Sunday, 8 November 2015

(३४)-१- गौ- चि०-अन्य बिमारियाँ ।

(३४)-१- गौ- चि०-अन्य बिमारियाँ ।

१ - हरनियाँ की बिमारी
==============================

कारण व लक्षण - पशुओं की आपस की लड़ाई से सींग लगने पर हो जाती है । पेट का भीतरी चमड़ा फट जाता है । और आँते बाहर आजाती है , आँते दबाने से अन्दर दब जाती है और फिर निकल आती है । पेट के दोनों तरफ़ जिधर भी चोट लग जाये उधर ही सूजन दिखाई पड़ती है ।

१ - औषधि - नीम के उबले हुए पानी से धोना चाहिए , तथा उसी से सेंकना चाहिए , यदि इससे आराम न हो तो मालिश करनी चाहिए ,

----------------- @ ---------------------

३ - हाथीपगा
===================

कारण व लक्षण - यह रोग एक प्रकार की सूजन है । इस रोग में सर्वप्रथम कान , आँख , फिर क्रमश: मुँह पर सुजन फैल जाती हैं । इस रोग में ख़ून का पानी बनना शुरू हो जाता है । इलाज न होने पर रोगी तुरन्त मर जाता है ।

१ - औषधि - सबसे पहले रोगी पशु के कान को आँख के बराबर लेजाकर मिला लेना चाहिए । फिर दोनों कानों की नोंक को नीचे की ओर से तेज़ चाकु द्वारा काट लें और उससे निकलने वाले ख़ून की १०-१० बून्द रोगी पशु की आँखों में डालना ( आंजना ) चाहिए । अवश्य ही आराम होगा ।

------------------- @ ---------------------

४ - मस्सें, इल्ला,या आइला
===========================

कारण व लक्षण - पशु को मस्सें हो जाये तो उन्हें ठीक करने के अनेक उपाय है ।

१ - औषधि - गाय का मूत्र ५०० ग्राम , नीला थोथा ५० ग्राम , नीला थोथा के छोटा टुकड़ा लेकर के गोमूत्र में भिगोकर मस्सें पर दिन में २-३ बार लगाना चाहिए आराम आनेतक लगाये ।

२ - औषधि - मेंथी के बीज का आटा २४० ग्राम , पानी ५०० ग्राम , मेंथी का आटा बनाकर उसे आठ घन्टे तक पानी में भिगोकर रखे । हर बार इस मात्रा को ही पशु को आराम होने तक दिन में दो बार देना चाहिए ।

३ - औषधि - मस्सें मे घोड की पुछ के बाल से मज़बूत गाँठ लगा देनी चाहिए कुछ दिन मे मस्सा कटकर नीचे गिर जायेगा ।

४ - औषधि - तेज़धार वाले चाकु या ब्लेड से मस्सें को काटकर गोमूत्र में फिटकरी भिगोकर कटे हुए स्थान पर फिटकरी रगड़ने से ख़ून बंद हो जायेगा और घाव पकेगा भी नही ।

५ - औषधि - सेम की बेल के पत्तों का रस २५० ग्राम , मस्सों के अनुसार दिन मे २-३ बार ठीक होने तक लगाना चाहिए ।

------------------- @ --------------------

५ - मिर्गी - दौरा
=================

कारण व लक्षण - यह रोग पशुओं कम व बच्चों में ज़्यादा होता हैं । इस रोग की उत्पत्ति हरे चारे की कमी व पेट में कीड़े पशु के दिमाग़ में चढ़ जाने के कारण होता हैं कारण यह रोग हो जाता है । इस रोग में पशु अचानक काँपने लगता है व लड़खड़ाने लगता है , उसकी गर्दन व शरीर एकदम अकड़ सा जाता है ,रोग का आक्रमण होते ही पशु बिना देखें ही गिर पड़ता है । उसके मुख से झाग निकलती रहती है , और पशु आँखों को घुमाता रहता है यह रोग पानी और आग के स्थान पर अधिक होता है , पशु पानी वर्ग में गिर भी जाता है । वह पशु डूबकर या जलने के कारण मर जाता है ।

