Tuesday, 13 January 2015

(३१) - गौ - चिकित्सा- पूँछरोग ।

(३१) - गौ - चिकित्सा- पूँछरोग ।


१ - पूँछ में बाड़ी रोग
=========================

कारण व लक्षण - रक्तसंचार में बाधा होने के कारण यह रोग पैदा हो जाता है । इस प्रकार के विषेश कीड़े के लग जाने के कारण भी यह रोग पैदा होता है । रोगी पशु की पूँछमें सड़ान हो जाती है । उसमें से दुर्गन्ध आती है। और उसका रक्त निकलता रहता है । पूँछ थोड़ी - थोड़ी कट - कटकर गिरती रहती है । जैसे - जैसे ज़ख़्म बढ़ता है, उस पर मक्खियाँ भिनभिना ने लगती है ।कभी-कभी लापरवाही करने पर ज़ख़्म में कीड़े पड़ जाते है ।

१ - औषधि - रोगी पशु की पूंँछ को रोगग्रस्त जगह से ४ इंच ऊपर एक डोरी टाईटकर बाँध देनी चाहिए फिर डोरी वाले स्थान से २इंंच नीचें से पूँछ को काट देना चाहिए । उसके बाद अफ़ीम ५ ग्राम , मीठा तैल ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर गरम करकें , कटी हुई पूँछ को इस तैल में डुबोया जाय । इससे ख़ून बहना भी बंद हो जायेगा और रोग भी समाप्त हो जायेगा ।

२ - औषधि - नारियल का तैल ४८ ग्राम , मालती ( डीकामाली ) २४ ग्राम , मालती को महीन पीसकर तैल में । मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाया जाय ,जिससे मक्खियाँ नहीं बैठेगी और पट्टी भी बाँधी जासकती है ।

३ - औषधि - अरण्डी का दूध पिचकारी से पूँछ पर डाल दें ।इससे सड़न बंद हो जायेगी और घाव भी जल्दी ठीक होगा ।

टोटका -:-
४ - औषधि -रोगी पशु के कपाल पर १ इंच व्यास का एक लोहे का कड़ा या १ इंच व्यास का ही कोई लोहे का पाईप को लाल करके एक दाग लगाना चाहिए।

५ - औषधि - बकरी को पकड़ने वाले भेड़िए के लैन्डे ( लैटरीन ) को लेकर उसे महीन पीसकर नारियल के गरम तैल में मिलाकर मरहम बना लें ,और इसी मरहम की पट्टी रोगस्थान पर बाँधी जाय, दूसरी पट्टियाँ बारह - बारह घन्टे बाद बदली जायेगी तो ठीक अवश्य होगा ।

--------------------- @ ---------------------

२ - पूँछ की जड़ के पास खाज
================================

कारण व लक्षण - गन्दे स्थान पर पशु के बैठने पर कुछ बारीक कीड़े उसकी पूँछ की जड़ में अपना घर बना लेते है । जो दिखायी नहीं देते हैं । पशु बहुत बेचैन रहता है वह पेड़ या दिवार या खम्भे के सहारे या दूसरे पशु । के सहारे खुँजलाता रहता है । वह रगड़ता रहता है रगड़ने से ख़ून भी आने लगता है ।

१ - औषधि - रोगग्रस्त स्थान को नीम की पत्ती डालकर उबालें हुए पानी से धोना चाहिए ।

२ - औषधि - घासलेट ( मिट्टी का तैल ) को रोगी की पूँछ की जड़ में लगाना चाहिए ।

३ - औषधि - अजवायन का तैल लगाना चाहिए और १५ मिनट के बाद नारियल का तैल लगाना चाहिए । और हाँ याद रहे अगर यह तैल नहीं लगाते तो वहाँ सूजन आ जायेगी और पशु खुजली से बेचैन हो जायेगा और उसकी सूजन लगातार बढ़ती जायेगी । ऐसी ग़लती भूले से भी मत करना ।

४ - औषधि - रेण्डी का ( रतनजोत या बधरेंडी ) का दूध किसी शीशी में भरकर रखने के बाद रूई के सहारे पाँच- छ: दिन लगा देना चाहिए ।

५ - औषधि - नीम का तैल गरम करके लगाने से भी इस रोग में आराम आता हैं ।

६ - औषधि - कँरज के के तैल के उपयोग से भी पशु को आराम आता है ।

------------------ @ ------------------


३ - पुछ का गलना , न ठीक होने वाला घाव ।
=================================

कारण व लक्षण - ठीक न होने वाला घाव या पशु की पूँछ गलना--

१ - औषधि - एेसे में कुत्ते की कोई भी हड्डी लेकर पावडर बना लें, हड्डी पावडर १० ग्राम , सरसों तैल १०० ग्राम , एक छिपकली मारकर, तैल को आँच पर चढ़ा कर उसमें हड्डी पावडर डालकर, फिर मरी हुई छिपकली डालकर इतना पकायें कि छिपकली काली पड़ जाये तो उसे निकालकर फैंक दे । यह तैल तैयार है , तैल को नासूर , घाव , तथा पूँछ पर लगाये वह भी ठीक हो जायेगा ।


४ - कारण व लक्षण - गलदाना ( पशु की पुँछ पीछे से गलना शुरू होती है और ऊपर तक गलने लगती है ) -

२ - औषधि - आवॅला २५० ग्राम , चिरायता १५० ग्राम , बाबची ५० ग्राम , सौंप १५० ग्राम , इन्द्र जौं ५०ग्राम , फूलगुलाब ५० ग्राम , इन सभी दवाइयों को कूटकर ५०-५० ग्राम की खुराक बना लें तथा एक खुराक को एक किलो पानी में पकालें , जब पानी तीन पाँव रह जायें तब छानकर नाल से पशु को देना । एक खुराक प्रतिदिन देवें ।


५ - ।। आर ( चौक्का )पिरानी ( पैणी ( छड़ी )मे चोंचदार कील द्वारा बैल व भैंसा के गुदाद्वार में घाव
========================================================

कारण व लक्षण - कभी-कभी किसान बैल व भैंसें को पैंणी में कील लगाकर ,वज़न खींचने के लिए या तेज़ दौड़ाने के लिए इसका उपयोग करता है । या पशु के मलद्वार में डंडा , लकड़ी चलाने से उसको घाव हो जाते है और ख़ून चालू हो जाता है।

१ - औषधि - पानी ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही २००० ग्राम , मसूर की दाल जली हुई ३६० ग्राम , पहले मसूर की दाल को तवे पर पूरी तरह भून लें । फिर उसे महीन पीसकर , चलनी से छानकर , दही में मिलाकर ख़ूब मथकर उसमें पानी मिला कर रोगी पशु को अच्छे होने तक , दिन में तीन बार पिलायें ।

२ - औषधि - गँवारपाठा ( घृतकुमारी ) गूद्दा ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही ९६० ग्राम , पानी २४० ग्राम ( २ लीटर) पहले गँवारपाठा के गूद्दे को दही में मथकर पानी मिला लें ।और रोगी पशु को अच्छे होने तक दिन में तीन बार पिलाते रहें ।

३ - औषधि - बेल फल का गूद्दा ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही ९६० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , बेल के गूद्दा को पानी में मथे । फिर उसे छानकर दही में मथकर रोगी पशु को ,अच्छे होने तक दिन में तीन बार पिलायें ।

४ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही ९६० ग्राम , पानी २००० ग्राम , में गलाये । फिर दही में उसे मथकर रोगी पशु , अच्छा होने तक ,दिन में दो बार पिलायें ।


Sent from my iPad