की नाक के अन्दर घुसा दें । इस प्रकार नाक के दोनो छिद्रों में आक की लकड़ी चलानी चाहिए । इसे लगाते समय पशु की नाक से आवाज़ आती है, और वह छींकता हैं ।
आलोक-:- आक की लकड़ी को पहले ही पशु की नाक के बाहर से नाप लेंना चाहिए । ध्यान रहे कि लकड़ी इतनी बड़ी न हो कि वह आँख तक पहुँच जाय । आँख तक पहुँच से हानि हो सकती है । यह रोग पशु के अगले पैर में ही होता है ।
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६ - पाँव करवा जाने पर ( पैरों का तलस जाना )
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कारण व लक्षण - रेत ,काली मिट्टी और नरम मिट्टी में पैदा हुए बछड़ों को पथरीली ज़मीन पर काम करने से पाँव करवा जाते है । रोगी पशु लंग करता है । वह कभी - कभी एक, दो या तीन पाँवों से लंग करता है ।
१ - औषधि - रोगी पशु के पैरों में नाल हमेशा बैठवानी चाहिए । इससे उसके पाँव करवाते नही । फिर वह डामर की सड़क , पथरीली ज़मीन और अन्य कड़ी जगहों पर आसानी से चल सकता है ।
२ - औषधि - रोगी पशु को नीम के उबले पानी से, गुनगुना होने पर ,२० ग्राम , नमक डालकर , दोनों समय , आराम होने तक ,सेंकना चाहिए । बाद में रोग के स्थान पर नारियल तैल की मालिश करनी चाहिए ।
घोड़े के लिए इलाज -:- ईंट को लाल गरम करके पानी में बुझा लें । फिर तत्काल उस ईंट पर घोड़े का लँगड़ा पैर रख दें। इससे उसके पैर में सेंक लगेगा और उसे आराम हो जायेगा ।
#- थोड़े से गाय के गोबर से बने कण्डो फ़र्श पर रख कर जलायें ,उपले जल जाने पर उन्हें तुरन्त वहाँ से हटा दें और उस स्थान पर घोड़े के पैर को गरम गरम फ़र्श पर रखकर सेंकना चाहिए और ऊपर से थोड़ा थोड़ा पानी डालनी चाहिए, इससे सेंक लगने से आराम आने लगेगा ।
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७ - खुर ( तलवे या तालू फूटने ) की बीमारी ।
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कारण व लक्षण - यह रोग भैंस को होता है । गर्मी की अधिकता के कारण यह रोग पैदा होता है ।
१ -औषधि - पशु के मुँह के भीतर ऊपरी जबड़े में दो पतले सुराख़ होते है , जिनका सम्बंध मस्तिष्क से रहता है । वह जो पानी पीता है वह इन सूराखों से उसके मस्तिष्क में चढ़ जाता है । ये दोनों सुराख़ अन्दर से चौड़े हो जाते है । पशु जब पानी पीता है तो पानी उसकी नाक से गिरता है ।
२ - औषधि - सिन्दुर ३६ ग्राम , मक्खन ९ ग्राम , दोनों को मिलाकर , थोड़ी रूई में लपेटकर , गोमती घास की काड़ी ( सोटिया घास ) लेकर उपर्युक्त मिश्रण उसके एक सिरे पर लगायें । फिर पशु को धीरे से पृथ्वी पर सुलाकर सावधानी से दोनों स्वरों में दो काँडियांँ बनाकर , दोनों सूराखों में आधा - आधा इंच लें जायँ ।बाहर निकली काड़ी को तोड़ देना चाहिए । रोगी पशु को एक ही बार में अवश्य आराम होगा ।
खान-पान -:- रोगी पशु को कमजोर न होने देना चाहिए । मुलायम घास और पतली खुराक दी जायेँ ।
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८ - फ़ील पाँव ( हाथा पाँव )
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कारण व लक्षण - इस रोग से ग्रसित पशु के पैर सूजकर हाथी के पैर के सामान हो जाते है इसलिए इस रोग को हाथी पाँव कहा जाता हैं । यह रोग कभी- कभी एक तथा कभी चारों पैरो मे भी हो जाता हैं जिसके कारण रोगी पशु को बडी कठिनाई से चलना पड़ता हैं इस रोग को गजचरण के नाम से भी पुकारा जाता हैं ।
१ - औषधि - परवल की जड़ , नीम के पत्ते , छोटी हरड़ इन तीनों २५०-२५० ग्राम लेकर सभी को पीसकर गाय का घी २५० ग्राम लेकर उसमे सानकर पशु को खिला देना चाहिए लाभकारी सिद्ध होगा ।
२ - औषंधि - अजवायन , सैंधानमक , बायबिडंग , सोंठ ,पीपल , प्रत्येक १०-१० ग्राम लेकर कुटपीसकर , आवश्यकतानुसार गुड़ मे सान कर कराते रहने से २ माह मे लाभ दिखाई देने लगेगा । और पशु धीरे- धीरे ठीक हो जायेगा ।
९ - पशुओं के खुरों मे घाव
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कभी - कभी खुर घिस जाने पर , गरम रेत आदि में चलने अथवा कील- काँटा आदि खुर में चुभ जाने आदि कारणों से खुर मे घाव होकर पक जाता हैं , जिसके कारण पशु को चलने- फिरने मे बड़ा कष्ट होता हैं ।
# - औषधि - इस दशा में फ़ौरन ही पशु की जीभ देखनी चाहिए । यदि जीभ पर छालें हो जाते हैं तो वह खूरपका नामक छूत का रोग होता हैं । यदि जीभ पर छालें न हो तो सामान्य कारणों से खुर मे घाव होना समझें । उसके लिए पशु के खुर को ध्यानपूर्वक देखकर यदि कील- काँटा चूभ गया हो तो उसे खींचकर निकाले और बोरिकएसिड पावडर मिले गरमपानी से खुर को धोयें साफ़ करके नीचे लिखे मरहम लगायें ।
१ - औषधि - तिल के तैल मे तारपीन का तैल मिलाकर उसमे रूई का फाहा तर करके खुर के बीच मे दबा दें । लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - यदि गरम रेत आदि के कारण फफोला पड़ गया हो तो पिसा हुआ नमक, मक्खन मे मिलाकर लगाना लाभदायक होता हैं।
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(२४)-गौ-चि०-सिर के रोग- सींगरोग ।
(२४)-गौ-चि०-सिर के रोग- सींगरोग ।
१ - सींग का टूट जाना
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यदि सींग टूटने पर रक्त बह रहा हो तो सींग के ऊपर पुरूष के बाल लपेटकर कपड़ा बाँध दें और उसके ऊपर गाय का या बकरी का दूध या अलसी का तेल व कपूर मिलाकर पट्टी को तेलकपूर से तर कर दें । इस प्रयोग से यथाशीघ्र लाभ होता हैं । यदि इस प्रयोग के क्रियान्वयन से ख़ून बहना नहीं रूकता है तो फिटकरी मिले हूए ठण्डे जल से तर करके पट्टी बाँधकर इसके बाद ऊपर वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए ।
२ - सींग मे कीड़ा लगना तथा टूट जाना
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पशु सींग के आस- पास घाव , फोड़ा - फुन्सी आदि की उपेक्षा करने से अथवा चोट आदि से सींग के टूट जाने पर घाव होकर उसमें कीड़ा लग जाता हैं । इसकी पहचान यह हैं कि जब पशु के सींग मे कीड़ा लग जाता है तो पशु अपना सींग बार- बार पेड़ या खम्बा व दिवार या पेड़ मे रगड़ता रहता है । कीड़ों का प्रभाव अधिक होने पर सींग एक तरफ़ को झुक जाता हैं ।
१ - औषधि - यदि सींग मे कीड़ा लगने का सन्देह हो तो आसपास की जगह नीम की पत्तियों के उबले पानी को गुनगुना करके साफ़ करना चाहिए की कही कोई छेद तो नही हैं या घाव तो नही हैं । यदि ऐसा हो तो तारपीन के तैल मे फाहा तर करके उसके अन्दर लगा देना चाहिए ताकि अन्दर के कीड़े मर जाते हैं । दिन में २-३ बार यही उपचार करें ।
२ - औषधि - फिनायल में साफ़ रूई का फाहा तर करके लगा देना चाहिए । इस उपाय से भी कीड़े मर जाते हैं ।
३ - औषधि - यदि कीड़ों के प्रभाव से सींग झुक गया हो अथवा चोट लगने से टूट गया हो तो उसे आरी से काटकर अलग कर देना चाहिए । इस क्रिया से ख़ून बहेगा - उसे रोकने के लिए ठण्डे पानी मे फिटकरी घोलकर उसमे पट्टी तर करके लगाकर बाँध देनी चाहिए ।
४ - औषधि - ख़ून बहना पूर्णरूपेण रूक जाने पर ड्राम फिटकरी और १ भाग तुतिया ( नीलाथोथा ) बारी- बारीक पीसकर उस पर बुरक देना चाहिए । ऊपर से साफ़ रूई रखकर कपड़े की गद्दी देकर कसकर पट्टी बाँध दें । तदुपरान्त घाव के इलाज की भाँति उसका इलाज करें ।
३ - सन्निपात रोग
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एक ही स्थान पर बहुत दिन तक पशु को बाँधकर पुष्टीकारक चारा व दाना न देने से अथवा एकाएक सिर में रक्त बढ़ जाने से यह रोग हो जाता हैं । इस रोग से ग्रसित पशु की आँख का रंग लाल हो जाता हैं तथा मुर्छित होकर गिर पड़ता हैं । उसकी श्वास की गति बढ़ जाती हैं ।
# - औषधि - रोगी पशु के नाक व कान की फस्द खोल कर मस्तिष्क प्रदाह की चिकित्सानुसार चिकित्सा करनी चाहिए ।
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१ - सींग का टूट जाना
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यदि सींग टूटने पर रक्त बह रहा हो तो सींग के ऊपर पुरूष के बाल लपेटकर कपड़ा बाँध दें और उसके ऊपर गाय का या बकरी का दूध या अलसी का तेल व कपूर मिलाकर पट्टी को तेलकपूर से तर कर दें । इस प्रयोग से यथाशीघ्र लाभ होता हैं । यदि इस प्रयोग के क्रियान्वयन से ख़ून बहना नहीं रूकता है तो फिटकरी मिले हूए ठण्डे जल से तर करके पट्टी बाँधकर इसके बाद ऊपर वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए ।
२ - सींग मे कीड़ा लगना तथा टूट जाना
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पशु सींग के आस- पास घाव , फोड़ा - फुन्सी आदि की उपेक्षा करने से अथवा चोट आदि से सींग के टूट जाने पर घाव होकर उसमें कीड़ा लग जाता हैं । इसकी पहचान यह हैं कि जब पशु के सींग मे कीड़ा लग जाता है तो पशु अपना सींग बार- बार पेड़ या खम्बा व दिवार या पेड़ मे रगड़ता रहता है । कीड़ों का प्रभाव अधिक होने पर सींग एक तरफ़ को झुक जाता हैं ।
१ - औषधि - यदि सींग मे कीड़ा लगने का सन्देह हो तो आसपास की जगह नीम की पत्तियों के उबले पानी को गुनगुना करके साफ़ करना चाहिए की कही कोई छेद तो नही हैं या घाव तो नही हैं । यदि ऐसा हो तो तारपीन के तैल मे फाहा तर करके उसके अन्दर लगा देना चाहिए ताकि अन्दर के कीड़े मर जाते हैं । दिन में २-३ बार यही उपचार करें ।
२ - औषधि - फिनायल में साफ़ रूई का फाहा तर करके लगा देना चाहिए । इस उपाय से भी कीड़े मर जाते हैं ।
३ - औषधि - यदि कीड़ों के प्रभाव से सींग झुक गया हो अथवा चोट लगने से टूट गया हो तो उसे आरी से काटकर अलग कर देना चाहिए । इस क्रिया से ख़ून बहेगा - उसे रोकने के लिए ठण्डे पानी मे फिटकरी घोलकर उसमे पट्टी तर करके लगाकर बाँध देनी चाहिए ।
४ - औषधि - ख़ून बहना पूर्णरूपेण रूक जाने पर ड्राम फिटकरी और १ भाग तुतिया ( नीलाथोथा ) बारी- बारीक पीसकर उस पर बुरक देना चाहिए । ऊपर से साफ़ रूई रखकर कपड़े की गद्दी देकर कसकर पट्टी बाँध दें । तदुपरान्त घाव के इलाज की भाँति उसका इलाज करें ।
३ - सन्निपात रोग
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एक ही स्थान पर बहुत दिन तक पशु को बाँधकर पुष्टीकारक चारा व दाना न देने से अथवा एकाएक सिर में रक्त बढ़ जाने से यह रोग हो जाता हैं । इस रोग से ग्रसित पशु की आँख का रंग लाल हो जाता हैं तथा मुर्छित होकर गिर पड़ता हैं । उसकी श्वास की गति बढ़ जाती हैं ।
# - औषधि - रोगी पशु के नाक व कान की फस्द खोल कर मस्तिष्क प्रदाह की चिकित्सानुसार चिकित्सा करनी चाहिए ।
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( ३२ ) - गौ- चिकत्सा - विष ( ज़हर ) का उपचार
( ३२ ) - गौ- चिकत्सा - विष ( ज़हर ) का उपचार
१ - विष ( ज़हर ) का उपचार
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पशु के शरीर मे विष कई कारणों से व्याप्त होता हैं , कभी बच्छनाग खाने से तो कभी संखिया या सींगिया खाने से अथवा कभी चरी खाने से । इनमे से प्रत्येक के लक्षण और दवाऐं अलग- अलग होती हैं । मुख्य रूप से ऐसी घटनाओं के पीछे दो प्रमुख कारण होते हैं । एक तो यह कि पशु को ज़हर दिया हो अथवा विषैली घास , कीड़े - मकोड़े आदि खा जाने या सर्प आदि ज़हरीले जन्तु द्वारा काटा जाना । दूसरा कारण - वर्षाऋतु में अचानक वर्षा रूक जाने से घास मे एक विशेष प्रकार का ज़हर पैदा हो जाना अथवा वर्षा के दिनों में ज़हरीली घासें तथा कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाना होता हैं । इन घासों अथवा कीड़े-मकोड़े को घास के धोखे मे खा जाना और पशु के शरीर मे उसका ज़हर फैल जाना तथा थोड़े समय मे ही पशु की मृत्यु हो जाती हैं । कभी- कभी सर्प के काटने से भी विष प्रभाव के कारण पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
लक्षण - यदि पशु को अधिक मात्रा मे ज़हर खिला दिया गया है , तो वह एकदम बिमार पड़ जायेगा । उसके पेट मे अचानक दर्द उठेगा और बेचैन होकर सींग तथा पैर पेट मे मारेगा और बार- बार अपनी गर्दन कोख की ओर घुमाकर देखेगा। उसके मुँह से झाग गिरने लगेगा , पेट फूलता जायेगा , प्यास बढती जायेगी तथा वह बार- बार पतला गोबर करता है फिर पतले दस्त होने लगते हैं , तदुपरान्त दस्तों के साथ ख़ून भी आने लगेगा तथा इसी बेचैनी की दशा में पशु की मृत्यु हो जायेगी ।
२ - विष- चिकित्सा
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ये तो भिन्न - भिन्न प्रकार के विषयों के लिए अलग- अलग दवाएँ हम आगे लिख रहे है किन्तु यदि आपकी समझ मे यह भी न आये कि- पशु को कौन- सा विष प्रभावित कर रहा है तो भी प्राथमिक उपचार के तौर पर सभी प्रकार के विषों के लिए कुछ दवाओं का वर्णन कर रहे है जिसके द्वारा पशु के जीवन की रक्षा की जा सकती हैं ।
१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पीसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या झरता द्वारा पिला दें ।
२ - औषधि - थोड़ी - सी चीनी पानी मे घोलकर पिलाने से भी विषैली घास आदि का विष क्षीण हो जाता हैं ।
३ - औषधि - अण्डे की सफ़ेदी पानी मे फैटकर पिलाना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
४ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को पिलाने से भी पेट का विष गुदाद्वार से बाहर निकल जाता हैं ।
५ - औषधि - पशु को जितना अधिक दूध पिला सकते है पिलाये , यदि विष तेज हो तो गाय का घी जितना अधिक पिला सकते हैं, पिलाये यह लाभप्रद होता हैं ।
६ - औषधि - डेढ़ पॉव अलसी को ४ लीटर पानी मे मन्द- मन्द आँच पर चलाते हुए पकाये और जब दलिया तैयार हो जाये तो छानकर नमक मिलाकर पशु को पिलाये ।
# - ध्यान रहे कि - जब तक पशु के पेट में दर्द रहे तब तक पीड़ित पशु को पानी बिलकुल नही देना चाहिए ।
३ - संखिया का विष ( arsenic Poisoning )
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संखिया का विष खाने के कुछ समय बाद ही पशु बेचैन हो उठता है । पशु के पेट मे दर्द व जलन सी होती हैं । पशु खाया हुआ चाका मुँह से निकालने लगता हैं । पशु को खूनीदस्त शुरू हो जाते हैं । प्यास बढ़ जाती है और जीभ सूख जाती हैं तथा आँखो मे गड्ढे पड़ने लगते हैं , पशु के मुँह से थूक बिलकुल ग़ायब हो जाता हैं । आँखे लाल हो जाती हैं । पशु का शरीर गरम रहता हैं तथा गुदामार्ग से काला ख़ून निकलने लगता हैं , और पशु को मूर्छा आ जाती हैं । पशु पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं और अन्त में श्वास तथा कण्ठ अवरूद्ध होकर पशु का शरीर ठण्डा पड़ जाता है , और पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - गाय या बकरी का गरम दूध और घी कई बार पिलायें । लाभप्रद होता हैं ।
२ - औषधि - गुलाब जल मे सफ़ेद कत्था मिलाकर पिलाना भी लाभप्रद हैं ।
३ - औषधि - केले की जड के रस मे कपूर मिलाकर पिलाना लाभप्रद हैं ।
