Monday, 9 November 2015

गौ - चिकित्सा-खूरपका मूंहपका

 खुसाड़ा, खूरपका व मुँहपका , घाव


कारण व लक्षण - 
यह जुगलाने वाले पशुओं की दुखदाई बीमारी है । इससे रोगी पशु के मुँह छालें और पैर में ज़ख्म हो जाते हैं । यह अनििश्चत रोग है । अधिकतर सर्दी के दिनों में यह रोग होता है । गर्मी में भी यह कभी - कभी हो जाता है । कभी - कभी वर्षा में भी हो जाता है । यह रोग एक ही पशु को एक हैं । वर्ष में २ - ३ बार भी हो सकता है । यह रोग सर्दी के कारण अधिक होता है । इसमें पशु मरते तो कम है , लेकिन दूँ:ख अधिक भोगते है । इसके चलते कई मादा पशुओं को गर्भपात भी हो जाता है । यह रोग छुआछूत के कारण अधिक फैलता है । यह रोग पहले जगंली सुअरों में होता है , फिर दूसरे पशुओं में फैलता है । इस रोग में सुअर की मृत्यु अधिक संख्या में होती है । ऐसे में पशु सूस्त रहता है । उसके मुँह से लार गिरती रहती है , और वह खाना पीना छोड़ देता है । खुर में ज़ख़्म होने के कारण वह अच्छी तरह चलफिर नहीं सकता और लंग करता है । दूधारू पशु के दूध में कमी आ जाती है । मुँह मे अधिक छालें पड़ जाते है , जिस कारण वह खा- पी नहीं पाता और दिनों - दिन वह कमज़ोर होता जाता है । मुँह के छालें बढ़ते - बढ़ते ज़ख़्म का रूप धारण कर लेते है । पशु के मुँह से दुर्गन्ध आती है । उसका बुखार बढ़ जाता हैं । उसकी नाक से पतला पानी गिरता रहता है ।

१ - औषधि - केला ४ नग , मिस्सी ९ ग्राम , पानी १ लीटर , केले को और मिस्सी को पानी में मिलाकर पशु को , अच्छा होने तक , रोज़ देना चाहिए । केले को पानी के साथ बिलकुल मथकर प्रयोग में लाना चाहिए ।

२ - औषधि - बन्दर की हगार (जंगली ) २५ ग्राम , रोटी या पानी के साथ मिलाकर पिलायी जाय । बन्दर की हगार की धूनी देनी चाहिए ।

३ - औषधि - अलसी का तैल २४० ग्राम , कत्था सफ़ेद १२ ग्राम , कत्था को लेकर महीन पीसकर तैल में मिलाकर , दोनों समय , रोगी पशु को इसी मात्रा में पिलाने से मुँह के छालें अच्छे हो जाते है । तथा पशु घास खाने लगता है ।

४ - औषधि - खरगोश का ख़ून ४ बूँद , अलसी का तैल १२० ग्राम , तैल में ख़ून को मिलाकर रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक ,उक्त मात्रा में पिलाया जाय ।
आलोक -- खरगोश का ख़ून इंजेक्शन से निकालना चाहिए उसकी हत्या नहीं करनी चाहिए ।

टोटका --:-
५ - औषधि - आँकड़े ( मदार ) का दूध ५ ग्राम , अजवायन का तैल ५ ग्राम , सिन्दुर १८ ग्राम , लकड़ी की एक पतली सलाई द्वारा सबको मिलाना चाहिए । हाथ से मिलाने पर हाथ में छालें पड़ जायेंगे । फिर रोगी पशु की पीठ पर (मकड़ी पर ) सलाई द्वारा इतवार को सुबह के समय में दो - दो बूँद लगानी चाहिए । यह दवा अच्छे पशुओ को भी लगानी चाहिए,जिससे उनकाे रोग ना हो पाये ।
टोटका --:-
६ - औषधि - टोटका - कई लोग नीचे लिखा टोटका भी करते है । जिन्हें इस विद्या पर विसवास हो वह करके देंख सकते है । इतवार को सुबह के समय सब पशुओ का थोड़ा - थोड़ा गोबर १२४० ग्राम , लेना चाहिए और ओझा झाड़ ( चिरचिटा का पेंड ) की एक बड़ी हरी जड़ लाकर उसको तैल में और सिन्दुर में भिगोकर उस गोबर के बीच में गाड़ देना चाहिए । फिर एक लाल कपड़े पर सतियाँ ( स्वस्तिक ) बनाकर उसकी एक पोटली बना ली जायें और उस पोटली को मुख्यद्वार पर बाँध दिया जायें ।तब सब पशुओं को उसके नीचे लाना और ले जाना चाहिए । अगर कोई पशु कभी किसी कारणवश मर जाय, तो उस पोटली को छोड़ देना चाहिए और मरे हुए पशु को लें जाने के बाद गोमूत्र छिटककर फिर से उस स्थान पर बाँध देनी चाहिए ।

