Saturday, 7 November 2015

( ३२ ) - गौ- चिकत्सा - विष ( ज़हर ) का उपचार

( ३२ ) - गौ- चिकत्सा - विष ( ज़हर ) का उपचार


१ - विष ( ज़हर ) का उपचार
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पशु के शरीर मे विष कई कारणों से व्याप्त होता हैं , कभी बच्छनाग खाने से तो कभी संखिया या सींगिया खाने से अथवा कभी चरी खाने से । इनमे से प्रत्येक के लक्षण और दवाऐं अलग- अलग होती हैं । मुख्य रूप से ऐसी घटनाओं के पीछे दो प्रमुख कारण होते हैं । एक तो यह कि पशु को ज़हर दिया हो अथवा विषैली घास , कीड़े - मकोड़े आदि खा जाने या सर्प आदि ज़हरीले जन्तु द्वारा काटा जाना । दूसरा कारण - वर्षाऋतु में अचानक वर्षा रूक जाने से घास मे एक विशेष प्रकार का ज़हर पैदा हो जाना अथवा वर्षा के दिनों में ज़हरीली घासें तथा कीड़े-मकोड़े पैदा हो जाना होता हैं । इन घासों अथवा कीड़े-मकोड़े को घास के धोखे मे खा जाना और पशु के शरीर मे उसका ज़हर फैल जाना तथा थोड़े समय मे ही पशु की मृत्यु हो जाती हैं । कभी- कभी सर्प के काटने से भी विष प्रभाव के कारण पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।

लक्षण - यदि पशु को अधिक मात्रा मे ज़हर खिला दिया गया है , तो वह एकदम बिमार पड़ जायेगा । उसके पेट मे अचानक दर्द उठेगा और बेचैन होकर सींग तथा पैर पेट मे मारेगा और बार- बार अपनी गर्दन कोख की ओर घुमाकर देखेगा। उसके मुँह से झाग गिरने लगेगा , पेट फूलता जायेगा , प्यास बढती जायेगी तथा वह बार- बार पतला गोबर करता है फिर पतले दस्त होने लगते हैं , तदुपरान्त दस्तों के साथ ख़ून भी आने लगेगा तथा इसी बेचैनी की दशा में पशु की मृत्यु हो जायेगी ।

२ - विष- चिकित्सा
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ये तो भिन्न - भिन्न प्रकार के विषयों के लिए अलग- अलग दवाएँ हम आगे लिख रहे है किन्तु यदि आपकी समझ मे यह भी न आये कि- पशु को कौन- सा विष प्रभावित कर रहा है तो भी प्राथमिक उपचार के तौर पर सभी प्रकार के विषों के लिए कुछ दवाओं का वर्णन कर रहे है जिसके द्वारा पशु के जीवन की रक्षा की जा सकती हैं ।

१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पीसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या झरता द्वारा पिला दें ।

२ - औषधि - थोड़ी - सी चीनी पानी मे घोलकर पिलाने से भी विषैली घास आदि का विष क्षीण हो जाता हैं ।

३ - औषधि - अण्डे की सफ़ेदी पानी मे फैटकर पिलाना लाभकारी सिद्ध होता हैं ।

४ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को पिलाने से भी पेट का विष गुदाद्वार से बाहर निकल जाता हैं ।

५ - औषधि - पशु को जितना अधिक दूध पिला सकते है पिलाये , यदि विष तेज हो तो गाय का घी जितना अधिक पिला सकते हैं, पिलाये यह लाभप्रद होता हैं ।

६ - औषधि - डेढ़ पॉव अलसी को ४ लीटर पानी मे मन्द- मन्द आँच पर चलाते हुए पकाये और जब दलिया तैयार हो जाये तो छानकर नमक मिलाकर पशु को पिलाये ।