४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।
५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।
६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।
७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।
८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।
४ - पारे का विष ( Mercury Poisoning )
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हरताल , रसकपूर आदि पारे की अपेक्षा अधिक तीव्र विष हैं । पारे का प्रभाव उग्र विषों कि भाँति तत्काल नही होता हैं , पारा खिलाये जाने से पशु का मुँह आ जाता हैं । पेट मे दर्द , दस्तों का लग जाना , पसीना अधिक आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं तथा अन्त मे बेहोश होकर मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - दूध मे देशी मुर्ग़ी के अण्डों की सफ़ेदी तथा गाय का घी मिलाकर जितना अधिक पिला सकें पिलाये । लाभप्रद होता हैं ।
२ - औषधि - जवाॅखार या सज्जी २५० मिलीग्राम को पानी मे मिलाकर पिलायें लाभदायक सिद्ध होगा ।
३ - औषधि - पेटदर्द के लिए ६ माशा अफ़ीम को माण्ड के साथ मिलाकर पिलाये ,यह लाभदायक होता हैं ।
५ - कनेर का विष
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पशु कभी- कभी कनेर के फल को खा लेता है , जिसके कारण पशु को कनेर का विष चढ़ जाता हैं । और पशु जूगाली करना बन्द कर देता हैं । पेट फूल जाता हैं । पतले दस्त आते हैं, पशु का शरीर काँपता हैं । गर्दन मे झटके आते है और नाड़ी की गति दुर्बल पड़ जाती हैं ।
१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पिसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या ढरके द्वारा पिला दें । और पशु को अण्डे और गाय का दूध व घी पिलायें यह लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं ।
६ - श्वेत घुँघुची (रत्ती ) का विष ( Acorus Poisoning )
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विष देने वाले व्यक्ति अक्सर श्वेत घुँघुची ( सफ़ेद रत्ती ) पशु को खिला देते हैं । इसके लक्षण तथा प्रभाव संखिया के विष के समान ही होते हैं । पशु थोडी देर बाद ही पशु बेचैन हो उठता हैं , पेट मे दर्द व जलन होती हैं । पशु खाया हुआ चारा मुँह से निकलने लगता हैं , ख़ूनी दस्त होते है , प्यास बढ जाती हैं और जीभ सूख जाती है और आँखो मे गड्ढे पड़ जाते हैं , मुँह मे थूक भी सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती है , पशु का शरीर गरम होता हैं , पशु को मूर्छा आ जाती हैं और वह पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं , अन्त मे श्वास व कण्ठ अवरूद्ध हो जाता हैं और शरीर ठन्डा पड़ जाता हैं ।
# - इस विष का इलाज भी संखिया की तरह ही होता है ।
१ - औषधि - गाय का गरम दूध ३ लीटर मे गाय का ही १ किलो घी मिलाकर पिलाये जिससे ज़हर आँतों को काटेगा नही और पशु के स्वास्थ्य मे लाभ होगा ।
२ - औषधि - बकरी का दूध ३ लीटर मे गाय का घी १ किलो मिलाकर गरम- गरम दूध मे मिलाकर गुनगुना ही पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - केले की जड के रस १ लीटर मे देशी कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभदायक है ।
४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।
५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।
६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।
७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।
८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।
७ - भाँग ( विजया ) व धतुरे का विष
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भाँग तथा धतुरा दोनो ही मादक व विषैले पदार्थ हैं । इनके पत्ते तंथा बीज दोनो ही ज़हरीले होते हैं । पशु प्राय: इन्हें धोखे मे खा जाते है । तो निम्नांकित लक्षण प्रकट होते हैं ।
पशु लड़खड़ा कर चलता हैं , गिर- गिर पड़ता हैं , प्यास अधिक लगती हैं , गला सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती हैं । धतुरा खाने से आँख की पुतली फैलकर चौड़ी हो जाती हैं । कभी- कभी पशु बेहोश होकर मर भी जाता हैं ।
१ - औषधि - पशु के समस्त शरीर पर और विशेषकर सिर पर लगातार ठण्डे पानी की धार ख़ूब डालें । लगभग १०० बाल्टी पानी ऊपर से डाले ताकि विष से उत्पन्न गर्मी कम हो जायें ।
२ - औषधि - बिनौलें की मींगी ( बिनौला बीज / कपास बीज ) १ किलो को गाय के दूध ३ किलो के साथ पीसछानकर दिन मे ३-४ बार पिलायें । इससे भाँग व धतुरे के विष का प्रभाव खत्म होता हैं ।
३ - औषधि - आक ( मदार ) की जड २५ ग्राम , घिसकर पानी २ लीटर पानी मे मिलाकर पिलाना हितकर होता हैं ।
४ - औषधि - चौलाई २ किलो को पीसकर , दही ४ किलो मे मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए ।
५ - औषधि - नींबू का रस २५० ग्राम , इमली का पना ५०० ग्राम , पिलाने से लाभ होता हैं ।
६ - औषधि - यदि धतुरे के विष का प्रभाव अधिक तीव्र हो तो गाय का दूध ५ किलो मे मुर्ग़ी के १० अण्डे मिलाकर रखे और फिर थोडी - थोडी देर बाद पिलाये और यदि पशु को वेदना ज़्यादा है तो पशु को १ पाँव देशी शराब पिलायें ।
८ - बच्छनाग का विष
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बच्छनाग खाने से पशु की जीभ व होंठ सूख जाते हैं और पशु हाँफने लगता हैं , पशु को मुर्छा आ जाती हैं और पशु के मुँह से तीव्र दुर्गन्ध निकलती हैं ।
१ - औषधि - बथुआ और पालक के साग ( साक ) का अर्क निकालकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - औषधि - गाय का दूध ३ लीटर या बकरी का दूध ३ लीटर गर्म दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - गाय के दूध से बने २ किलो खट्टे मट्ठे मे १०० ग्राम नींबू का रस मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - पशु के शरीर के ऊपर अधिक से अधिक ठन्डा पानी अति उत्तम रहेगा । इससे पशु को बहुत लाभ होता हैं । पशु के शरीर पर पानी का गिराना प्रत्येक विष मे लाभदायक होता हैं ।
# - पीड़ित पशु को २ दिन तक चारा खाने को न दें तथा पीने के पानी मे गुलाबजल मिलाकर देना चाहिए ।
९ - सींगिया विष
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इस विष से पीड़ित पशु के दाँत व जीभ का रंग नीला हो जाता हैं । मूर्छा छा जाती हैं , मल और मूत्र के मार्ग से रक्त बहने लगता हैं ।
१ - औषधि - गाय व बकरी का ३-३ किलो दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - गुलाबजल २५० ग्राम ,मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलायें ।
३ - औषधि - खीरा या तरबूज़ का पानी पिलाने से भी लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - ईसबगोल या बिहीदाने का लबाव ( पानी मे भिगोकर ) देना चाहिए ।
५ - औषधि - बर्फ़ के जल ३ किलो मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।
१० - अफ़ीम का विष ( Opium Poisoning )
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अफ़ीम स्वाद में कडुवी होने के कारण पशु इसे खाते- खाते उगल देता हैं । किसी भी प्रकार पशु के पेट में अफ़ीम पहुँच जाने पर पशु को मूर्छा आ जाती हैं । आँखो की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं तथा मुँह से अफ़ीम की दुर्गन्ध भी आती हैं ।
१ - औषधि - २-२ घन्टे के अन्तर से ५-६ बार पशु को - कटेरी का कुटकर निकला हुआ रस २५-२५० ग्राम की मात्रा मे पिलायें ।
२ - औषधि - हुलहुल ( सूरजमुखी ) के बीज पीसकर गाय के घी के साथ पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।
३ - औषधि - चौलाई की जड का रस ५०० ग्राम , गाय का घी १ किलो गरम करके घी को गुनगुना करके दोनो को मिलाकर पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।
४ - औषधि - १ छटाक ब्राण्डी शराब पीड़ित पशु को दें दें । यह भी अफ़ीम के प्रभाव को क्षीण कर देती हैं ।
११ - कुचले का विष ( Nux Vomica Poisoning )
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पशु को कुचला खिलाये जाने के थोडी देर बाद ही पशु को जँभाइयाँ आने लगती हैं और उसके शरीर के समस्त अंग ऐंठने लगते हैं ।हाथ- पैर मे झटके- से लगते हैं , श्वास गति तेज हो जाती हैं । अन्त मे पशु बेहोश होकर मर जाता हैं ।
१ - औषधि - अरण्डी का तैल १ किलो , पीड़ित पशु को पिला देना चाहिए ,ताकि दस्तों द्वारा शरीर के अन्दर का विष निकल जाये ।
२ - औषधि - संखिया के विष को नष्ट करने वाला पुर्व वर्णित योग कुचले के विष को दूर करने मे भी लाभदायक होता हैं ।
३ - औषधि - माजूफल या तम्बाकू १०-१० ग्राम का काढ़ा बनाकर पशु को पिलायें इस प्रयोग से भी कुचले का विष दूर हो जाता हैं ।
१२ - जमालघोटे का रस
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जमालघोटा एक अत्यन्त ही गरम तथा दस्तावर विष है । कभी- कभी किसी दवा मे , जब इसकी मात्रा अधिक पड़ जाती है तो पशु पर उसके प्रयोग से विष का प्रभाव पशु पर हो जाता हैं । इससे पशु को दस्त अधिक आते हैं , ऐंठन व जलन होती हैं , पशु घबराकर गिर पड़ता हैं और बेहोश हो जाता हैं ।
१ - औषधि - गरमपानी पिडित पशु को ख़ूब पिलायें ।
२ - औषधि - माजूफल २ तौला , अफ़ीम ४ माशा , चावलों के आधा किलो माण्ड मे मिलाकर पीड़ित पशु को पिलाये । लाभदायक होता हैं ।
१३ - औषधि - तूतीया ( नीलाथोथा ) का विष
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नीलाथोथा से पुती दिवार को चाटने से अथवा ताँबे के बर्तन मे रखी वस्तु खा लेने से पशु पर इसका इसका ज़हरीला प्रभाव होता हैं ।
१ - औषधि - साबुन, अण्डे , दूध , मीठा तेल , नमक ,तथा काँजी आदि वस्तुएँ जितनी अधिक पशु को खिला सके - खिलाये । ये सभी वस्तुएँ नीले थोथे के विष को क्षीण करती हैं ।
१४ - तेज़ाब का ज़हर ( Acid Poisoning )
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पशु कभी- कभी तेज़ाब पी जीते हैं , जिसके कारण उनके मुँह और गले ,मैदे आदि मे जलकर घाव पड़ जाते हैं और पीड़ित पशु कोई भी चीज खा- पी नही पाता हैं ।
१ - औषधि - पीड़ित पशु को चूने का पानी पिलाना लाभदायक सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - गाय के दूध मे अण्डे फैटकर पिलाना भी लाभकारी होता हैं ।
३ - औषधि - पानी मे साबुन घोलकर उसमे थोडी- सी अफ़ीम घोलकर पिलाने से भी लाभ होता हैं ।
१५ - चूना आदि क्षारों का कुप्रभाव
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१ - औषधि - चूना आदि तेज क्षार खा जाने से यदि पशु के मुँह मे घाव हो जाये तो उसे - नींबू का अर्क , इमली का पानी , काँजी अथवा ताजा कच्चा दूध पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - औषधि - मीठा तैल अथवा तिलों का तैल पिलाना भी गुणकारी होता हैं ।
३ - औषधि - जामुन का तेज़ाब पानी में मिलाकर पिलाना भी लाभकारी हैं किन्तु ध्यान रहें कि तेज़ाब बहुत थोडी मात्रा मे डालें ।
१६ - चेरी का विष ( Green Grass Poisoning)
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बरसात के मौसम में जब अचानक पानी बरसना बन्द हो जाता है और हरी- चरी छोटी होती हैं तो उसमे एक प्रकार का विष उत्पन्न हो जाता हैं । उस चरी के खा लेने से पशु के सारे शरीर में विष फैल जाता हैं । इससे पीड़ित पशु बेदम और बेहोश हो जाता हैं । इसी प्रकार - जोड़े की ऋतु मे घास या किसी प्रकार के छोटे पौधे पर एक प्रकार का कीड़ा रहता हैं । यदि पशु किसी प्रकार से उस घास को खा जाता हैं तो उसका विष उसके शरीर मे फैल जाता हैं ।
१ - औषधि - इसका तात्कालिक उपचार यह है कि - पानी से कीचड़ निकालकर पीड़ित पशु के पूरे शरीर पर लपेट देनी चाहिए ।
२ - औषधि - कालीमिर्च , सोंठ , हींग , और अजवायन , प्रत्येक १०-१० ग्राम , तथा कालानमक २० ग्राम , - इन सब वस्तुओं को लेकर बारीक पीस लें और आधा लीटर गुनगुने पानी मे मिलाकर रोगी को दिन भर मे ऐसी २ मात्राएँ पिला दें । लाभकारी होता हैं ।
३ - औषधि - एक लीटर गरम दूध में आधा किलो गाय का घी और आधी छटाक तारपीन का तैल पीड़ित पशु को भलीप्रकार पिलाकर तदुपरान्त नीचे लिखी औषधियाँ देना चाहिए ।
केले की जड का रस २५० ग्राम , कपूर १० ग्राम , इन दोनो को भलीप्रकार मिलाकर पशु को पिला दें । कपूर को पहले थोडी- सी शराब अथवा सिरके मे घोलकर केले के रस में मिला लें । यदि केले का रस न हो तो - २५० ग्राम , गुलाबजल अथवा उबले हुए जल का प्रयोग कर सकते हैं ।
# - किसी भी प्रकार के विष पीड़ित पशु को फिटकरी का पानी पिलाने से लाभ होता हैं ।
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१ - विष ( ज़हर ) का उपचार
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पशु के शरीर मे विष कई कारणों से व्याप्त होता हैं , कभी बच्छनाग खाने से तो कभी संखिया या सींगिया खाने से अथवा कभी चरी खाने से । इनमे से प्रत्येक के लक्षण और दवाऐं अलग- अलग होती हैं । मुख्य रूप से ऐसी घटनाओं के पीछे दो प्रमुख कारण होते हैं । एक तो यह कि पशु को ज़हर दिया हो अथवा विषैली घास , कीड़े - मकोड़े आदि खा जाने या सर्प आदि ज़हरीले जन्तु द्वारा काटा जाना । दूसरा कारण - वर्षाऋतु में अचानक वर्षा रूक जाने से घास मे एक विशेष प्रकार का ज़हर पैदा हो जाना अथवा वर्षा के दिनों में ज़हरीली घासें तथा कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाना होता हैं । इन घासों अथवा कीड़े-मकोड़े को घास के धोखे मे खा जाना और पशु के शरीर मे उसका ज़हर फैल जाना तथा थोड़े समय मे ही पशु की मृत्यु हो जाती हैं । कभी- कभी सर्प के काटने से भी विष प्रभाव के कारण पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
लक्षण - यदि पशु को अधिक मात्रा मे ज़हर खिला दिया गया है , तो वह एकदम बिमार पड़ जायेगा । उसके पेट मे अचानक दर्द उठेगा और बेचैन होकर सींग तथा पैर पेट मे मारेगा और बार- बार अपनी गर्दन कोख की ओर घुमाकर देखेगा। उसके मुँह से झाग गिरने लगेगा , पेट फूलता जायेगा , प्यास बढती जायेगी तथा वह बार- बार पतला गोबर करता है फिर पतले दस्त होने लगते हैं , तदुपरान्त दस्तों के साथ ख़ून भी आने लगेगा तथा इसी बेचैनी की दशा में पशु की मृत्यु हो जायेगी ।
२ - विष- चिकित्सा
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ये तो भिन्न - भिन्न प्रकार के विषयों के लिए अलग- अलग दवाएँ हम आगे लिख रहे है किन्तु यदि आपकी समझ मे यह भी न आये कि- पशु को कौन- सा विष प्रभावित कर रहा है तो भी प्राथमिक उपचार के तौर पर सभी प्रकार के विषों के लिए कुछ दवाओं का वर्णन कर रहे है जिसके द्वारा पशु के जीवन की रक्षा की जा सकती हैं ।
