Saturday, 7 November 2015

(४६)-१-गौ-चि०-चर्मरोग ।

(४६)-१-गौ-चि०-चर्मरोग ।

१ - चर्मरोग
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कारण व लक्षण - यह रोग छूत रोग हैं । अक्सर कमज़ोर पशुओं मे होता हैं । यह रोग गन्दे व सीलनयुक्त व तंग स्थान मे रहने से होता हैं । आमतौर पर पशुओं मे खुजली दो प्रकार की पायी जाती हैं । कभी- कभी ख़ुश्क ( सूखी ) खुजली या फिर गीली ( तर ) खुजली पायी जाती हैं । यह खुजली अधिकत्तर भैंस को अधिक होती हैं । यह रोग अधिकांश पुछ तथा थुई से प्रारम्भ होता हैं । पशु बार- बार उस स्थान को चाटा करता है या पेड़ से रगड़कर या दीवार से रगड़कर खुजलाता है , पहले तो उसकी खाल उतरती है व वहाँ के बाल झड़ जाते हैं फिर घाव हो जाता हैं तथा फिर पशु की खाल मोटी होकर उसमे सलवटें पड़ जाती हैं और यह कर्म करने मे पशु को आन्नद प्राप्त होता हैं । खुजली की स्थिति मे पशु की खाल फट जाती हैं । पशु बेचैन हो जाता हैं और उस स्थान से पीब बहने लगता हैं । खुजली तेज हो जाती है तथा पशु परेशान होकर बार- बार उसे चाटने की कोशिश करता रहता हैं । यह छूत रोग भी हैं यह एक से दूसरे पशु तक पहुँचता हैं ।

सावधानियाँ - खुजली के लक्षण जैसे ही पशु मे दिखने लगे तो सबसे पहले उसे स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें , और पशु को जहाँ बाँधना है या जहाँ पर बँधा था उस स्थान नीम का पानी पकाकर छिड़कर किटाणु रहित करना चाहिऐ । ५ किलो पानी मे नीम की पत्तियाँ डालकर उसे खोलायें फिर गुनगुने पानी से खुजली वाले स्थान को पानी से अच्छी तरह साफ़ करें और शेष पानी से नहलायें ऐसा करने से खुजली आगे नही बढ़ेगी और पशु को तेज धूप मे बाँधना चाहिए ।

१ - औषधि - गाय के गोबर का रस निकालकर उसमे सरसों का तेल मिलाकर खुजली वालें स्थान पर मालिश करनी चाहिए और धूप सेंकनी चाहिए ,ऐसा करने से पशु को आराम आता हैं ।

२ - औषधि - गन्धक १० ग्राम , गाय का घी ८० ग्राम , ( या तिल का तेल ४० ग्राम ) , नीम का तेल ४० ग्राम ,हल्दी ५ ग्राम , फिटकरी ५ ग्राम ,सभी को कूटपीसकर घी या तेल मे मिलाकर रखलें और खुजली युक्त स्थान पर प्रतिदिन सुबह- सायं मालिश करने से पहले तेल को हिला- डुलाकर प्रयोग करने से रोग जाता रहेगा ।

३ - औषधि - नहाने का साबुन १० ग्राम , मिट्टी का तेल १० ग्राम ,गरम पानी २०० ग्राम लेकर उसमें साबुन को घोलकर फिर मिट्टी तेल डालकर फैटते रहे जब सब मिलकर दूध जैसा हो जाये तो किसी काँच की बोतल मे भरकर रखलें और जब भी लगाये तो बोतल के अच्छी तरह हिला- डुलाकर तभी लगाये ऐसा करने से रोग जाता रहेगा । साथ ही कुछ खाने की दवाई भी देंगे तो रोग जल्दी ठीक होगा ।

# - खाने के लिए दवाई -

४ - औषधि - सादा नमक १ छटांक , गन्धक पावडर आधा तौला , आधा लीटर पानी मे मे मिलाकर नाल द्वारा एक सप्ताह तक पिला देना चाहिए ।

