Tuesday, 13 January 2015

(१५)- गौ - चिकित्सा - पीलिया,यकृतरोग ।

(१५)- गौ - चिकित्सा - पीलिया,यकृतरोग ।

१ - पीलिया ( पाण्डुरोग )( Jaundice )
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कारण- लक्षण :- इस रोग को कामला रोग के नाम से भी जाना जाता है । यह रोग अक्सर जिगर ( यकृत ) ( liver ) के ख़राब हो जानें से होता हैं इस रोग में पशु के मुँह तथा आँखों की झिल्लीयां पीली पड़ जाती हैं , शरीर का पित्त नली में सूजन आ जाने के कारण या पथरी , कीड़ों के जमा हो जाने आदि कारणों से जब आँतों में नहीं पहुँच पाता हैं और ख़ून में मिलकर सारे शरीर में फैल जाता हैं , शरीर की पतली खाल अथवा बारीक झिल्ली द्वारा पीलापन प्रकट होने लगता हैं
पशु इस रोग से पीड़ित होने पर मैटमैला रंग का गोबर करता हैं तथा पेशाब बहुत पीला आता हैं और पशु को क़ब्ज़ हो जाता हैं । भूख और प्यास अधिक लगती है , शरीर का तापमान घटता- बढ़ता रहता हैं तथा रोगी पशु दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता जाता हैं ।

१ - औषधि - सादा नमक पावडर २५० ग्राम , सोंठ पावडर ३५ ग्राम , चावल का माण्ड १ किलो , सभी को आपस में मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।

२ - औषधि - हरा कसीस २० ग्राम , चिरायता चूर्ण ३० ग्राम , सोंठ पावडर ३० ग्राम , चावल का माण्ड १ किलो , सभी को आपस में मिलाकर पशु को पिलाने से लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - इस रोग में आँवला अवलेह देन २५० ग्राम , प्रतिदिन देना लाभकारी होता हैं ।

४ - औषधि - अमलतास का गूद्दा ३ तौला, इमली के फल का गूद्दा ३ तौला , आधा लीटर गुनगुना पानी में घोंटकर छानकर पशु को पिलाने से पशु को दस्त आकर पित्त बाहर निकल जाता है और रोग ठीक हो जायेगा ।
५ - औषधि - गन्धक पावडर २ तौला , सोंठ पावडर २ तौला , नमक ४ छटांक , एलुवा १ तौला , गन्ने का शीरा या गुड़ २५० ग्राम , गरमपानी १ किलो , सभी को गरम पानी में मिलाकर पिलाने से दस्तों द्वारा पित्त बाहर निकल कर पशु ठीक हो जायेगा ।

६ - औषधि - बन्दाल के फल ६ माशा , पानी ढाई तौला में रात को भिगोकर रख दें तथा सुबह छानकर थोड़ा-थोड़ा पशु के नाक के दोनो नथुनों में डालें । इससे नाक द्वारा पीला - पीला पानी बहकर सारा पित्त निकलकर पशु को आराम हो जायेगा ।

२ - यकृत ( लिवर , जिगर ) में ख़ून का जमा होना
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कारण-लक्षण :- पशुओ को अधिक पौष्टिक खुराक देनें और तद्नुकूल उससे परिश्रम न लेने से उसके यकृत ( जिगर ) में ख़ून जमा हो जाता है । कभी- कभी गर्मी- सर्दी के तेज़ प्रभाव तथा हृदय रोगों के कारण भी जिगर में ख़ून जमा हो जाता हैं ।
जिगर में ख़ून जमा हो जाने पर -- पशु सुस्त रहता हैं अत: वह चुस्ती- फुर्ती से चल-फिर नहीं सकता हैं , उसकी नब्ज़ कमज़ोर होकर धीमी पड़ जाती हैं तथा भूख कम हो जाती हैं और शरीर का तापमान घट जाता हैं , आँखों में पीलापन आ जाता हैं पशु बार-बार अपने दाहिने अंग को देखता रहता हैं तथा दांयी ओर का पेट दबाने पर उसे पीड़ा महसूस होती हैं ।

१ - औषधि - एलुवा १५ ग्राम , नौसादर १५ ग्राम , कलमीशोरा १५ ग्राम , चिरायता चूर्ण १५ ग्राम , जवाॅखार १५ ग्राम , मेग्नेशियम साल्ट १५ ग्राम , आधा लीटर गरमपानी सभी को आपस में मिलाकर पिलाने से ,यकृत में जमा हुआ ख़ून पिघलकर फैल जाता हैं । और पशु को आराम आने लगता हैं ।
इन सभी दवाइयों के उपयोग के साथ- साथ बाहृा उपचार भी किया जाना चाहिए जिससे पशु को जल्दी आराम हो । इसके लिए निम्नांकित योग का लेप बनाकर पशु के जिगर के ऊपर अर्थात दाहिनी ओर पसलियाें के नीचे मलने तथा लगाने से तत्काल लाभ पहुँचता हैं विधी इस प्रकार हैं - -