१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पीसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या झरता द्वारा पिला दें ।
२ - औषधि - थोड़ी - सी चीनी पानी मे घोलकर पिलाने से भी विषैली घास आदि का विष क्षीण हो जाता हैं ।
३ - औषधि - अण्डे की सफ़ेदी पानी मे फैटकर पिलाना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
४ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को पिलाने से भी पेट का विष गुदाद्वार से बाहर निकल जाता हैं ।
५ - औषधि - पशु को जितना अधिक दूध पिला सकते है पिलाये , यदि विष तेज हो तो गाय का घी जितना अधिक पिला सकते हैं, पिलाये यह लाभप्रद होता हैं ।
६ - औषधि - डेढ़ पॉव अलसी को ४ लीटर पानी मे मन्द- मन्द आँच पर चलाते हुए पकाये और जब दलिया तैयार हो जाये तो छानकर नमक मिलाकर पशु को पिलाये ।
# - ध्यान रहे कि - जब तक पशु के पेट में दर्द रहे तब तक पीड़ित पशु को पानी बिलकुल नही देना चाहिए ।
३ - संखिया का विष ( arsenic Poisoning )
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संखिया का विष खाने के कुछ समय बाद ही पशु बेचैन हो उठता है । पशु के पेट मे दर्द व जलन सी होती हैं । पशु खाया हुआ चाका मुँह से निकालने लगता हैं । पशु को खूनीदस्त शुरू हो जाते हैं । प्यास बढ़ जाती है और जीभ सूख जाती हैं तथा आँखो मे गड्ढे पड़ने लगते हैं , पशु के मुँह से थूक बिलकुल ग़ायब हो जाता हैं । आँखे लाल हो जाती हैं । पशु का शरीर गरम रहता हैं तथा गुदामार्ग से काला ख़ून निकलने लगता हैं , और पशु को मूर्छा आ जाती हैं । पशु पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं और अन्त में श्वास तथा कण्ठ अवरूद्ध होकर पशु का शरीर ठण्डा पड़ जाता है , और पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - गाय या बकरी का गरम दूध और घी कई बार पिलायें । लाभप्रद होता हैं ।
२ - औषधि - गुलाब जल मे सफ़ेद कत्था मिलाकर पिलाना भी लाभप्रद हैं ।
३ - औषधि - केले की जड के रस मे कपूर मिलाकर पिलाना लाभप्रद हैं ।
४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।
५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।
६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।
७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।
८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।
४ - पारे का विष ( Mercury Poisoning )
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हरताल , रसकपूर आदि पारे की अपेक्षा अधिक तीव्र विष हैं । पारे का प्रभाव उग्र विषों कि भाँति तत्काल नही होता हैं , पारा खिलाये जाने से पशु का मुँह आ जाता हैं । पेट मे दर्द , दस्तों का लग जाना , पसीना अधिक आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं तथा अन्त मे बेहोश होकर मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - दूध मे देशी मुर्ग़ी के अण्डों की सफ़ेदी तथा गाय का घी मिलाकर जितना अधिक पिला सकें पिलाये । लाभप्रद होता हैं ।
२ - औषधि - जवाॅखार या सज्जी २५० मिलीग्राम को पानी मे मिलाकर पिलायें लाभदायक सिद्ध होगा ।
३ - औषधि - पेटदर्द के लिए ६ माशा अफ़ीम को माण्ड के साथ मिलाकर पिलाये ,यह लाभदायक होता हैं ।
५ - कनेर का विष
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पशु कभी- कभी कनेर के फल को खा लेता है , जिसके कारण पशु को कनेर का विष चढ़ जाता हैं । और पशु जूगाली करना बन्द कर देता हैं । पेट फूल जाता हैं । पतले दस्त आते हैं, पशु का शरीर काँपता हैं । गर्दन मे झटके आते है और नाड़ी की गति दुर्बल पड़ जाती हैं ।
१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पिसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या ढरके द्वारा पिला दें । और पशु को अण्डे और गाय का दूध व घी पिलायें यह लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं ।
६ - श्वेत घुँघुची (रत्ती ) का विष ( Acorus Poisoning )
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विष देने वाले व्यक्ति अक्सर श्वेत घुँघुची ( सफ़ेद रत्ती ) पशु को खिला देते हैं । इसके लक्षण तथा प्रभाव संखिया के विष के समान ही होते हैं । पशु थोडी देर बाद ही पशु बेचैन हो उठता हैं , पेट मे दर्द व जलन होती हैं । पशु खाया हुआ चारा मुँह से निकलने लगता हैं , ख़ूनी दस्त होते है , प्यास बढ जाती हैं और जीभ सूख जाती है और आँखो मे गड्ढे पड़ जाते हैं , मुँह मे थूक भी सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती है , पशु का शरीर गरम होता हैं , पशु को मूर्छा आ जाती हैं और वह पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं , अन्त मे श्वास व कण्ठ अवरूद्ध हो जाता हैं और शरीर ठन्डा पड़ जाता हैं ।
# - इस विष का इलाज भी संखिया की तरह ही होता है ।
१ - औषधि - गाय का गरम दूध ३ लीटर मे गाय का ही १ किलो घी मिलाकर पिलाये जिससे ज़हर आँतों को काटेगा नही और पशु के स्वास्थ्य मे लाभ होगा ।
२ - औषधि - बकरी का दूध ३ लीटर मे गाय का घी १ किलो मिलाकर गरम- गरम दूध मे मिलाकर गुनगुना ही पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - केले की जड के रस १ लीटर मे देशी कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभदायक है ।
४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।
५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।
६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।
७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।
८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।
७ - भाँग ( विजया ) व धतुरे का विष
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भाँग तथा धतुरा दोनो ही मादक व विषैले पदार्थ हैं । इनके पत्ते तंथा बीज दोनो ही ज़हरीले होते हैं । पशु प्राय: इन्हें धोखे मे खा जाते है । तो निम्नांकित लक्षण प्रकट होते हैं ।
पशु लड़खड़ा कर चलता हैं , गिर- गिर पड़ता हैं , प्यास अधिक लगती हैं , गला सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती हैं । धतुरा खाने से आँख की पुतली फैलकर चौड़ी हो जाती हैं । कभी- कभी पशु बेहोश होकर मर भी जाता हैं ।
१ - औषधि - पशु के समस्त शरीर पर और विशेषकर सिर पर लगातार ठण्डे पानी की धार ख़ूब डालें । लगभग १०० बाल्टी पानी ऊपर से डाले ताकि विष से उत्पन्न गर्मी कम हो जायें ।
२ - औषधि - बिनौलें की मींगी ( बिनौला बीज / कपास बीज ) १ किलो को गाय के दूध ३ किलो के साथ पीसछानकर दिन मे ३-४ बार पिलायें । इससे भाँग व धतुरे के विष का प्रभाव खत्म होता हैं ।
३ - औषधि - आक ( मदार ) की जड २५ ग्राम , घिसकर पानी २ लीटर पानी मे मिलाकर पिलाना हितकर होता हैं ।
४ - औषधि - चौलाई २ किलो को पीसकर , दही ४ किलो मे मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए ।
५ - औषधि - नींबू का रस २५० ग्राम , इमली का पना ५०० ग्राम , पिलाने से लाभ होता हैं ।
६ - औषधि - यदि धतुरे के विष का प्रभाव अधिक तीव्र हो तो गाय का दूध ५ किलो मे मुर्ग़ी के १० अण्डे मिलाकर रखे और फिर थोडी - थोडी देर बाद पिलाये और यदि पशु को वेदना ज़्यादा है तो पशु को १ पाँव देशी शराब पिलायें ।
८ - बच्छनाग का विष
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बच्छनाग खाने से पशु की जीभ व होंठ सूख जाते हैं और पशु हाँफने लगता हैं , पशु को मुर्छा आ जाती हैं और पशु के मुँह से तीव्र दुर्गन्ध निकलती हैं ।
१ - औषधि - बथुआ और पालक के साग ( साक ) का अर्क निकालकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - औषधि - गाय का दूध ३ लीटर या बकरी का दूध ३ लीटर गर्म दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - गाय के दूध से बने २ किलो खट्टे मट्ठे मे १०० ग्राम नींबू का रस मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - पशु के शरीर के ऊपर अधिक से अधिक ठन्डा पानी अति उत्तम रहेगा । इससे पशु को बहुत लाभ होता हैं । पशु के शरीर पर पानी का गिराना प्रत्येक विष मे लाभदायक होता हैं ।
# - पीड़ित पशु को २ दिन तक चारा खाने को न दें तथा पीने के पानी मे गुलाबजल मिलाकर देना चाहिए ।
९ - सींगिया विष
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इस विष से पीड़ित पशु के दाँत व जीभ का रंग नीला हो जाता हैं । मूर्छा छा जाती हैं , मल और मूत्र के मार्ग से रक्त बहने लगता हैं ।
१ - औषधि - गाय व बकरी का ३-३ किलो दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - गुलाबजल २५० ग्राम ,मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलायें ।
३ - औषधि - खीरा या तरबूज़ का पानी पिलाने से भी लाभ होता हैं ।
४ - औषधि - ईसबगोल या बिहीदाने का लबाव ( पानी मे भिगोकर ) देना चाहिए ।
५ - औषधि - बर्फ़ के जल ३ किलो मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।
१० - अफ़ीम का विष ( Opium Poisoning )
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अफ़ीम स्वाद में कडुवी होने के कारण पशु इसे खाते- खाते उगल देता हैं । किसी भी प्रकार पशु के पेट में अफ़ीम पहुँच जाने पर पशु को मूर्छा आ जाती हैं । आँखो की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं तथा मुँह से अफ़ीम की दुर्गन्ध भी आती हैं ।
१ - औषधि - २-२ घन्टे के अन्तर से ५-६ बार पशु को - कटेरी का कुटकर निकला हुआ रस २५-२५० ग्राम की मात्रा मे पिलायें ।
२ - औषधि - हुलहुल ( सूरजमुखी ) के बीज पीसकर गाय के घी के साथ पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।
३ - औषधि - चौलाई की जड का रस ५०० ग्राम , गाय का घी १ किलो गरम करके घी को गुनगुना करके दोनो को मिलाकर पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।
४ - औषधि - १ छटाक ब्राण्डी शराब पीड़ित पशु को दें दें । यह भी अफ़ीम के प्रभाव को क्षीण कर देती हैं ।
११ - कुचले का विष ( Nux Vomica Poisoning )
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पशु को कुचला खिलाये जाने के थोडी देर बाद ही पशु को जँभाइयाँ आने लगती हैं और उसके शरीर के समस्त अंग ऐंठने लगते हैं ।हाथ- पैर मे झटके- से लगते हैं , श्वास गति तेज हो जाती हैं । अन्त मे पशु बेहोश होकर मर जाता हैं ।
१ - औषधि - अरण्डी का तैल १ किलो , पीड़ित पशु को पिला देना चाहिए ,ताकि दस्तों द्वारा शरीर के अन्दर का विष निकल जाये ।
२ - औषधि - संखिया के विष को नष्ट करने वाला पुर्व वर्णित योग कुचले के विष को दूर करने मे भी लाभदायक होता हैं ।
३ - औषधि - माजूफल या तम्बाकू १०-१० ग्राम का काढ़ा बनाकर पशु को पिलायें इस प्रयोग से भी कुचले का विष दूर हो जाता हैं ।
१२ - जमालघोटे का रस
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जमालघोटा एक अत्यन्त ही गरम तथा दस्तावर विष है । कभी- कभी किसी दवा मे , जब इसकी मात्रा अधिक पड़ जाती है तो पशु पर उसके प्रयोग से विष का प्रभाव पशु पर हो जाता हैं । इससे पशु को दस्त अधिक आते हैं , ऐंठन व जलन होती हैं , पशु घबराकर गिर पड़ता हैं और बेहोश हो जाता हैं ।
१ - औषधि - गरमपानी पिडित पशु को ख़ूब पिलायें ।
२ - औषधि - माजूफल २ तौला , अफ़ीम ४ माशा , चावलों के आधा किलो माण्ड मे मिलाकर पीड़ित पशु को पिलाये । लाभदायक होता हैं ।
१३ - औषधि - तूतीया ( नीलाथोथा ) का विष
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नीलाथोथा से पुती दिवार को चाटने से अथवा ताँबे के बर्तन मे रखी वस्तु खा लेने से पशु पर इसका इसका ज़हरीला प्रभाव होता हैं ।
१ - औषधि - साबुन, अण्डे , दूध , मीठा तेल , नमक ,तथा काँजी आदि वस्तुएँ जितनी अधिक पशु को खिला सके - खिलाये । ये सभी वस्तुएँ नीले थोथे के विष को क्षीण करती हैं ।
१४ - तेज़ाब का ज़हर ( Acid Poisoning )
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पशु कभी- कभी तेज़ाब पी जीते हैं , जिसके कारण उनके मुँह और गले ,मैदे आदि मे जलकर घाव पड़ जाते हैं और पीड़ित पशु कोई भी चीज खा- पी नही पाता हैं ।
१ - औषधि - पीड़ित पशु को चूने का पानी पिलाना लाभदायक सिद्ध होता हैं ।
२ - औषधि - गाय के दूध मे अण्डे फैटकर पिलाना भी लाभकारी होता हैं ।
३ - औषधि - पानी मे साबुन घोलकर उसमे थोडी- सी अफ़ीम घोलकर पिलाने से भी लाभ होता हैं ।
१५ - चूना आदि क्षारों का कुप्रभाव
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१ - औषधि - चूना आदि तेज क्षार खा जाने से यदि पशु के मुँह मे घाव हो जाये तो उसे - नींबू का अर्क , इमली का पानी , काँजी अथवा ताजा कच्चा दूध पिलाना लाभकारी होता हैं ।
२ - औषधि - मीठा तैल अथवा तिलों का तैल पिलाना भी गुणकारी होता हैं ।
३ - औषधि - जामुन का तेज़ाब पानी में मिलाकर पिलाना भी लाभकारी हैं किन्तु ध्यान रहें कि तेज़ाब बहुत थोडी मात्रा मे डालें ।
१६ - चेरी का विष ( Green Grass Poisoning)
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बरसात के मौसम में जब अचानक पानी बरसना बन्द हो जाता है और हरी- चरी छोटी होती हैं तो उसमे एक प्रकार का विष उत्पन्न हो जाता हैं । उस चरी के खा लेने से पशु के सारे शरीर में विष फैल जाता हैं । इससे पीड़ित पशु बेदम और बेहोश हो जाता हैं । इसी प्रकार - जोड़े की ऋतु मे घास या किसी प्रकार के छोटे पौधे पर एक प्रकार का कीड़ा रहता हैं । यदि पशु किसी प्रकार से उस घास को खा जाता हैं तो उसका विष उसके शरीर मे फैल जाता हैं ।
१ - औषधि - इसका तात्कालिक उपचार यह है कि - पानी से कीचड़ निकालकर पीड़ित पशु के पूरे शरीर पर लपेट देनी चाहिए ।
२ - औषधि - कालीमिर्च , सोंठ , हींग , और अजवायन , प्रत्येक १०-१० ग्राम , तथा कालानमक २० ग्राम , - इन सब वस्तुओं को लेकर बारीक पीस लें और आधा लीटर गुनगुने पानी मे मिलाकर रोगी को दिन भर मे ऐसी २ मात्राएँ पिला दें । लाभकारी होता हैं ।
३ - औषधि - एक लीटर गरम दूध में आधा किलो गाय का घी और आधी छटाक तारपीन का तैल पीड़ित पशु को भलीप्रकार पिलाकर तदुपरान्त नीचे लिखी औषधियाँ देना चाहिए ।
केले की जड का रस २५० ग्राम , कपूर १० ग्राम , इन दोनो को भलीप्रकार मिलाकर पशु को पिला दें । कपूर को पहले थोडी- सी शराब अथवा सिरके मे घोलकर केले के रस में मिला लें । यदि केले का रस न हो तो - २५० ग्राम , गुलाबजल अथवा उबले हुए जल का प्रयोग कर सकते हैं ।
# - किसी भी प्रकार के विष पीड़ित पशु को फिटकरी का पानी पिलाने से लाभ होता हैं ।
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(३६)- गौ - चिकित्सा . सर्पदंश व कुत्ते या बन्दर की
(३६)- गौ - चिकित्सा . सर्पदंश व कुत्ते या बन्दर कीट द्वारा काटने पर। .