५ - औषधि - चावल का आटा ५०० ग्राम , नीम के पत्ते २५० ग्राम ,२५० किलो पानी मे आटा डालकर पकाने के लिए रख दें और नीम के पत्ते पीसकर पानी मे ही डालकर हिलाते रहे पकने के बाद ठंडा करलें फिर इसमे २ किलो गाय के दूध से बनी दही डालकर अच्छी तरह मथकर दिनभर मे नाल द्वारा ८-९ दिन तक पिलाते रहे । रोगी पशु दाना अवश्य देते रहें । गर्मियों मे होने वाली खुजली की अतिउत्तम दवा हैं ।

२ - ख़ुश्क खुजली
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उपचार - सबसे पहले तो रोगी पशु को नीम की पत्तियाँ पानी मे पकाकर पानी को ठन्डा करके पशु अच्छे से नहलाना चाहिए और खुजली ग्रस्त स्थान को अच्छे से धोना चाहिए । नीम पानी के स्थान पर हुक्के के पानी से भी नहलाना भी लाभदायक होता हैं । इसके बाद आगे उपचार इस प्रकार करें -

१ - औषधि - गन्ने के रस का सिरका और शराब समान मात्रा में लेकर पशु के सारे शरीर में मालिश करना चाहिए।यह लाभकारी सिद्ध होगा ।

२ - औषधि - दो भाग नैनी गन्धक , एक भाग पारा , तीन भाग बादाम की लूगदी लें ,सबको एक साथ खरल करके गाय के घी मे मिलाकर पशु के रागग्रस्त स्थान पर मालिश करनी चाहिए यह लाभप्रद सिद्ध होगी ।

३ - औषधि - हरताल और सांभर नमक समान मात्रा में लेकर गाय के घी में मिलाकर पशु के शरीर में मालिश करें ।

४ - औषधि - खुजली से ग्रस्त पशु को नीम की पत्ती १ पाव , नमक १० ग्राम , प्याज़ १ पाव , गाय के दूध से बना छाछ १ किलो , आपस मे मिलाकर यह एक दिन की खुराक है इसे प्रतिदिन पिलाये और दो हफ़्ते तक पिलाना चाहिए । खुजली अवश्य ठीक होगी ।

३ - तर या गीली खुजली
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उपचार - खुजली गीली - तर हो या ख़ुश्क । इसमे रोगी पशु की सफ़ाई - स्वच्छता की परम की परम आवश्यकता हैं । खुजली ही नही " गजचर्म " खाज , दाद , दिनाय , उक्वत , अथवा एक्ज़िमा , रोग से ग्रस्त पशुओं के लिए भी सफ़ाई और स्वच्छता अतिआवश्यक हैं । प्राय: रोगग्रस्त पशु को स्नान कराने अथवा रोगाक्रान्त भाग धोने से इन चर्मरोगों मे विशेष तथा जल्द लाभ होता हैं । पशु के शरीर को धोने के बाद ही निम्नांकित योगों का सुविधानुसार प्रयोग करना चाहिए ।

१ - औषधि - नीम की पत्ती को पीसकर गीली खुजली पर लेप करें अथवा नाम के पेड़ डाल को चन्दन की भाँति घीसकर लेप लगाना चाहिए ।

२ - औषधि - गाय के मक्खन को सैकड़ों बार पानी से धोकर मिर्च बारीक पीसकर तथा सिन्दूर मिलाकर लेप करे ।

३ -औषधि - बर्रे का छत्ता फूँककर तेल मे मिलाकर तेल को गीली खुजली के स्थान पर लगायें ।
देशी साबुन , गन्ने के रस का सिरका और सिन्दुर प्रत्येक को सममात्रा में लेकर और मिलाकर तर खुजली पर लगाये ।

