Tuesday, 13 January 2015

४५ - गौ-चिकित्सा - लकवा रोग ।

४५ - गौ-चिकित्सा - लकवा रोग ।

१ - मुँह का लकवा रोग ( language )
=========================

रोग व लक्षण :- यह रोग विशेष रूप से गायों को होता हैं और जिन क्षेत्रों की मिट्टी में फास्फोरस की कमी पायी जाती हैं और इसकी कमी- पूर्ती हेतू पशु हड्डियाँ खाने लगते हैं वहाँ यह रोग अधिक होता हैं । जिन हड्डियों में क्लोस्ट्रीडियम बोटलीनम् टाइप " डी" जीवाणु अथवा उनका विष उपस्थित रहता हैं , उन हड्डियों को खाने से यह रोग हो जाता हैं ।
इस रोग का प्रमुख लक्षण यह हैं कि रोगग्रस्त पशु की पेशियाँ अत्यधिक कमज़ोर हो जाती हैं और हर समय उसके मुँह से लार टपकती रहती है । जीभ , ग्रसनी तथा जबड़े को लकवा मार जाता हैं , जिनके कारण पशु चारा- दाना खाने , जूगाली करने और निगलने में असमर्थ हो जाता हैं ।

चिकित्सा :- इस रोग की अभी तक कोई भी विश्वसनीय चिकित्सा की खोज नही हो सकी हैं । अलबत्ता पशु को खुराक के साथ खनिज चूर्ण खिलाना एकदम बन्द कर दें , और इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि उसे हड्डियाँ खाने का अवसर न मिल सकें ।

२ - पशुओं का लकवा व फ़ालिज रोग
=======================
कारण व लक्षण - इसरोग को लकवा ,पक्षाघात , फ़ालिज आदि नामों से जाना जाता हैं अंग्रेज़ी मे इसे "पैरेलिसिस" कहते हैं यह असाध्य रोग हैं । जिस पशु को यह रोग हो जाता हैं , उसका जीना कठिन हो जाता हैं । इस रोग की उत्पत्ति बादी से होती हैं । इसमे रोगग्रस्त पशु के कान सीधे खडे होकर लकड़ी के समान कठोर हो जाते हैं सारी देह जकड़ जाती हैं । चारों पाँवों से भी खड़ा नही हो पाता हैं । यह रोग प्राय: कमर पर गहरी चोट लग जाने , तेज सर्दी - गर्मी या बरसात मे अधिक समय तक भीगने, ज़हरीली घास आदि खा लेने , सूत जैसे लम्बे कीड़ों का रीढ़ की हड्डी के गूदे में पैदा हो जाना आदि कारणों से होता हैं । इससे पशु का एक ओर धड़ अथवा धड़ का पिछला हिस्सा निश्चल हो जाता हैं अर्थात हिलता डुलता नही हैं ।
१ - औषधि - पशु को पूर्णरूपेण आराम करने दें , उसके नीचे गुदगुदा बिछावन दें , और प्रत्येक १-१ घन्टा के अन्तराल पर उसकी करवट बदलवाने रहना चाहिए । क्योंकि इस रोग मे पशु करवट नही बदल पाता हैं ।
२ -औषधि - दूध मे अण्डों की जर्दी फेंटकर पिलाना चाहिए । यह लाभप्रद होता हैं ।
३ -औषधि - पानी के साथ सरसों पीसकर फ़ालिज प्रभावित अंग पर लेप करना भी लाभकारी सिद्ध होता हैं ।
४ - औषधि - प्रभावित अंग को गरम पानी की भाप दें क्योंकि भाप बन्द जगह पर करे ।
५ - सोंठ और हराकसीस ६-६ माशा , सेंधानमक आधी छटांक और कुचला ४ माशा - इन समस्त द्रव्यों को लेकर आधा लीटर जल में घोटकर छान लें और पशु को नित्य पिलायें । इस रोग में पशु को ख़ूब गरम व सुपाच्य वस्तुऐ खिलानी चाहिए तथा हवा सर्दी से पूरा - पूरा बचाव रखना चाहिए एवं निश्चल हुए अंग पर गर्म तेलों की मालिश करनी चाहिए ।
६ - औषधि - इस रोग में दागना भी लाभदायक होता हैं । २-२ दाग चारों पुट्ठों पर १-१ दोनों ठठरी के नीचे दोनो कनपटियों पर दाग , दोनों नितम्बों पर २ दाग पशु को लगवा दें । दागने का चिन्ह पुर्वोक्त जैसा हैं ।


Sent from my iPad