# - टोटका - उपचार - मुर्छा तोड़ने के लिए रोगी पशु के कानों से ही उसकी दोनों आँखों को दबाया जाय इससे पशु को आराम आ जायेगा और दौरा चला जायेगा या पशु के नाक के बीच का हिस्सा जहाँ पर पसीना आता है उस स्थान को ऊपर को दबाना चाहिए दौरा टूटने तक , व आँखों में जिस स्थान पर डीढ आती है उस स्थान को को दोनों आँखों को अगूँठे से दौरा टूटने तक दबाना चाहिए ।

# - टोटका - रीठे का छिल्का बारीक पीसकर बेहोशी की स्थिति में पशु को सुँघा देने से उसे तत्काल होश आ जाता हैं ।

# -टोटका - गाय के गोबर से बने उबले की राख में आक ( मदार ) का दूध मिलाकर बेहोश पड़े पशु को सुँघा देने से भी मिर्गी की मुर्छा दूर हो जाती हैं ।

# - आलोक - पशु की मिर्गी मुर्छा तोड़ने के लिए रोगी पशु के मुँह पर या अन्दर पानी आदि नहीं डालना चाहिए । इस रोग को दूर करने के लिए पेट के कीड़ों को नष्ट करना अतिआवश्यक हैं , जिसके लिए दवाओं का आगे वर्णन किया जायेगा ।

१ - औषधि - पहले रोगी को अच्छा जूलाब देकर उसका पेट साफ़ करना चाहिए । जूलाब -:- सोना- पाली ६० ग्राम , गौमूत्र ९६० ग्राम , सोना- पाली को पीसकर गौमूत्र में मिलाकर नाल या बोतल से पिलाया जायें ।

२ - औषधि - चिरौंजी का तैल ६ ग्राम , तारपीन का तैल ३६ ग्राम । दोनों को मिलाकर रोगी को प्रतिदिन सुबह एकबार आराम होने तक पिलाया जाय ।

४ - औषधि - चक्रमर्द ( पवाडिया ) ४८० ग्राम , सेंधानमक ३६ ग्राम , पानी ३८४० ग्राम , सबको बारीक कूट पीसछानकर पानी में उबाला जाये , आधा- आधा बाँटकर एक मात्रा सुबह व एक सायं को खिलानी चाहिए इसके अतिरिक्त और कौई दवाई नहीं देनी चाहिए ।

५ -औषधि - पलाश पापड़ा यानि ढाक के बीज , अनार की छाल , सौँफ और अमलतास प्रत्येक १-१ तौला लें । सबको कूटपीसकर आधा लीटर जल में पकावें । जब जल २५० ग्राम रह जायें तो गुनगुना - गुनगुना ही पशु को ख़ाली पेट नाल द्वारा पिलायें । साथ ही यह दवा देना ज़रूरी हैं १५ मिनट बाद ही पशु को तिल का तेल या अलसी का तेल या सरसों का तेल आधा छटांक मिलाकर पिला दें । ५-६ दिनों तक नियमित रूप से यह प्रयोग करना चाहिए ।

६ -औषधि - यदि उपरोक्त औषध के ५-६ दिन के बाद कोई लाभ न हो तो - पहले मीठा तेल ( तिल का तेल ) और तारपीन का तेल उपरोक्त मात्रा में मिलाकर पशु को जूलाब दें उसके बाद नमक ढाई तौला , नीम की पत्ती ढाई तौला , गाय के दूध से बनी छाछ आधा शेर में भली - भाँति घोटछानकर , २ छटांक सरसों का तेल मिलाकर रोगी पशु को नित्य पिलाते रहे ।इस प्रयोग को एक माह तक करने से रोग समूल नष्ट हो जाता हैं ।

-------------------------- @ -----------------------


६ - माता का अपने बच्चे को भूल जाना
=======================================

कारण व लक्षण - कभी - कभी मादा पशु जन्म देने के बाद अपने बच्चे को भूल जाती है ।औरउसकी न तो दूध पिलाती है और न प्यार करती है । वह उसे पराया बच्चा समझँ कर दूर भागती है । मादा पशु को जन्म देते ही उसके बच्चे को हटा लेने से या बहुत से बछड़ों में उसका बछड़ा मिल जाने से वह अपने बछड़े को भूल जाती है ।

