Sunday, 13 June 2021

रामबाण योग :- 114 -:

रामबाण योग :- 114 -:

बड़ी अरणी -

प्राचीन काल से ही बड़ी अरणी का उपयोग कई तरह के रोगों के इलाज में औषधि के रूप में होता रहा है। बड़ी अरणी को अंगेथु, गणियारी कई अन्य नामों से भी जाना जाता है । पेट से जुड़े रोगों के इलाज में बड़ी अरणी काफी फायदेमंद है । आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार इसकी पत्तियां, तना, फल तीनों ही सेहत के लिए गुणकारी हैं।
बड़ी अरणी का पेड़ पहाड़ों पर पाया जाता है । बड़ी अरणी और छोटी अरणी में मुख्य अंतर यह है कि बड़ी अरणी का तना काफी बड़ा और मजबूत होता है । इसकी शाखाएं भी विपरीत दिशाओं में दूर तक फैली होती हैं जबकि छोटी अरणी का पौधा आकार में छोटा होता है । ग्रंथों के अनुसार बड़ी अरणी की तासीर गर्म होती है और अग्नि की तरह इसमें रोगों को तुरंत खत्म करने की क्षमता होती है. इसीलिए इसे संस्कृत में अग्निमंथ नाम दिया गया है।
 
अरणी का वानस्पतिक नाम Premna serratifolia L. (प्रेम्ना सेरेटिफोलिआ) Syn-Premna obtusifolia R. Br., Premna integrifolia L., Premna attenuata R. Br. है. यह Verbenaceae (वर्बीनेसी) कुल का पौधा है। Hindi : बड़ी अरनी, अरनी, अरणी, अंगेथु, गणियारी, गानियार, गानियारी, वाकर , English : क्रीक प्रेम्ना (Creek premna), स्पाइनस फायर बैंड टीक (Spinous fire brand teak), कोस्टल प्रेम्ना (Coastal premna) , Sanskrit : अग्निमंथ, वृहतग्निमन्थ, गणिकारिका, कणिका, श्रीपर्णी, वैजयन्तिका, जया, जयन्ती, नादेयी, वातघ्नी कहते है।
बड़ी अरनी पाचक अग्नि को बढ़ाने वाली, कटु और पौष्टिक होती है । यह कफघ्न, वातघ्न, शोथघ्न,  अनुलोमक शीत-प्रशमनकारक तथा पांडुरोग नाशक होती है। इसके पत्र वातानुलोमक, स्तन्यवर्धक तथा आमाशयिक-क्रियाविधिवर्धक होते हैं। इसकी मूलत्वक् स्तम्भक होती है। इसकी मूल विरेचक, अग्निवर्धक, बलकारक, उत्तेजक तथा यकृत् की पीड़ा को दूर करने वाली होती है।
 
#- हृदय दौर्बल्य - शरीर को निरोग रखने के लिए ह्रदय का स्वस्थ रहना बहुत ज़रूरी है । बड़ी अरणी के पत्ते और धनिया दोनों को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाएं। 10-30 मिली मात्रा में इस काढ़ा को पीने से हृदय की कमजोरी मिटती है।

#- त्रिदोषज गुल्म ,पेट फुलने की सम्सया - पेट फूलने की समस्या होने पर अरनी के उपयोग करना लाभदायक है । इसके लिए बड़ी या छोटी अरणी की जड़ों को 10-15 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बनाएं । 40 मिली गुनगुने काढ़े में 30 ग्राम गुड़ मिला कर पिलाने से तीनों दोषों के कारण होने वाली पेट फूलने की समस्या से आराम मिलता है।

#- उदर रोग - बड़ी अरणी की 100 ग्राम जड़ को लेकर आधा लीटर पानी में मंद ऑच पर 15 मिनट तक उबाले , तथा 50-60 ग्राम मिलीग्राम पानी दिन में दो बार पीने से जठराग्नि प्रबल होती है । यह औषधि पौष्टिक भी होती है।

#- अमाशय शूल,उदर रोग - बड़ी अरणी को 400 मिलीग्राम पानी में उबालकर , मसलकर , छानकर 50 मिलीग्राम की मात्रा में पिलाने से अमाशय शूल का शमन होता है।

#- ज्वर में उदरशूल - बड़ी अरणी मूल 5-10 ग्राम का क्वाथ बनाकर 20-40 मिलीग्राम क्वाथ को दिन में दो बीर पीने से ज्वर से पीड़ित व्यक्ति का उदरशूल मिटता है।

