Friday, 25 July 2014

३७ - गौ - चिकित्सा . धनुर्वात ।

३७ - गौ - चिकित्सा . धनुर्वात ।

धनुवति , धनुर्वात
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इस रोग में पशु बहुत अधिक सुस्त रहता है । कोई पशु लकड़ी की तरह अकड़ जाता है । और पाँव ज़मीन पर ठोंकता रहता हैं ।वह गर्दन घुमाता रहता है । इस रोग में पशु भड़कने जैसा मालूम होता है । उस की साँस तेज़ चलती हैं । साधारण : दस्त भी बन्द हो जाते हैं । बछड़ों को यह रोग होने पर वे दूध पीना बन्द कर देते हैं । पशु आधे - आधे घन्टे तक बेहोश रहते हैं । जिस ओर पशु पांँव ठोंकता हैं , उस ओर की चमड़ी के बाल भी निकल जाते हैं ।

१ - औषधि - चन्द्रशूर ( अलासिया ) ६० ग्राम , गरम पानी ५०० ग्राम , काला नमक १२ ग्राम , नमक और चन्द्रशूर को बारीक पीसकर , गरम पानी में उबालकर , काढ़ा बनाकर , रोगी पशु को , दोनों समय , आराम होने तक , पिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - इन्द्रायण का फल २४ ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , काली मिर्च १२ ग्राम , लौंग ९ ग्राम , काला नमक १२ ग्राम , पानी ३०० ग्राम , ऊपर बतायी गयी सभी वस्तुओं को बारीक पीसकर , पानी में उबालकर , काढ़ा बनाना चाहिए । काढ़ा आधा होने पर गुनगुना रहने पर पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलाना चाहिए । रोगी पशु को बन्द कमरे में बाँधा जाय । उसे ऊपर से टाट या कम्बल ओढ़ा देना चाहिए ।

३ - औषधि - इन्द्रायण फल ३० ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , बंसलोचन ९ ग्राम , नमक १२ ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , गुड़ ३० ग्राम , पानी ३०० ग्राम । ऊपर लिखी चीज़ों को बारीक पीसकर , छलनी द्वारा छानकर , काढ़ा बनाना चाहिए । काढ़ा इतना औटाया जाना चाहिए कि वह औटाकर आधा रह जाय। तब गुनगुना ,बिना छाने रोगी पशु को दोनों समय पिलाना चाहिए और आराम होने तक पिलाना चाहिए । और ध्यान रहे की बंसलोचन को अलग पीसकर रखें, और दवा पिलाते समय ही मिलाये ।

४ - औषधि - रोगी पशु को एक सेर दूध और एक मुर्ग़ी का अण्डा मिलाकर सुबह - सायं पिला देना चाहिए ।


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