Tuesday, 13 January 2015

(१४) - गौ - चिकित्सा .तिल्ली ।

(१४) - गौ - चिकित्सा .तिल्ली ।
तिल्ली की बिमारी
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कारण व लक्षण - तिल्ली ( तिल ) की बिमारी वह होती है, जिसमें रोगी पशु बराबर ख़ून फेंकता रहता है । ख़ून के ख़राब आने से फेंकना बन्द कर देता है पशु घास खाना बन्द कर देता है । उसके रोयें खड़े हो जाते है । वह ठण्डा हो जाता है । इलाज समय से न हुआ तो एक - दो दिन में पशु मर जाता है ।

१ - औषधि - कंथार ( गोविन्द फल ) लै० केपीरस केलेनिका -की छाल ४८० ग्राम ,गाय का दूध ९६० ग्राम , कन्थार की छाल को महीन पीसकर , एक घन्टा दूध में गला देना चाहिए । फिर उसे छानकर पशु को पिलाना चाहिए । सुबह - सायं दोनों समय पिलाना चाहिए । ऐसा करने से दो दिन में पशु अच्छा हो जायेगा । अगर पशु को एक दिन में आराम हो जायें तो दूसरे दिन यह दवा नहीं पिलानी चाहिए । गाय के गोबर के कण्डे को जलाकर पशु को सेंकना चाहिए । सुबह - सायं , दोनों समय और सेंक लगाना चाहिए और # प्रकार का दाग बाँयी तरफ़ लगाना चाहिए ।

२ - औषधि - अजवायन २४० ग्राम , मीठा तैल २४० ग्राम , दोनों को मिलाकर पशु को सुबह - शाम , आराम होने तक , पिलाना चाहिए ।

३ - औषधि - प्याज़ का रस ५०० ग्राम , सुबह - सायं , आराम होने तक देना चाहिए ।

४ - औषधि - इन्द्रायण ६० ग्राम , घुड़बच ६० ग्राम , काला नमक ६० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , तीनों को महीन पीसकर , पानी में काढ़ा बनाकर , गरम करके आधा हो जाने पर , बिना छाने , पिला देना चाहिए ।

आलोक -:- ऊपर लिखी दवाईयों की मात्रा बड़ी गायों के लिए लिखी गयी है लेकिन छोटी गायों के लिए दवा की मात्रा कम कर लेनी चाहिए ।
इस बिमारी को फैलाने वाले कीटाणु को अंग्रेज़ी में " बैसिल्लस एन्सथे सिस " कहते है । ठीक वातावरण न मिलने पर , इस बीमारी के कीटाणु " स्पोर " बन जाते हैं । गर्मी , बुखार , गिल्टी -- यह एक छूत की बिमारी है , जो सभी पालतू पशुओं और मनुष्यों को हो जाती है । घरेलू पशुओं में सबसे अधिक यह घोड़ों , भेड़ - बकरियो हिरनों और ऊँटों को होती है । गिद्ध इस बिमारी से इनमुम रहते है। यह बीमारी हर मौसम में हर जगह होती है , परन्तु विशेषकर नीची तराई की जगहों में जहाँ पानी - निकास नहीं होता है । यह बीमारी एक जगह में बार- बार हर साल हुआ करती है । इस रोग के कीटाणु मिट्टी में वर्षों तक सुरक्षित रहते हैं ।
इन कीटाणुओं पर मामूली दवाएँ कोई असर नहीं करती है । इन "स्पोर" को आधे घन्टे पानी में उबाला जाय , तब भी वे नही मरते । स्पोर पशु के शरीर में नहीं मरते । जब पशु का ख़ून बाहर गिरता है , तो ये कीटाणु स्पोर बन जाते है । इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि मरे हुए पशु का ख़ून भूमि पर न पड़े । अगर भूमि में गिर जाय तो उस स्थान को साफ़ कर दिया जाय ।
खाना खाने या पानी पीने से इस रोग के कीटाणु या स्पोर पेट में पहुँचते हैं । पेट में जो रस निकलते हैं । उनसे कुछ कीड़े तो मर जाते हैं । किन्तु स्पोर पर उनका असर नहीं होता । ठीक प्रकार की नमी हवा कम पाने से स्पोर बढ़ते है और ख़ून में मिल जाते हैं । कभी - कभी कुछ ऐसी मक्खियों के काटने पर यह रोग फैलता है , जो कि इस बिमारी से मरे हुए पशु का माँस खा लेती हैं या उस मरे पशु पर बैठी रहती हैं । मनुष्यों में साँस के द्वारा यह कीटाणु शरीर में प्रवेश करता हैं । अंग्रेज़ी में उसे " उलरटर डिसीजेज" कहते हैं । यह बिमारी चारा , दाना , पानी , गोबर - मूत्र ,ख़ून , बर्तनों और आदमियों के ज़रिये या किसी छोटे घाव के द्वारा फैलती है । इस बिमारी से पीड़ित पशु २४ घन्टे से लेकर ३ दिन के अन्दर ही मर जाता है । इस रोग को दो भागों में बाँटते हैं : १. अन्दरूनी या आन्तरिक बिमारी और २. बाहरी बिमारी ।