...............अन्य प्राणियों के काटने पर चिकित्सा ..................
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१ - सर्पदंश (दीवड़ साँप के काटने पर )
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कारण व लक्षण - साँप के काटने पर रोगी पशु के शरीर में विष फैल जाता है । सूजन पहले मुँह की तरफ़ से शुरू होती है । शरीर पर चिट्टे पड़ जाते है । उनमें से कभी - कभी रक्त या पानी निकलता है । पूँछ के बाल उखड़ जाते हैं ।मुँह से लार गिरती है। लहर आती है । पशु गिर पड़ता हैं ।
१ - औषधि - छाया में सुखायी हुई शिवलिंगी २४० ग्राम , पानी १ लीटर , सुखी शिवलिंगी को महीन कूटपीसकर , पानी में मिलाकर , रोगी पशु को दिन में ३ तीन बार पिलायें । इसके बाद , नीचे लिखी दवावाले पानी से उसे नहलाया जाय । सुखी शिवलिंगी २ किलोग्राम , १५ लीटर पानी , सुखी शिवलिंगी को कूट- पीसकर , पानी में उबालकर , रोगी पशु को नहलाया जाय।इससे उस आराम मिलता है ।
२ - औषधि - गीली ( हरी ) शिवलिंगी १८० ग्राम , पानी १ लीटर , गीली शिवलिंगी को कूटपीसकर , पानी में मिलाकर पिलायें । इस दवा को ४-४ घन्टे पर पिलाते रहना चाहिए। तथा गीली शिवलिंगी २ किलोग्राम पानी १५ लीटर शिवलिंगी को कूट- पीसकर , पानी में उबाला जाय और सूजे स्थान को ख़ूब रगड़कर धोया जाय और गुनगुने पानी से रोगी पशु को नहलाया जायँ ।
३ - औषधि - गूलर की छाल २४० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ९६० ग्राम , छाल को महीन कूटपीसकर , छाछ में मिलाकर ,१० मिनट तक लगायें । फिर निचोड़कर रोगी पशु को ४-४ घन्टे बाद , आराम होने तक , पिलाया जायँ ।
४ - औषधि - रोगी के रोग स्थान तत्काल गरम करके लाल लोहे से दाग लगाकर घाव केबाहर का सारा माँस जला देना चाहिए । जिससे विषैला माँस जलकर ज़हर फैलने से रुके और खाने की दवाईयाँ उसके बाद देवें ।
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२ - साँप का काटना
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कारण व लक्षण - साँप के काटने पर पशु के शरीर में विष फैल जाता है । उसके पैर लड़खड़ाते है । वह सुस्त रहता है । पशु के शरीर मे कम्पन व शिथिलता आती हैं,आरम्भ मे नाड़ी की गति तेज हो जाती हैं ।पशु के मुँह से विषमिश्रित झाग निकलने लगता हैं । आँखे पथरा जाती हैं और पशु का सारा शरीर काला पड़ जाता हैं आँख हरे रंग की होने लगती हैं ।पूँछ के बाल खींचने पर उखड़ जाते हैं । उसे लहरें आती हैं ।दो - तीन दिन लहरों में रोगी पशु मर जाता है ।
१ - औषधि - सफ़ेद शिरस । की अन्तरछाल ६० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , कालीमिर्च २४ ग्राम , जड़ की अन्तरछाल को महीन पीसकर , कपड़े द्वारा रस निकालकर , कालीमिर्च को पीसकर गुनगुने घी में सबको मिलाकर रोगी पशु को सुबह- सायं , आराम होने तक पिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - साँप के काटे हुए स्थान पर दागनी द्वारा लाल करके दाग लगाना चाहिए, जिससे विषैला माँस जल जायेगा । और अपामार्ग ( चिरचिटा ) की हरी छाल व सफ़ेद शिरस की अन्तरछाल के रस बराबर मात्रा में मिलाकर पिलाने से ठीक होगा ।
३ - औषधि - सर्वप्रथम पशु को जिस स्थान पर साँप ने काटा हो , उसके ऊपर थोड़ा रस्सी , सूतली अथवा किसी अन्य चींज से कसकर बाँध देना ( बन्द लगाना ) चाहिए । ताकि ख़ून का प्रवाह शरीर मे आगे जाने से रूक जाये और विष ऊपर न चढ़ सकें ।
४ - औषधि - जिस स्थान पर साँप ने काटा हो , वहाँ पर तेज चाक़ू या छुरी आदि से चीरकर ख़ून निकाल देना चाहिए । काला- काला विषयुक्त ख़ून निकल जाने के बाद उस स्थान में लाल दवा ( पोटेशियम परमैग्नेट ) भर देनी चाहिए । यदि लाल दवा तत्काल उपलब्ध न हो तो - नौसादर तथा आक का दूध मिलाकर भर देना चाहिए और जब तक विष पूरी तरह न निकल जाये , उसे बराबर भरते ही रहना चाहिए ।
५ - औषधि - हुक्के के नीचे का मैल ६ माशा , गुड १० ग्राम , और हुक्के का बासी पानी २५० ग्राम , लें । इन सबका घोल तैयार करके पीड़ित पशु को नाल द्वारा पिला देना चाहिए ।
६ - औषधि - स्प्रिट आफ अमोनिया पशु को पिलाये । इससे हृदय को शक्ति मिलती हैं तथा विष का प्रभाव भी क्षीण होता हैं । इस दवा को काटे हुये स्थान पर लगाना भी चाहिए ।
# - सर्प के काटे हुए पशु को कदापि सोने नही देना चाहिए , यदि उसे नींद आये भी तो उसको कील चुभोकर अथवा डण्डे से छेड़कर या अन्य किन्हीं उपायों के द्वारा लगातार जगायें रखना चाहिए तथा उपरोक्त उपचारादि करते रहना चाहिए । इस प्रकार के अथक प्रयासों और ईश्वर की अनुकम्पा से सर्पदंश पशु के प्राण बचने की आशा की जाती है ।
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३ - पशु द्वारा साँप की केंचुली खा जाना
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कारण व लक्षण - कभी - कभी हरी घास , सूखी घास - दाने आदि में सर्प की केंचुली गिरी होती है । पशु चारे के साथ उसे भी खा जाते हैं । ऐसे रोग में पशु को दस्त लगते है । दस्तों में बहुत बुरी गन्ध आती है । अन्य दवा देने पर भी इस रोग के दस्त बन्द नहीं होते । पशु दिनोंदिन अधिक कमज़ोर होता जाता है ।
१ - औषधि - कालीमिर्च ३० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , मिर्च को महीन पीसकर , घी में मिलाकर , गुनगुना करके , रोगी को बोतल से रोज़ सुबह , आराम होने तक , पिलाया जाय ।
२ - औषधि - लालमिर्च २४ ग्राम , सेंधानमक ७२ ग्राम , गुड १८० ग्राम , सबको बारीक पीसकर , गुड मिलाकर , रोगी पशु को दिन में दो बार , उक्त मात्रा में आराम होने तक , पिलाया जाय ।
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४ - पागल कुत्ते या गीदड़ व बन्दर के द्वारा काटने पर
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कारण व लक्षण - कुत्ता व बन्दर, गीदड़ पागल हो जाने पर वह दूसरे पशु को काट लेते है । इससे मुँह में लार टपकती है और पूँछ सीधी हो जाती है । ऐसा पशु पानी से दूर भागता है वह पानी की आवाज़ से भी डरता है । और पशु के द्वारा अन्य पशु को काट लेने पर या इसकी लार लग जाने पर वह पशु भी रोगी हो जाता है । तथा दूसरा पशु संक्रमित होने के तीन दिन से छ: माह के भीतर कभी भी पागल हो जाता है अधिकतर रोगी तीन दिन के अन्दर मर जाते है । पागल होने के बाद पशु जिस प्राणी के द्वारा काटा जाता है वह उसी की आवाज़ में चिल्लाता है।
१ - औषधि - सबसे पहले पशु के काँटे हुए स्थान पर तत्काल लोहे को लाल करके उस स्थान को अच्छी तरह से जलाभून देना चाहिए ,जिससे उसका ज़हर का असर तुरन्त ख़त्म हो जाये । और पशु को टीके लगवा देने चाहिए ।
२ - औषधि - हज़ारी गेन्दा का फूल १ नग , पानी २४० ग्राम , फूल को बारीक कूटपीसकर पानी में घोलकर , रोगी पशु को बिना छाने ही , तीन दिन तक , दोनों समय पिलाना चाहिए । ८ दिन तक रोज़ यह दवा पिलाते रहना चाहिए ।
३ - औषधि - लालमिर्च के बीज १० ग्राम ,गाय का घी १०० ग्राम , नमक १० ग्राम , मिर्च के बीजों को पीसकर व नमक को लेकर घी में मिलाकर मरहम बनाकर दोनों समय , ठीक होने तक लगाये ।
५ - मधुमक्खियों व तैतया ,बर्रे के द्वारा काँटे जाने पर
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कारण व लक्षण - मधुमक्खियों व तैतया व बर्रे आदि कीट द्वारा काटने पर पशु चरते समय व खुजली करते समय पशु के शरीर में किसी कीट द्वारा डंक मारने के कारण सूजन आ जाती है ।
१ - औषंधि - ऐसे काँटे हुए स्थान से डंक निकाल देना चाहिए ,और फिर गँवारपाठा ( घृतकुमारी ) के गूद्दे को निकालकर , रोगी पशु के काँटे हुए स्थान पर सुबह - सायं लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - गाय का घी २४० ग्राम , मिश्री १२० ग्राम , मिश्री को महीन पीसकर , घी में मिलाकर , रोगी पशु को दो समय , पिलाया जाय । मिश्री के स्थान पर शक्कर या गुड़ का भी प्रयोग किया जा सकता है ।
३ - नींबू का रस २४० ग्राम , शक्कर १२० ग्राम , दोनों को मिलाकर , छानकर रोगी पशु को दोनों समय , पिलाना चाहिए ।
४ - औषधि - प्याज़ का रस लगाने से भी आराम होता है , तथा आधा टी कप प्याज़ का रस पशु को पिलाना चाहिए इससे भी पशु को आराम आता है ।
५ - औषधि - जिस स्थान पर डंक मारा हो , उस स्थान पर लालदवा और पिसी हुई टाटरी मिलाकर रख देवी चाहिए तथा ऊपर से १-२ बूँद ताजा पानी टपका देना चाहिए । इस प्रयोग से ही जलन दूर होकर लाभ हो जाता हैं ।
६ - औषधि - नौसादर तथा चूना मिलाकर जहाँ डंक लगा हो उस स्थान पर लगा देने से भी तत्काल ठन्डक पड़ जाती है । इसके स्थान पर "अमोनिया फोर्ट" को भी लगा सकते हैं
७ - औषधि - जमालघोटा की गिरी नींबू के रस मे घीसकर लगा देने से इनके विष का प्रभाव नष्ट होकर आराम आ जाता हैं ।
७ - औषधि - आक की जड , लटजीरा ( अपामार्ग ) की जड , मीठा तेलिया - इन तीनों मे से जो भी वस्तु तत्काल उपलब्ध हो जाये , उसे पत्थर पर घिसकर लेप कर देने से भी शीघ्र आराम पहुँचता हैं ।
६ - शेर के हमले में पशु घायल होने पर
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कारण व लक्षण - कभी - जगंल में पशु पर शेर हमला कर देता है आैर वह घायल हो जाता है । शेर पँजे व दाँतों का पशु के शरीर पर बूरा प्रभाव पड़ता है । पँजे के घाव में सूजन आ जाती है तथा दाँतों के घाव मे पस ( मवाद ) भी पड़ जाते है जिसके कारण पशु को बड़ी पीड़ा का सामना करना पड़ता है ।
१ - औषधि - हल्दी पावडर १० ग्राम , फिटकरी पावडर १० ग्राम , नीम की पत्ती का पेस्ट ५० ग्राम , गेन्दा की पत्ती का पेस्ट ५० ग्राम , नमक ६ ग्राम , सभी को मिलाकर मरहम बना लें और घावों पर दोनों समय आराम होने तक लगायें ।
२ - औषधि - गाय का घी २०० ग्राम , गेन्दा की पत्तियों का रस २०० ग्राम , नीम की पत्तियों का रस २०० ग्राम ,कच्ची हल्दी का रस १०० ग्राम , नारियल रेशे की राख ५० ग्राम , दूबघास ( दूर्वा ) का रस १०० ग्राम , फिटकरी पावडर ५० ग्राम , सादा नमक १० ग्राम , लालमिर्च के बीज ८ ग्राम , सभी को कढ़ाई में पकाकर जब पानी जल जाय और घी शेष रह जाय तो कढ़ाई को उतारकर उसमें नारियल के रेशे की राखँ को मिक्स करके मरहम बना लेवें , रोगी पशु को सुबह - सायं आराम होने तक लगाये ।
३ - औषधि - मक्का का आटा १२० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , आटे को छानकर पानी में मिलाकर ख़ूब पकाना चाहिए । गाढ़ा होने पर उतार लेना चाहिए तथा गुनगुना होने पर पशु के ज़ख़्म पर लेप लगाना चाहिए । फिर रूई रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए । और ऊपर से गरम पानी थोड़ी - थोड़ी देर बाद डालते रहना चाहिए । यह क्रिया अच्छे होने तक दोनों समय तक करनी चाहिए । इससे घाव नही पकेगा और पशु को आराम आयेगा ।
# - रोगी पशु यदि चारा न खा पा रहा हो तो उसे नाल या बोतल से चावल का माँड़ या ज्वार का आटा पकाकर पतला - पतला करके पिला देना चाहिए ।
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...............अन्य प्राणियों के काटने पर चिकित्सा ..................
