Saturday, 7 November 2015

(३८)- गौ - चिकित्सा .आग से जलना ।

(३८)- गौ - चिकित्सा .आग से जलना ।

१ - आग से जल जाना
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कारण व लक्षण -कभ- कभी भूल से आग लग जाने अथवा छप्पर , मकान आदि पशु के बाधने के स्थान पर अचानक आग लग जाने पर पशु आग से झुलस जाते हैं । मामूली जलने पर तो जलीं हुई जगह लाल - सी पड़ जाती हैं ,किन्तु अधिक जल जाने पर फफोलें पड़ जाते हैं । पशु जल जाने पर जिस स्थान कम जला होता है वहाँ की जगह सुर्ख़ हो जाती हैं। जले हुए स्थान मे फफोलों के फुटने से घाव हो जाते हैं ऐसी अवस्था मे चूने का पानी और अलसी का तेल २५०-२५० ग्राम लेकर एक साथ ख़ूब मिलाकर उसमे कपड़ा भिगोकर जले हुए स्थान पर लगाना हितकर रहेगा ।

१ - औषधि - अलसी का तेल १२० ग्राम , चूने का पानी ६० ग्राम , राल ( बारूद ) १२ ग्राम , राल को पीसकर तीनों आपस में मिलाएँ फिर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक लगायें।

२ - औषधि - असली शहद २४० ग्राम , बढ़िया सिन्दुर ( कामियाँ सिन्दुर ) १२० ग्राम , दोनों को आपस में ख़ूब फैंट कर रोगी पशु को दिन में तीन बार लगाये , ठीक होने तक लगाते रहे। या पहले शहद लगाकर ऊपर से सिन्दुर भी लगा सकते है ।

३ - औषधि - उँधा फूली के पत्तों का रस ( पाना चोली ) १२ ग्राम , अलसी का तेल ६० ग्राम , दोनों को आपस में फैटकर रोगी पशु को अच्छा होने तक दिन में दो तीन बार लगाते रहे ।

४ - औषधि - कई बार मक्खियाँ बहुत अधिक सताती है तो ऐसी स्थिति में हमें डीकामाली ( मालती बेल ) ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , डीकामाली को महीन पीसकर तथा तैल में भिगोकर रोगी पशु को ठीक होने तक दिन में तीन बार लगायें। कई बार अलसी के तैल के स्थान पर नारियल का तैल भी उक्त स्थान पर लगा सकते है। इससे ज़्यादा फ़ायदा होगा। एक बात और ध्यान रखना चाहिए कि डीकामाली को पीसकर रख लें । लगाने से पहले ही तैल में मिलाएँ क्योंकि मिलाकर अधिक समय रखने पर डीकामाली की गन्ध उड़ जाती है।

५ - औषधि - मोरपंख को जलाकर उसकी राख को चलनी में छानकरनारियल के तैल में मिलाकर पशु को अच्छा होने तक दिन में दो बार लगाते रहें।
मोरपंख व नारियल तैल को आप किसी भी घाव पर लगा सकते है जहाँ मक्खियाँ ज़्यादा सताती हो वहाँ प्रयोग करें ।

६ - औषधि - बेर की पत्ती ( बोर की पत्ती ) २४ ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , पत्तियों को ख़ूब महीन पीसकर तथा तैल में मिला कर रोगी पशु को दिन में दो बार लगाते रहे ठीक होने तक।

७ - औषधि - घृतकुमारी ( एलोविरा ) गूद्दा ४८० ग्राम गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी २४० ग्राम , घृतकुमारी के गूद्दे को दही में मिलाकर ख़ूब मथकर इसमें पानी मिला कर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक रोज़ पिलाते रहें।

८ - औषधि - बेल ( बिल्व फल ) का गूद्दा ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , पहले बेल फल के गूद्दे को पानी में मथकर छान लें, फिर उसे दही में मथकर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक पिलाते रहें ।

९ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी १८२० ग्राम , पहले मेंथी के दानों को महीन पीसकर पानी मे गलाये फिर दही में मिलाकर रोगी पशु को दिन में दो बार पिलाते रहे अच्छा होने तक। पशु अवश्य ठीक होगा ।

१० - औषधि - मेहन्दी के पत्ते जलाकर उसकी राख घावों पर छिड़कना भी लाभकारी होता हैं ।

११ - औषधि - चूने के निखरे हुए पानी को अलसी या नारियल के तैल मे और कपूर मिलाकर किसी साफ़ बोतल मे भरकर सुरक्षित रखे , दवा को लगाने से पहले ख़ूब हिलाये उसके बाद जले हुए स्थान पर दिन मे २-३ बार लगाने से लाभ होता हैं ।

१२ - औषधि - गाय के मक्खन को फूल ( काँसे ) की परात या थाली मे डालकर साफ़ पानी मे मिलाकर ख़ूब फैटते रहे फिर पानी को निकालकर दूसरा पानी डालकर फैटते रहे , इस क्रिया को २० से १०० बार करने से यह घी सतधौत घी बन जायेगा अब इस घी को किसी मिट्टी के बर्तन मे रखे और रोगी पशु के जले हुए स्थान पर दिन मे २-३ बार लगायेंगे तो अवश्य ठीक होगा ।

यदि पशु अधिक जल गया हो तो सावधानीपुर्वक पशु को दिन मे दो- तीन करवट अवश्य दिला देनी चाहिए तथा पीड़ित पशु को मक्खी व मच्छर से बचाने का कोई उत्तम उपाय अवश्य करना चाहिए । या कोई कपड़ा डालकर ढक दें ।
१३ - चूने के निथरे हुए पानी को अलसी या गोले के तैल मे अथवा तिल के तैल मे थोड़ा - सा कपूर मिलाकर समपरिमाण मे मिलाकर किसी साफ़ - स्वच्छ बोतल में भरकर ख़ूब हिलायें । जब सब दवा हि- मिलकर एक हो तो इस दवा को दिन मे २ बार जले हुए स्थानों पर लगायें ।
जले स्थान को मक्खियों से बचाने के लिए हल्के कपड़े से ढकें तथा यह भी ध्यान रहे कि उपरोक्त दवा पशु चाटने न पायें ।

१४ - औषधि - गाय के शुद्ध घी को फूल ( काँसे ) की थाली या परात मे पानी डालकर बार- बार घी धोयें और फैटे और पानी बदले इस प्रकिया को सौ बार करके साफ़ करके निथार लें और फिर जले हुए स्थान पर लगाने बहुत आराम होता हैं ।



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२ - गरम पानी से जल जाना
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कारण व लक्षण - कभी- कभी अज्ञानतावश पशु को अधिक गरम पानी से सेंक देतें हैं या गरम - गरम पानी फैंक देत है उसके ऊपर , जिससे पशु जल जाता है । उसकी चमड़ी सुन्न पड़ जाती है और तिडक जाती है ।

१ - औषधि - गेरू ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , गेरू को महीन पीसकर कपडछान करके तैल में मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर दोनों वक़्त , सुबह- सायं ठीक होने तक लगाते रहे ।

२ - औषधि - चूने का पानी ६० ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर ख़ूब हिलायें और उसके बाद में रोगी पशु को लगायें ।

३ - औषधि - सिन्दुर ६० ग्राम , शहद ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर जले हुए स्थान पर लेप कर दें । और ठीक होने तक करते रहें ।





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