७--औषधि - रोगी पशु के मुँह तथा पैर को साफ़ करने के लिए नीम की पत्ती १ किलो, पानी १४ लीटर , नीम की पत्तियों को महीन पीसकर पानी में डालकर उबाल लेना चाहिए । फिर छानकर गुनगुने पानी से रोगी पशु का मुँह और पैर रोज़ाना दोनों समय ,आराम होने तक , धोने चाहिए ।
आलोक-- नीम की पत्ती के स्थान पर बकायन,मुजाल,निर्गुन्डी की पत्तियों को लेकर भी कर सकते है ।

# - फिर पशु को अलसी का तैल ६० ग्राम , बेकल की सुखी पत्ती की राख ( ब्रह्मपादप , लैटीन भाषा में- जिम्मास्पोटियम मोटेना ) २४ ग्राम , मालती पञ्चांग ६ ग्राम , बेकल की हरी पत्तियाँ लाकर उन्हें जलाकर उनका पावडर बना लें फिर मालती को महीन कूटछानकर तालमेल मिलाकर रोगी के मुँह के छालें और घाव में दोनों समय,आराम आने तक लगाते रहे ।

८ - औषधि - डीकामाली ( मालती ) ९ माशे , करौंदे की जड़ १२ ग्राम , नारियल का तैल २४,ग्राम , सबको बारीक कूटछानकर सब को आपस में मिलाकर रोगी पशु के मुँह और पैरों पर दोनों समय , आराम होने तक ,लगाया जाना चाहिए ।

९ - औषधि - खटामा,( खाटखटुम्बा ,अम्बरबेल ) २० ग्राम , पीकर कीड़े पड़े ज़ख़्म में भरकर ऊपर से पट्टी बाँध दी जाय । उसके ऊपर मिट्टी का लेप लगा दिया जाय। इससे कीड़े मर जायेंगे । मिट्टी की जगह गाय का गोबर भी लगा सकते है ।

१० - औषधि - कीड़े वाले ज़ख़्म में रूई द्वारा अजवायन तैल भी लगाया जाय तो कीड़े बहुत जल्दी मरते है ।

११ - कीड़े वाले ज़ख़्म मे पीसा हुआ नमक भरकर ,ऊपर से पट्टी बाँधी जाय और उसके उपर गाय का गोबर का लेप कर देना चाहिए ।

टोटका - : - बड़ी लाजवन्ती १० ग्राम , कीड़े वाले पशु को खिलायी जाय और लाजवन्ती की एक बीटी बनाकर रोगी पशु के गले में बाँध दी जाय। तो सब कीड़े मर जायेंगे ।

टोटका - : - छोटी दूद्धी (हजारदाना ) ६० ग्राम , रोगी पशु को खिलायी जाय और ६० ग्राम दूद्धी लेकर रोगी पशु के गले से टच करके किसी कपड़े से बाँध दें शरीर के सभी कीड़े मर जायेंगे ।

१२ - औषधि - ज़ख़्म ( घाव ) -- सिन्दुर १२ ग्राम , नारियल तैल १२ ग्राम , दोनों को मिलाकर ज़ख़्म पर लगाया जाय । इससे ज़ख़्म जल्दी ठीक होगे ।
आलोक :- किन्तु ध्यान रहे पशु घाव को चाटने न पायें और पट्टी पर जो गोबर लगाये वह देशी गाय का ही गोबर होना चाहिए । नहीं तो पशु चाटता रहेगा और घाव बढ़ता रहेगा ।

१३ - औषधि - गेन्दा फूल के पेड़ की पत्तियाँ ताेडकर उनका रस निकालकर घाव में भरकर पट्टी बाँध ने से भी कैसा भी घाव हो जल्दी ठीक होता है । पट्टी पर गाय का गोबरअवश्य लगायें ।

१४ टोटका- औषधि - हींग ९ ग्राम , सरसों का तैल २४० ग्राम , दोनों को मिलाकर वर्षा और शीत ऋतु मे हर इतवार के दिन बोतल द्वारा पिलाया जाय । इससे पशु को बिमारी नहीं होगी ।

१५ -टोटका- औषधि - मीठा तेल ३६० ग्राम , हर इतवार को मौसम के अनुसार पिलाते रहे । मीठे तैल के स्थान पर अलसी का तैल भी प्रयोग करते है ।

१५ -टोटका- गौशाला में खरगोश पाले जायें ।उनका कटघरा मुख्यद्वार के पास ही हो । कटघरे की सफ़ाई करते समय जो कचरा निकलता है उसे गौशाला के गेट पर ही डाल देना चाहिए । और उसके ऊपर से सभी पशुओं को निकाले तो खूरपका मुहँपका रोग नहीं आयेगा । दूसरे दिन उस कचरे को साफ़ कर कटघरे का नया कचरा फिर फैला देना चाहिए । जिन दिनों यह बिमारी हो उन दिनों तो तरना ही चाहिए लेकिन अगर हम इसे प्रतिदिन करे तो यह रोग गौशाला में आयेगा ही नही ।