# - ध्यान रहे कि - जब तक पशु के पेट में दर्द रहे तब तक पीड़ित पशु को पानी बिलकुल नही देना चाहिए ।


३ - संखिया का विष ( arsenic Poisoning )
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संखिया का विष खाने के कुछ समय बाद ही पशु बेचैन हो उठता है । पशु के पेट मे दर्द व जलन सी होती हैं । पशु खाया हुआ चाका मुँह से निकालने लगता हैं । पशु को खूनीदस्त शुरू हो जाते हैं । प्यास बढ़ जाती है और जीभ सूख जाती हैं तथा आँखो मे गड्ढे पड़ने लगते हैं , पशु के मुँह से थूक बिलकुल ग़ायब हो जाता हैं । आँखे लाल हो जाती हैं । पशु का शरीर गरम रहता हैं तथा गुदामार्ग से काला ख़ून निकलने लगता हैं , और पशु को मूर्छा आ जाती हैं । पशु पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं और अन्त में श्वास तथा कण्ठ अवरूद्ध होकर पशु का शरीर ठण्डा पड़ जाता है , और पशु की मृत्यु हो जाती हैं ।

१ - औषधि - गाय या बकरी का गरम दूध और घी कई बार पिलायें । लाभप्रद होता हैं ।

२ - औषधि - गुलाब जल मे सफ़ेद कत्था मिलाकर पिलाना भी लाभप्रद हैं ।

३ - औषधि - केले की जड के रस मे कपूर मिलाकर पिलाना लाभप्रद हैं ।

४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।

५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।

६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।

७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।

८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।


४ - पारे का विष ( Mercury Poisoning )
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हरताल , रसकपूर आदि पारे की अपेक्षा अधिक तीव्र विष हैं । पारे का प्रभाव उग्र विषों कि भाँति तत्काल नही होता हैं , पारा खिलाये जाने से पशु का मुँह आ जाता हैं । पेट मे दर्द , दस्तों का लग जाना , पसीना अधिक आना आदि लक्षण प्रकट होते हैं तथा अन्त मे बेहोश होकर मृत्यु हो जाती हैं ।

१ - औषधि - दूध मे देशी मुर्ग़ी के अण्डों की सफ़ेदी तथा गाय का घी मिलाकर जितना अधिक पिला सकें पिलाये । लाभप्रद होता हैं ।

२ - औषधि - जवाॅखार या सज्जी २५० मिलीग्राम को पानी मे मिलाकर पिलायें लाभदायक सिद्ध होगा ।

३ - औषधि - पेटदर्द के लिए ६ माशा अफ़ीम को माण्ड के साथ मिलाकर पिलाये ,यह लाभदायक होता हैं ।


५ - कनेर का विष
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पशु कभी- कभी कनेर के फल को खा लेता है , जिसके कारण पशु को कनेर का विष चढ़ जाता हैं । और पशु जूगाली करना बन्द कर देता हैं । पेट फूल जाता हैं । पतले दस्त आते हैं, पशु का शरीर काँपता हैं । गर्दन मे झटके आते है और नाड़ी की गति दुर्बल पड़ जाती हैं ।

१ - औषधि - बारीक पीसी हुई सोंठ सवा तौला , बारीक पिसी हुई गन्धक १० तौला , अलसी का तैल २० तौला , चावलों का माण्ड आधा किलो - इन समस्त वस्तुओं को मिलाकर पीड़ित पशु को नाल या ढरके द्वारा पिला दें । और पशु को अण्डे और गाय का दूध व घी पिलायें यह लाभदायक सिद्ध हो सकता हैं ।


६ - श्वेत घुँघुची (रत्ती ) का विष ( Acorus Poisoning )
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विष देने वाले व्यक्ति अक्सर श्वेत घुँघुची ( सफ़ेद रत्ती ) पशु को खिला देते हैं । इसके लक्षण तथा प्रभाव संखिया के विष के समान ही होते हैं । पशु थोडी देर बाद ही पशु बेचैन हो उठता हैं , पेट मे दर्द व जलन होती हैं । पशु खाया हुआ चारा मुँह से निकलने लगता हैं , ख़ूनी दस्त होते है , प्यास बढ जाती हैं और जीभ सूख जाती है और आँखो मे गड्ढे पड़ जाते हैं , मुँह मे थूक भी सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती है , पशु का शरीर गरम होता हैं , पशु को मूर्छा आ जाती हैं और वह पैर फैलाकर पड़ा रहता हैं , अन्त मे श्वास व कण्ठ अवरूद्ध हो जाता हैं और शरीर ठन्डा पड़ जाता हैं ।

