Tuesday, 13 January 2015

गौ - चिकित्सा .हड्डीरोग ।

(३५) - गौ - चिकित्सा .हड्डीरोग ।

१ - कमर का टूट जाना या कोई भी हड्डी टूटने पर
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कारण व लक्षण - पशुओ में कई बार चलते- फिरते या चरते- चरते अचानक डर के कारण या दूसरे पशु के टक्कर मारने से गिरने के कारण या किसी पशु के धोखे से मार देने के कारण कमर की हड्डी टूट जाती है ।

१ - औषधि - सबसे पहले पशु को किसी के सहारे रस्सियों का और टाट का सहारा देकर खड़ा कर लें। फिर उसे नीचे लिखी औषधियाँ पिलाऐं । गाय के दूध की दही १४४० ग्राम , मसूर की जली हुई दाल ४८० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , मसूर की जली हुई दाल को दही में मथकर पानी मिलाकर पशु को , अच्छा होने तक , दोनों समय पिलाऐं ।

२ - औषधि - गाय के दूध से बनी दही १४४० ग्राम , गुड़ ४८० ग्राम , पानी ९६० ग्राम ,१०० ग्राम मैदा लकड़ी चूर्ण सभी को मिलाकर रोगी पशु को तीनों समय, अच्छा होने तक पिलायें ।

३ - औषधि - गाय का दूध १४४० ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , ५० ग्राम अश्वगन्धा चूर्ण तीनों को मिलाकर ,पशु के दोनों समय अच्छा होने तक पिलाऐं ।

४ - औषधि - गाय का दूध ९६० ग्राम , सहजन ( सोहजना ) के पत्तों का चूर्ण १०० ग्राम , चिरौंजी ( चायडी ) की जड़ की छाल १२० ग्राम , जड़ की छाल को बारीक पीसकर छान लेना चाहिए और सुबह - सायं दोनों समय रोगी पशु को अच्छा होने तक पिलायें ।

५ - औषधि - गाय का दूध ९६० ग्राम , गुड़ १२० ग्राम , धामड़ की जड़ की छाल का चूर्ण १२० ग्राम , या जोड़तोड़ ( सुमन लता ) चूर्ण ५० ग्राम , या चारों को लेकर दूध में पकाकर गुनगुना पशु को सुबह- सायं चार पाँच दिन पिलाते रहने से ठीक अवश्य होगा ।

६ - औषधि - गाय का दूध ९६० ग्राम , झिनझिनी की जड़ की छाल का चूर्ण १२० ग्राम , या माँसी के पञ्चांग का चूर्ण १०० ग्राम , या तीनों को दूध में पन्द्रह मिनट तक पकाने के बाद गुनगुना कर पशु को ५-६ दिन पिलाने से ठीक होगा ।

७ - औषधि - गाय का दूध ९६० ग्राम , हाड़ जूड़ ( हडजोड़ ) चूर्ण ६० ग्राम , गाय का घी ६० ग्राम ,,सभी को मिला पन्द्रह मिनट पकाकर गुनगुना कर रोगी पशु को दोनों समय पिलाने से ५-६ दिन में ठीक हो जायेगा ।

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२ - नक्खी की बिमारी ( अगले पैर से लँगड़ाना )
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कारण व लक्षण - पशु जब आपस में लड़ जाते है या फिर दूसरा पशु टक्कर मार देता है । या पशु दिवार ,पेड़ , गड्ढे की चपेंट में आ जाता है । या वज़न खींचने में कभी - कभी कूल्ली उतर जाती है । पशु के कूल्ली उतर जाने पर वह पिछले पैर से लगंडाता है तथा नक्खी उतरने पर वह अगले पैर से लँगड़ाता है । उसकी हड्डी खिसक जाती है और पाँव मे गड्डा हो जाता है ।

१ - औषधि -गाय का गोबर २४० ग्राम , गोमूत्र २४० ग्राम , दोनों को मिलाकर , गरम करें । यदि सूखा गोबर लेंडी की तरह हो तो ३६० ग्राम , मूत्र लेना चाहिए ।गुनगुना होने पर कुलली पर और नक्खी पर लेंप करना चाहिए । लेप अच्छा होने तक करना चाहिए ।

२ - औषधि - नक्खी का इलाज बाँस की खपाची बनाकर पाँव के चारों और लगाकर कपडें के सात पर्त करके , ४ दिन तक बाँधने के बाद अवश्य खोल देना चाहिए ।