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१ - सर्पदंश (दीवड़ साँप के काटने पर )
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कारण व लक्षण - साँप के काटने पर रोगी पशु के शरीर में विष फैल जाता है । सूजन पहले मुँह की तरफ़ से शुरू होती है । शरीर पर चिट्टे पड़ जाते है । उनमें से कभी - कभी रक्त या पानी निकलता है । पूँछ के बाल उखड़ जाते हैं ।मुँह से लार गिरती है। लहर आती है । पशु गिर पड़ता हैं ।
१ - औषधि - छाया में सुखायी हुई शिवलिंगी २४० ग्राम , पानी १ लीटर , सुखी शिवलिंगी को महीन कूटपीसकर , पानी में मिलाकर , रोगी पशु को दिन में ३ तीन बार पिलायें । इसके बाद , नीचे लिखी दवावाले पानी से उसे नहलाया जाय । सुखी शिवलिंगी २ किलोग्राम , १५ लीटर पानी , सुखी शिवलिंगी को कूट- पीसकर , पानी में उबालकर , रोगी पशु को नहलाया जाय।इससे उस आराम मिलता है ।
२ - औषधि - गीली ( हरी ) शिवलिंगी १८० ग्राम , पानी १ लीटर , गीली शिवलिंगी को कूटपीसकर , पानी में मिलाकर पिलायें । इस दवा को ४-४ घन्टे पर पिलाते रहना चाहिए। तथा गीली शिवलिंगी २ किलोग्राम पानी १५ लीटर शिवलिंगी को कूट- पीसकर , पानी में उबाला जाय और सूजे स्थान को ख़ूब रगड़कर धोया जाय और गुनगुने पानी से रोगी पशु को नहलाया जायँ ।
३ - औषधि - गूलर की छाल २४० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ९६० ग्राम , छाल को महीन कूटपीसकर , छाछ में मिलाकर ,१० मिनट तक लगायें । फिर निचोड़कर रोगी पशु को ४-४ घन्टे बाद , आराम होने तक , पिलाया जायँ ।
४ - औषधि - रोगी के रोग स्थान तत्काल गरम करके लाल लोहे से दाग लगाकर घाव केबाहर का सारा माँस जला देना चाहिए । जिससे विषैला माँस जलकर ज़हर फैलने से रुके और खाने की दवाईयाँ उसके बाद देवें ।
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२ - साँप का काटना
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कारण व लक्षण - साँप के काटने पर पशु के शरीर में विष फैल जाता है । उसके पैर लड़खड़ाते है । वह सुस्त रहता है । पशु के शरीर मे कम्पन व शिथिलता आती हैं,आरम्भ मे नाड़ी की गति तेज हो जाती हैं ।पशु के मुँह से विषमिश्रित झाग निकलने लगता हैं । आँखे पथरा जाती हैं और पशु का सारा शरीर काला पड़ जाता हैं आँख हरे रंग की होने लगती हैं ।पूँछ के बाल खींचने पर उखड़ जाते हैं । उसे लहरें आती हैं ।दो - तीन दिन लहरों में रोगी पशु मर जाता है ।
१ - औषधि - सफ़ेद शिरस । की अन्तरछाल ६० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , कालीमिर्च २४ ग्राम , जड़ की अन्तरछाल को महीन पीसकर , कपड़े द्वारा रस निकालकर , कालीमिर्च को पीसकर गुनगुने घी में सबको मिलाकर रोगी पशु को सुबह- सायं , आराम होने तक पिलाना चाहिए ।
२ - औषधि - साँप के काटे हुए स्थान पर दागनी द्वारा लाल करके दाग लगाना चाहिए, जिससे विषैला माँस जल जायेगा । और अपामार्ग ( चिरचिटा ) की हरी छाल व सफ़ेद शिरस की अन्तरछाल के रस बराबर मात्रा में मिलाकर पिलाने से ठीक होगा ।
३ - औषधि - सर्वप्रथम पशु को जिस स्थान पर साँप ने काटा हो , उसके ऊपर थोड़ा रस्सी , सूतली अथवा किसी अन्य चींज से कसकर बाँध देना ( बन्द लगाना ) चाहिए । ताकि ख़ून का प्रवाह शरीर मे आगे जाने से रूक जाये और विष ऊपर न चढ़ सकें ।
४ - औषधि - जिस स्थान पर साँप ने काटा हो , वहाँ पर तेज चाक़ू या छुरी आदि से चीरकर ख़ून निकाल देना चाहिए । काला- काला विषयुक्त ख़ून निकल जाने के बाद उस स्थान में लाल दवा ( पोटेशियम परमैग्नेट ) भर देनी चाहिए । यदि लाल दवा तत्काल उपलब्ध न हो तो - नौसादर तथा आक का दूध मिलाकर भर देना चाहिए और जब तक विष पूरी तरह न निकल जाये , उसे बराबर भरते ही रहना चाहिए ।
५ - औषधि - हुक्के के नीचे का मैल ६ माशा , गुड १० ग्राम , और हुक्के का बासी पानी २५० ग्राम , लें । इन सबका घोल तैयार करके पीड़ित पशु को नाल द्वारा पिला देना चाहिए ।
६ - औषधि - स्प्रिट आफ अमोनिया पशु को पिलाये । इससे हृदय को शक्ति मिलती हैं तथा विष का प्रभाव भी क्षीण होता हैं । इस दवा को काटे हुये स्थान पर लगाना भी चाहिए ।
# - सर्प के काटे हुए पशु को कदापि सोने नही देना चाहिए , यदि उसे नींद आये भी तो उसको कील चुभोकर अथवा डण्डे से छेड़कर या अन्य किन्हीं उपायों के द्वारा लगातार जगायें रखना चाहिए तथा उपरोक्त उपचारादि करते रहना चाहिए । इस प्रकार के अथक प्रयासों और ईश्वर की अनुकम्पा से सर्पदंश पशु के प्राण बचने की आशा की जाती है ।
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३ - पशु द्वारा साँप की केंचुली खा जाना
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कारण व लक्षण - कभी - कभी हरी घास , सूखी घास - दाने आदि में सर्प की केंचुली गिरी होती है । पशु चारे के साथ उसे भी खा जाते हैं । ऐसे रोग में पशु को दस्त लगते है । दस्तों में बहुत बुरी गन्ध आती है । अन्य दवा देने पर भी इस रोग के दस्त बन्द नहीं होते । पशु दिनोंदिन अधिक कमज़ोर होता जाता है ।
१ - औषधि - कालीमिर्च ३० ग्राम , गाय का घी २४० ग्राम , मिर्च को महीन पीसकर , घी में मिलाकर , गुनगुना करके , रोगी को बोतल से रोज़ सुबह , आराम होने तक , पिलाया जाय ।
२ - औषधि - लालमिर्च २४ ग्राम , सेंधानमक ७२ ग्राम , गुड १८० ग्राम , सबको बारीक पीसकर , गुड मिलाकर , रोगी पशु को दिन में दो बार , उक्त मात्रा में आराम होने तक , पिलाया जाय ।
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४ - पागल कुत्ते या गीदड़ व बन्दर के द्वारा काटने पर
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कारण व लक्षण - कुत्ता व बन्दर, गीदड़ पागल हो जाने पर वह दूसरे पशु को काट लेते है । इससे मुँह में लार टपकती है और पूँछ सीधी हो जाती है । ऐसा पशु पानी से दूर भागता है वह पानी की आवाज़ से भी डरता है । और पशु के द्वारा अन्य पशु को काट लेने पर या इसकी लार लग जाने पर वह पशु भी रोगी हो जाता है । तथा दूसरा पशु संक्रमित होने के तीन दिन से छ: माह के भीतर कभी भी पागल हो जाता है अधिकतर रोगी तीन दिन के अन्दर मर जाते है । पागल होने के बाद पशु जिस प्राणी के द्वारा काटा जाता है वह उसी की आवाज़ में चिल्लाता है।
१ - औषधि - सबसे पहले पशु के काँटे हुए स्थान पर तत्काल लोहे को लाल करके उस स्थान को अच्छी तरह से जलाभून देना चाहिए ,जिससे उसका ज़हर का असर तुरन्त ख़त्म हो जाये । और पशु को टीके लगवा देने चाहिए ।
२ - औषधि - हज़ारी गेन्दा का फूल १ नग , पानी २४० ग्राम , फूल को बारीक कूटपीसकर पानी में घोलकर , रोगी पशु को बिना छाने ही , तीन दिन तक , दोनों समय पिलाना चाहिए । ८ दिन तक रोज़ यह दवा पिलाते रहना चाहिए ।
३ - औषधि - लालमिर्च के बीज १० ग्राम ,गाय का घी १०० ग्राम , नमक १० ग्राम , मिर्च के बीजों को पीसकर व नमक को लेकर घी में मिलाकर मरहम बनाकर दोनों समय , ठीक होने तक लगाये ।
५ - मधुमक्खियों व तैतया ,बर्रे के द्वारा काँटे जाने पर
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कारण व लक्षण - मधुमक्खियों व तैतया व बर्रे आदि कीट द्वारा काटने पर पशु चरते समय व खुजली करते समय पशु के शरीर में किसी कीट द्वारा डंक मारने के कारण सूजन आ जाती है ।
१ - औषंधि - ऐसे काँटे हुए स्थान से डंक निकाल देना चाहिए ,और फिर गँवारपाठा ( घृतकुमारी ) के गूद्दे को निकालकर , रोगी पशु के काँटे हुए स्थान पर सुबह - सायं लगाना चाहिए ।
२ - औषधि - गाय का घी २४० ग्राम , मिश्री १२० ग्राम , मिश्री को महीन पीसकर , घी में मिलाकर , रोगी पशु को दो समय , पिलाया जाय । मिश्री के स्थान पर शक्कर या गुड़ का भी प्रयोग किया जा सकता है ।
३ - नींबू का रस २४० ग्राम , शक्कर १२० ग्राम , दोनों को मिलाकर , छानकर रोगी पशु को दोनों समय , पिलाना चाहिए ।
४ - औषधि - प्याज़ का रस लगाने से भी आराम होता है , तथा आधा टी कप प्याज़ का रस पशु को पिलाना चाहिए इससे भी पशु को आराम आता है ।
५ - औषधि - जिस स्थान पर डंक मारा हो , उस स्थान पर लालदवा और पिसी हुई टाटरी मिलाकर रख देवी चाहिए तथा ऊपर से १-२ बूँद ताजा पानी टपका देना चाहिए । इस प्रयोग से ही जलन दूर होकर लाभ हो जाता हैं ।
६ - औषधि - नौसादर तथा चूना मिलाकर जहाँ डंक लगा हो उस स्थान पर लगा देने से भी तत्काल ठन्डक पड़ जाती है । इसके स्थान पर "अमोनिया फोर्ट" को भी लगा सकते हैं
७ - औषधि - जमालघोटा की गिरी नींबू के रस मे घीसकर लगा देने से इनके विष का प्रभाव नष्ट होकर आराम आ जाता हैं ।
७ - औषधि - आक की जड , लटजीरा ( अपामार्ग ) की जड , मीठा तेलिया - इन तीनों मे से जो भी वस्तु तत्काल उपलब्ध हो जाये , उसे पत्थर पर घिसकर लेप कर देने से भी शीघ्र आराम पहुँचता हैं ।
६ - शेर के हमले में पशु घायल होने पर
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कारण व लक्षण - कभी - जगंल में पशु पर शेर हमला कर देता है आैर वह घायल हो जाता है । शेर पँजे व दाँतों का पशु के शरीर पर बूरा प्रभाव पड़ता है । पँजे के घाव में सूजन आ जाती है तथा दाँतों के घाव मे पस ( मवाद ) भी पड़ जाते है जिसके कारण पशु को बड़ी पीड़ा का सामना करना पड़ता है ।
१ - औषधि - हल्दी पावडर १० ग्राम , फिटकरी पावडर १० ग्राम , नीम की पत्ती का पेस्ट ५० ग्राम , गेन्दा की पत्ती का पेस्ट ५० ग्राम , नमक ६ ग्राम , सभी को मिलाकर मरहम बना लें और घावों पर दोनों समय आराम होने तक लगायें ।
२ - औषधि - गाय का घी २०० ग्राम , गेन्दा की पत्तियों का रस २०० ग्राम , नीम की पत्तियों का रस २०० ग्राम ,कच्ची हल्दी का रस १०० ग्राम , नारियल रेशे की राख ५० ग्राम , दूबघास ( दूर्वा ) का रस १०० ग्राम , फिटकरी पावडर ५० ग्राम , सादा नमक १० ग्राम , लालमिर्च के बीज ८ ग्राम , सभी को कढ़ाई में पकाकर जब पानी जल जाय और घी शेष रह जाय तो कढ़ाई को उतारकर उसमें नारियल के रेशे की राखँ को मिक्स करके मरहम बना लेवें , रोगी पशु को सुबह - सायं आराम होने तक लगाये ।
३ - औषधि - मक्का का आटा १२० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , आटे को छानकर पानी में मिलाकर ख़ूब पकाना चाहिए । गाढ़ा होने पर उतार लेना चाहिए तथा गुनगुना होने पर पशु के ज़ख़्म पर लेप लगाना चाहिए । फिर रूई रखकर पट्टी बाँध देनी चाहिए । और ऊपर से गरम पानी थोड़ी - थोड़ी देर बाद डालते रहना चाहिए । यह क्रिया अच्छे होने तक दोनों समय तक करनी चाहिए । इससे घाव नही पकेगा और पशु को आराम आयेगा ।
# - रोगी पशु यदि चारा न खा पा रहा हो तो उसे नाल या बोतल से चावल का माँड़ या ज्वार का आटा पकाकर पतला - पतला करके पिला देना चाहिए ।
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(२९)-गौ- चि०-१- बुखार ।
(२९)-गौ- चि०-१- बुखार ।
१ - फेफड़ों का बुखार ( Contagious Pleuro Pneumonia )
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कारण व लक्षण - फेफड़ों का ज्वर प्लूरो निमोनिया की भारत देश के असम प्रान्त मे ही देखने को मिलती हैं , किन्तु संसार मे यह रोग व्यापक रूप से विद्यमान हैं । यह भी एक प्रकार का छूत रोग ही हैं जो कि अन्य स्वस्थ पशुओं मे रोगी पशु की छूत से तीव्रता से से फैलता हैं । यद्यपि यह रोग बहुत धीरे- धीरे बढ़ता हैं । किन्तु रोगी पशु को रोगमुक्त होने में कभी- कभी काफी समय ( महीनों ) लग जाता हैं ।
कारण व लक्षण :- यह रोग " बीवीमाइसीज प्लूरो निमोनिया " के जीवाणु समूह के एक अतिसूक्ष्म जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता हैं । यह जीवाणु गौ - पशुओं के अतिरिक्त अन्य पशुओं में- यह रोग पैदा नही करता हैं । आमतौर पर यह रोग - रोगी पशु के श्वास द्वारा अन्य स्वस्थ पशुओं को लग जाता हैं , क्योंकि जो जीवाणु रोगी पशु की श्वास के साथ बाहर निकलते हैं , वे हवा द्वारा अन्य पशुओं के श्वास में चले जाते हैं , इसके अतिरिक्त रोगी पशु की नाक से बहने वाला पानी तथा लार आदि भी रोगाणु फैलाने में सहायक होते हैं ।
इस रोग की सामान्यवस्था के रोग लक्षण लगभग एक महीने में प्रकट होते हैं , जबकि उग्रावस्था के रोग लक्षण प्रकट होने में मात्र एक सप्ताह का ही समय लगता हैं । इस रोग मे सर्वप्रथम रोगग्रस्त पशु को तीव्र ज्वर होता हैं और निमोनिया के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं और शीघ्र ही पशु को श्वास लेने में कठिनाई अनुभव होने लगती है । श्वास रूक जाने के कारण प्राय: रोगी पशु की मृत्यु भी हो जाती हैं । पशु चारा, दाना,खाना व चरना और जूगाली करना बन्द कर देता हैं तथा उसकी छाती मे दर्द होता हैं । और उसे सूखी खाँसी का ठसका भी लगता हैं । इस प्रकार निमोनिया तथा प्लूरिसी रोगों के मिलेजुले लक्षण इस रोग मे प्रकट होते हैं जोकि फेफड़ों पर अँगुलियाँ रखकर बजाने से स्पष्ट प्रतीत होते हैं । इस रोग में फेफड़ों तथा छाती में एक प्रकार का तरल पदार्थ - सा जमा हो जाता हैं । पशु हर समय गर्दन व सिर लटकायें हुए सुस्त - सा खड़ा रहता हैं तथा उसकी नाक से हर समय पानी बहता रहता हैं ।