४ - औषधि - दही और बारूद एक साथ फैटकर पशु के शरीर में लगाना भी लाभदायक हैं ।

५ - औषधि - हुक्के का पानी को शरीर पर मलने से तर तथा ख़ुश्क दोनो प्रकार की खुजली दूर होती हैं ।

६ - औषधि - मिट्टी का तेल १ भाग और गाय का दूध ८ भाग मिलाकर लगाने से खुजली में आराम हो जाता हैं ।


४ - गजचर्म ( Menge )
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लक्षण व कारण - यह गजचर्म रोग कठिन रोग हैं । यह प्रथम एक जगह उत्पन्न होता हैं और फिर शीघ्र ही सारे शरीर मे फैल जाता हैं । रोगी पशु का चमड़ा हाथी के समान खुरदरा व कठोर हो जाता हैं । रोगी पशु की देह मे पसीना नही आता हैं । इस रोग को " चर्मदल कुष्ठ " के नाम से भी जाना जाता हैं । इस रोग प्राय: खौरा व खुजलीनाशक खाने व लगाने की दवाओं के सेवन से ही रोगी पशु को लाभ हो जाता हैं ।

१ - औषधि - कच्छूराषभ तेल , महामरिच्यादि तेल , नीम तेल , इन तेलों के आलावा तर खुजली मे लगाने वाली जो दवाऐं उनका भी प्रयोग कर सकते हैं ।

२ - औषधि - आम की फाँक तथा सेंधानमक पीसकर ताँबे के बर्तन मे रखकर लोहे की वस्तु से ख़ूब रगड़े । इसके बाद इसे रोगी के शरीर पर मालिश करेने से लाभ होता हैं ।

३ - औषधि - सूखे आँवले को जल मे पीसकर गजचर्म रोग में पशु के आक्रान्त स्थल पर लेप करना गुणकारी हैं । और ध्यान रहे कि रोगी पशु को हरा चारा ही खिलाये । कब्जकारक वस्तु न दे व दाना चारा हानिकारक हैं ।


५ - खौरा रोग
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लक्षण व कारण - इस रोग होने पर गाय- बैल के शरीर पर भूसी- सी उड़ने लगती हैं । पशु बार- बार शरीर को खूँटे या दिवार से रगड़कर खुजलाता हैं । सब तरह की खाने- पीने की सावधानी रखने पर भी पशु दिन- प्रतिदिन कमज़ोर होता चला जाता हैं । यह खौरा रोग अक्सर कन्धे से प्रारम्भ होकर पशु के पूरे शरीर मे फैल जाता हैं । इस रोग मे कभी-कभी तो दाने के समान फुन्सियाँ नज़र आने लगती हैं । इस रोग से ग्रसित पशु अपने शरीर को वृक्षों आदि से रगड़ता रहता हैं ।

उपचार - बैल के दातों के बीच मे मसूड़ों पर चनें की दाल के बराबर माँस की एक ग्रन्थि होती हैं । इस ग्रन्थि को नाख़ून से उखाड़कर ऊपर से पिसी हुई हल्दी मल देने से यह खौरा रोग जड- मूल से नष्ट हो जाती हैं ।


६ - परका रोग ( छपका रोग )
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कारण व लक्षण - ऐसा सूना जाता हैं कि एक प्रकार के पंख वाले सर्प भी धरती पर पाये जाते हैं । जो अक्सर उड़ा करते हैं । जिस पशु के शरीर के ऊपर से यह उड़ने वाला पंखयुक्त सर्प उलटकर निकल जाता हैं । तब उस पशु की कमर पर छालें पड़ पड़ जाते हैं । और रोगी पशु खाना- पीना बन्द कर देता हैं । और दिन- प्रतिदिन दूबला होता चला जाता हैं । और यदि पशु का तुरन्त इलाज नही किया गया तो पशु की खाल चटक जाती है और उसको बेहद कष्ट होता हैं ।