# - औषधि - उल्क १ छटांक , जरावन्द १ छटांक , मकोय पंचांग पावडर २ छटांक , अंजीर २ छटांक , हींग १ तौला , इन सब को गन्ने के सिरके में पकाकर लेप तैयार करके गुनगुना पशु के जिगर ( दाहिनी ओर की पसलियों के ऊपर )पर लगाने से लाभ पहुँचता हैं ।

# - औषधि - राई का पावडर २५० ग्राम , आवश्यकतानुसार गरमपानी में मिलाकर लेप तैयार करके पशु की दांयी पसलियों पर गाढ़ा -गाढ़ा लेप करने से शीघ्र लाभ पहुँचता हैं । आधा घन्टे बाद लेप छुड़ाकर तारपीन के तेल या तिल के तेल की मालिश करें तो ओर जल्दी आराम होगा ।

३ - यकृत शोथ ( जिगर, लीवर में सूजन का आ जाना )
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कारण- लक्षण :- पशुओं को भारी अथवा देर तक पचने वाले आहार देने, उनसे उचित परिश्रम के काम न लेने पर , सर्दी-गर्मी के प्रभाव या चोट आदि लग जाने से उनके जिगर पर सूजन आ जाती हैं । जिगर के स्थान पर ऊपर से दबाने से पशु को दर्द मैहसुस होता है तथा वह स्थान कुछ ऊपर को उठा हुआ सा दिखाई देता हैं । पशु चारा - दाना व जूगाली करना बन्द कर देता है , कभी- कभी खाँसता भी हैं । उसकी आँखें पीली अथवा सुर्ख़ सी पड़ जाती हैं । पेशाब गहरे पीले रंग का आने लगता हैं , क़ब्ज़ रहता है अथवा पशु के शरीर का तापमान बढ़ जाता है । इस रोग के लक्षणों का पता चलते ही इलाज तुरन्त चालू कर देना चाहिए इलाज में देरी न करें अन्यथा रोग बढ़कर संघातिक रूप धारण कर सकता हैं । इस रोग में भी परहेज़ के अन्तर्गत अन्य रोगों के समान ही जल्दी पचने वाला आहार ही देना चाहिए तथा सर्दी- गर्मी , ठन्डी हवा , और ठन्डे पानी के प्रयोग से दूर रखें ।

१ - औषधि - हराकसीस ३ माशा , नीम के पत्ते ५ तोला , त्रिकुटा डेढ़ तोला , त्रिफला डेढ़ तौला, सज्जीखार ६ माशा , सेंधानमक ६ माशा , मेग्नेशियम साल्ट १ माशा , सभी को कुटपीसकर चूर्ण बनाकर रख लें तथा आवश्यकतानुसार गुनगुने पानी में घोलकर पशु को पिलायें । इस प्रकार सुबह-सायं दिन में दो बार १-२ दिन खिलाने सें लाभ होकर पशु चारा पानी ठीक से खाने लगता हैं ।

२ - औषधि - पहले दिन -- पशु को अप्समसाल्ट ५०० ग्राम , सोंठ पावडर २ तौला , कलमीशोरा २ तौला , नौसादर आधा छटांक , सभी नमक को पीसकर , ७५० मिलीग्राम पानी में मिलाकर पिला दें ।
दूसरे दिन -- कलमीशोरा १ तौला , नौसादर १ तौला , कपूर ३ माशा , देशीशराब १२० मिली ग्राम , इन सबको आधा किलो गुनगुने पानी में मिलाकर दिन में दो बार पिलाते रहे जब तक रोगी पूर्णरूपेण ठीक न हो जायें । जब पशु की दशा में कुछ - कुछ सुधार होना शुरू होने लगे तो उसे ताक़त प्रदान करने वाली औषधियों का सेवन कराना चाहिए । जिनका नीचे वर्णन कर रहे हैं --

# - औषधि - नौसादर , चिरायता चूर्ण , कुटकी चूर्ण , कलमीशोरा , प्रत्येक १-१ तौला , नमक ३ तौला , कुचला ३ माशा चूर्ण , सभी १किलो गुनगुने पानी में मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।

# - औषधि - एलुवा , आकाशबेल ( अमरबेल ) चिरायता , अफसंतीन, नीम के पत्ते , नौसादर प्रत्येक १-१ तौला , अप्समसाल्ट या मैग्निशियम साल्ट ५ तौला और कुचला १ माशा , - इन सभ दवाओं को कुटकर गरमपानी में मिलाकर पिलाने से लाभ होगा ।
इस रोग में राई का लेप तथा तारपीन का तेल व सरसों के तेल की मालिश करना लाभकारी सिद्ध होता है तथा मालिश करने के बाद रूई को गरम करके पेट की सिकाई करना अतिगुणकारी होता है ।

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