Tuesday, 13 January 2015

(२७)-१-गौ- चि०-बायँ-वायुरोग ।

(२७)-१-गौ- चि०-बायँ-वायुरोग ।

पशुओं में वायुरोग ( बाँय ) का होना
=============================
१ - हन्न वायु
===========

लक्षण व कारण - यह बड़ा ही भयंकर रोग हैं । इस रोग में घूम-घूम कर पशु नीचे गिर पड़ता हैं । उसके पाँव काँपते हैं , वह चारों पैर फैला देता हैं , पशु को अत्यधिक बेचैनी होती हैं ।
#- "घुमनारोग" से पीड़ित पशु घुमता हैं, इस रोग में पशु कुम्हार के बर्तन बनाने वाले मिट्टी के चाक की तरह घूमता रहता हैं , काँपता नहीं हैं , जबकि 'हन्न वायु, रोग में कम्पन्न व बेचैनी अधिक होती हैं । इस रोग में पशु का पेट फूल जाता है ।

१ - औषधि - इन्द्रायण ( नारून , नाहरून ) के दो फलों को पीसछानकर पशु को खिलाने से लाभ होता हैं ।

२ - औषधि - बाघ का माँस खिलाने से तुरन्त लाभँ होता हैं ।

३ - औषधि - बारहसिंगा के सींग को पत्थर पर पानी की कुछ बूँदें डालकर सींग को घिसकर चन्दन की तरह बना लें फिर पशु को पिलाना चाहिएे यदि सींग न मिले तो बारहसिंगा के मिगंन ( लेंडी ) को पीसकर खिलाना भी लाभप्रद हैं ।

४ - औषधि - हिरण की नाभि को पीसकर पिलाना भी अति गुणकारी होता हैं ।

५ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर , और गाय का घी २५० ग्राम , दोनों को मिलाकर देने से भी लाभ होता हैं ।


२ - घुमना रोग
==============
कारण व लक्षण - इस रोग में पशु एक स्थान पर घुमता रहता हैं । उसे बेहोशी हो जाती हैं । बाँधने पर पशु बंधी रस्सी के सहारे खड़ा होता हैं । ऐसा मालूम होता हैं कि उसे आँखों से दिखाई नहीं पड़ रहा हो तो इस रोग में पशु ऐसे घुमता है जैसे कुम्हार अपना चाक घुमाता हैं । इसे ही घुमना रोग कहते हैं ।

१ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर में हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर दिन में कम से कम ३ बार पिलाना चाहिए । अधि से अधिक ५-६ बार पिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - बकरी का दूध १ लीटर , हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर दिन में ५-६ बार पिलाने से पशु को आराम आता हैं ।

३ - औषधि - असली मलयगिरी चन्दन को पत्थर पर घिसकर १-१ छटांक दिन में ५-६ बार पिलाने से भी लाभ होता हैं ।

४ - औषंधि - अलसी १२५ ग्राम की मात्रा को भिगोकर दिन में ३ बार पिलाने से भी लाभ होता हैं ।


३ - मूर्छा रोग
============

कारण व लक्षण - इस रोग में पशु धीरे- धीरे अलसाने लगता हैं । घुमरी ( घमेर ) आया करती हैं । पशु की बेचैनी बढ़ती जाती हैं । फिर एकाएक पशु ज़मीन पर गिर जाता हैं और मूर्च्छित ( बेहोश ) हो जाता हैं ।

१ - औषधि - नमक १२५ ग्राम , सोंठपावडर १५ ग्राम , गुड़ डेढ़ छटांक , गन्धक चूर्ण डेढ़ छटांक , सभी को दो लीटर गरमपानी में मिलाकर रखें और ठण्डा होने पर नाल में भरकर पशु को पिलाने से आराम आता हैं ।

२ - औषधि - हींग आधा तौला , कालीमिर्च पावडर ५ ग्राम , ज़ीरा पावडर १० ग्राम , अदरक पीसकर १ छटांक , सभी को मिलाकर गरम पानी में मिलाकर नाल द्वारा पिलाना चाहिए , दोनों दवाई के बीच तीन घन्टे होना चाहिए । ये दोनों खुराक एक दिन ही दें सकते हैं ।

३ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर में हल्दीपावडर १ छटांक मिलाकर पिलाने से बिमार पशु को बहुत ही लाभ होता हैं । यह दवा दिन में तीन बार देना चाहिए ।

----------- @ ------------


४ - हिरण वाह ( हिरणाबाँय ) पागलपन
==============================
कारण व लक्षण - इस रोग में पशु पागल होकर जानवरों और आदमियों को मारने के लिए दौड़ता हैं । खुर से मिट्टी कुरेदता हैं , मौक़ा पाकर बहुत दूर भागने की कोशिश करता हैं । उसको अपने देह की सुध नहीं रहती हैं और उसकी आँख लाल हो जाती हैं

१ - औषधि - असली मलयगिरी चन्दन को पत्थर पर कूछ बुंदे पानी की डालकर घिसकर पेस्ट बनाकर रोगी पशु को पिलाने से अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता हैं ।

२ - औषधि - गाय का दूध १ लीटर , हल्दीपावडर १ छटांक , दूध में मिलाकर दिन मे ४-५ बार पिलाने से पशु को लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - हिरण की नाभि १ छटांक , लालमिर्च १ छटांक , पीसकर गरम पानी में मिलाकर दिन में तीन बार पिलाने से लाभँ होता हैं और पशु जल्दी ही ठीक हो जाता हैं ।

५ - औषधि - बारहसिंगा के के सींग को पत्थर पर कुछ बुंदे पानी डालकर सींग को घीसकर पेस्ट बना लें और पशु को खिलाने से आराम आता हैं ।

६ - औषधि - बाघ का माँस को पानी में पीसकर पशु को पिलाने से आराम आता हैं ।


५ - जकड़ा रोग
====================

कारण व लक्षण - यह एक वायु रोग है । इस रोग में पशु का शरीर जकड़ सा जाता है इस लिए इस रोग को जकड़ा रोग कहते हैं । गाय -भैंस के पैरों में वायु विकार के कारण पशु खड़ा नहीं हो पाता हैं ।

१ - औषधि - बकरबेल, हाड़ा बेल , ( । ) यह बेल काष्ठिय पौधों पर चढ़ती है और तने से लिपटी रहती है । और पत्तियों को तोड़ने से इसके डंठल से दूध निकलता है ।

बकरबेल २ किलो की कूट्टी काटकर २० भाग करलें । एक भाग सवा किलो पानी में उबालें और एक किलो शेष रहने तक उबाले यह एक खुराक के लिए प्रयाप्त है । अब मेंथी का चूर्ण १ किलो , कूटकी २०० ग्राम , मालकंगनी २०० ग्राम , कालीजीरी १०० ग्राम , इन दवाइयों को कूटकर चालीस खुराक बना लेंएक खुराक लेकर ।बकरबेल की पानी में बनी खुराक दोनों को मिलाकर सुबह -सायं देने से लाभ होगा यह दवाई दस दिन तक दवाई खिलाऐ ।
मालिश के लिए मरहम-- तारपीन का तेल १५० ग्राम , सरसों का तैल २५० ग्राम , मोम देशी १०० ग्राम , सज्जी १०० ग्राम , मर्दा सिंह २५ ग्राम , को लेकर सज्जी व मूर्दा सिंह को कूटछानकर बाक़ी दवाइयों को मिलाकर किसी बर्तन में रखकर धीमी आँच पर गर्म कर ले , यह मरहम बन जायेगा । एकबार पशु को स्नान के बाद लगाये । लाभ अवश्य होगा ।


६ - धनुवति , धनुर्वात
=================

कारण व लक्षण - इस रोग में पशु बहुत अधिक सुस्त रहता है । कोई पशु लकड़ी की तरह अकड़ जाता है । और पाँव ज़मीन पर ठोंकता रहता हैं ।वह गर्दन घुमाता रहता है । इस रोग में पशु भड़कने जैसा मालूम होता है । उस की साँस तेज़ चलती हैं । साधारण : दस्त भी बन्द हो जाते हैं । बछड़ों को यह रोग होने पर वे दूध पीना बन्द कर देते हैं । पशु आधे - आधे घन्टे तक बेहोश रहते हैं । जिस ओर पशु पांँव ठोंकता हैं , उस ओर की चमड़ी के बाल भी निकल जाते हैं ।