# - आलोक - बाँस की खपाची का प्रयोग तुरन्त लँगड़ा रूप में पैदा हुऐ पशु के बच्चे को भी बाँधने से उसका पैर ठीक हो जाता है ।

३ - औषधि - गोविन्द फल ( कन्थार की पत्ती ) १२० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , पत्तियों को एक घन्टे तक पानी में भिगोने के बाद पानी से निकालकर पीसलेना चाहिए तथा बाद में उनको निचोड़कर रस निकाल लें और रस के बराबर ही मीठा तैल मिलाकर गरम करे । गरम करते समय उसे हिलाते रहना चाहिए तथा उतारकर गुनगुना होने पर रूई से नक्खी या कुल्ही के ऊपर इसको , एक दिन छोड़कर , तीसरे दिन , अच्छा होने तक लगाना चाहिए ।

# - आलोक - पशु को भागने से बचाना चाहिए , दवा लगाने पर पशु को सेंकना नहीं चाहिए ,सेंकने से पशु की चमड़ी निकल जाती है ।

४ - औषधि - अगले पैर की नक्खी उतरने पर हरी पत्तियों की सींक ( सलाई ) को लाकर उनकी पत्तियाँ तोड़कर उसके छिलके को उतार कर चार इंच की लम्बाई में काट लेना चाहिए । इसके बाद पशु को गिराकर , उसका मुँह चौड़ा करके , उसकी नाक के छेद में पूरी सलाईयां भर देना चाहिए । सलाईयां निकालनी नहीं चाहिए इस प्रयोग से ८-१० दिन में पंशु की नक्खी यथावत बैठ जायेगी । यदि पशु छिकेगा भी तो उसकी नक्खी आ जायेगी ।

५ - औषधि - खुर के नीचे सात परत कपड़ा लपेट दें बाँस की खपाची बनाकर बाँध दे । खपाची घुटने से ४ इंच ऊपर बाँधी जाये तो पशु झटका मारेगा और पाँव आ जायेगा पशु को आराम होगा । तथा सूजन वाले स्थान पर बाँधने के लिए सन् की रस्सी या सूतली का ही प्रयोग करना चाहिए । और बाद में साबुन से हाथ धोकर हाथों में नारियल तैल लगाना चाहिए ।

३ - पसली का टूटना
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कारण व लक्षण - कभी - कभी पशुओं के आपस में लड़ जाने से घातक चोंट लग जाने से ,अचानक गिर पड़ने से पसलियाँ टूट जाया करती है ।

१ - औषधि - नीम की पत्ती ९६० ग्राम , नमक १२ ग्राम , पानी २० लीटर , नमक व पत्तियों को महीन पीसकर पानी में डालकर उबालना चाहिए पानी १९ लीटर रहने पर छानकर पशु के रोगग्रस्त स्थान पर एक कपड़ा पहले से भिगोकर उस स्थान पर रख दें ।बाद में गुनगुने गरम पानी से उसे सेंकें यह कार्य दोनों समय आराम होने तक किया जाये । बची हुई उबली पत्तियों को रोगग्रस्त स्थान पर बाँध देनी चाहिए । नीम के स्थान पर बकायन की पत्ती या निर्गुण्डी की पत्तियों का उपयोग भी अति उत्तम रहता है । तथा नारियल तैल की मालिश भी रोगग्रस्त स्थान पर लाभकारी होता है यह रोज़ करनी चाहिए ।

२ - औषधि - काला ढाक ( काला पलाश ) की अन्तरछाल १२० ग्राम , गोमूत्र ३६० ग्राम , छाल को बारीक कूटछानकर , गोमूत्र मिलाकर पशु के रोगग्रस्त स्थान पर लगाकर पट्टी बाँध देनी चाहिए । पट्टी आराम होने तक रोज़ाना बदलनी चाहिए ।
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४ - हड्डी पर चोंट
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कारण व लक्षण - हड्डी पर अचानक गहरी चोट लगने से , पत्थर या लाठी का प्रहार होने से , पशुओं में आपस में लड़ने से और फिसल जाने से अक्सर हड्डी टूट जाती है । और जिस स्थान से हड्डी टूटी होती है वहाँ पर सूजन तथा दर्द होता रहता है , क्षतिग्रस्त स्थान हिलाने पर हिलता है और हिलाते समय कट- कच की आवाज़ होती है । और टूटा हूआ स्थान झुका हुआ महसूस होता है ।