# - इस विष का इलाज भी संखिया की तरह ही होता है ।

१ - औषधि - गाय का गरम दूध ३ लीटर मे गाय का ही १ किलो घी मिलाकर पिलाये जिससे ज़हर आँतों को काटेगा नही और पशु के स्वास्थ्य मे लाभ होगा ।

२ - औषधि - बकरी का दूध ३ लीटर मे गाय का घी १ किलो मिलाकर गरम- गरम दूध मे मिलाकर गुनगुना ही पिलाने से लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - केले की जड के रस १ लीटर मे देशी कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभदायक है ।


४ - औषधि - पशु को बार- बार गाय का घी व दूध तथा चावलों का माण्ड अधिक मात्रा मे पिलाये ।

५ - औषधि - दूध १ लीटर ,मे देशी मुर्ग़ी के २ अण्डे , घोल- घोलकर पिलायें ।

६ -औषधि - चौलाई को दूध मे घोटकर गाय का घी मिलाकर पिलायें तथा ठण्डे पानी के स्थान पर गरम पानी पीने को दें ।

७ -औषधि - लोहे की जंग १ तौला पीसकर चूने या नौसादर के १ तौला पानी मे मिलाकर पिलायें । और पशु के पेट का दर्द कम करने के लिए ६ माशा अफ़ीम चावलों के माण्ड मे मिलाकर पिलायें ।

८ - औषधि - साबुन पानी मे घोलकर पशु को अच्छी तरह पिला दें , किन्तु पानी गरम होना चाहिए ।



७ - भाँग ( विजया ) व धतुरे का विष
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भाँग तथा धतुरा दोनो ही मादक व विषैले पदार्थ हैं । इनके पत्ते तंथा बीज दोनो ही ज़हरीले होते हैं । पशु प्राय: इन्हें धोखे मे खा जाते है । तो निम्नांकित लक्षण प्रकट होते हैं ।
पशु लड़खड़ा कर चलता हैं , गिर- गिर पड़ता हैं , प्यास अधिक लगती हैं , गला सूख जाता हैं , आँखे लाल हो जाती हैं । धतुरा खाने से आँख की पुतली फैलकर चौड़ी हो जाती हैं । कभी- कभी पशु बेहोश होकर मर भी जाता हैं ।

१ - औषधि - पशु के समस्त शरीर पर और विशेषकर सिर पर लगातार ठण्डे पानी की धार ख़ूब डालें । लगभग १०० बाल्टी पानी ऊपर से डाले ताकि विष से उत्पन्न गर्मी कम हो जायें ।

२ - औषधि - बिनौलें की मींगी ( बिनौला बीज / कपास बीज ) १ किलो को गाय के दूध ३ किलो के साथ पीसछानकर दिन मे ३-४ बार पिलायें । इससे भाँग व धतुरे के विष का प्रभाव खत्म होता हैं ।

३ - औषधि - आक ( मदार ) की जड २५ ग्राम , घिसकर पानी २ लीटर पानी मे मिलाकर पिलाना हितकर होता हैं ।

४ - औषधि - चौलाई २ किलो को पीसकर , दही ४ किलो मे मिलाकर पशु को खिलाना चाहिए ।

५ - औषधि - नींबू का रस २५० ग्राम , इमली का पना ५०० ग्राम , पिलाने से लाभ होता हैं ।

६ - औषधि - यदि धतुरे के विष का प्रभाव अधिक तीव्र हो तो गाय का दूध ५ किलो मे मुर्ग़ी के १० अण्डे मिलाकर रखे और फिर थोडी - थोडी देर बाद पिलाये और यदि पशु को वेदना ज़्यादा है तो पशु को १ पाँव देशी शराब पिलायें ।

८ - बच्छनाग का विष
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बच्छनाग खाने से पशु की जीभ व होंठ सूख जाते हैं और पशु हाँफने लगता हैं , पशु को मुर्छा आ जाती हैं और पशु के मुँह से तीव्र दुर्गन्ध निकलती हैं ।

१ - औषधि - बथुआ और पालक के साग ( साक ) का अर्क निकालकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।

२ - औषधि - गाय का दूध ३ लीटर या बकरी का दूध ३ लीटर गर्म दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - गाय के दूध से बने २ किलो खट्टे मट्ठे मे १०० ग्राम नींबू का रस मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।