आलोक -:- यह ध्यान अवश्य रहे की रोगी पशु को नमक और गुड़ भूलकर भी नहीं खिलाना चाहिए । अगर रोगी पशु घास - दाना न खाये तो उसे चावल का माँड़ या ज्वार का आटा पकाकर खिलाया जाय ।इससे उसके पेट में ठंडक होगी और पेट भरेगा । ज्वार का आटा १ किलो , पानी ४ लीटर , दोनों को मिलाकर पकाया जाय और ठंडा होने पर रोगी पशु को दोनों समय , घास दाना न खाने तक खिलाया जाना चाहिए ।

# - अगर रोगी पशु को कुछ खिलाया- पिलाया न जाय और पानी ही ख़ूब पिलाया जाय तो रोगी पशु को पानकाशी की बिमारी हो जायगी ।

१६ - औषधि - खुसाड़ा से विलायती गायों को १०५ से १०७ सेंटीग्रेड तक बुखार हो जाता है ऐसे में पशु को बालोल ( सेम ) की नरम-नरम पत्तियाँ खिलानी चाहिए ।

१८ - औषधि - हरी शीशम की पत्तियाँ खिलानी चाहिए , २५० ग्राम , शीशम की पत्तियों को बारीक पीसकर उसका रस १ लीटर पानी में मिलाकर दोनों समय ,उक्त मात्रा में रोगी पशु को खाने के लिए देना चाहिए । हरी - हरी नीम की पत्तियाँ खिलानी चाहिए । एक किलो नीम की पत्ती को बारीक कुटकर और ५०० ग्राम , पानी में मिलाकर पिला देंना चाहिए ।

१९ - औषधि - एक किलो नीम की बारीक पीसकर एक लीटर पानी में उबालें और गुनगुना होने पर पशु को पिला दें ।

२० - हाथी सुण्डी ( हेलीओट्रोपियम इण्डिकम ) ६० ग्राम ( य़ह दवाई कार्तिक महीने के बाद गड्ढे़ सुखने के बाद उन गड्ढों में उगती है ) बारीक पीसकर १०० ग्राम , पानी में मिलाकर पिला देनी चाहिए । उसे गरम करके देने से ज़्यादा फ़ायदा होता हैं ।

२१ - जलजमनी ( बछाँग ) २१६० ग्राम , पीसकर ४०० ग्राम ,पानी में पिला देने से ज़्यादा लाभ होता है ।

२२ - औषधि - हरड़ बेल की पत्ती ४८० ग्राम , को पीसकर ५०० ग्राम , पानी के साथँ मिलाकर पिलानी चाहिए ,गरम करके पिलाने पर ज़्यादा फ़ायदा है ।
# - हरा चारा पैराग्रास काटकर देना चाहिए ,उसकी कुट्टी नहीं देनी चाहिए , क्योंकि कुट्टी खाने पर पशु को तकलीफ़ होती है । वह उसे चुभती है ।

२३ - रोगी पशु को गोमूत्र पिलाने से ज़्यादा फ़ायदा होता है । इसलिए रोज,अच्छा होने तक , उसे गोमूत्र पिलाना चाहिए ।

आलोक-:- गजराज, पुर्निया कोई भी हो तो हरा चारा खिलाना चाहिए। सूखा भूसा या घास नहीं देनी चाहिए ।

२४ - औषधि - बेकल ( ब्रह्मपादप ) की पत्ती ४८० ग्राम , पीसकर उसका रस एक लीटर पानी के साथ मिलाकर पिलानी चाहिए ।

२५ - औषधि - ब्रह्मपादप ( बेकल ) की पत्ती को तवे पर भूनकर , बारीक पीसछानकर निम्न मात्रा में मलहम बनाकर छालें में लगाया जायें । बेकल की पत्तियों को भूनकर राख ४८ ग्राम , अलसी का तैल ४८ ग्राम , दोनों को लेकर मरहम बना लें और घाव व छालों पर लगायें ।

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२६ - खूरपका व मुहँपका
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१ - औषधि - सतअजवायन २०ग्राम , मुश्ककपुर २० ग्राम ,पीपरमैंटसत् ३ग्राम ,लौंगतैल ३ ग्राम , शुद्ध हींग ५ ग्राम , हींग को बारीक पीसकर,सभी चीज़ों को मिलाकर काँच की बोतल में भरकर दो घंटे धूप में रखकर तैयार हो जायेगा । बोतल का ढक्कन टाईट रखे नहीं यह औषधि उड़ने लगती है ।

विधी- एक नाल पानी में बड़े पशुओं के लिए २० बूँद व छोटे पशुओं के लिए पाँच बनूँ मिलाकर देवें तथा दूसरी खुराक एक हफ़्ते बाद देने से पशुओं में यह बिमारी नहीं आयेगी ।

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२७ - रोग - खूरपका ( गोड़हवा ) ।
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औषधि - नीम का तेल ।

पशुओं के खुर पक जाने पर नीम का तेल १० ग्राम लेकर रोटी या आटे के पेड़े में मिलाकर पशु को खिला दें । खिलाने के तीन दिन बाद ठीक न होने पर एक बार फिर से दवाई को दें देना चाहिए ।