#- बद्धकोष्ठ ,कब्ज रोग - 3 ग्राम बड़ी अरणी के पत्ते तथा 3 ग्राम बड़ी हरड़ का छिलका लेकर 250 मिली पानी में पकाकर, काढ़ा बना लें। इसे सुबह-शाम 20-40 मिली की मात्रा में पिएं । इससे कब्ज की समस्या दूर होती है।

#- विबन्ध ( कब्ज रोग ) - 50 ग्राम बड़ी अरणी की जड़ को आधा ली पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 20-40 मिली मात्रा में सुबह शाम पीने से कब्ज दूर होती है। यह काढ़ा बहुत पौष्टिक भी होता है।

#- अतिसार व पेट के कीडें - बड़ी अरणी के पंचांग का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम 20-30 मिली मात्रा में पीने से दस्त से राहत मिलता है, साथ ही साथ इसके सेवन से पेट के कीड़े भी मर जाते हैं।

#- अध्मान ( अफारा ) - बड़ी अरणी के पत्तों का क्वाथ 20-40 मिलीग्राम पीने से अध्मान ( अफारा ) में लाभ होता है।

#- हस्तिमेह - बड़ी अरणी की जड़ व तने के छिलके का क्वाथ बनाकर 40-50 मिलीग्राम क्वाथ सुबह सायं पीने से हस्तिमेह में लाभ होता है। इस क्वाथ के पीने से वसा - मेह में भी लाभ होता है।

#- इक्षुमेह - अरणी मूलत्वक के क्वाथ 40-50 मिलीग्राम में मधु मिलाकर सेवन करने से इक्षुमेह में लाभ होता है।

#- वसामेह - 40-60 मिलीग्राम बड़ी अरणी मूलक्वाथ का सेवन करने से वसामेह में लाभ होता है।

#- शीतपित्त - 2 ग्राम बड़ी अरणी मूल को गाय के घी के साथ मिलाकर 6 दिन तक सुबह सायं खाने से शीतपित्त तथा उदर्द रोग मिटता है।

#- शोथ व मेदोरोग - बड़ी अरणी 10 ग्राम तथा त्रिफला 5 ग्राम लेकर रात को 1 लीटर पानी में मिट्टी के बर्तन में भिगो दें , सुबह क्वाथ बनाकर पीएँ , इसी तरह दोनों समय इस प्रयोग को करें, हल्का व सुपाच्य भोजन लें, बढ़ा हुआ मेंद व शोथ को दूर करने का यह अचूक प्रयोग है। ( यदि इसके प्रयोग से अतिसार की प्रतीति हो तो उसी के अनुसार मात्रा कम कर दें।

#- उदरशोथ ( सूजन ) - बड़ी या छोटी अरणी की जड़ों को 10-15 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर , ठंडा किए हुए पानी में अरणीक्षीर घोलकर पीने से और उसी पानी से मालिश करने से पेट की सूजन की समस्या ठीक होती है। 

# - सर्वांगशोथ - बड़ी अरणीमूल का क्वाथ बनाकर 40 मिलीग्राम मात्रा में सुबह सायं पीने से सर्वांग शोथ , उदरशूल , जलोदर , में लाभ होता है । इसके साथ गोमूत्र अर्क का प्रयोग किया जाय तो जल्दी लाभ होता है।

#- पेटदर्द, पेट फुलना व मंदाग्नि - 20 ग्राम बड़ी अरणी के पत्तों को 400 मिली पानी में पकाकर काढ़ा बनायें। इस काढ़े को 20-40 मिली की मात्रा में सुबह शाम पीने से पेट फूलना ( अफारा ), पेट में दर्द, मंद जठराग्नि आदि पेट से जुड़ी समस्याओं में लाभ मिलता है।

#- मोच, सूजन - अरणी की जड़ और पुनर्नवा की जड़ दोनों को समान मात्रा में लेकर पीस लें । इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लेप करें. इससे मोच में होने वाली सूजन कम होती है।

#- अपच व पेटदर्द - बड़ी अरणी की पत्तियों की सब्जी बनाकर खाने से पेट दर्द और अपच व बादी ( वात ) की समस्या दूर होती है ।

#- बवासीर दर्द की पोटली - बड़ी अरणी के पत्तों का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पिलाने से तथा इसके पत्तों की पोटली बनाकर बांधने से बवासीर के दर्द से राहत मिलती है।

#- बवासीर दर्द - मूली, त्रिफला, मदार, बांस, वरुण, बड़ी अरणी, सहिजन और अश्मतंक के  पाटों का काढ़ा बना लें । इस काढ़े को एक टब में डालें और उस टब में कुछ देर तक बैठें. ऐसा करने से बवासीर के दर्द से तुरंत आराम मिलता है ।