मन्दावस्था वाले पशु धीरे-धीरे कमज़ोर होकर लगभग दो महीने में मर जाता हैं । मध्यमावस्था वाले पशु रोग में २ या ३ सप्ताह में पशु की मृत्यु हो जाती हैं तथा उग्रावस्था के रोग में पशु एक सप्ताह में ही मर जाता हैं । जो रोगग्रस्त पशु बच भी जाते हैं - वे दीर्घकाल तक दुर्बल बने रहते हैं तथा उनको खाँसी भी बनी रहती हैं और खाँसी एवं श्वास के द्वारा वे रोग के कीटाणु फैलाते रहते हैं । इस रोग को हमारे देश के विभिन्न प्रान्तों में धस्का , धाँस, फिफडी , फेफड़े का निमोनिया तथा मरी आदि नामों से पुकारा जाता हैं
१ - औषधि - कपूर १ तौला , तारपीन तेल १ छटांक , अलसी का तेल १२५ ग्राम , इन तीनों को मिलाकर पशु के सीने पर इस तेल की मालिश करें तथा थोड़ा- सा मिश्रण पिला भी दें , इस प्रयोग से पशु को तुरन्त आराम आ जायेगा ।
२ - औषधि - तारपीन तैल १ भाग , तिल का तैल १० भाग , दोनो को आपस मे मिलाकर पशु की छाती पर मालिश कर ना चाहिए यह लाभकारी सिद्ध होगा ।
३ - औषधि - नीम के पत्ते , युकलिप्टस के पत्ते , मरूवा तुलसी के पत्ते , सभी के पत्ते २५०-२५० ग्राम लेकर तीन किलो पानी मे १० ग्राम तारपीन तेल डालकर पकायें , ख़ूब उबालें और इस पानी की भाप से रोगी पशु के मुँह पर भपारा देंवें जिससे श्वास द्वारा पशु के फेफड़े में पहुँचने से शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं । सुबह- सायं दिन में २ बार तीन- चार दिन यह प्रयोग करें । इस बात का ध्यान रखें कि यह क्रिया बन्द स्थान में करें , जहाँ कि भाप देते समय या उसके तुरन्त बाद पशु को ठण्डी हवा सीधी न लगें ।
४ - औषधि - उपर्युक्त क्रिया की ही भाँति लोबान और गुगल को आग में जलाकर उसकी धूनी पशु के मुँह पर देना भी लाभकारी हैं । यह धूआँ श्वास द्वारा पशु के फेफड़ों में पहुँच कर फेफड़ों में जमा बलगम तथा जकड़न को दूर करता हैं । यह क्रिया भी ठण्डी हवा से बचाव रंखकर दिन मे २-३ बार प्रतिदिन करनी चाहिए । इस प्रयोग से फेफड़ों की सूजन उतर जाती हैं ।
५ - औषधि - यदि रोगग्रस्त पशु को खाँसी का ठस्का अधिक उठता है तो - कपूर ३ माशा , कलमीशोरा ६ माशा , मुलहटी १ तौला , अलसी ढाई तौला , कालीमिर्च ६ माशा , गन्ने की राब या शीरा पाँच तौला , सबसे पहले सूखी चीज़ों को पीसकर चूर्ण बना लें और फिर सभी को राब या शीरा में मिलाकर पशु को दिन में २-३ बार चटायें । इस दवा को ३-४ बार चटाने से ही खाँसी दूर हो जायेगी ।
यदि पशु को क़ब्ज़ भी हो और वह गोबर सामान्य ढंग से न करता हो तो सर्वप्रथम उसकी क़ब्ज़ दूर करने का प्रयास करना चाहिए । इस हेतू निम्न योग का प्रयोग परम लाभकारी होगा ।
६ - औषधि - सेंधानमक आधा पाव , पिसाहुआ गन्धक डेढ़ छटांक , पिसी हुई सौँफ १ तौला , सब या शीरा डेढ़ छटांक , गरमपानी आधा लीटर - इन सबको मिलाकर पशु को पिला दें । एक या अधिक से अधिक २ बार पिलाने से ही पशु को साफ़ दस्त आकर क़ब्ज़ दूर हो जायेगी ।
चूँकि इस रोग में पशु को तेज ज्वर हो जाता हैं । इसलिए बुखार की तेज़ी कम करने तथा बुखार अधिक न बढ़ने देने के लिए निम्नांकित योग लाभकारी हैं -
७ - औषधि - कपूर ९ माशा , कलमीशोरा ९ माशा , धतुरे के बीज पीसे हुऐ ९ माशा , देशी शराब ढाई तौला और पानी १ लीटर लें । पहले कपूर को देशी शराब में घोलें । तदुपरान्त कलमीशोरा को पानी में घोल लें । पहले कपूर को देशी शराब में घोलें तदुपरान्त कलमीशोरा को पानी मे घोल लें ओर उक्त दोनों घोलो को आपस मे मिलाकर उसमे धतुरे के पीसे हुए बीज मिला दें । यह दवा थोड़ी- थोड़ी करके पशुओ को दिन भर में ३-४ बार पिलायें । यह योग छाती मे जमे हुए कफ ( बलगम ) को निकालेगा , बुखार की तीव्रता को कम करेगा और रोगी पशु की शारीरिक शक्ति को क्षीण नही होने देगा । साधारण निमोनिया में यह योग लाभकारी हैं ।
आलोक- इस रोग से पीड़ित दूधारू पशु का दूध पीने हेतू कदापि उपर्युक्त नही होता हैं । अत: यथासम्भव दूध प्रयोग में न लायें । उसका घी तैयार करके प्रयोग किया जा सकता हैं । रोगी पशु को हवा तथा सर्दी से भी पूर्णरूपेण बचायें ।( किसी बन्द स्थान में झूल आदि डालकर रखें )
परहेज़ - हल्की , सुपाच्य तथा दस्तावर चींजे रोगी पशु को चिकित्सा काल में खाने को देना चाहिए । जैसे दलिया , चोकर, चाय , दूध, आदि , पानी गुनगुना पिलायें ।
२ - साधारण ज्वर
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कारण व लक्षण - साधारणतया: खाद्य पदार्थों की गड़बड़ी , क़ब्ज़ ,अचानक मौसम परिवर्तन , अत्यधिक भीगने पर , मच्छर आदि के काटने पर तथा अन्य कई कारणों से पशुओं को भी ज्वर हो जाता हैं । इनके अतिरिक्त अन्य कई बिमारियों के कारण भी पशुओ को ज्वर आ जाता है साधारण प्रकार के पशुओ में ज्वर के लक्षण निम्न प्रकार के हैं --
ज्वरग्रस्त होने पर पशु का शरीर गर्म हो जाता हैं , रोगी पशु के बाल खडे हो जाते हैं तथा उसकी श्वास की गति तेज हो जाती हैं । पशु थर- थर काँपने लगता हैं और अपने कानों को नीचे लटका देता हैं तथा जूगाली करना बन्द कर देता है । पशु सुस्त रहने लगता हैं , और उसके पेशाब का रंग बदल जाता हैं ।
१ - औषधि - बुखार मे पशु को ठन्डी हवा से बचाकर सुरक्षित स्थान पर रखें तथा उसके शरीर पर झोल ( झूल यानि गरम कपड़ा ) आदि डाल दें , क़ब्ज़ को दूर करने के लिए हल्का जूलाब दें , ताकि पेट साफ़ हो जाये । तदुपरान्त निम्नलिखित योगों की प्रयोग करना चाहिए ।
२ - औषधि - कपूर ३ माशे , कलमीशोरा १ तौला - इन दोनो को १ छटाक देशी शराब मे घोलकर तदुपरान्त आधा किलो गुनगुने शीरे के घोल मे मिलाकर रोगी पशु को पिलायें ।
३ - औषधि - द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) घास के फूल १ छटाक, कालीमिर्च १ तौला , को आधा लीटर गुनगुने पानी मे घोटपीसकर गुनगुना करके पिलायें ।
४ - औषधि - कलमीशोरा डेढ़ तौला , सैंधानमक ढाई तौला , चिरायता ढाई तौला,आधा पॉव राब या शीरे मे मिलाकर पिलाये । यदि राब या शीरा न हो तो आधा लीटर गुनगुने पानी मे मिलाकर पिलायें ।
५ - उपचार - ज्वरक्रान्त रोगी पशु को ऐसे स्थान मे रखना चाहिए , जहाँ अधिक हवा न लगे तथा नीचे लिखी दवाओं मे से सुविधानुसार दवा लेकर उपचार शुरू करें ।
६ - औषधि - गाय का घी १ पाव , कालीमिर्च पावडर १ छटांक , मिर्च को घी मे मिलाकर पशु को पिलाना चाहिए यह लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
७ - औषधि - धतुरे की जड की छाल १० ग्राम ,कालीमिर्च ४० ग्राम , दोनो पिसकर आधा किलो पानी मे मिलाकर गरम करके पिलाना हितकर होता होता हैं ।
८ - औषधि - चिरायता आधा छटांक व गुड आधा किलो दोनो को एक लीटर पानी मे डालकर पकाये जब पानी आधे से अधिक जल जायें तब इसे छानकर रोगी पशु को गुनगुना करके पिलाये यह गुणकारी होता हैं ।
९ - औषधि - नमक अजवायन कालीमिर्च , सोंठ , चिरायता , प्रत्येक औषधि १०-१० ग्राम लेकर चावल के माण्ड के साथ मिलाकर रोगी पशु को तीन दिन तक पिलायें ।
१० - औषधि - बेल की पत्तियाँ ( बिल्वपत्र ) अदरक , गुडुची ( गिलोय ) पारिजात ( हारश्रगाँर ) के पत्ते तुलसी की पत्तियाँ ,गुड १ पाँव , पानी एक किलो लेकर सभी को मिलाकर पकाये जब आधा पानी रह जाये तो छानकर गुनगुना ही पशु को पिलाये ।
११ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) एक छटाक , कालीमिर्च एक तौला , आधा किलो पानी मे मिलाकर सेवन कराये । गुणकारी होता हैं ।
# - परहेज़ - रोगी पशु को खाने मे माण्ड मे नमक मिलाकर देना चाहिए तथा पीने के लिए स्वच्छ जल देना होगा ।
३ - अढैया ( शीत ज्वर )
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कारण व लक्षण - मनुष्यों की भाँति पशुओ को भी बुखार आता हैं , भैंस व बैल का नार्मल ताप १०१ डिग्री फारेहनहाइट होता हैं। इससे अधिक होने पर पशु को बुखार का रोगी समझा जाता हैं । शीत ज्वर मे पशु के मुख का भीतरी भाग गरम नाड़ी की गति तीव्र हो जाती हैं तथा पशु के रोयें खडे हो जाते हैं । पेशाब , आँखें , नाक इत्यादि लाल वर्ण के हो जाते हैं तथा खाने मे अरूचि व प्यास ज़्यादा लगती हैं । पशु जूगाली करना भी बन्द कर देता हैं ।
ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि ज्वर कभी - कभी अन्य रोगों के साथ भी आता हैं । जैसे - खूरपका रोग के साथ , ऐसे रोगों का वर्णन उन रोगों के साथ ही किया गया हैं ।
अढैया ज्वर को शीत ज्वर के नाम से भी जाना जाता हैं । यह ज्वर अढ़ाई घन्टे , अढ़ाई पहर तक या अढ़ाई दिन तक रहता हैं , इसी कारण इसे अढैया ज्वर कहते है । सामान्य ज्वर अथवा अढैया बुखार एक साध्य रोग हैं । इस बुखार उपर लिखे गये लक्षणो के अतिरिक्त पशु के शरीर का ताप बढ़ जाता हैं । बारी - बारी से रोगग्रस्त पशु के चारों पैर लँगडे हो जाते हैं । कभी - कभी तो पशु का सर्वांग लँगड़ा हो जाता हैं । यह अवस्था अल्पकाल तक रहती हैं ।
१ - औषधि - गाय का घी आधा पाँव , कालीमिर्च पावडर आधा छटाक मिलाकर पशु को पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - चिरायता का चूर्ण आधा छटांक , गुड ८ छटांक , पानी आधा लीटर लेकर आपस मे मिलाकर गुनगुना ही पशु को पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - धतुरे की जड १० ग्राम , कालीमिर्च ४० ग्राम ,पानी मे पीसकर गरम करके नाल द्वारा पशु को पिलानी चाहिए ।
४ - औषधि - सोंठ , चिरायता , कालीमिर्च , अजवायन , सैंधानमक ( प्रत्येक ५-५ तौला ) लेकर चूर्ण बनाकर , चावल के माण्ड मे मिलाकर पिलाना हितकर होता हैं ।
५ - औषधि - बेलपत्र ,अदरक , पित्तपापड़ा ४०-४० ग्राम , गुड़ ५०० ग्राम , १ किलो पानी मे पकाकर गुनगुना ही रोगी पशु को पिलायें । इससे ज्वर दूर होगा ।
४ - लँगड़ा ज्वर ( बुखार ) ( ब्लैक क्वार्टर )
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कारण व लक्षण - इस ज्वर के कई नाम है जैसे लँगड़ा , लँगड़ी , गोली , चिरचिरा , फलसूजा , आदि । यह ज्वर पशु के ख़ून मे कीटाणु द्वारा विकार उत्पन्न किये जाने से होता हैं । इस ज्वर से पीड़ित पशु अन्य स्वस्थ पशुओ से अलग खड़ा दिखाई देता हैं और चलने से लँगड़ाता मालूम होता हैं , जैसे कि उसे लकवा मार गया हो , थोड़ी देर बाद ही चलते- चलते गिर जाता हैं तथा सिर को एक तरफ़ को गिरा देता हैं , पशु की पेशियाँ काली पड़ जाती हैं इसलिए इस रोग को ब्लैक लैग तथा स्यूडो एन्थैक्स भी कहते हैं । ये पेशियाँ गैस के दबाव के कारण छेददार दिखाई देती हैं । रोगी पशु के ऊत्तकों ( टिश्यूज ) मे संडे और खट्टे मक्खन की गन्ध से मिलती- जुलती खट्टी बू आती हैं तथा पेशियाँ सूख जाती हैं रोगी पशु के भीतरी अंगों मे ख़ून जमा हो जाता हैं फिर भी शत- प्रतिशत सही निदान के लिए के लिए चिकित्सक को पशु की पेशी तथा रक्त का जैविकीय तथा संवर्धन जाँच के लिए प्रयोगशाला मे भिजवा दें । उसके कान लटक जाते हैं । रोगी पशु जहाँ से लँगड़ाता है , उसके आसपास सूजन भी दिखाई देती हैं । इस सूजन को जब हाथ से दबाया जाता हैं तो कर- कर या मर- मर , बज- बज ,चर- चर की आवाज मालूम होती है इसकी सूजन पशु की पिछली जाँघ अथवा पीठ पर होती हैं । इससे पशु को तेज बुखार हो जाता हैं और उसका पेट फूल जाता हैं तथा पाखाना - पेशाब भी बन्द हो जाता हैं । यदि उसके रक्त मे विशिष्ट क्लोस्ट्रीडिया पाया जाये तो यह इस बात का प्रमाण हैं कि रोग निश्चित रूप से लँगड़ा ज्वर ( ब्लैक क्वार्टर ) ही हैं । इस रोग से ग्रसित पशु की प्राय: २४ घन्टे मे मृत्यु हो जाती हैं ।
# - उपचार - यह एक असाध्य रोग हैं । इस रोग से ग्रसित ९९% रोगी मर जाते हैं । इसकी सर्वोत्तम औषधि यदि है की इसका टीका लगवा देना चाहिए । कुछ अन्य चिकित्सकों के अनुसार नीम का तेल या कपूरादि तैल किटाणुनाशक अन्य कोई दवा सूजन वाली जगह मे चीरकर भरवा देनी चाहिए । यदि उचित समय पर समुचित चिकित्सा की जाय तो सम्भव है कि रोगी पशु का जीवन बच जायें ,
१ - औषधि - कपूरादि तैल - कपूर १ तौला , तारपीन का तैल १ छटाक और सरसों का तैल २५० ग्राम लें , इन सबको मिलाकर कपूर को तेलों के मिश्रण मे भलीप्रकार घोल लें । यह तैल रोग के कीटाणुओं को भी नष्ट कर देता हैं और छिदना के घावों पर मक्खियों को भी नही बैठने देता हैं ।
# - चीरा लगाने वाले यंत्र को लाल गरम करके पहले कीटाणु रहित कर लें उसके बाद ठंडा करके चीरा लगाये ।
२ - सूजन वाले स्थान को गरम लोहे की लाल सलाखों से दागना चाहिए इससे सभी कीटाणु मर जाते है और पशु के बचने की उम्मीद बढ जाती हैं ।
३ - इस रोग मे छेदन क्रिया या छेदना भी लाभदायक होता है , छेदना करने की विंधी इस प्रकार हैं --
पशु के गले की लटकती हूई खाल जिसे हेलुआ या गलकम्बल के नाम से जानते हैं , हेलुआ मे तेज चाक़ू या छुरी कोई एक अँगुल की चौड़ाई का छेद खाल के आर पार कर दें । किन्तु ध्यान रहे कि - जिस चाक़ू या छुरी का प्रयोग करें , उसे पानी मे खोलाकर पहले किटाणु रहित कर लें फिर ऐसा ही एक छेद पहले छेद से तीन - चार अगुँल की दूरी पर करे । अब इन दोनो छेदो मे से होकर एक मोटा डोरा ( धागा ) या घोड़े की पूछ के बालों की साफ़ डोरी बनाकर को सूजे ( सूए ) द्वारा छेद मे डालकर मज़बूती से दोनो सिरों को आपस मे बाँध दें किन्तु ध्यान रहे की बाधते समय डोरी इतनी ढिली रहे की उससे कही भी पशु की खाल न खींचें और न ही खाल दबे । अब इन छेदो पर नीम का तैल या कपूरादि तैल चपड़ दे ।ताकि मक्खियाँ न बैठे । यह कीटाणुनाशक तैल दिन मे कई बार चुपड़ते रहें । यदि घाव का अंकुर ऊँचा हो गया हो तो उस पर पिसा हुआ नीलाथोथा बुरक दें ।