१ - औषधि - गेहूँ के भूसे का धूआँ रोगी पशु के शरीर पर लगाने से लाभ होता हैं ।

२ - औषधि - फिटकरी के पानी से शरीर को धोकर नीम की पत्तियाँ पीसकर घावों पर लगाने से घाव सूखने लगता हैं और बाद मे नारियल तैल लगाते रहना चाहिए । इस क्रिया को ५-६ दिन तक करते रहने से रोग बिलकुल ठीक हो जाता हैं ।

३ - औषधि - गाय के मक्कखन को १०० बार धोकर उसमे देशी सिन्दुर और लालमिर्च आपस में मिलाकर लगाने से भी इस रोग में लाभ होता हैं ।

४ - टोटका - रविवार के दिन लाल बनाथ ( रेशमी वस्त्र ) लेकर इस रोग से ग्रसित पशु के शरीर पर बाँधना तथा उसमे से थोड़ा पशु को खिला देना भी रोगनाशक उपाय हैं ।


७ - मनिया फूटना
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कारण व लक्षण - इस रोग बहुत सारे नामों से भी जाना जाता हैं ।पाठ फूटना ,रीवा , पंचक , बार्बल , फ्लाइज , मनिया फूटना आदि नामो से जाना जाता हैं । यह रोग ख़ून की ख़राबी से उत्पन्न होता हैं । कुछ लोगों का मत है कि यह रोग बाहरी किटाणुओं से होता हैं ।इस रोग मे पशु की त्वचा के नीचें पतले कीड़े पड़ जाते है और वह नीचे ही चलते रहते हैं ।और कभी- कभी यह कीड़े त्वचा मे छेद भी कर देते हैं जिसमे से ख़ून निकलने लगता हैं । इस रोग में पशु खाना- पीना बन्द कर देता हैं । और दिन- प्रतिदिन दूबला होता चला जाता हैं । इस रोग से ग्रसित पशु की त्वचा खराब हो जाती हैं । उसके सम्पूर्ण शरीर पर काले रंग के दाग हो जाते हैं । यह रोग जंगली झाड़ी अथवा संडे- गले पानी से उड़कर पशु के शरीर में प्रवेश कर जाने वाले कीड़ों के कारण और वर्षा ऋतु मे अधिक होता हैं । इसलिए सबसे पहले समय- समय पर फिटकरी या नीम की पत्तियों को उबाले हुए पानी से अथवा साबुन सेके गरम जल से धोना चाहिए , इसके बाद जिस स्थान से ख़ून निकलना प्रारम्भ हो वहाँ पर आगे लिखी दवाओं का प्रयोग करें ।-

१ - औषधि - सबसे पहले कीड़ों को निकालने का प्रयास करना चाहिए । यदि कीड़े न निकलें तो नीम का तैल , नीम की दातुन से कीड़ों के निकलने के स्थान लगाने से कीड़े मर जाते हैं । यदि हो सके तो कीड़ों के निकलने के स्थान पर ख़ून अथवा मवाद निकालकर नीम का तैल लगाये ताकि तैल का असर ख़ून तक पहुँच सकें और कीड़े मर जायें ।

२ - औषधि - प्याज़ तथा नीम की पत्तियाँ रोगग्रस्त पशु को खिलायें ।

३ - औषधि - नीम से निकला हुआ पानी ( निबावट, नीम के आशु ) पिलाना चाहिए ।

४ - औषधि - पशु को नियमित रूप से नमक खिलाना भी इस रोग में हितकारी हैं ।

५ - टोटका - काला झेंगुर मंगलवार के दिन रोगी पशु को खिलायें या कालेनाग की केंचुली दो तौला , एक पाव गुड मे मिलाकर मंगलवार के दिन ही खिलाने से लाभ होता हैं ।