#- सिफ़लिस - 10-12 मिली बड़ी अरणी के पत्तों के रस को कुछ दिनों तक सुबह शाम पीने से सिफलिस में लाभ मिलता है। इसके पत्तों को उबालकर सिकाई करने से या पत्तियों को लिंग पर बांधने से भी सिफलिस के कारण लिंग में होने वाली सूजन में कमी आती है।


#- गठिया दर्द - बड़ी अरणी के पंचांग का काढ़ा बनाकर सुबह शाम 20-30 मिली मात्रा में पीने से गठिये के दर्द से आराम मिलता है ।

#- गठिया दर्द - बड़ी अरणी पंचांग को पीसकर गुनगुना करके जोड़ों पर लगाने से आर्थराइटिस, गठिया आदि में होने वाले दर्द से आराम मिलता है।

#- अर्टिकरिया - 2 ग्राम बड़ी अरणी की जड़ के चूर्ण को, गाय के घी के साथ मिलाकर 6 दिन तक सुबह शाम खाने से अर्टिकरिया की समस्या में लाभ मिलता है।
 
 #- ठंड का बुखार ( टोटका ) - बड़ी अरणी की जड़ या तने की छाल को पीसकर थोड़ा सा कपूर मिलाकर माथे पर लेप करने से ठंड लगकर आने वाले बुखार में लाभ होता है।                                                                                                                                                   
#- बच्चो के ठंड से बुखार - बड़ी अरणी के 10-15 पत्तों और 10 काली मिर्च को पीसकर सुबह-शाम सेवन करने से ठंड लगकर आने वाले बुखार में में लाभ होता है। बच्चों के लिए इसे कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ।

#- रक्त शोधक - 5 ग्राम बड़ी अरणी की जड़ की छाल में 3 ग्राम नीम की छाल मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 20-30 मिली की मात्रा में सुबह शाम पीने से रक्त साफ होता है।

#- रक्तशोधनार्थ - 5 मिली बड़ी अरणी के रस में शहद मिलाकर प्रतिदिन पिलाने से भी रक्त की शुद्धि होती है।


#- मोटापा - 10 ग्राम बड़ी अरणी तथा 5 ग्राम त्रिफला लेकर रात को 1 लीटर पानी में मिट्टी के बर्तन में भिगों दें । सुबह इसका काढ़ा क्वाथ बनाकर पीएं. सुबह और शाम दोनों समय इसका उपयोग करें साथ में हल्का व सुपाच्य भोजन लें । इससे कुछ ही दिनों में मोटापा दूर होने लगता है । अगर इस काढ़े के सेवन से आपको दस्त होने लगें तो इसकी मात्रा कम कर दें ।


#- प्रयोग विधी - बड़ी अरणी के जड़ के चूर्ण को 2 से 4 ग्राम की मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए । इसी तरह इससे तैयार काढ़े को 20-40 मिली मात्रा में और पत्तियों के रस को 5-10 एमएल मात्रा में लेना चाहिए ।
 

विशेष

:

दोनों

अरणी

के

बहुत

से

गुण

एवं

उनके

प्रयोग

काफी

समान

हैं

,

बड़ी

अरणी

में

छोटी

अरणी

की

तुलना

में

गन्ध

व

तीक्ष्णता

ज्यादा

होती

है।




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रामबाण योग :- 113 -:

रामबाण योग :- 113 -:

छोटी अरणी

-

अरणी

दो

प्रकार

की

होती

है

,

छोटी

और

बड़ी।

छोटी

अरणी

के

औषधीय

गुण

बहुत

सारे

बीमारियों

के

इलाज

के

लिए

इस्तेमाल

किये

जाते

हैं।

छोटी

अरणी

की

सब्जी

और

चटनी

भी

बनाई

जाती

है।

आयुर्वेद

में

अरणी

का

महत्व

इसके

औषधीय

गुणों

के

कारण

है।

जैसा

कि

पहले

की

कहा

गया

है

कि

अरणी

बड़ी

और

छोटी

दो

प्रकार

के

होती

हैं।

छोटी

तथा

बड़ी

दोनों

प्रकार

की

अरणी

वीर्य

और

रस

में

प्राय

:

समान

गुण

वाले

होते

हैं।

छोटी

अरणी

के

पत्ते

सुगंधित

होते

हैं

इसलिए

खाने

में

उपयोग

करने

के

साथ

-

साथ

औषध

बनाने

में

भी

इसका

प्रयोग

किया

जाता

है।

 