खपाची का प्रयाग -:- टूटे हुए स्थान पर पट्टी बाँधने के लिए हमें पहले नये पोलें बाँस को लेकर उसकी खपाचियाँ बना लेनी चाहिए । खपाचियाँ कमानीदार लचक वाली होनी चाहिए , शरीर के पतले स्थान की तरफ़ की खपाची कम चौड़ी व मोटे स्थान की और की तरफ़ की चौड़ी होनी चाहिए । खपाचियाे के ऊपर मुलायम कपड़े की दो तहँ व रूई लगाकर सूतली से बाँधना चाहिए ।
पशु को ज़मीन पर लेटाकर टूटे हुए पाँव या हिस्से को ऊपर करके अगर किसी पैर में है तो उसे ऊपर करके बाक़ी तीनों पैरों को एक साथ मिलाकर बाँध देना चाहिए , और हड्डी को दबाकर या खींचकर उसे ,उसके स्थान पर बैठा देना चाहिए तथा खपाची बाँधनी चाहिए , सभी खपाची समान्तर दूरी पर रखनी चाहिए ,हर दो खपाची के बीच में एक खपाची का स्थान ख़ाली रखना चाहिए और सभी खपाचीयो को जमाकर नयी सूतली द्वारा तीन बन्द कसकर बाँध देने चाहिए ताकी पट्टी खिसक न सके इस पट्टी को २५ दिन तक नहीं खोलना चाहिए । अगर पाँव में ज़ख़्म पड़ जाये तो इसके बीच में पट्टी बदलनी चाहिए तथा दूसरी पट्टी नये सिरे से तैयार कर सभी रस्सियाँ भी नयी ही लगानी चाहिए । पट्टी बदलने से पहलेनयी पट्टी पहले ही ठीक तैयार कर लेना चाहिए ।

१ - औषधि - तैल व सिन्दुर आपस में मिलाकर शहद के समान गाढ़ा बना लें , सावधानी से हड्डी को यथास्थान बैठाकर टूटे स्थान पर सब जगह उसका लेप कर दें । फिर उस स्थान पर मनुष्य के सिर के बाल रखकर एक गद्दी बना लेनी चाहिए, ऊपर कपडेदार खपाचीयो को जमाकर नयी सूतली से तीन जगह से जमा कर बाँध दें । रोज़ाना पट्टी मे ६० ग्राम , अलसी का तैल खपाचीयो के सहारे उतारा करें ताकि पट्टी चिकनी बनी रहे और चमड़ी गले नहीं यह क्रिया नियमित करते रहे ।

२ - औषधि - पकी ईंट का चूरा कर पावडर बना लें । उसे एक कपडेवाली पट्टी में भरकर टूटे हुए भाग पर बाँधना चाहिए । उसके ऊपर कपड़ा लपेटी हुई लचलची खपाची रखकर नयी रस्सी से तीन जगह से कसकरबाँध देंना चाहिए। फिर दिन में एक बार नीम की पत्तियों का उबला पानी ठन्डा करके छींटना चाहिए । रूई द्वारा अलसी या नारियल का तैल पट्टी में उतारना चाहिए ।

३ - औषधि - हडजोड़ हरी १२० ग्राम , गाय का दूध १ लीटर , गाय का घी १०० ग्राम , हडजोड़ को महीन पीसकर दस मिनट तक दूध में पकायें , और उतार कर इसी में घी को मिलाकर गुनगुना कर पशु को नाल या बोतल से पिला देना चाहिए । दूध को देर तक न पकायें नहीं तो दूध हडजोड़ के कारण जमकर दही जैसा हो जाता है और पिलाने में परेशानी पैदा होती है ।

३ - औषधि - चिरौंजी की जड़ २४ ग्राम , गाय का दूध ९६० ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , जड़ को महीन पीसकर दूध में पकाकर निचोड़कर छान लें , रोगी पशु को आराम होने तक दोनों समय पिलाये ।
रोगी पशु को हल्की , पतली , पोषक खुराक( अलसी ) उड़द गेहूँ का चौकर ,चना सोयाबीन ,आदि ) एक माह तक देवें । उसे बबूल की पत्ती अवश्य खिलानी चाहिए ।