४ - औषधि - पशु के शरीर के ऊपर अधिक से अधिक ठन्डा पानी अति उत्तम रहेगा । इससे पशु को बहुत लाभ होता हैं । पशु के शरीर पर पानी का गिराना प्रत्येक विष मे लाभदायक होता हैं ।

# - पीड़ित पशु को २ दिन तक चारा खाने को न दें तथा पीने के पानी मे गुलाबजल मिलाकर देना चाहिए ।



९ - सींगिया विष
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इस विष से पीड़ित पशु के दाँत व जीभ का रंग नीला हो जाता हैं । मूर्छा छा जाती हैं , मल और मूत्र के मार्ग से रक्त बहने लगता हैं ।

१ - औषधि - गाय व बकरी का ३-३ किलो दूध पिलाने से लाभ होता हैं ।

२ - औषधि - गुलाबजल २५० ग्राम ,मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलायें ।

३ - औषधि - खीरा या तरबूज़ का पानी पिलाने से भी लाभ होता हैं ।

४ - औषधि - ईसबगोल या बिहीदाने का लबाव ( पानी मे भिगोकर ) देना चाहिए ।

५ - औषधि - बर्फ़ के जल ३ किलो मे कपूर १० ग्राम मिलाकर पिलाना लाभकारी होता हैं ।



१० - अफ़ीम का विष ( Opium Poisoning )
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अफ़ीम स्वाद में कडुवी होने के कारण पशु इसे खाते- खाते उगल देता हैं । किसी भी प्रकार पशु के पेट में अफ़ीम पहुँच जाने पर पशु को मूर्छा आ जाती हैं । आँखो की पुतलियाँ सिकुड़ जाती हैं तथा मुँह से अफ़ीम की दुर्गन्ध भी आती हैं ।

१ - औषधि - २-२ घन्टे के अन्तर से ५-६ बार पशु को - कटेरी का कुटकर निकला हुआ रस २५-२५० ग्राम की मात्रा मे पिलायें ।

२ - औषधि - हुलहुल ( सूरजमुखी ) के बीज पीसकर गाय के घी के साथ पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।

३ - औषधि - चौलाई की जड का रस ५०० ग्राम , गाय का घी १ किलो गरम करके घी को गुनगुना करके दोनो को मिलाकर पिलाना चाहिए यह लाभदायक होता हैं ।

४ - औषधि - १ छटाक ब्राण्डी शराब पीड़ित पशु को दें दें । यह भी अफ़ीम के प्रभाव को क्षीण कर देती हैं ।



११ - कुचले का विष ( Nux Vomica Poisoning )
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पशु को कुचला खिलाये जाने के थोडी देर बाद ही पशु को जँभाइयाँ आने लगती हैं और उसके शरीर के समस्त अंग ऐंठने लगते हैं ।हाथ- पैर मे झटके- से लगते हैं , श्वास गति तेज हो जाती हैं । अन्त मे पशु बेहोश होकर मर जाता हैं ।
१ - औषधि - अरण्डी का तैल १ किलो , पीड़ित पशु को पिला देना चाहिए ,ताकि दस्तों द्वारा शरीर के अन्दर का विष निकल जाये ।

२ - औषधि - संखिया के विष को नष्ट करने वाला पुर्व वर्णित योग कुचले के विष को दूर करने मे भी लाभदायक होता हैं ।

३ - औषधि - माजूफल या तम्बाकू १०-१० ग्राम का काढ़ा बनाकर पशु को पिलायें इस प्रयोग से भी कुचले का विष दूर हो जाता हैं ।


१२ - जमालघोटे का रस
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जमालघोटा एक अत्यन्त ही गरम तथा दस्तावर विष है । कभी- कभी किसी दवा मे , जब इसकी मात्रा अधिक पड़ जाती है तो पशु पर उसके प्रयोग से विष का प्रभाव पशु पर हो जाता हैं । इससे पशु को दस्त अधिक आते हैं , ऐंठन व जलन होती हैं , पशु घबराकर गिर पड़ता हैं और बेहोश हो जाता हैं ।

१ - औषधि - गरमपानी पिडित पशु को ख़ूब पिलायें ।

२ - औषधि - माजूफल २ तौला , अफ़ीम ४ माशा , चावलों के आधा किलो माण्ड मे मिलाकर पीड़ित पशु को पिलाये । लाभदायक होता हैं ।