 अरणी का वानास्पतिक नाम Clerodendrum phlomidis L. f. (क्लीरोडेनड्रम् फ्लोमाइडिस)Syn-Volkameriamultiflora Burm.f है। इसका कुल  Verbenaceae (वर्बीनेसी) होता है और इसको अंग्रेजी में Wind killer (विन्ड किलर)कहते हैं। चलिये अब जानते हैं कि अरणी और किन-किन नामों से जाना जाती है। 

Sanskrit-

क्षुद्राग्निमंथ

,

लघुंथ

,

अरणिका

,

अग्निमंथिनी

;

Hindi-

टेकार

,

उरनी

,

अरणी

लघु

,

तर्कारी

,

छोटी

अरणी

; कहते है।

छोटी अरणी के रस में मधुर,कड़वा, तिक्त होता है और  विपाक में कड़वा होता है। वीर्य में गर्म, लघु, दीपन तथा वात-कफ को कम करने वाली होती है। इसका प्रयोग सूजन, पाण्डु या पीलिया, अग्निमांद्य या बदहजमी, विबन्ध या कब्ज, वज़न बढ़ने, सिरदर्द, गुल्म या एसिडिटी, आभ्यन्तर-विद्रधि (पेट के भीतर का घाव) तथा आध्मान (Flatulance) की चिकित्सा में किया जाता है। छोटी अरणी का शाक-सामान्यत गर्म, मधुर, तिक्त रसयुक्त तथा वात का कम करने वाला होता है। अरणी देखने में छोटा होता है लेकिन आयुर्वेद में इसके पौष्टिकता और औषधीय गुणों के कारण उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

#- कान दर्द - अगर कान में दर्द से परेशान रहते हैं तो बेल, एरण्ड, तर्कारी (अरणी लघु), बांस के बीज आदि द्रव्यों को समान मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। चूर्ण को 20 ग्राम की मात्रा में लेकर, 300 मिली आरनाल (काञ्जी) में पकाकर नाड़ीस्वेद करने से वातकफ के कारण होने वाले कान दर्द से राहत मिलती है।

#-कर्णशूल व कर्णपूय -अरणी, नीम तथा धतूरे के पत्तों का रस निकालकर बराबर मात्रा में तिल या सरसों के तेल में पकाकर तेल तैयार होने पर छानकर रखें। इसे 2-4 बूंद कान में डालने से कर्ण पीड़ा, कर्णपूय व कर्णशूल में अत्यन्त लाभ होता है। पूर्ण लाभ होने तक नियमित इसका प्रयोग करें।

#- कानदर्द - अरणी के पत्तों को पीसकर रस निकाल लें। इस रस को गुनगुना करके 2-4 बूंद कानों में डालने से भी कान दर्द आदि समस्याओं से राहत मिलती है।
 
#- प्रतिशयाय , जुकाम - ( पोटली ) चोरपुष्पी (चोरक), छोटी अरणी की छाल, बालवच, जीरा तथा कलौंजी को कूटकर, चूर्ण बनाकर छानकर रख लें। पोटली में बांधकर सूंघने से प्रतिश्याय को दूर करने में मदद करता है।
 
#- श्वासरोग आदि - छोटी अरणी के पत्ते को पीसकर रस निकालकर 5-10 मिली मात्रा में सुबह-शाम पीने से सांस संबंधी कष्ट में लाभ होता है।

#- डायबिटीज - छोटी अरणी के पत्ते को पीसकर रस निकालकर 5-10 मिली मात्रा में सुबह-शाम पीने से में लाभ होता है।
 
#- अरूचि , अपच - छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस अथवा 10 मिली जड़ से बने काढ़े को पिलाने से अरुचि, अजीर्ण,अपच में लाभ होता है।

#- आध्मान- छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस अथवा 10 मिली जड़ से बने काढ़े को पिलाने से अध्मान, अफारा में लाभ होता है।

#- अतिसार या दस्त - छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस अथवा 10 मिली जड़ से बने काढ़े को पिलाने से दस्त,अतिसार मे लाभ होता है।

#- पेट के कृमियों - छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस अथवा 10 मिली जड़ से बने काढ़े को पिलाने से पेट के कृमियों के इलाज में मदद करता है।

#- उदर विकार,वातज गुल्म - छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस अथवा 10 मिली जड़ से बने काढ़े को पिलायें इस काढ़े में 30-40 मिली काढ़े में थोड़ा सरसों का चूर्ण डालकर पीने से वातज गुल्म का इलाज करने में मदद मिलती है।