८ - दाद ( Ring Worm )
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कारण व लक्षण - यह रोग भी गजचर्म व खुजली की तरह एक संक्रामक रोग हैं और यह छूत रोग है अन्य पशुओ को भी फैलने का ख़तरा रहता हैं । अक्सर यह रोग छोटे पशुओ मे होता हैं । पशु के शरीर मे जिस स्थान पर दाह होती हैं । वही पर दाद बनता है इसमे गोल- गोल लाल चक्कते पड़ जाते हैं । और उन चक्कतों मे भयंकर खुजली उठती है और पशु उस स्थान को पेड़ या दीवार मे रगड़- रगड़कर खुजलाता हैं । और दाद से निकला पानी जहाँ - जहाँ लगता हैं वहाँ - वहाँ रोग फैलता जाता हैं । चक्कते बढ़ते जाते है और जब यह रोग पक जाता हैं पानीदार रस व पतला पीव - सा निकलता रहता हैं और उन पर काली पपड़ी - सी जम जाती हैं । इस रोग के कीटाणु भी इस पपड़ी के नीचे के सामूहिक रूप से रहते हैं और जहाँ - जहाँ यह पपड़ी पड़ती है , वही इस रोग के कीटाणु भी गिरते रहते हैं - जो कि अन्य स्वस्थ पशुओ मे रोग फैलने लगता हैं ।
गजचर्म और दाद मे एक मुख्यत: अन्तर है कि गजचर्म वाले स्थान की खाल मोटी हो जाती हैं , किन्तु दाद वाले स्थान की खाल इतनी मोटी नही होती हैं तथा इसके मध्य मे व किनारे- किनारे पीली- पीली - सी फुन्सियाँ नज़र आती है । अक्सर यह रोग बरसात के बाद अधिक होता हैं ।क्योंकि मौसम मे सीलन बनी रहती हैं।पशु के शरीर की जो खाल दबी रहती हैं ।वहाँ मैल चिपटा रहता हैं और उसी के कारण दाद रोग उत्पन्न होता हैं । यह रोग अक्सर बालों वाली जगह होता है अत: इस रोग का उपचार बालों की कटाई करके ही शुरू ही करना चाहिए । और कौई भी दवा या मलहम लगाने से पहले नीम की पत्तियों पानी मे पकाकर रोगग्रस्त स्थान को अच्छी तरह धोना चाहिए । और यदि पपड़ियाँ पड़ गयी है तो उन्हे किसी तेज क्षारयुक्त घोल से मुलायम करके उतार कर गड्डे को खोदकर उसमे दाब देना चाहिए । इससे रोग आगे नही फैलेगा ।

१ - औषधि - कच्छूराषभ तैल , महामरिच्यादि तैल , व नीम तैल की मालिश करनी चाहिए सुबह- सायं इससे तुरन्त लाभ होने लगता हैं ।

२ - औषधि - आँकड़ा ( आँखे का दूध ) निकालकर दादयुक्त स्थान पर लगाने एक बार तो लगता है कि घाव जैसे हो गये है पर वह जड से खत्म हो जाते हैं ।

३ - औषधि - नीम की बक्कल को घीसकर उसमे थोड़ी सी फिटकरी मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से आराम आता हैं ।



८ - सुजवा रोग ( पूरे शरीर पर सूजन )
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कारण व लक्षण - पशुओं को यह रोग पित्तविकार से उत्पन्न होता हैं । इस रोग पशु के पूरे शरीर की खाल सूज जाती हैं । रोगी पशु की खाल दबाने से या खिंचने से वह चरचराहट- मरमराहट सी प्रतित होती है । यह सुजवा रोग तीन प्रकार का होता हैं उनके लक्षण व चिकित्सा इस प्रकार हैं --

१ - प्रथम - इस रोग मे पशु का सारा शरीर फ़ुल जाता हैं ।

२ - द्वितीय - इसमे पशु की पीठ व पेट का चमड़ा फ़ुल जाता हैं ।

३ - तृतीय - इसमे रोगी पशु का सारा शरीर फ़ुल जाता हैं । सूजन वाले स्थान पर उगँली गाँठने पर उस स्थान पर गड्ढा हो जाता हैं ।