# - आलोक -:- हड्डी जोड़ने से पहले पशु को २४० ग्राम , शराब अवश्य पिलानी चाहिए जिसके कारण पशु को दर्द का अहसास कम होगा और आराम से पट्टी को बन्धवाँ लेगा ।

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५ - हड्डी टूटकर बाहर निकल आना
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कारण व लक्षण - कभी - कभी हड्डी पर बाहरी चोट लगने पर , हड्डी टूटकर बाहर निकल जाती है । या पशुओं में लड़ाई होने से भी हड्डी टूटकर बाहर निकल जाती है । जहाँ हड्डी टूटकर बाहर आ जाती है उस स्थान से रक्त निकलता है और पशु को दर्द बहुत होता है । कईबार हड्डी फैटकर बीच में माँस फँस जाता है , टूटे स्थान पर सूजन आ जाती है, व कभी - कभी टूटा पैर इधर - उधर घुमाने पर घुमने लगता है ।

उपचार विधी -:- पहले तो बाहर निकली हड्डी को यथास्थान बैठा देवा चाहिए , चमड़े को चीर कर भी हड्डी को बैठा सकते है । काला ढाक ( काला पलाश ) की अन्तरछाल महीन पीसकर , छलनी से छानकर उसे गोमूत्र में भीगो देना चाहिए , एक मज़बूत कपड़े की पट्टी पर उसका २ सूत मोटा लेप कर दिया जाय । पट्टी धीरे - धीरे से टूटे स्थान पर बाँधकर फिर कपड़ा लपेटी हुई खपाचीयो को यथास्थान समानान्तर जमा दें और नयी रस्सी द्वारा तीन बंध कसकर बाँध दें ।पट्टी बाँधने के बाद पट्टी पर दिन में दोबार गोमूत्र छिड़क दें , गोमूत्र से पट्टी को हमेशा तर रखना चाहिए । यही पट्टी यथावत एक माह तक बंधी रहनी चाहिए । अगर ज़ख़्म बढ़ जाय या उसमें पीव ( पस ) पड़ जाये या सड़ान होने लगे तो पट्टी खोलकर नीम के उबले हुए गुनगुने पानी से घाव को धोकर पुनः इसी प्रकार पट्टी बाँ देनी चाहिए । पट्टी बदलने का मतलब फिर से नयी पट्टी करना है, पुरानी किसी वस्तु का प्रयोग नहीं करना ।
अगर पीछे का पैर जाँघ पर से टूटा हो , तो खपाचियाँ पैर के बराबर लम्बी होनी चाहिए और कपड़े की सात तहँ लगायें जिससे खपाचियाँ पशु के शरीर मे न घुसे खपाचीयो जितना लम्बा कपड़ा लपेटना चाहिए ।
अगर पैर घुटने के ऊपरी भाग से टूटा हो , तो पूरे के बराबर कपड़ा लिपटी खपाचियाँ लें , पट्टी बाँधने से पहले टाँट की दो गोल गद्दीयाँ लिपटी हुई डेढ़ इंच की गालाई की गद्दी टाँच पर रखें , फिरँ नि पट्टियों को मोड़कर या टाँच पर दोनों तरफ़ समानान्तर दूरी पर रखें , इसके बाद कपड़े से लपेटी हुई कमानीदार खपाचियाँ रखकर पट्टी नयी रस्सी द्वारा बाँधनी चाहिए । पट्टी को पाँच जगह से बाँधना चाहिए ।फिर पिलाने वाली दवाये देनी चाहिए ।

१ - औषधि - मीठा तैल ३६० ग्राम , शक्कर १२० ग्राम , शक्कर को महीन पीसकर तैल में मिलाकर रोगी पशु को रोज़ सुबह आराम होने तक नाल या बोतल से हिला - हिलाकर पिलाना चाहिए नहीं शक्कर जम जाती है ।

२ - औषधि - गुड़ १२० ग्राम , गाय का दूध ९६० ग्राम , गाय का घी १०० ग्राम , अश्वगन्धा चूर्ण १० ग्राम , दूध को गरम करके उसमें गुड़ घोलकर गरम - गरम में ही घी व अश्वगन्धा चूर्ण भी मिला दें रोगी पशु को दोनों समय १५ दिन तक पिलावे ।

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