१ - औषधि - चन्द्रशूर ( अलासिया ) ६० ग्राम , गरम पानी ५०० ग्राम , काला नमक १२ ग्राम , नमक और चन्द्रशूर को बारीक पीसकर , गरम पानी में उबालकर , काढ़ा बनाकर , रोगी पशु को , दोनों समय , आराम होने तक , पिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - इन्द्रायण का फल २४ ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , काली मिर्च १२ ग्राम , लौंग ९ ग्राम , काला नमक १२ ग्राम , पानी ३०० ग्राम , ऊपर बतायी गयी सभी वस्तुओं को बारीक पीसकर , पानी में उबालकर , काढ़ा बनाना चाहिए । काढ़ा आधा होने पर गुनगुना रहने पर पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलाना चाहिए । रोगी पशु को बन्द कमरे में बाँधा जाय । उसे ऊपर से टाट या कम्बल ओढ़ा देना चाहिए ।

३ - औषधि - इन्द्रायण फल ३० ग्राम , सोंठ २४ ग्राम , बंसलोचन ९ ग्राम , नमक १२ ग्राम , लहसुन ६० ग्राम , गुड़ ३० ग्राम , पानी ३०० ग्राम । ऊपर लिखी चीज़ों को बारीक पीसकर , छलनी द्वारा छानकर , काढ़ा बनाना चाहिए । काढ़ा इतना औटाया जाना चाहिए कि वह औटाकर आधा रह जाय। तब गुनगुना ,बिना छाने रोगी पशु को दोनों समय पिलाना चाहिए और आराम होने तक पिलाना चाहिए । और ध्यान रहे की बंसलोचन को अलग पीसकर रखें, और दवा पिलाते समय ही मिलाये ।

४ - औषधि - रोगी पशु को एक सेर दूध और एक मुर्ग़ी का अण्डा मिलाकर सुबह - सायं पिला देना चाहिए ।


७ - गठिया या जोड़ों का दर्द
===========================

कारण व लक्षण - पशु के शरीर में यह एक प्रकार का रक्तविकार है । अशुद्ध घास, दाना और पानी पीने से यह रोग उत्पन्न हो जाता है । रोगी पशु उदास रहता है । उसके खाने - पीने तथा जूगाली करने में कुछ कमी आ जाती है । पहले उसके अगले घुटनों पर सूजन आती है , फिर पिछले घुटनों पर । इसके बाद शरीर में गाँठ के रूप में सूजन इसी तरह आती और उतरती है । यह क्रम कई दिनों तक चला करता है । सूजन एक जोड़ से दूसरे जोड़ पर चली जाती है । कुछ दिन तक पुनः इसी जोड़ पर सूजन आ जाती है । तब पशु काम के लायक नहीं रहता ।

१ - औषधि - हरी मेंथी रोगी पशु को ९६०० ग्राम , प्रतिदिन एक माह तक खिलायी जाय । इससे उसे अवश्य आराम होगा । पशु भी तैयार हो जायगा ।

२ - औषधि - मेंथी का दाना ७२० ग्राम , पवाडिया ( चक्रमर्द ) के बीज ७२० ग्राम , काला नमक ६० ग्राम , पानी ४००० ग्राम , सबको बारीक पीसकर चलनी द्वारा छानकर पानी के साथ ८ घन्टे भिगोकर रोगी पशु को , आराम होने तक दिया जाय । पशु को खली आदि । देना बन्द कर देना चाहिए । उसे केवल हरा चारा देना चाहिए । उक्त दवा पशु को सुबह - सायं देनी चाहिए ।

३ - औषधि - साम्राज्य बेला १२० ग्राम , गिरदान १२० ग्राम , नागोरी अश्वगन्धा ४८० ग्राम , काला कुडा़ ६०० ग्राम , सबको बारीक पीस,छानकर चूर्ण बना लेना चाहिए । रोगी पशु को रोज १०० ग्राम चूर्ण , पानी ४०० ग्राम, में उबालकर , बोतल द्वारा, बिना छाने पिलाये । यह दवा रोगी पशु को २२ दिन तक पिलायी जाय ।



Sent from my iPad