१ - प्रथम प्रकार के सुजवा रोग की दवा -

# - औषधि - १२५ ग्राम गेरू , १ किलो नीम की ताजा हरी पत्तियों को पीसकर रखें इस सारे पेस्ट मे गेरू पावडर मिलाकर थोड़ा ताजा पानी मिलाकर आधा पेस्ट नाल द्वारा पशु को पिलाये शेष पत्तियों के पेस्ट को गरम करके पशु के शरीर पर मालिश करें । और पशुपालक को कुछ बातें ध्यान रखना चाहिए -

# - औषधि - सूखा साँभरनमक नमक इस प्रकार के रोग से ग्रसित पशु के शरीर में मलना लाभकारी होता हैं , यदि इस प्रयोग से रोगी पशु को पसीना आ जायें तो यह इस बात का संकेत हैं कि इस प्रयोग से पशु को अवश्य लाभ हो रहा हैं ।

# - काली कसौन्दी की पत्तियाँ आधा किलो , कालीमिर्च आधा छटांक , दोनो को पानी मे पीसकर पशु को पिलाना चाहिए ।

२ - दूसरे प्रकार के सुजवा रोग की दवा -

# - साबुन के पानी से पशु के शरीर पेट व पीठ पर मलना लाभकारी होता है ।

# - गाय का घी एक पाँव देशी साबुन एक छटांक दोनो को एक बर्तन मे पकाकर ठण्डा हो जाने पर रोगी पशु को ५-७ दिन तक पिलाना चाहिए ।

३ - तृतीय प्रकार का सुजवा रोग -

# - बछिया के गोबर के कण्डे ( उपलें ) की राख को पानी मे औटाकर पिलाने से लाभ होता हैं ।

# - विशेष - कुछ चिकित्सकों के अनुसार इस रोग मे रसपित्ती रोगनाशक दवा भी काम करती है उसकी विधी हम उपर दे चूके हैं ।


८ - घामड रोग ( Sun Stroke )
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गर्मी के दिनों मे तेज धूप मे काम करने से पशु को यह रोग हो जाता हैं , इस रोग मे घाम यानि धूप लग जाती है । इस रोग से ग्रसित पशु को धूप मे खड़ा होना अच्छा नहीं लगता हैं उसकी साँस तेज हो जाती है, खाने- पीने की इच्छा नही होती हैं। साथ ही ज्वर भी हो जाता हैं ।

# - रोगी पशु को धूप और लू से बचाकर छायादार स्थान मे रखें तथा निम्न उपचार करें ।

१ - औषधि - पंवार पनवाड़ १२५ ग्राम के लगभग किसी तालाब, पोखर ,आदि से लाकर पीस लें तथा पॉव भर कच्ची खाण्ड के साथ पानी में छानकर ६-७ दिनों तक निरन्तर रोगी पशु को पिलाये ।

२ - औषधि - आम की फ़सल का सीज़न हो तो कच्चे आमों को साबूत ही आग मे भूनकर उनका रस निकालकर नमक, ज़ीरा आदि मिलाकर पानी मे घोलकर पशु को पिलाये ।

३ - औषधि - सफ़ेद तिल २५० ग्राम को रात में मिट्टी के सकोरे ( बर्तन ) मे भिगो दें और प्रात:काल घोटछानकर ७ दिनों तक रोगी पशु को नियमित पिलायें ।

४ - औषधि - ज़ीरा २५० ग्राम , सरसों का तैल २५० ग्राम , मे पीसकर मिला लें और पशु को नित्य सवेरे के समय नियमित ४० दिनों तक पिलायें ।

५ - औषधि - मेहन्दी १ तौला , आधा पॉव सफ़ेद ज़ीरा रात को पानी में भिगोकर मिट्टी के कोरें सकोरे में रख दें , और प्रातःकाल घोटकर रोगी पशु को पिलायें ।

६ - औषधि - चने के हरे पत्तों का साक ५०० ग्राम , भाँग २५० ग्राम , दोनो को घोटपीसकर रोगी पशु को पिलाये रोगी पशु को आराम लगता हैं ।


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