#- पाण्डूरोग - 5-10 मिलीग्राम छोटी अरणी पत्रस्वरस का प्रात: सायं सेवन करने से पाण्डूरोग में लाभ होता है।

#- यकृतशोथ - 5-10 मिलीग्राम छोटी अरणी पत्रस्वरस का प्रात: सायं सेवन करने से यकृत विकार तथा यकृतशोथ में कुछ दिनों तक पीने से लाभ होता है ।

 #- अमाशय शूल - छोटी अरणी के 10-20 ग्राम पत्तों को उबालकर मसलकर छानकर क्वाथ बनाकर पीने से अमाशय शूल में लाभ होता है।

#- प्रमेह - छोटी अरणी के 5-10 मिलीग्राम पत्रस्वरस को प्रात: सायं पीने से प्रमेह में लाभ होता है।

#- अर्श- छोटी अरणी की 10 ग्राम जड़ को 200 मिली पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 10-20 मिली की मात्रा में सुबह शाम पीने से अर्श , बवासीर में लाभ होता है।

#- पूयमेह - छोटी अरणी की 10 ग्राम जड़ को 200 मिली पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 10-20 मिली की मात्रा में सुबह शाम पीने से लाभ होता है।

#- फिरंग - छोटी अरणी की 5-10 मिलीग्राम छोटी अरणी पत्रस्वरस का सेवन करने से फिरंग में लाभ होता है।

#- सूजाक - छोटी अरणी की 10 ग्राम जड़ को 200 मिली पानी में पकाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 10-20 मिली की मात्रा में सुबह शाम पीने से पूयमेह या सूजाक (गोनोरिया) तथा शोथ या सूजन को कम करने में मदद करता है।
 
#- उपदंश ( सिफ़लिस ) - यौन संक्रमण के कारण उपदंश या सिफिलिस होता है। छोटी अरणी के पत्तों का काढ़ा या रस बनाकर पीने से उपदंश में लाभ होता है।

#- मेदोरोग - 5-10 मिलीग्राम छोटी अरणी के पत्तों का काढ़ा या रस बनाकर पीने से मेदरोग में लाभ होता है।
 
#- श्वेतप्रदर व गर्भाशयगत सूजन - छोटी अरणी के 5-10 मिली पत्ते के रस में थोड़ा पानी, शहद अथवा मिश्री मिलाकर पीने से प्रदर ल्यूकोरिया, गर्भाशयगत सूजन एवं अन्य गर्भाशयगत बीमारियों में भी लाभ होता है।

#- योनिशैथिल्य ( लूज़ वैजाइना , ढीली योनि ) - त्रिफला, भांग, पठानी लोध्र तथा कच्चे अनार फल की छाल को समान मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें। अब इस चूर्ण में तर्कारी (अग्निमन्थ), छोटी अरणी के पत्तों के रस की भावना को देकर 500 मिग्रा की गोली बना लें। इस गोली को सुबह योनि में रखने से योनि का संकोचन होकर योनिशैथिल्यता (शिथिलता) दूर होता है।

 #- शोथ - 10-20 मिलीग्राम छोटी अरणी मूल क्वाथ को पीने शरीर में जहाँ पर भी सूजन होगी वह उतर जायेगी ।
#- वातरक्त ,गठिया - छोटी अरणी के पञ्चाङ्ग का चूर्ण (1-2 ग्राम),रस (5-10 मिली) या काढ़े (20-40 मिली) का सेवन करने से वातरक्त  या गठिया में लाभ होता है।
 
#- ऊरूस्तम्भ व लकवा - लघु अरणी, सहिजन, तुलसी, सोंठ, कुटज तथा नीम के पत्ते, जड़ एवं फल को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना कर, काढ़े से अंगों का मसाज करने से ऊरुस्तम्भ या लकवा में लाभ होता है।
 
#- बालरोग ( शिशु रोग ) - कपित्थ, बेल, तर्कारी (अरणी लघु), वंशलोचन, एरण्ड तथा करञ्ज को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनायें। इस काढ़े से बच्चों का मसाज करने से बाल-रोगों में फायदा मिलता है।
 
#- रोमान्तिका - छोटी अरणी के जड़ का काढ़ा बनाकर उसको लगाने से रोमान्तिका या रूबेला के लक्षणों से राहत मिलने में आसानी होती है।


#- खुराक - 5-10  मिली रस, 30-50 मिली काढ़ा और 2-4 ग्राम पञ्चाङ्ग चूर्ण का सेवन कर सकते हैं। 



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