१ - औषधि - टटीरी ( चिड़िया ) के अण्डे का खोल ( जब चिड़िया का बच्चा अण्डे से बाहर आ जाता है तब शेष खोल को उपयोग में लाए ) का भाग ४ माशा , काली मिर्च ६ माशा लेकर अण्डे के छिलके व मिर्च को महीन पीसकर एक छोटे से कपड़े में पोटली बाँध लें ,उस पोटली को किनारे से बाँध लें एक मज़बूत धागे द्वारा और पोटली पर तैल लगाकर पोटली को पशु की योनिमार्ग से पशु की योनि में अन्दर डाल दें तथा १० मिनट तक अन्दर ही रहने दें । तथा शेष धागे को पूछके ऊपरी भाग में बाँध दें । फिर भूले हुए बच्चे को उसके पास लाया जाय तो वह उससे प्रेम करने लगती है और उसको दूध पिलाने लगती है । तब पोटली के धागे को खोलकर बाहर निकाल लिया जाय तथा पोटली को बाहर निकालकर बच्चे के ऊपर रगड़ दिया जायजिससे माँ बच्चे को चाटने लगेगी ।

२ - औषधि - मोर के अण्डे का छिल्का तीन माशा महीन पीसकर रोटी के साथ दोनों समय तीन दिन तक खिलाया जाय । यह छिल्का भी अण्डे से बच्चे बाहर आने के बाद का ही प्रयोग करें ।

३ - औषधि - गाय के दूध की दही २४० ग्राम , पिसाहुआ सादा नमक २४ ग्राम , दोनों को मिलाकर बच्चे के शरीर पर चुपड़ देना चाहिए । फिर उस बच्चे को उसकी माँ के मुँह के पास लें जायें तो माता उससे प्रेम करने लगेगी और उसे चाटने लगेगी तथा दूध देने के लिए पाना छोड़ देगी ।

४ - औषधि - सादा नमकपावडर १२ ग्राम , हल्दी पावडर १२ ग्राम , दोनों को मिलाकर एक कपडें में बाँधकर एक पोटली बनाकर मज़बूत धागे से बाँध दिया जाये तथा पोटली पर नारियल तैल लगाकर पोटली को योनिमार्ग से योनि में अन्दर रख दिया जाये ५-६ मिनट तक हिलाते रहे फिर पोटली को बाहर निकालकर पोटली को बच्चे के शरीर पर रगड़ दिया जाय तथा बच्चे को माँ के पास लें जाते समय बच्चे की आवाज़ में मैं- मैं की आवाज़ निकालकर आगे बढ़ते हुए बच्चे को माँ के मुँह के सामने खड़ा कर देना चाहिए । जिससे माँ बच्चे को चाटने लगेगी व अपना लेंगी और प्रेम करने लगेगी तथा दूध देने व बच्चे को दूध पिलाने के लिए तैयार हो जायेगी ।
५ - टोटका -:- औषधि - आधा किलो गुड़ , ५० ग्राम नमक पावडर, मिलाकर ॐ नम: शिवाय , मंत्र का जाप करते हुए मादा पशु को खिलायें तब वह दूध देने लगेगी तथा बाद में आधाकिलो गुड़ रोज़ देते रहे ,जब पशु खुब दूध देने लगे तो गुड़ देना बन्द कर देना चाहिए ।

आलोक -:- ध्यान रहे की ऐसी स्थिति में पशु के दूध न देने पर उसे भूलकर भी मारना नहीं चाहिए तथा उसे प्रेम करना चाहिए ।

६ - औषधि - रोगी मादा पशु को लगभग २० क़दम की दूरी पर बाँधकर उसके बच्चे के शरीर पर गाय के दूध से बनी दही ५०० ग्राम , नमक ३० ग्राम , दोनों को मिलाकर बच्चे के शरीर पर रगड़ दें तथा कुछ दही एक बर्तन में रखकर कुत्ते को खाने के लिए दें और बछड़े भी उसी बर्तन में खिलाने कि कोशिश करें जब माँ कुत्ते को दही खाता देखेंगी तो उसे हटाने आयेगी और कुत्ते को भगायेंगीं तब अपने बच्चे को अपना लेंगी लेकिन गाय का रस्सी इतनी लम्बी हो की वह वँहा तक आ जाये ।

७ - औषधि - अपामार्ग ( चिरचिटा ) के पौधे की दो जड़ रोटी में रखकर मादा पशु को सुबह - सायं , दिन में दो बार खिलाये ।