१३ - औषधि - तूतीया ( नीलाथोथा ) का विष
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नीलाथोथा से पुती दिवार को चाटने से अथवा ताँबे के बर्तन मे रखी वस्तु खा लेने से पशु पर इसका इसका ज़हरीला प्रभाव होता हैं ।

१ - औषधि - साबुन, अण्डे , दूध , मीठा तेल , नमक ,तथा काँजी आदि वस्तुएँ जितनी अधिक पशु को खिला सके - खिलाये । ये सभी वस्तुएँ नीले थोथे के विष को क्षीण करती हैं ।


१४ - तेज़ाब का ज़हर ( Acid Poisoning )
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पशु कभी- कभी तेज़ाब पी जीते हैं , जिसके कारण उनके मुँह और गले ,मैदे आदि मे जलकर घाव पड़ जाते हैं और पीड़ित पशु कोई भी चीज खा- पी नही पाता हैं ।

१ - औषधि - पीड़ित पशु को चूने का पानी पिलाना लाभदायक सिद्ध होता हैं ।

२ - औषधि - गाय के दूध मे अण्डे फैटकर पिलाना भी लाभकारी होता हैं ।

३ - औषधि - पानी मे साबुन घोलकर उसमे थोडी- सी अफ़ीम घोलकर पिलाने से भी लाभ होता हैं ।



१५ - चूना आदि क्षारों का कुप्रभाव
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१ - औषधि - चूना आदि तेज क्षार खा जाने से यदि पशु के मुँह मे घाव हो जाये तो उसे - नींबू का अर्क , इमली का पानी , काँजी अथवा ताजा कच्चा दूध पिलाना लाभकारी होता हैं ।

२ - औषधि - मीठा तैल अथवा तिलों का तैल पिलाना भी गुणकारी होता हैं ।

३ - औषधि - जामुन का तेज़ाब पानी में मिलाकर पिलाना भी लाभकारी हैं किन्तु ध्यान रहें कि तेज़ाब बहुत थोडी मात्रा मे डालें ।


१६ - चेरी का विष ( Green Grass Poisoning)
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बरसात के मौसम में जब अचानक पानी बरसना बन्द हो जाता है और हरी- चरी छोटी होती हैं तो उसमे एक प्रकार का विष उत्पन्न हो जाता हैं । उस चरी के खा लेने से पशु के सारे शरीर में विष फैल जाता हैं । इससे पीड़ित पशु बेदम और बेहोश हो जाता हैं । इसी प्रकार - जोड़े की ऋतु मे घास या किसी प्रकार के छोटे पौधे पर एक प्रकार का कीड़ा रहता हैं । यदि पशु किसी प्रकार से उस घास को खा जाता हैं तो उसका विष उसके शरीर मे फैल जाता हैं ।

१ - औषधि - इसका तात्कालिक उपचार यह है कि - पानी से कीचड़ निकालकर पीड़ित पशु के पूरे शरीर पर लपेट देनी चाहिए ।

२ - औषधि - कालीमिर्च , सोंठ , हींग , और अजवायन , प्रत्येक १०-१० ग्राम , तथा कालानमक २० ग्राम , - इन सब वस्तुओं को लेकर बारीक पीस लें और आधा लीटर गुनगुने पानी मे मिलाकर रोगी को दिन भर मे ऐसी २ मात्राएँ पिला दें । लाभकारी होता हैं ।

३ - औषधि - एक लीटर गरम दूध में आधा किलो गाय का घी और आधी छटाक तारपीन का तैल पीड़ित पशु को भलीप्रकार पिलाकर तदुपरान्त नीचे लिखी औषधियाँ देना चाहिए ।
केले की जड का रस २५० ग्राम , कपूर १० ग्राम , इन दोनो को भलीप्रकार मिलाकर पशु को पिला दें । कपूर को पहले थोडी- सी शराब अथवा सिरके मे घोलकर केले के रस में मिला लें । यदि केले का रस न हो तो - २५० ग्राम , गुलाबजल अथवा उबले हुए जल का प्रयोग कर सकते हैं ।

# - किसी भी प्रकार के विष पीड़ित पशु को फिटकरी का पानी पिलाने से लाभ होता हैं ।


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