१ - अन्दरूनी या आन्तरिक बिमारी -:-इस बिमारी में पशु यकायक मर जाता हैं और कोई ख़ास लक्ष्ण नहीं प्रतीत होते । अगर पशु को बिमारी की हालत में देखा जाय तो उसके लक्षण होगें -- तेज़ बुखार , आँखों में बेचनी , पेट में दर्द, पेट फूलना, गोबर या लदी का ख़ून से सना होना , गन्दे रंग की पेशाब , कुछ काला होना , नाक से ख़ून मिला हुआ मवाद - सा निकलना । पशु लड़खड़ाकर ज़मीन पर गिर जाता है । ये ही इस बिमारी के लक्षण है।
कभी - कभी पशु जोश में आ जाता है । उसके पेट में दर्द मालूम होता है । वह पसीने से तर हो जाता है और १०-२४ घण्टे में उसकी मृत्यु हो जाती है ।

२- बाहरी बिमारी - :- इसमे पशु के शरीर के किसी भी हिस्से पर , ज़्यादातर गर्दन या पेट पर कड़ी उभरी हुई सूजन होती है , जिसमें शुरू में दर्द होता हैं । लेकिन बाद दर्द नहीं होता । पशु को बुखार आ जाता हैं । घोड़ों में सूजन गले से शुरू होती है और फिर गर्दन के नीचे हिस्से में होकर सीने तक पहुँचाती है । सिर और गर्दन की सूजन बहुत बढ़ जात है। यहाँ तक कि पशु को हिलते डुलते कठिनाई होती है । भेड़ों में अन्दरूनी या आन्तरिक बिमारी अधिक पायी जाती है और वे मरी हुई पायी जाती । पूँछ के पास उनमें दस्त , ख़ून लगा होता है । इस बिमारी से ८० से ९० प्रतिशत रोगी - पशु मर जाते है ।

लाश का परिक्षण -:- इस रोग के रोगी पशु की लाश का सड़ना शीघ्र आरम्भ हो जाता है । वह बहुत जल्दी फूल जाती है । उसका ख़ून बहुत गाढ़ा हो जाता है और कोलतार की की तरह गहरे काले रंग का - सा हो जाता है । ख़ून जमता नहीं और तमाम प्राकृतिक छिद्रों से -- नाक , मुँह , कान, मूत्रद्वार ,मलद्वार से निकलता है । तिल्ली ५-६ गुनी बढ़ती जाती है और कभी - कभी वह नर्म होकर फट जाती है । भेड़ में ऐसा नहीं होता । ये लक्षण केवल बाहरी बिमारी में पाये जाते हैं ।

कलेजा और गुदा -:- ये लाल रंग और सूजे रंग के हो जाते हैं । इसी प्रकार फेफड़े और मस्तिक लाल , गहरे रंग के हो जाते हैं । घोड़े की आँतों में सूजन पायी जाती हैं ।

आलोक -:- तिल्ली की बिमारी से मरे हुए पशुओं से विशेष सावधान रहना चाहिए । मरे हुए पशुओं को ठीक तरह से ठिकाने लगायाव जाय । उनकी खाल चोरी न जाय और नहीं उसका निरीक्षण किया जाय , जब तक कि उसके लिए ठीक- ठीक प्रबन्ध न कर लिया जाय । ऐसी लाश को जला देना चाहिए या गाड़ देना चाहिए । लाश को एक जगह से दूसरी लें जाना हो तो उसके सब प्राकृतिक छिद्रों को यानी मुँह , नाक , मूत्रद्वार आदि को किसी तेज़ दवा , रूई या कपड़े से दबाकर बन्द कर देना चाहिए , ताकि उनमें से शरीर का मवाद न निकले , क्योंकि, ऐसा होने पर और दवा लगने पर कीटाणु स्पोर में बदल जायेंगे , जो कि वर्षों तक भूमि में जीवित रहते हैं । यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह बिमारी मनुष्यों को हो जाती है । लाश को पानी वाले स्थान पर न गाड़ा जाय ।
इस बिमारी में ऊपर बतायी सभी बातें ध्यान में रखनी चाहिए । जिस जगह बिमारी का असर हो ख़ाली कर देना चाहिए । पानी पीने के स्थानों और चरागाहों को बदल देना चाहिए । चुस्त पशुओं को नये चरागाहों में लें जाना चाहिए ।
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