------------------------- @ -----------------------


७ - बिला होना
=======================

कारण व लक्षण - यह रोग गायों को अधिक होता है । इस रोग के पैदा होने का कारण साबुन की तरह झागदार एक मक्खी है ।यह मक्खी वर्षाऋतु में हर घास के ऊपर पायी जाती है , यह मक्खी पशु की नाक से साँस द्वारा दिमाग़ में चढ़ जाती है । इसका असर तीन दिन अधिकतम रहता है । यह रोग भैंसों की अपेक्षा गायों को अधिक होता है । क्योंकि गायों की श्वास क्रिया भैंसों से कमज़ोर होती है । भैंसें अपनी ज़ोरदार श्वास से दूर भगा देती है । यह सफ़ेद मक्खी वर्षा ऋतु में अधिक होती है तथा झडी में मर जाती है । यह मक्खी जैसे पशु के दिमाग़ में पहुँचती है पशु बिमार हो जाता है । रोगी पशु बहुत सुस्त रहता है ,खाना पीना जूगाली करना बन्द कर देता है ।उसका शरीर अकड़ जाता है वह कापँने लगता है ,वह कभी एक पैर से कभी दो पैर से और कभी तीन पैर से लंग करता है जिस स्थान पर वह बैठ जाता है वहाँ से वह बिना उठाये उठ नहीं पाता है । कभी - कभी रोगी पशु का गोबर और पेशाब करना तक बन्द कर देता है रोगी पशु कभी- कभी तीन दिन तक पानी नहीं पीता है ,यह रोग तीन दिन अधिक ज़ोर करता है और पशु के होंठ सूख जाते है ।

१ - औषधि - सफ़ेद प्याज़ का रस २० बून्द, रोगी पशु मुँह को हाथ से खोलकर रखें और नाक को ऊपर उठाकर नाक के नथुनों मे १०-१० बुन्दे डालकर नाक को ऊपर उठा देना चाहिए ७-८ मिनट के लिए जिससे दवा पशु के दिमाग़ तक पहुँच जाये । यही क्रिया आधा घन्टे बाद फिर से दोहरानी चाहिए ,इससे पशु अवश्य अच्छा होगा यदि सफ़ेद प्याज़ न मिले तो लाल प्याज़ लें सकते है ।

२ - औषधि - सफ़ेद प्याज़ १२ ग्राम , लहसुन १२ ग्राम , दोनों को मिलाकर पीसा जाय , फिर कपड़े में रखकर निचोड़कर रस निकाला जाय फिर उपर्युक्त विधी द्वारा नाक मे ५-५ बुन्दे डाली जाये इससे अवश्य आराम होगा अगर नहीं हुआ तो आधा घन्टे बाद एक बार इसी खुराक को देवें ।

३ - औषधि - रोगी पशु के सिर पर व सींगों में कडवी तोरई की बेल को लपेट देना चाहिए ,उसकी कडवी गन्ध से वह मक्खी मर जायेगी ।पशु को आराम मिलेगा ।

४ - टोटका -:- वर्षा के दिनों में अमावस्या या पूर्णिमा के दिन उस झागदार मक्खी को एक पत्ते या काग़ज़ में लेकर अपने सब पशुओं केआसपास एक पूरा चक्कर लगाकर फिर पशुओं के ठीक मध्य में बैठकर उस पुडियाँ ( झागदार मक्खी ) को अपनी पगड़ी या साफ़ा आदि में बाँध लें ,उससे पशुओं को यह रोग नहीं होगा । किसी दूसरे व्यक्ति के पशुओं को यह रोग हो तो उस पगड़ी या साफें को पशु के सिर की ओर से पैर की ओर २१ बार घुमाए । इससे पशु चंगा हो जायेगा और चलने फिरने लगेगा तथा घास खाने लगेगा ।

--------------------------- @ ----------------------------


८ - बच्चे के मरने पर माता का दूध न देना
=======================================

कारण व लक्षण - गाय, भैंस का बच्चा कई बार पैदा होते ही मरजाता है या मरा हुआ पैदा होता है तो पशु दूध नहीं देता है । ऐसे में पशु दूध के दबाव के कारण परेशान रहता है और मालिक भी ।

१ - औषधि - कलिहारी मूल ६ ग्राम , गुड २४० ग्राम , कलिहारी को कूटपीसकर दोनों समय गुड़ में मिलाकर आठ दिन तक मादा पशु को खिलाना चाहिए ।