यदि पशु के शरीर मे सूजन अधिक बढ जाये , फेफड़ों मे ख़ून - सा भरा प्रतित हो तथा पशु को साँस लेने मे कठिनाई प्रतित होने लगे तो उसके बचने की आशा बहुत ही कम रह जाती हैं । क्योंकि उस अवस्था मे पहुँचने पर कोई दवा प्रभावकारी सिद्ध नही होती हैं । अत: उस अवस्था से पूर्व ही निम्नलिखित योग प्रयोग किया जाये तो प्राय: रोगग्रस्त पशु के प्राण बच जाते हैं -
१ - औषधि - अलसी का तैल २५० ग्राम , पिसा हुआ गन्धक १२५ ग्राम , सोंठपावडर साढ़े बारह ग्राम , इन सब द्रव्यों को आधा लीटर गरम पानी मे मिलाकर पशु को पिलायें और जबतक पशु का पेट न चलने लगे ( दस्त ) तबतक प्रत्येक तीसरे घन्टे के बाद इससे योग का सेवन निरन्तर चालू रखे । यह योग एक प्रकार का जूलाब हैं जोकि गोबर द्वारा पशु के शरीर के अन्दर का सारा रोग ( विष ) बाहर निकल जाता है और पशु की जान बच जाती हैं ।
# - इस रोग की छूत अन्य पशुओ मे न फैले , इस हेतु दो सरल उपाय लिख रहे हैं -
२ - औषधि - नमक १० तौला , गन्धक साढ़े सात तौला , सोंठ सवा तौला - इन तीनों को पीसकर साढ़े सात तौला राब मे मिलाकर अपने सभी स्वस्थ पशुओ को चटा दें । इस प्रयोग से उन्हे इस रोग की छूत लगने का ख़तरा कम हो जायेगा ।
३ - औषधि - पानी मे थोड़ा - सा कलमीशोरा और थोड़ा - सा नमक घोलकर सब स्वस्थ पशुओ को पिलाते रहे ( ताकि यदि कभी रोग के कीटाणु उनके अन्दर पहुँच भी जायें तो तत्काल ही नष्ट हो जायें । )
५ - प्लेग
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कारण व लक्षण - इस संक्रामक रोग का प्रभाव बहुत ही तीव्र गति से होता हैं । रोगाक्रान्त पशु से अन्य स्वस्थ पशुओ को इस रोग के कीटाणु अपना शिकार तेज़ी से बनाते हैं । अत: स्वस्थ पशुओ से रोगी पशु को तुरन्त अलग करना चाहिए । इस रोग मे बुखार के साथ गिल्टी निकलकर पशु को कष्ट देती हैं ।बैल व गाय आदि पशुओ की नाक , आँख , मुँह से पानी बहना , तन्द्रा होना , रोंगटे खड़ा हो जाना , मल- मूत्रवरोधन तथा श्वसन क्रिया मे अनियमिता और अवरोध उपस्थित हो जाते हैं तथा पशु के मृत्यु कारक लक्षण प्रकट होते हैं ।प्लेग रोग का निदान तुरन्त कर लेना चाहिए अन्यथा २४ घन्टे के अन्दर ही रोगी पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - दशमूल , पाचन , समुद्र फेन , बुबई व तुलसी की पत्तियाँ प्रत्येक सममात्रा मे लेकर एंव काले धतुरे की कुछ पत्तियाँ पीसकर मिलाकर इसकी पुलटीश ४-५ घन्टे के अन्तर पर रोगी पशु की गर्दन पर गिल्टियों वाले स्थान पर लगाये यह लाभकारी योग हैं ।
२ - औषधि - सहजन के बीज भाँग का चूर्ण अपामार्ग ( चिरचिटा ) का चूर्ण , पीपल , अरण्डी के बीज का गूद्दा और मृगनाभि चूर्ण प्रत्येक को उचित मात्रा मे मिलाकर आवश्यकतानुसार रोगी पशु को दिन मे २-३ बार पिलाना चाहिए ।
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१ - फेफड़ों का बुखार ( Contagious Pleuro Pneumonia )
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कारण व लक्षण - फेफड़ों का ज्वर प्लूरो निमोनिया की भारत देश के असम प्रान्त मे ही देखने को मिलती हैं , किन्तु संसार मे यह रोग व्यापक रूप से विद्यमान हैं । यह भी एक प्रकार का छूत रोग ही हैं जो कि अन्य स्वस्थ पशुओं मे रोगी पशु की छूत से तीव्रता से से फैलता हैं । यद्यपि यह रोग बहुत धीरे- धीरे बढ़ता हैं । किन्तु रोगी पशु को रोगमुक्त होने में कभी- कभी काफी समय ( महीनों ) लग जाता हैं ।
कारण व लक्षण :- यह रोग " बीवीमाइसीज प्लूरो निमोनिया " के जीवाणु समूह के एक अतिसूक्ष्म जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता हैं । यह जीवाणु गौ - पशुओं के अतिरिक्त अन्य पशुओं में- यह रोग पैदा नही करता हैं । आमतौर पर यह रोग - रोगी पशु के श्वास द्वारा अन्य स्वस्थ पशुओं को लग जाता हैं , क्योंकि जो जीवाणु रोगी पशु की श्वास के साथ बाहर निकलते हैं , वे हवा द्वारा अन्य पशुओं के श्वास में चले जाते हैं , इसके अतिरिक्त रोगी पशु की नाक से बहने वाला पानी तथा लार आदि भी रोगाणु फैलाने में सहायक होते हैं ।
इस रोग की सामान्यवस्था के रोग लक्षण लगभग एक महीने में प्रकट होते हैं , जबकि उग्रावस्था के रोग लक्षण प्रकट होने में मात्र एक सप्ताह का ही समय लगता हैं । इस रोग मे सर्वप्रथम रोगग्रस्त पशु को तीव्र ज्वर होता हैं और निमोनिया के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं और शीघ्र ही पशु को श्वास लेने में कठिनाई अनुभव होने लगती है । श्वास रूक जाने के कारण प्राय: रोगी पशु की मृत्यु भी हो जाती हैं । पशु चारा, दाना,खाना व चरना और जूगाली करना बन्द कर देता हैं तथा उसकी छाती मे दर्द होता हैं । और उसे सूखी खाँसी का ठसका भी लगता हैं । इस प्रकार निमोनिया तथा प्लूरिसी रोगों के मिलेजुले लक्षण इस रोग मे प्रकट होते हैं जोकि फेफड़ों पर अँगुलियाँ रखकर बजाने से स्पष्ट प्रतीत होते हैं । इस रोग में फेफड़ों तथा छाती में एक प्रकार का तरल पदार्थ - सा जमा हो जाता हैं । पशु हर समय गर्दन व सिर लटकायें हुए सुस्त - सा खड़ा रहता हैं तथा उसकी नाक से हर समय पानी बहता रहता हैं ।
मन्दावस्था वाले पशु धीरे-धीरे कमज़ोर होकर लगभग दो महीने में मर जाता हैं । मध्यमावस्था वाले पशु रोग में २ या ३ सप्ताह में पशु की मृत्यु हो जाती हैं तथा उग्रावस्था के रोग में पशु एक सप्ताह में ही मर जाता हैं । जो रोगग्रस्त पशु बच भी जाते हैं - वे दीर्घकाल तक दुर्बल बने रहते हैं तथा उनको खाँसी भी बनी रहती हैं और खाँसी एवं श्वास के द्वारा वे रोग के कीटाणु फैलाते रहते हैं । इस रोग को हमारे देश के विभिन्न प्रान्तों में धस्का , धाँस, फिफडी , फेफड़े का निमोनिया तथा मरी आदि नामों से पुकारा जाता हैं
१ - औषधि - कपूर १ तौला , तारपीन तेल १ छटांक , अलसी का तेल १२५ ग्राम , इन तीनों को मिलाकर पशु के सीने पर इस तेल की मालिश करें तथा थोड़ा- सा मिश्रण पिला भी दें , इस प्रयोग से पशु को तुरन्त आराम आ जायेगा ।
२ - औषधि - तारपीन तैल १ भाग , तिल का तैल १० भाग , दोनो को आपस मे मिलाकर पशु की छाती पर मालिश कर ना चाहिए यह लाभकारी सिद्ध होगा ।
३ - औषधि - नीम के पत्ते , युकलिप्टस के पत्ते , मरूवा तुलसी के पत्ते , सभी के पत्ते २५०-२५० ग्राम लेकर तीन किलो पानी मे १० ग्राम तारपीन तेल डालकर पकायें , ख़ूब उबालें और इस पानी की भाप से रोगी पशु के मुँह पर भपारा देंवें जिससे श्वास द्वारा पशु के फेफड़े में पहुँचने से शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं । सुबह- सायं दिन में २ बार तीन- चार दिन यह प्रयोग करें । इस बात का ध्यान रखें कि यह क्रिया बन्द स्थान में करें , जहाँ कि भाप देते समय या उसके तुरन्त बाद पशु को ठण्डी हवा सीधी न लगें ।
४ - औषधि - उपर्युक्त क्रिया की ही भाँति लोबान और गुगल को आग में जलाकर उसकी धूनी पशु के मुँह पर देना भी लाभकारी हैं । यह धूआँ श्वास द्वारा पशु के फेफड़ों में पहुँच कर फेफड़ों में जमा बलगम तथा जकड़न को दूर करता हैं । यह क्रिया भी ठण्डी हवा से बचाव रंखकर दिन मे २-३ बार प्रतिदिन करनी चाहिए । इस प्रयोग से फेफड़ों की सूजन उतर जाती हैं ।
५ - औषधि - यदि रोगग्रस्त पशु को खाँसी का ठस्का अधिक उठता है तो - कपूर ३ माशा , कलमीशोरा ६ माशा , मुलहटी १ तौला , अलसी ढाई तौला , कालीमिर्च ६ माशा , गन्ने की राब या शीरा पाँच तौला , सबसे पहले सूखी चीज़ों को पीसकर चूर्ण बना लें और फिर सभी को राब या शीरा में मिलाकर पशु को दिन में २-३ बार चटायें । इस दवा को ३-४ बार चटाने से ही खाँसी दूर हो जायेगी ।
यदि पशु को क़ब्ज़ भी हो और वह गोबर सामान्य ढंग से न करता हो तो सर्वप्रथम उसकी क़ब्ज़ दूर करने का प्रयास करना चाहिए । इस हेतू निम्न योग का प्रयोग परम लाभकारी होगा ।
६ - औषधि - सेंधानमक आधा पाव , पिसाहुआ गन्धक डेढ़ छटांक , पिसी हुई सौँफ १ तौला , सब या शीरा डेढ़ छटांक , गरमपानी आधा लीटर - इन सबको मिलाकर पशु को पिला दें । एक या अधिक से अधिक २ बार पिलाने से ही पशु को साफ़ दस्त आकर क़ब्ज़ दूर हो जायेगी ।
चूँकि इस रोग में पशु को तेज ज्वर हो जाता हैं । इसलिए बुखार की तेज़ी कम करने तथा बुखार अधिक न बढ़ने देने के लिए निम्नांकित योग लाभकारी हैं -
७ - औषधि - कपूर ९ माशा , कलमीशोरा ९ माशा , धतुरे के बीज पीसे हुऐ ९ माशा , देशी शराब ढाई तौला और पानी १ लीटर लें । पहले कपूर को देशी शराब में घोलें । तदुपरान्त कलमीशोरा को पानी में घोल लें । पहले कपूर को देशी शराब में घोलें तदुपरान्त कलमीशोरा को पानी मे घोल लें ओर उक्त दोनों घोलो को आपस मे मिलाकर उसमे धतुरे के पीसे हुए बीज मिला दें । यह दवा थोड़ी- थोड़ी करके पशुओ को दिन भर में ३-४ बार पिलायें । यह योग छाती मे जमे हुए कफ ( बलगम ) को निकालेगा , बुखार की तीव्रता को कम करेगा और रोगी पशु की शारीरिक शक्ति को क्षीण नही होने देगा । साधारण निमोनिया में यह योग लाभकारी हैं ।
आलोक- इस रोग से पीड़ित दूधारू पशु का दूध पीने हेतू कदापि उपर्युक्त नही होता हैं । अत: यथासम्भव दूध प्रयोग में न लायें । उसका घी तैयार करके प्रयोग किया जा सकता हैं । रोगी पशु को हवा तथा सर्दी से भी पूर्णरूपेण बचायें ।( किसी बन्द स्थान में झूल आदि डालकर रखें )
परहेज़ - हल्की , सुपाच्य तथा दस्तावर चींजे रोगी पशु को चिकित्सा काल में खाने को देना चाहिए । जैसे दलिया , चोकर, चाय , दूध, आदि , पानी गुनगुना पिलायें ।
२ - साधारण ज्वर
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कारण व लक्षण - साधारणतया: खाद्य पदार्थों की गड़बड़ी , क़ब्ज़ ,अचानक मौसम परिवर्तन , अत्यधिक भीगने पर , मच्छर आदि के काटने पर तथा अन्य कई कारणों से पशुओं को भी ज्वर हो जाता हैं । इनके अतिरिक्त अन्य कई बिमारियों के कारण भी पशुओ को ज्वर आ जाता है साधारण प्रकार के पशुओ में ज्वर के लक्षण निम्न प्रकार के हैं --
ज्वरग्रस्त होने पर पशु का शरीर गर्म हो जाता हैं , रोगी पशु के बाल खडे हो जाते हैं तथा उसकी श्वास की गति तेज हो जाती हैं । पशु थर- थर काँपने लगता हैं और अपने कानों को नीचे लटका देता हैं तथा जूगाली करना बन्द कर देता है । पशु सुस्त रहने लगता हैं , और उसके पेशाब का रंग बदल जाता हैं ।
१ - औषधि - बुखार मे पशु को ठन्डी हवा से बचाकर सुरक्षित स्थान पर रखें तथा उसके शरीर पर झोल ( झूल यानि गरम कपड़ा ) आदि डाल दें , क़ब्ज़ को दूर करने के लिए हल्का जूलाब दें , ताकि पेट साफ़ हो जाये । तदुपरान्त निम्नलिखित योगों की प्रयोग करना चाहिए ।
२ - औषधि - कपूर ३ माशे , कलमीशोरा १ तौला - इन दोनो को १ छटाक देशी शराब मे घोलकर तदुपरान्त आधा किलो गुनगुने शीरे के घोल मे मिलाकर रोगी पशु को पिलायें ।
३ - औषधि - द्रोणपुष्पी ( गुम्मा ) घास के फूल १ छटाक, कालीमिर्च १ तौला , को आधा लीटर गुनगुने पानी मे घोटपीसकर गुनगुना करके पिलायें ।
४ - औषधि - कलमीशोरा डेढ़ तौला , सैंधानमक ढाई तौला , चिरायता ढाई तौला,आधा पॉव राब या शीरे मे मिलाकर पिलाये । यदि राब या शीरा न हो तो आधा लीटर गुनगुने पानी मे मिलाकर पिलायें ।
५ - उपचार - ज्वरक्रान्त रोगी पशु को ऐसे स्थान मे रखना चाहिए , जहाँ अधिक हवा न लगे तथा नीचे लिखी दवाओं मे से सुविधानुसार दवा लेकर उपचार शुरू करें ।
६ - औषधि - गाय का घी १ पाव , कालीमिर्च पावडर १ छटांक , मिर्च को घी मे मिलाकर पशु को पिलाना चाहिए यह लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
७ - औषधि - धतुरे की जड की छाल १० ग्राम ,कालीमिर्च ४० ग्राम , दोनो पिसकर आधा किलो पानी मे मिलाकर गरम करके पिलाना हितकर होता होता हैं ।
८ - औषधि - चिरायता आधा छटांक व गुड आधा किलो दोनो को एक लीटर पानी मे डालकर पकाये जब पानी आधे से अधिक जल जायें तब इसे छानकर रोगी पशु को गुनगुना करके पिलाये यह गुणकारी होता हैं ।
९ - औषधि - नमक अजवायन कालीमिर्च , सोंठ , चिरायता , प्रत्येक औषधि १०-१० ग्राम लेकर चावल के माण्ड के साथ मिलाकर रोगी पशु को तीन दिन तक पिलायें ।
१० - औषधि - बेल की पत्तियाँ ( बिल्वपत्र ) अदरक , गुडुची ( गिलोय ) पारिजात ( हारश्रगाँर ) के पत्ते तुलसी की पत्तियाँ ,गुड १ पाँव , पानी एक किलो लेकर सभी को मिलाकर पकाये जब आधा पानी रह जाये तो छानकर गुनगुना ही पशु को पिलाये ।
११ - औषधि - गुम्मा ( द्रोणपुष्पी ) एक छटाक , कालीमिर्च एक तौला , आधा किलो पानी मे मिलाकर सेवन कराये । गुणकारी होता हैं ।
# - परहेज़ - रोगी पशु को खाने मे माण्ड मे नमक मिलाकर देना चाहिए तथा पीने के लिए स्वच्छ जल देना होगा ।
३ - अढैया ( शीत ज्वर )
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कारण व लक्षण - मनुष्यों की भाँति पशुओ को भी बुखार आता हैं , भैंस व बैल का नार्मल ताप १०१ डिग्री फारेहनहाइट होता हैं। इससे अधिक होने पर पशु को बुखार का रोगी समझा जाता हैं । शीत ज्वर मे पशु के मुख का भीतरी भाग गरम नाड़ी की गति तीव्र हो जाती हैं तथा पशु के रोयें खडे हो जाते हैं । पेशाब , आँखें , नाक इत्यादि लाल वर्ण के हो जाते हैं तथा खाने मे अरूचि व प्यास ज़्यादा लगती हैं । पशु जूगाली करना भी बन्द कर देता हैं ।
ध्यान देने योग्य बात यह हैं कि ज्वर कभी - कभी अन्य रोगों के साथ भी आता हैं । जैसे - खूरपका रोग के साथ , ऐसे रोगों का वर्णन उन रोगों के साथ ही किया गया हैं ।
अढैया ज्वर को शीत ज्वर के नाम से भी जाना जाता हैं । यह ज्वर अढ़ाई घन्टे , अढ़ाई पहर तक या अढ़ाई दिन तक रहता हैं , इसी कारण इसे अढैया ज्वर कहते है । सामान्य ज्वर अथवा अढैया बुखार एक साध्य रोग हैं । इस बुखार उपर लिखे गये लक्षणो के अतिरिक्त पशु के शरीर का ताप बढ़ जाता हैं । बारी - बारी से रोगग्रस्त पशु के चारों पैर लँगडे हो जाते हैं । कभी - कभी तो पशु का सर्वांग लँगड़ा हो जाता हैं । यह अवस्था अल्पकाल तक रहती हैं ।
१ - औषधि - गाय का घी आधा पाँव , कालीमिर्च पावडर आधा छटाक मिलाकर पशु को पिलाने से लाभ होता हैं ।
२ - औषधि - चिरायता का चूर्ण आधा छटांक , गुड ८ छटांक , पानी आधा लीटर लेकर आपस मे मिलाकर गुनगुना ही पशु को पिलाने से लाभ होता हैं ।
३ - औषधि - धतुरे की जड १० ग्राम , कालीमिर्च ४० ग्राम ,पानी मे पीसकर गरम करके नाल द्वारा पशु को पिलानी चाहिए ।
४ - औषधि - सोंठ , चिरायता , कालीमिर्च , अजवायन , सैंधानमक ( प्रत्येक ५-५ तौला ) लेकर चूर्ण बनाकर , चावल के माण्ड मे मिलाकर पिलाना हितकर होता हैं ।
५ - औषधि - बेलपत्र ,अदरक , पित्तपापड़ा ४०-४० ग्राम , गुड़ ५०० ग्राम , १ किलो पानी मे पकाकर गुनगुना ही रोगी पशु को पिलायें । इससे ज्वर दूर होगा ।
४ - लँगड़ा ज्वर ( बुखार ) ( ब्लैक क्वार्टर )
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कारण व लक्षण - इस ज्वर के कई नाम है जैसे लँगड़ा , लँगड़ी , गोली , चिरचिरा , फलसूजा , आदि । यह ज्वर पशु के ख़ून मे कीटाणु द्वारा विकार उत्पन्न किये जाने से होता हैं । इस ज्वर से पीड़ित पशु अन्य स्वस्थ पशुओ से अलग खड़ा दिखाई देता हैं और चलने से लँगड़ाता मालूम होता हैं , जैसे कि उसे लकवा मार गया हो , थोड़ी देर बाद ही चलते- चलते गिर जाता हैं तथा सिर को एक तरफ़ को गिरा देता हैं , पशु की पेशियाँ काली पड़ जाती हैं इसलिए इस रोग को ब्लैक लैग तथा स्यूडो एन्थैक्स भी कहते हैं । ये पेशियाँ गैस के दबाव के कारण छेददार दिखाई देती हैं । रोगी पशु के ऊत्तकों ( टिश्यूज ) मे संडे और खट्टे मक्खन की गन्ध से मिलती- जुलती खट्टी बू आती हैं तथा पेशियाँ सूख जाती हैं रोगी पशु के भीतरी अंगों मे ख़ून जमा हो जाता हैं फिर भी शत- प्रतिशत सही निदान के लिए के लिए चिकित्सक को पशु की पेशी तथा रक्त का जैविकीय तथा संवर्धन जाँच के लिए प्रयोगशाला मे भिजवा दें । उसके कान लटक जाते हैं । रोगी पशु जहाँ से लँगड़ाता है , उसके आसपास सूजन भी दिखाई देती हैं । इस सूजन को जब हाथ से दबाया जाता हैं तो कर- कर या मर- मर , बज- बज ,चर- चर की आवाज मालूम होती है इसकी सूजन पशु की पिछली जाँघ अथवा पीठ पर होती हैं । इससे पशु को तेज बुखार हो जाता हैं और उसका पेट फूल जाता हैं तथा पाखाना - पेशाब भी बन्द हो जाता हैं । यदि उसके रक्त मे विशिष्ट क्लोस्ट्रीडिया पाया जाये तो यह इस बात का प्रमाण हैं कि रोग निश्चित रूप से लँगड़ा ज्वर ( ब्लैक क्वार्टर ) ही हैं । इस रोग से ग्रसित पशु की प्राय: २४ घन्टे मे मृत्यु हो जाती हैं ।
# - उपचार - यह एक असाध्य रोग हैं । इस रोग से ग्रसित ९९% रोगी मर जाते हैं । इसकी सर्वोत्तम औषधि यदि है की इसका टीका लगवा देना चाहिए । कुछ अन्य चिकित्सकों के अनुसार नीम का तेल या कपूरादि तैल किटाणुनाशक अन्य कोई दवा सूजन वाली जगह मे चीरकर भरवा देनी चाहिए । यदि उचित समय पर समुचित चिकित्सा की जाय तो सम्भव है कि रोगी पशु का जीवन बच जायें ,
१ - औषधि - कपूरादि तैल - कपूर १ तौला , तारपीन का तैल १ छटाक और सरसों का तैल २५० ग्राम लें , इन सबको मिलाकर कपूर को तेलों के मिश्रण मे भलीप्रकार घोल लें । यह तैल रोग के कीटाणुओं को भी नष्ट कर देता हैं और छिदना के घावों पर मक्खियों को भी नही बैठने देता हैं ।
# - चीरा लगाने वाले यंत्र को लाल गरम करके पहले कीटाणु रहित कर लें उसके बाद ठंडा करके चीरा लगाये ।
२ - सूजन वाले स्थान को गरम लोहे की लाल सलाखों से दागना चाहिए इससे सभी कीटाणु मर जाते है और पशु के बचने की उम्मीद बढ जाती हैं ।
३ - इस रोग मे छेदन क्रिया या छेदना भी लाभदायक होता है , छेदना करने की विंधी इस प्रकार हैं --
पशु के गले की लटकती हूई खाल जिसे हेलुआ या गलकम्बल के नाम से जानते हैं , हेलुआ मे तेज चाक़ू या छुरी कोई एक अँगुल की चौड़ाई का छेद खाल के आर पार कर दें । किन्तु ध्यान रहे कि - जिस चाक़ू या छुरी का प्रयोग करें , उसे पानी मे खोलाकर पहले किटाणु रहित कर लें फिर ऐसा ही एक छेद पहले छेद से तीन - चार अगुँल की दूरी पर करे । अब इन दोनो छेदो मे से होकर एक मोटा डोरा ( धागा ) या घोड़े की पूछ के बालों की साफ़ डोरी बनाकर को सूजे ( सूए ) द्वारा छेद मे डालकर मज़बूती से दोनो सिरों को आपस मे बाँध दें किन्तु ध्यान रहे की बाधते समय डोरी इतनी ढिली रहे की उससे कही भी पशु की खाल न खींचें और न ही खाल दबे । अब इन छेदो पर नीम का तैल या कपूरादि तैल चपड़ दे ।ताकि मक्खियाँ न बैठे । यह कीटाणुनाशक तैल दिन मे कई बार चुपड़ते रहें । यदि घाव का अंकुर ऊँचा हो गया हो तो उस पर पिसा हुआ नीलाथोथा बुरक दें ।
यदि पशु के शरीर मे सूजन अधिक बढ जाये , फेफड़ों मे ख़ून - सा भरा प्रतित हो तथा पशु को साँस लेने मे कठिनाई प्रतित होने लगे तो उसके बचने की आशा बहुत ही कम रह जाती हैं । क्योंकि उस अवस्था मे पहुँचने पर कोई दवा प्रभावकारी सिद्ध नही होती हैं । अत: उस अवस्था से पूर्व ही निम्नलिखित योग प्रयोग किया जाये तो प्राय: रोगग्रस्त पशु के प्राण बच जाते हैं -
१ - औषधि - अलसी का तैल २५० ग्राम , पिसा हुआ गन्धक १२५ ग्राम , सोंठपावडर साढ़े बारह ग्राम , इन सब द्रव्यों को आधा लीटर गरम पानी मे मिलाकर पशु को पिलायें और जबतक पशु का पेट न चलने लगे ( दस्त ) तबतक प्रत्येक तीसरे घन्टे के बाद इससे योग का सेवन निरन्तर चालू रखे । यह योग एक प्रकार का जूलाब हैं जोकि गोबर द्वारा पशु के शरीर के अन्दर का सारा रोग ( विष ) बाहर निकल जाता है और पशु की जान बच जाती हैं ।
# - इस रोग की छूत अन्य पशुओ मे न फैले , इस हेतु दो सरल उपाय लिख रहे हैं -
२ - औषधि - नमक १० तौला , गन्धक साढ़े सात तौला , सोंठ सवा तौला - इन तीनों को पीसकर साढ़े सात तौला राब मे मिलाकर अपने सभी स्वस्थ पशुओ को चटा दें । इस प्रयोग से उन्हे इस रोग की छूत लगने का ख़तरा कम हो जायेगा ।
३ - औषधि - पानी मे थोड़ा - सा कलमीशोरा और थोड़ा - सा नमक घोलकर सब स्वस्थ पशुओ को पिलाते रहे ( ताकि यदि कभी रोग के कीटाणु उनके अन्दर पहुँच भी जायें तो तत्काल ही नष्ट हो जायें । )
५ - प्लेग
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कारण व लक्षण - इस संक्रामक रोग का प्रभाव बहुत ही तीव्र गति से होता हैं । रोगाक्रान्त पशु से अन्य स्वस्थ पशुओ को इस रोग के कीटाणु अपना शिकार तेज़ी से बनाते हैं । अत: स्वस्थ पशुओ से रोगी पशु को तुरन्त अलग करना चाहिए । इस रोग मे बुखार के साथ गिल्टी निकलकर पशु को कष्ट देती हैं ।बैल व गाय आदि पशुओ की नाक , आँख , मुँह से पानी बहना , तन्द्रा होना , रोंगटे खड़ा हो जाना , मल- मूत्रवरोधन तथा श्वसन क्रिया मे अनियमिता और अवरोध उपस्थित हो जाते हैं तथा पशु के मृत्यु कारक लक्षण प्रकट होते हैं ।प्लेग रोग का निदान तुरन्त कर लेना चाहिए अन्यथा २४ घन्टे के अन्दर ही रोगी पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।
१ - औषधि - दशमूल , पाचन , समुद्र फेन , बुबई व तुलसी की पत्तियाँ प्रत्येक सममात्रा मे लेकर एंव काले धतुरे की कुछ पत्तियाँ पीसकर मिलाकर इसकी पुलटीश ४-५ घन्टे के अन्तर पर रोगी पशु की गर्दन पर गिल्टियों वाले स्थान पर लगाये यह लाभकारी योग हैं ।
२ - औषधि - सहजन के बीज भाँग का चूर्ण अपामार्ग ( चिरचिटा ) का चूर्ण , पीपल , अरण्डी के बीज का गूद्दा और मृगनाभि चूर्ण प्रत्येक को उचित मात्रा मे मिलाकर आवश्यकतानुसार रोगी पशु को दिन मे २-३ बार पिलाना चाहिए ।
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Tuesday, 13 January 2015
( ३० ) - गौ - चिकित्सा.अण्डकोषरोग।
( ३० ) - गौ - चिकित्सा.अण्डकोषरोग।
१ - नंदी, साँड़ के अण्डकोष ( पोतो ) में सूजन
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कारण व लक्षण - साँड़ के अण्डकोषो में अचानक चोट लगने पर या वायुविकार ( बादी ) होने पर पोतों में सूजन आती है । तथा साँड़ को बेचैनी रहती है । वह पिछलेवाले दोनों पैर फैलाकर खड़ा रहता है और अक्सर उसको बुखार भी बना रहता है ।
१ - औषधि - नीम की पत्तियों तथा नमक का उबला हुआ पानी से गुनगुना होने पर दोनों समय झराई ( सेंकना)
चाहिए, फिर रूई द्वारा पानी को पोंछकर आग वर्णित दवाई लगानी चाहिए । विधारा की पत्ती ६० ग्राम , नारियल तैल ६० ग्राम , विधारा की पत्तियों को बारिक पीसकर कपडेद्वारा रस निकालकर उसे तैल में मिलाकर , गुनगुना करके रोगी के पोतों पर दोनों समय आराम होने तक मालिश करे ।
२ - औषधि - मालती बेल का पञ्चांग २४ ग्राम , नारियलतैल ४८ ग्राम , मालतीबेल को महीन पीसकर तैल में मिलाकर साँड़ के पोतों पर आराम होने तक मालिश करें ।
३ - औषधि - पलाश ( ढाक ) के फूल ९६० ग्राम , पानी १० लीटर , फूलों को पानी में उबालकर गुनगुना होने पर पानी से फूल निकालकर एक कपड़े में रखकर साँड़ के पोतों पर बाँध देना चाहिए । और उसी गरम पानी से पहले पोतों को सेंकना चाहिए । यह क्रिया आराम आने तक करनी चाहिए ।
४ - औषधि - सूर्यमुखी के फूल ९६० ग्राम , पानी १० लीटर , फूलों को पानी में डालकर उबालना चाहिए फिर गुनगुने पानी से पोतों की दोनों समय ,आराम आने तक सिकाई करनी चाहिए ।
५ - औषधि - सूर्यमुखी के बीज ६० ग्राम , नारियल तैल १२० ग्राम , बीजों को महीन पीसछानकर तैल में मिलाकर गरम करना चाहिए और गुनगुना होने पर रूई को फैलाकर यह पेस्टउसके ऊपर फैलाकर पोतों पर रखकर पट्टी बाँध दें यह क्रिया आराम होने तक दोनों समय करनी चाहिए ।
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२ - नंदी का स्खलित होना
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१ - बैल ( साण्ड ) व भैंसा या अगली टाँगों में ही वीर्य निकालने ( स्खलित ) लगता है ,झूरने लगता है --ऐसी स्थिति में गेरू १ किलो , गेहूँ का आटा १ किलो, गेरू कूटछानकर आटे में मिलाकर १००-१०० ग्राम , की खुराक बनालें । एक खुराक को एक किलो पानी में भिगोकर रख दें ।तथा प्रात: उठकर नाल से दवा पिला दें ।सभी खुराक प्रतिदिन प्रात: ही देवें ।
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१ - नंदी, साँड़ के अण्डकोष ( पोतो ) में सूजन
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कारण व लक्षण - साँड़ के अण्डकोषो में अचानक चोट लगने पर या वायुविकार ( बादी ) होने पर पोतों में सूजन आती है । तथा साँड़ को बेचैनी रहती है । वह पिछलेवाले दोनों पैर फैलाकर खड़ा रहता है और अक्सर उसको बुखार भी बना रहता है ।
१ - औषधि - नीम की पत्तियों तथा नमक का उबला हुआ पानी से गुनगुना होने पर दोनों समय झराई ( सेंकना)
चाहिए, फिर रूई द्वारा पानी को पोंछकर आग वर्णित दवाई लगानी चाहिए । विधारा की पत्ती ६० ग्राम , नारियल तैल ६० ग्राम , विधारा की पत्तियों को बारिक पीसकर कपडेद्वारा रस निकालकर उसे तैल में मिलाकर , गुनगुना करके रोगी के पोतों पर दोनों समय आराम होने तक मालिश करे ।
२ - औषधि - मालती बेल का पञ्चांग २४ ग्राम , नारियलतैल ४८ ग्राम , मालतीबेल को महीन पीसकर तैल में मिलाकर साँड़ के पोतों पर आराम होने तक मालिश करें ।
३ - औषधि - पलाश ( ढाक ) के फूल ९६० ग्राम , पानी १० लीटर , फूलों को पानी में उबालकर गुनगुना होने पर पानी से फूल निकालकर एक कपड़े में रखकर साँड़ के पोतों पर बाँध देना चाहिए । और उसी गरम पानी से पहले पोतों को सेंकना चाहिए । यह क्रिया आराम आने तक करनी चाहिए ।
४ - औषधि - सूर्यमुखी के फूल ९६० ग्राम , पानी १० लीटर , फूलों को पानी में डालकर उबालना चाहिए फिर गुनगुने पानी से पोतों की दोनों समय ,आराम आने तक सिकाई करनी चाहिए ।
५ - औषधि - सूर्यमुखी के बीज ६० ग्राम , नारियल तैल १२० ग्राम , बीजों को महीन पीसछानकर तैल में मिलाकर गरम करना चाहिए और गुनगुना होने पर रूई को फैलाकर यह पेस्टउसके ऊपर फैलाकर पोतों पर रखकर पट्टी बाँध दें यह क्रिया आराम होने तक दोनों समय करनी चाहिए ।
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२ - नंदी का स्खलित होना
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१ - बैल ( साण्ड ) व भैंसा या अगली टाँगों में ही वीर्य निकालने ( स्खलित ) लगता है ,झूरने लगता है --ऐसी स्थिति में गेरू १ किलो , गेहूँ का आटा १ किलो, गेरू कूटछानकर आटे में मिलाकर १००-१०० ग्राम , की खुराक बनालें । एक खुराक को एक किलो पानी में भिगोकर रख दें ।तथा प्रात: उठकर नाल से दवा पिला दें ।सभी खुराक प्रतिदिन प्रात: ही देवें ।
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