२ - औषधि - अपामार्ग ( चिरचिटा ) की जड़ ३६ ग्राम , गुड ४८० ग्राम , जड को बारीक पीसकर गुड़ में मिलाकर दोनों समय इस मात्रा को ६-७ दिन तक देना चाहिए ।

३ - औषधि - अश्वगन्धा ६० ग्राम , गेहूँ का दलिया ९६० ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , गाय का घी १८० ग्राम , सबको मिलाकर पानी में पकाकर , दोनों समय , दस दिन तक , खिलाना चाहिए ।

# - आलोक -:- ऐसे दूधारू पशु को पहले गुड़ खिलाकर और बाद में गुड़ को दाने में मिलाकर दुहना चाहिए । गुड़ के लालचवश मादा पशु दूध देगी । १५० ग्राम नमक तथा ४०० ग्राम गुड, दोनों समय मिलाकर फिर २५० ग्राम गुड, मादा पशु को खिलाने से दूध देने लगती है ।

-------------------------- @ --------------------------



९ - थके बैल की पहचान व चिकित्सा
=========================

कारण व लक्षण - जब बैल बहुत अधिक चलता हैं तब वह थक जाता हैं और लँगड़ाने लगता हैं उसके पैर की नसें फ़ुल जाती हैं वह थोड़ा चलकर रूक जाता हैं और बहुत सुस्त हो जाता हैं ।

# - उपचार - बैल को ऐसे स्थान पर बाँधना चाहिए जहाँ हवा न आती हो किन्तु मकान मे दिन का उजाला आता हो । थके हुए बैल के ऊपर २-३ कम्बल लपेट देने चाहिए । बहुत थोड़ी- थोड़ी मात्रा मे बैल को शराब पिलानी चाहिए इस उपाय से बैल को पसीना आकर उसका बदन खुल जायेगा ।
# - औषधि - गुड १ पाँव , हल्दी आधा छटाक , अजवायन एक छटाक ,चूना १ तौला , सभी एक साथ बर्तन मे डालकर आवश्यकतानुसार पानी डालकर काढ़ा बना ले फिर थके हुए बैल को गुनगुना ही पिलाने से लाभ होता हैं ।



१० - दुर्बलता
================

कारण व लक्षण - पशु का दिन- प्रतिदिन कमज़ोर होते जाना , मन्दाग्नि , श्वास - प्रश्वास की गति में तीव्रता , किन्तु गले मे घुरघुराहट होती रहना , शरीर के रंग में परिवर्तन होना आदि लक्षण इस रोग की मुख्य पहचान हैं । यह बिमारी प्राय: बैलों को होती हैं

१ - औषधि - दुबलेपन की शिकायत मे पशु को लम्बे समय तक प्याज़ खिलाना लाभदायक होता हैं ।

२ - औषधि - सौंठ , काले तिल , और सफ़ेद मूसली , प्रत्येक २५०-२५० ग्राम , लेकर तथा भली प्रकार कुटपीसकर ,गाय का घी २५० ग्राम , मिलाकर - एक दिन पुर्व भीगे हुए लगभग २ किलो गेहू को कुटकर इसमे मिला लें , इसके १० लड्डू तैयार कर लें , इन लड्डुओं को दिन मे दो बार सुबह- सायं रोगी पशु को खिलायें ।



११ - ज़रा रोग
==============

कारण व लक्षण - शरदकाल मे उत्पन्न होने वाले घासों ( चारा ) पर मुख से श्वेत रंग का स्राव छोड़ने वाला एक कीट पैदा हो जाता हैं । घास चरते समय उस कीट को जब कोई पशु उदरस्थ कर लेता हैं तो वह इस रोग से पीड़ित हो जाता हैं । और पशु की मुख्य पहचान यह है कि - कीड़ा खाये पशु का बदन काला - सा पड़ने पड़ने लगता हैं ।

१ - औषधि - रोगी पशु की शारीरिक दशा , आयु और रोग की तीव्रता और दशाओं के अनुसार तथा स्वानुभव के आधार पर रोगी पशु को पिसी हुई कालीमिर्च गाय के घी मे मिलाकर पिला देने से इस कीड़े का ज़हर नष्ट हो जाता है ।

२ - औषधि - कड़वा करेला एक से डेढ़ किलो कूटकर पशु को ७-८ दिन तक खिलाते रहने से कीड़े का विषैला प्रभाव समाप्त हो जाता हैं ।


Sent from my iPad